





जिस प्रकार सूर्य की रश्मियों से ही चन्द्रमा में प्रकाश है और वह प्रकाशवान दिखाई देता है——–जबकि यह दृश्य प्रत्यक्षतः स्पष्ट दिखाई नहीं देता है कि सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर और अन्य तारा मण्डल पर पड़ रहा है और वे उसी से जगमगा रहे है, यह सब अदृश्य रूप से होता है और यह बात धुव्र सत्य है—–ठीक ऐसा ही शिष्य का जीवन भी होता है। गुरु के श्रीमुख से प्राप्त ज्ञान द्वारा ही वह प्रकाशवान, ज्ञानवान हो सकता है। इसके लिए सद्गुरु रूपी प्रकाशपुंज आवश्यक है, जो अपनी रश्मियों का भाग देकर उसे प्रकाशवान बनाते हैं।
कनखल के समीप गंगा किनारे महर्षि भारद्वाज और महर्षि रैभ्य के आश्रम थे। दोनो में मित्रता थी, रैभ्य और उनके दोनों पुत्र परम विद्वान थे तथा लोगों में सम्मानित भी। भारद्वाज तपस्वी थे, किन्तु अध्ययन में रुचि न थी। भारद्वाज के पुत्र यवक्रीत भी पिता की भांति अध्ययन से दूर रहें। जब उन्होंने रैभ्य और उनके पुत्रों की ख्याति देखी, तो वैदिक ज्ञान प्राप्त करने की कामना से उन्होंने उग्र तप प्रारम्भ कर दिया। देवराज इंद्र ने जब उपस्थित होकर यवक्रीत से कठोर तप का कारण पूछा, तो यवक्रीत ने कहा- गुरु के मुख से वेदों की सम्पूर्ण शिक्षा शीघ्रता से नहीं पाई जा सकती। अतः कठोर तप से शास्त्र ज्ञान पाना चाहता हूं। इंद्र ने सलाह दी, यह उल्टा मार्ग है, आप योग्य गुरु के सानिध्य में अध्ययन कर शास्त्र ज्ञान प्राप्त करें। इंद्र चले गए, किन्तु यवक्रीत ने उग्र तप जारी रखा। एक दिन इंद्र वृद्ध ब्राह्मण के वेश में उस स्थान पर पहुंचे, जहां से यवक्रीत गंगा में स्नान के लिए उतरते थे। यवक्रीत जब स्नान कर लौटे, तो देखा वृद्ध ब्राह्मण मुठ्ठी भर-भर कर गंगा में रेत डाल रहा है।
यवक्रीत ने कारण पूछा तो वृद्ध ब्राह्मण ने उत्तर दिया- लोगों को यहां गंगा के उस पार जाने में असुविधा होती है, अतः मैं इस रेत से नदी पर सेतु निर्माण कर रहा हूं। यवक्रीत ने कहा- महाराज! इस महाप्रवाह को बालू रेत से बांधना असंभव है। आप निष्फल प्रयत्न कर रहे हैं। तब वृद्ध ब्राह्मण ने यवक्रीत से कहा- ठीक उसी तरह जैसे तुम उग्र तप से गुरु के बगैर वैदिक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हो। तत्काल यवक्रीत ने ब्राह्मण को पहचान लिया। यवक्रीत ने इंद्र से क्षमा मांगी और स्वीकारा कि गुरु के बिना ज्ञान असंभव है।
विशेषकर यदि उसमें हठ और अहंकार है, तब तो वह संभव हो ही नहीं सकता। ज्ञान के लिए गुरु की कृपा और निरन्तर अध्ययन अनिवार्य है। यदि कोई हठ कर स्वयं ही विद्या प्राप्त करने का प्रयास करे तो उसके प्रयास निष्फल होने का खतरा है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु कृपा की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
शास्त्रों में जप, तप, ध्यान, धारणा सब का विवेचन आया है। लेकिन अन्ततः निष्कर्ष यही निकलता है कि गुरु के श्रीमुख से प्राप्त ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है और उसी ज्ञान से भौतिक जीवन तथा आध्यात्मिक जीवन में सफलता व सिद्धि प्राप्त हो सकती है। केवल गुरु ही शिष्य के नेत्रों में ज्ञान की श्लाका से अज्ञान का अंधकार दूर कर सकते हैं। पुस्तकें तो लाखों हैं, चार वेद, छः वेदान्त, अठारह पुराण, 108 उपनिषद तथा हजारों मीमांसायें हैं, लेकिन सद्गुरु के श्रीमुख से निकला हुआ एक वचन ही इन सब पर भारी है।
