





हमारा प्राचीन ऋषि कालीन ज्ञान-विज्ञान आज के आधुनिक वैज्ञानिक शोध पर सौ फीसदी सत्य व पूर्णतः प्रामाणित हुआ है। मनुष्य शरीर अनन्त संभावनाओं का पिण्ड है, जिसका सही रूप में उपयोग कर व्यक्ति अपने जीवन को नवीन आयाम दे सकता है। इड़ा व पिगंला नाड़ी के मध्य स्थित छठी इंद्री मनुष्य देह में वह चेतना है, जो प्रत्येक क्रिया या घटना का पूर्वाभास कराती है। छठी इंद्री पशु-पक्षी में सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक सक्रिय व क्रियाशील होती है। आपने देखा होगा किसी विपदा के पूर्व पक्षी अजीब रूप में आवाज करते हैं, श्वान अजीब तरह से रोने लगता है। ऐसी ही आवाजें मछलियां, हाथी अन्य जीव भी करते हैं, जापान के लोग अपने घर में एक विशेष तरह की मछली रखते हैं, जो वहां आने वाली किसी भी विपदा का पूर्व में ही संकेत देती है। क्योंकि जापान में भूकम्प व तूफान बहुत अधिक आता है।
भौतिक जीवन में छठी इंद्री के लाभ तात्पर्य यही है कि यदि मनुष्य की छठी इंद्री जाग्रत हो जाये और वह अपनी सिक्सथ सेंस का उपयोग कर सके, तो इसका सबसे अधिक लाभ उसे अपने सांसारिक जीवन में ही प्राप्त होता है। यदि आप कोई पारिवारिक या सामाजिक कार्य अथवा अपने जीवन वृद्धि के लिए नौकरी या व्यापार को करना चाहते हैं तो सिक्सथ सेंस के द्वारा आपको ज्ञात हो जायेगा कि इन कार्यों में कितनी प्रगति अथवा हानि हो सकती है और उसी के फलस्वरूप कार्य करने का भाव-चिंतन प्राप्त होगा और निरन्तर श्रेष्ठता की प्राप्ति कर सकेंगे। ऐसे अनेक विषय जो सांसारिक जीवन की रूप-रेखा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इन पर अपनी छठी इंद्री शक्ति द्वारा मजबूत-स्पष्ट विचार व योजना प्राप्त हो तो निश्चित रूप से साधक-शिष्य अपेक्षा से अधिक सफलता प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है और हानि-असफलता की संभावना नगण्य सी हो जाती है। छठी इंद्री द्वारा साधक साधनाओं की गूढ़ता का भी आभास करता है, वह अपनी इस चेतना शक्ति के माध्यम से जो साधना, मंत्र जाप, दीक्षा उसके जीवन उत्थान के लिए आवश्यक है उसी ओर बढ़ने के लिए प्रेरित होता है। सही रूप में कहा जाये तो छठी इंद्री का रहस्य अनुभूति द्वारा ही पूर्णता से समझा जा सकता है। यह एक ऐसा विषय है जिसे शब्दों के माध्यम से स्पष्ट करना संभव नहीं।
ऐसा ही दुर्लभ, अलौकिक शक्तियों से युक्त, जीवन के सर्वतोन्मुखी विकास में महत्वपूर्ण, भौतिक-आध्यात्मिक आधार स्तम्भ को सशक्त कर जीवन को उच्चतम स्वरूप प्रदान करने में सहायक छठी इंद्री जाग्रय शक्तिपात दीक्षा परम पूज्य सद्गुरुदेव सर्व देव शक्तिमय गंगोत्री-बद्रीनाथ धाम में प्रदान करेंगे। शंकराचार्य जयन्ती, बगलामुखी, नृसिंह व बुद्ध पूर्णिमा के सुयोगों से निर्मित वैशाख मास में पूज्य सद्गुरुदेव जीवट व आत्मीय भाव से जुड़े अपने शिष्य रूपी पौधों को अपनी तपस्यांश शक्ति से सिंचित कर कल्पवृक्ष स्वरूप प्रदान कर जीवन को अक्षय स्वरूप में शुभ-लाभमय बनाने के लिए आतुर हैं, अब यह शिष्य की पात्रता और उसके भाव-चिंतन पर निर्भर है कि वह उनकी परम अनुकम्पा किस रूप में ग्रहण करता है।
