





भगवान ब्रह्मा द्वारा महर्षि भृगु का निर्माण सृष्टि के सृजन कार्य के लिए किया गया था। ये समस्त प्रजापतियों में से एक हैं। इनका विवाह राजा दक्ष की पुत्री ख्याति से हुआ था, इनके दो पुत्र धाता व विधाता थे। कई अन्य पुराणों के अनुसार ऋषि शुक्र व ऋषि च्यवन इन्हीं के पुत्र हैं।
हम सभी यह जानने के इच्छुक व उत्सुक रहते हैं कि हमारा आने वाला समय, हमारा भविष्य कैसा रहेगा? आज ही नहीं अपितु वैदिक काल से ही मनुष्य-जाति का इसके प्रति रूझान था। प्राचीन भारत में महर्षि भृगु भविष्य बताने के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी रचना भृगु संहिता समस्त ज्योतिष शास्त्र का आधार है।
एक दिन सरस्वती नदी के तट पर सभी ऋषि-मुनि एक महायज्ञ में सम्मिलित हुए, महर्षि भृगु भी वहां प्रस्तुत थे। सभी ऋषिगण इस उलझन में थे कि हवन के लिए मुख्य स्थान कौन से भगवान अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से किन्हें प्रधानता दी जाए। चर्चा चली कि क्यूं न इन सभी भगवान में से सर्वोपरि कौन हैं, इसकी परीक्षा ली जाए? सर्वसम्मति से सभी ऋषिगण ने महर्षि भृगु को त्रिमूर्ति की परीक्षा लेने का कार्य सौंपा कि वे ही यह बताएं कि तीनों भगवान में से अग्रगण्य कौन है?
इस परीक्षा हेतु महर्षि भृगु ने सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के यहां ब्रह्मलोक की ओर प्रस्थान किया। वहां जाकर योजना अनुसार महर्षि भृगु ने भगवान ब्रह्मा से बड़ी ही अशिष्टता से व्यवहार किया, जिससे वे ब्रह्मा जी के धैर्य की परीक्षा ले सके और वैसा ही हुआ, ब्रह्मा जी अत्यन्त क्रोधित होकर भृगु को दण्डित करने को आतुर ही गये पर मां सरस्वती ने बीच में आकर महर्षि भृगु की ब्रह्मा जी के क्रोध से रक्षा की। स्वयं को तिरस्कृत होता देख महर्षि भृगु भी आवेश में आ गए, उन्होंने भगवान ब्रह्म को श्राप दे डाला कि कलियुग में कोई भी ब्रह्मा जी की पूजा नहीं करेगा। इसीलिए भगवान ब्रह्मा के बहुत कम मंदिर है। ब्रह्मलोक से जाने के बाद महर्षि भृगु भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत की ओर गए। जब वे वहां पहुंचे तो शिव के प्रमुख गण नन्दी ने उन्हें भगवान शिव से मिलने से रोक दिया क्योंकि उस समय शिव रमण क्रिया में व्यस्त थे। महर्षि भृगु ने शिव जी को भी श्राप दे दिया कि वे अब से लिंग के रूप में ही पूजे जायेंगे। इसी कारण से शिव के मूर्तरूप से अधिक शिवलिंग की पूजा होती है।
अंत में विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए भृगु श्री विष्णु धाम वैकुण्ठ में पहुंच गए और बिना किसी की अनुमति लिए भीतर प्रवेश कर गए। जब वे विष्णु जी के यहां पहुंचे, तब वे विश्राम कर रहे थे, भृगु ने उन्हें जाग जाने को कहा परन्तु भगवान विष्णु बहुत ही गहरी नींद में सो रहे थे। जब भगवान विष्णु से कोई उत्तर नहीं मिला तो महर्षि भृगु ने विष्णु जी के सीने पर जोर से लात मार दी, प्रहार में इतना तेज बल था कि उससे भगवान विष्णु के सीने पर भृगु के पैर का निशान पड़ गया।