यात्रायें पूर्व में भी सम्पन्न हुयीं थी और वस्तुतः भविष्य में भी सम्पन्न होंगी, हो सकता है जीवन में आपको और भी दुर्लभ दीक्षाओं को ग्रहण करने का अवसर प्राप्त हो परन्तु यह काल, इस घड़ी में जिन दिव्य चेतना शक्तियों का संचार पूज्य सद्गुरुदेव करने वाले हैं, यह दिव्य छठी इंद्री जाग्रय शक्तिपात दीक्षा का अवसर पुनः सुलभ होना अंसभव है। इसके साथ ही ऐसे दिव्य पावन तीर्थों पर इस तरह की क्रियाओं का पूज्य सद्गुरुदेव के सानिध्य में अवसर प्राप्त करने की अभिलाषा का चिंतन सभी साधक-शिष्य को बड़ी गहनता के साथ करना चाहिये, उन्हें इस अवसर का पूर्ण-पूर्ण रूप में लाभ प्राप्त करने व अपने जीवन की अभिलाषाओ को सरलता व सुगमता से प्राप्त कर सकें। इस हेतु स्वयं में ही पूर्ण चिंतन व सोच-विचार कर सप्तपुरी दिव्य धाम में आकर सिद्धाश्रम भाव भूमि में सद्गुरु का पूर्ण सानिध्य व आशीर्वाद् आत्मसात कर सकेंगे।
क्योंकि इस महोत्सव का उद्देश्य स्पष्टतः सर्व स्वरूप में शिष्य हित ही है, पूज्य सद्गुरुदेव व वात्सल्य भावमय चेतना से आपूरित माँ भगवती ने शिष्यों के हित को सर्वोपरि रखकर इन तीर्थों पर दिव्यतम साधनायें व दीक्षा प्रदान करने की सहमति प्रदान की है, हम कैलाश सिद्धाश्रम साधक परिवार परम वंदनीय माता जी के इस करुणामय निर्णय के लिये कोटि-कोटि धन्यवाद् अर्पित करते हैं, क्योंकि वास्तव में यह मात्र एक अवसर ही नहीं, बल्कि जीवन के अनेक संतापों, सर्व पितृ दोषों व असुर वृत्तियों का निवारण कर जीवन को पूर्ण जाज्वल्यमान आनन्दमय चेतना युक्त निर्मित कर सकेंगे। जिससे तारण, निवारण, हरण साधनात्मक क्रियाओं के पश्चात् अष्ट सिद्धि नवनिधि युक्त लक्ष्मीमय अमृत तत्व प्राप्ति की क्रियायें सम्पन्न होगी।
इस धरा पर जन्म लेने वाला हर मनुष्य अपने पूर्व जन्म के प्रारब्ध रूप में प्राप्त भाग्य का परिणाम भोगता है अर्थात् इस जीवन में सुख-दुःख, बाधा, कष्ट आदि अधिकांश पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं। अब प्रश्न यह है कि यदि भाग्य बहुत ही शुभ है, तो भी वह अपने भाग्य का पूर्ण लाभ प्राप्त क्यों नहीं कर पाता है? यदि कुण्डली कहती है 22 साल में विवाह होना है, तो क्यो नहीं हुआ? यदि कुण्डली कहता है कि 28 साल में सरकारी नौकरी लग जायेगी तो व्यक्ति 40 साल तक बेरोजगार क्यों है? कुण्डली कहती है व्यक्ति राजयोग का भोग करेगा पर वह चपरासी की स्थिति में जीने को विवश है।
इसका तात्पर्य यह है कि जो भाग्य में लिखा है, उसका क्षय हो जाता है, जिसके पीछे का कारण नकारात्मकता होती है, जो मिलने वाले भाग्य में अवरोधक होती है और साधक अपने पूर्ण भाग्य का लाभ प्राप्त करने से वंचित हो जाता है। सांसारिक मनुष्य के जन्मभूमि व कर्मभूमि का प्रभाव जीवन में अवश्य ही प्राप्त होता है, इन्हीं स्थितियों से पृथ्वी के वातावरण अर्थात् सतह से अनेक नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होते हैं, जो कहीं अधिक कहीं कम हैं। ज्योतिष शास्त्र की अधिकांश विवेचना इनके प्रभाव के आधार पर होती है। जहां नकारात्मकता अधिक है, वहां शुभ ग्रहों के प्रभाव में भी अन्तर आ जाता है।
इसके साथ ही कुल देवी-देवता की नाराजगी, वास्तु दोष, काला जादू, तंत्र दोष, पितृ दोष और पितरों के साथ जुडी हुई अन्य आत्मायें इनसे सम्बन्धित समस्याओं का एक बड़ा वर्ग भुक्त भोगी बनने को विवश है। जिससे मानसिक-शारीरिक, पारिवारिक, आर्थिक व जीवन में श्रेष्ठता आदि क्रियाओं में निरन्तर अवरोध आते रहते हैं। यदि किसी कारणवश पितरों के साथ असुर आत्मायें जुड़ गई हों, तो ये आत्मायें अधिक कष्ट देती हैं, क्योंकि इनको जातक से कोई लगाव नहीं होता, इसी तरह भूत-प्रेत, पिशाच आदि दोषों में भी होता है, उन्हें किसी से कोई लगाव नहीं होता, ना ही उनमें मानवीय संवदेना होती है।
इसी कारण वे असहनीय पीड़ायें पहुंचाते हैं। इसके साथ ही पूर्व जन्म के कर्मदोषों के कारण अनेक विपरीत परिस्थितियों को प्रारब्ध रूप में भोगना पड़ता है, यदि कोई व्यक्ति अपने पूर्व जन्म में किसी स्त्री या पुरुष को किसी कारण अनेक तरह से कष्ट पहुंचाया है तो वही स्त्री अथवा पुरुष इस जन्म में पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री, पिता अथवा अन्य किसी भी रूप में साथ है और वह भिन्न-भिन्न तरह से दुःखों का कारण बना हुआ है। इसका एक पहलू यह भी है कि यदि अपने निकट सम्बन्धियों से अत्यधिक निकटता, स्नेह व प्रेम है, तो वह भी किसी पूर्व प्रारब्ध का सुपरिणाम है। प्रारब्ध एक ऐसा बिन्दु है जिसे बदला नहीं जा सकता, परन्तु उसके प्रभाव को कम और अनुकूल बनाया जा सकता, जिसके माध्यम से जीवन सरलता से व्यतीत हो सके।
गंगोत्री धाम पवित्र गंगा का उद्गम स्थल है, जहां अपने दुर्भाग्य को धोया जा सकता है, कर्मदोष रूपी कालिमा जो जन्म-जन्म से कालरूपी सर्पिणी की तरह लिपटी है, उससे छुटकारा पाया जा सकता है। यह तीर्थ पाप-ताप-संताप दोष निवारण धाम है, जो सभी तरह के दोषों का क्षय कर पावन स्वरूप प्रदान करती है और जीवन में पावनता रूपी स्थितियां प्राप्त होने पर अपने भाग्य का पूर्ण लाभ प्राप्त किया जा सकता है, जिससे सौभाग्यमय स्थितियों की प्राप्ति में गतिशीलता प्राप्त होती है।
इसलिए परम पूज्य सद्गुरुदेव के सानिध्य में सर्वप्रथम पाप-ताप-संताप संहारिणी क्रिया सम्पन्न हो रही है। जब साधक पाप-ताप अर्थात् अपने प्रारब्ध स्वरूप पूर्व कर्मदोषों की समाप्ति की क्रिया सम्पन्न कर लेगें, उसके पश्चात् बद्रीनाथ धाम यात्रा की ओर अग्रसर होगें।
बद्रीनाथ धाम पहुंचने पर जीवन को पूर्व जन्म के कर्म रूपी प्रारब्ध के पश्चात् सर्वाधिक प्रभावित करने वाले पितरों की आराधना सम्पन्न की जायेगी। पितृ का एक वर्ग तंत्र से भी जुड़ा होता है, तंत्र-पितृ, भूत-प्रेत, पिशाच आदि इन सभी दोषों का प्रभाव एक जैसा होता है। पितृ यदि सरल स्वभाव के हैं, उनमें उग्रता नहीं है, तो जीवन में बड़ी विपदा नहीं आती, लेकिन यदि पितृ प्रेत योनि में चले गये तो अथवा पितर के साथ कोई अन्य आत्मा जुड़ गई है तो ये अत्यधिक उग्रता के साथ जीवन की स्थितियों को तहस-नहस कर देते हैं।