अचानक प्रहार होने पर भगवान विष्णु की नींद टूट गयी और तब उन्हें समझ आया कि प्रहार महर्षि भृगु ने किया था। यह जान भगवान विष्णु जरा भी विचलित नहीं हुए, उन्होंने महर्षि भृगु से पूछा कि कहीं इस प्रहार से उनके पैर में कोई चोट तो नहीं आई। भगवान विष्णु का इतना निर्मल व्यवहार देख भृगु अति प्रसन्न हुआ और उन्होंने भगवान विष्णु को त्रिदेव में सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया।
अनेक पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान विष्णु की अर्धांगिनी माँ लक्ष्मी को इस घटना के बारे में ज्ञात हुआ कि भृगु ने श्री विष्णु पर इतना प्रचंड प्रहार किया है तो वे क्रोधित हो गई, उन्होंने महर्षि भृगु को श्राप दिया कि वे कभी किसी ब्राह्मण के यहां नहीं रहेंगी और समस्त ब्राह्मण सदा धन के अभाव में ही रहेंगे। यह सुनने पर महर्षि भृगु ने वैकुण्ठ धाम में आने का अपना उद्देश्य माँ लक्ष्मी को बताया, तब वे शांत हुई। माँ लक्ष्मी ने कहा कि ब्राहमण धन-वैभव के अभाव में रहेंगे, परन्तु जो भी ब्राह्मण भगवान विष्णु का पूजन करेगा, वह इस श्राप से मुक्त हो जायेगा।
शीघ्र ही महर्षि भृगु को भी आभास हो गया कि उन्हें त्रिमूर्ति में से श्रेष्ठ चुनने का अधिकार नहीं है और न ही उनकी निजता भंग करने का और उन्हें श्राप देना भी अनुचित है। क्योंकि त्रिमूर्ति ने ही उन्हें बनाया और उन्हीं की भक्ति के वरदान से वे एक प्रसिद्ध ऋषि बन पाये। अपने क्रोधपूर्ण व्यवहार के लिए भृगु ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश सभी से क्षमा मांगी और बड़ी ही सरलता के साथ उन तीनों ने महर्षि भृगु को क्षमा कर दिया। तब से भगवान विष्णु, ब्रह्मा, शिव का हवन में की जाने वाली पूर्णाहुति में सर्वोच्च स्थान है और भक्तजन अपनी आस्था अनुसार इन सभी भगवान में से किसी के भी नाम के साथ आहूति दे सकते हैं।
इस वृतान्त के बाद महर्षि भृगु को व्यर्थ के घमंड और क्रोध से दूरी बना लेने की प्रेरणा मिली। इसी के बाद भृगु ने भगवान गणेश व माँ सरस्वती के आर्शीवाद् से ज्योतिष पर आधारित सुप्रसिद्ध ग्रंथ भृगु संहिता की रचना की। जिसके ज्ञान द्वारा समस्त ब्राह्मण वर्ग अपना जीवन यापन कर सके। भृगु संहिता एक ऐसा ग्रंथ है जो समस्त मानव जाति के लिए कल्याणकारी है और उन्हें मोक्ष के मार्ग से भी अवगत कराता है।
महर्षि भृगु ने इस महान ग्रंथ की रचना करने के लिए अनेकों जन्म कुण्डलियां एकत्र की, उनके सम्पूर्ण जीवन काल के लिए भविष्यवाणी लिखीं, उन्हें एक साथ संकलित किया और कई महत्वपूर्ण व जटिल शोध व गणनाएं भी कीं। वर्तमान में भृगु संहिता के कुछ हिस्से नष्ट हो गए हैं और कुछ हिस्से अभी भी मौजूद हैं और ज्योतिषियों के प्रयोग में आ रहें है, जिससे मानव जाति का कल्याण हो रहा है।
निधि श्रीमाली
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