साथ ही शत्रु के द्वारा तंत्र अभिचार करना, यह भी जीवन के प्रगति में अनेक समस्यायें खड़ी करते रहते हैं। जिसके प्रभाव में आने पर साधक को उन दुष्क्रियाओं को समाप्त करने के लिए जीवन भर जूझना पड़ता है और वह जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा करने अक्षम हो जाता है। तंत्र अभिचार सबसे बुरा और घातक होता है। इसमें सबसे अधिक शारीरिक-मानसिक उत्पीड़न होता है, साथ ही आर्थिक स्थिति जीर्ण-शीर्ण हो जाती है और इसके साथ ही कहीं- कहीं यह मृत्यु का भी कारण बनता है।
ग्रन्थ की रचना हुयी जो जीवन में सन्मार्ग रूपी ज्ञान प्रदान करती है तपोस्थली की यात्रा अपनी अलौकिक चेतना जाग्रत करने के लिए। विशिष्ट क्रियायें दिव्य चैतन्य मुहूर्त में देव शक्तिमय भूमि पर जीवन्त जाग्रत दिव्य महापुरुष के सानिधय में अक्षुण्ण रूप से आत्मसात करने के अवसर की पुनरावृत्ति नहीं होती ।
जिस तरह जीवन में भौतिक संसाधनो, द्रव्यों की प्राप्ति के लिए साधक निरन्तर कर्मरत रहता है उसी तरह मनुष्य जीवन में पुण्य वृद्धि व देव शक्ति की चेतना आत्मसात करने के लिए दिव्य तीर्थ धाम स्थलों की निरन्तर यात्रा से साधक-शिष्य को धर्म, अर्थ, काम शक्ति में श्रेष्ठमय अनुकूलता, सुख, समृद्धि में वृद्धि होती है।
बद्रीनाथ धाम में ब्रह्मकपाल मोचन तीर्थ पितृ, तंत्र, भूत-प्रेत, पिशाच आदि दोषों की निवृत्ति के लिये दिव्य स्थान है, ऐसे ब्रह्मकपाल मोचन तीर्थ पर उक्त दुष्क्रियाओं की पूर्णतः मुक्ति परम पूज्य सद्गुरुदेव के सानिध्य में पूर्ण जाज्वल्यमान भाव से साधक, शिष्य सम्पन्न करेंगें, जिससे शिष्यों के जीवन की यह विकटतम बाधा को पूर्णता से समाप्त किया जा सके। जो पूर्व में बद्रीनाथ धाम की यात्रा कर चुके हैं, उनके लिए ये क्रियायें और अधिक अनुकूलता प्रदायक होंगी, क्योंकि शास्त्रों में वर्णन है कि जब तक मनुष्य देह है तब तक बार-बार ऐसे दिव्यतम धाम की यात्रा सम्पन्न करते रहना चाहिये, जिससे जीवन देवमय स्वरूप तीर्थमय निर्मलता युक्त बन सके। अलौकिक चेतना शक्ति रूपी ऊर्जा निरन्तर आत्मसात व संग्रहित करने से जीवन में सर्व अनुकूलतामय स्थितियां बनी रहती हैं और किसी भी तरह से जीवन में विपदा-आपदा, बाधा, दुःख, अभाव का आगमन नहीं होता।
उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो चुका है कि दोनों धामों में पाप-ताप-पितृ-तंत्र दोष निवारण क्रियाओं से मन, भाव, विचार, देह की शुद्धि के पश्चात् केशव प्रयाग तीर्थ व विशाल शालिग्राम शिला से युक्त दिव्य चैतन्य विष्णु लक्ष्मी विग्रह स्थित बद्री विशाल मंदिर प्रांगण में संसार की दुर्लभ, अलौकिक शक्ति युक्त छठी इन्द्रिय जाग्रय शक्तिपात दीक्षा पूज्य सद्गुरुदेव प्रदान करेंगे, इसके साथ ही त्रिपुरान्तकारी शिव-गौरी अष्ट सिद्धि नवनिधि लक्ष्मीमय पूर्ण सर्व सौभाग्य प्राप्ति युक्त महामृत्युंजय रूद्राभिषेक सम्पन्न होगा। जिससे साधक अपने भाग्य का सर्वलाभ अक्षुण्ण रूप में ग्रहण कर सकेंगे और अपनी ऊर्जा शक्ति द्वारा लक्ष्मी तत्व के सहस्र स्वरूपों को अपने रोम-रोम में स्थापित करने में सफल हो सके।
आपको यह ज्ञान होना चाहिये कि जीवन में बदलाव के लिये साहसिक व दृढ़ता के साथ केवल स्वयं को ही निर्णय लेना है, तब ही जीवन में सर्व सुखमय अमृतरस की प्राप्ति होती है। जो भी अपने जीवन में विशिष्ट अवसर का लाभ प्राप्त करने की तत्परता दिखाता है, वही व्यक्ति उच्चतम सफलता प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त कर पाता है। जो लोग सुयोग उपलब्ध होने पर भी अत्यधिक विचार व भिन्न-भिन्न भावों से ग्रसित होते हैं, उनका जीवन ऐसे ही डांवाडोल और लटकते हुये निकल जाता है।
वैशाखी मास में शंकराचार्य जयन्ती, बगलामुखी, नृसिंह, छिन्नमस्ता जयन्ती व बुद्ध पूर्णिमा युक्त इन अक्षय लक्ष्मी चैतन्यता प्राप्ति पर्वो का सुलाभ साधक को विशेष रूप से आत्मसात करना चाहिये, साथ ही सद्गुरु परिवार का सानिध्य और सुख-सुविधा व चैतन्य साधनात्मक सामग्री प्रदान की जा रही है, आपके समान सम्पूर्ण सृष्टि में कोई नहीं है, अतः अपने आपको सर्वश्रेष्ठ बनाने का यह सुअवसर है। किसी से भी सलाह या आज्ञा लेने की आवश्यकता नहीं है, ना ही विचार करने का समय है, केवल और केवल अपने मन और बुद्धि से ही सोचकर सद्गुरु सानिध्य में उनका अनुगामी बनना है। सद्गुरु सानिध्यमय तीर्थ यात्रा हेतु शीघ्र ही पंजीकरण करायें। केवल सात दिवस गुरु के साथ रहने से ही निश्चिन्त रूप से सप्तपुरी की यात्रा के माध्यम से पूर्व के सभी संतापो व दोषों से निश्चिन्त रूप से मुक्त हो सकेंगे और जीवन उच्चतम श्रेष्ठताओं से अभिभूत हो सकेगा।
गंगोत्री-बद्रीनाथ धाम में सम्पन्न होने वाली दिव्य ओजस्वी साधनात्मक क्रियायें-
गंगोत्री धाम में गंगा उद्गम स्थल पर स्नान कर भागीरथी शिला पर अवस्थित गंगा मंदिर प्रांगण में जीवन को सर्व सुख- सौभाग्य धन लक्ष्मी, धर्म, अर्थ, काम की पूर्णता प्राप्ति काल भैरव चैतन्य शक्ति साधना व दीक्षा युक्त हवन सम्पन्न होगा।
बद्री नारायण धाम में अलकनन्दा तट पर स्थिति ब्रह्म कपाल महातीर्थ पर सर्व दुःख भंजन साधना सम्पन्न होगी।
सरस्वती अलकनन्दा संगम स्थल केशव प्रयाग युक्त बद्री विशाल मंदिर प्रांगण तीर्थ में त्रिपुरान्तकारी शिवमय मृत्युज्यं शक्ति युक्त रूद्राभिषेक व अलौकिक चेतना शक्ति प्राप्ति छठी इंद्रिय जागरण शक्तिपात दीक्षा प्रदान की जायेगी।
आधयात्मिक भाव-भूमि युक्त दिव्य तीर्थ जहां श्रीमद् भागवद् रूपी श्रेष्ठ साथ ही परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद महाराज जी की सिद्धाश्रम 1985 में सद्गुरुदेव जी ने गंगोत्री धाम में आज्ञा प्रदान की थी ! तुम उठो खड़े हो पूरे विश्वास के साथ यह आवाहन है निखिल का, ये पुकार है सद्गुरुदेव की, यह आमंत्रण है योगीराज निखिलेश्वरानन्द जी का मैं तो केवल उनकी आज्ञा का पालन कर रहा हूं।
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश श्रीमाली
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