जब शिष्य में सेवा और समर्पण का भाव आ जाता है तो उसे संसार में सर्वत्र विजय प्राप्त होती है। जब तक शिष्य अहंकार भाव में रहता है और यह सोचता है कि करने वाला मैं हूं और मेरे ऊपर गुरु की कृपा है, तब तक उसके कार्य पूर्ण रूप से सम्पन्न नहीं हो सकते और न ही वह पूर्ण रूप से शिष्य बन सकता है। जब यह भाव आ जाता है कि जो कुछ हो रहा है वह केवल और केवल गुरु कृपा से ही हो रहा है, तब उसके जीवन में निरन्तर सुस्थितियों का आगमन होता रहता है।
समर्पण और अहंकार विपरीत धुव्र हैं। दोनो का मिलन नहीं हो सकता है। जब शिष्य समर्पित भाव से क्रिया करता है तो वास्तव में गलती की कोई संभावना नहीं रहती क्योंकि वह केवल सेवक की भांति कार्य कर रहा होता है और सेवक का कार्य है, आज्ञा पालन करना, तब वह फल की चिंता किये बिना कर्म करता ही रहता है, क्योंकि शिष्य को ज्ञात है कि गुरु सेवा कार्य से ही निश्चिन्त फल की प्राप्ति होती ही है।
साधारण शिष्य बड़ा ही स्वार्थी प्राणी कहा जा सकता है, उसके सामने अपना ही माया संसार, अपनी चिन्तायें होती हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसके पास एक मार्ग है, कि वह अपने गुरु को इन पीड़ाओं का भार सौंप दें, लेकिन क्या गुरु के हृदय के भीतर झांकने का प्रयास किया है? किस-किस का जहर, किस-किस की पीड़ा गुरु को सहन करनी पड़ती है? यदि कोई प्रहार होगा, तो उसे सहन करना ही पड़ेगा, यह प्रहार शिष्य के ऊपर होगा, तो उसे भी गुरु ही सहन करते हैं। इन सब के उपरांत भी गुरु के चेहरे पर मुस्कुराहट, प्रसन्नता और शिष्य के लिए अभय मुद्रा होती है।
इसलिए गुरु की महिमा, लीला, उनकी कृपा और उनकी सभी क्रियायें अपने आप में गूढ़ से भी गूढ़तम होती हैं, वे शिष्य कल्याण के लिए सदा पिता स्वरूप में परम दयालु रूप में विद्यमान होते हैं, शिष्य की गलतियों, न्यूनताओं और उसके कुभावों का विषपान कर भी वे शिष्य के लिए सुस्थितियों का मार्ग प्रशस्त करते रहते हैं। वास्तव में गुरु की कृपा अनन्त होती है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एकमात्र गुरु ही सही मार्गदर्शन प्रदान कर शिष्य को सुपथ पर अग्रसर करते हैं, इस मरुस्थल भूमि में केवल गुरुदेव ही जीवन की कलुषिताओं, विषमताओं, बाधाओं और विपत्तियों से पार लगाने वाले होते हैं। इसलिए जीवन में निरन्तर गुरु की महिमा व उनकी कृपा का स्मरण करते रहने चाहिए, साथ ही उन्होंने अनन्त जीवों में हमें अपनी शरण दी उनकी इस अहैतु कृपा का आभार प्रकट करना चाहिए।
ऐसा ही निखिल महापर्व जो सही मायने में गुरुदेव के समक्ष स्वयं के सुभावों को प्रकट कर उनसे यह विनय करने का दिवस है कि हे गुरुदेव! आप अपना वरद हस्त हम पर बनायें रखना, कदम दर कदम हम आपकी ओर ही बढ़ते रहें, हम इस मरुस्थल में भटक ना जायें, इसलिए हमारा हाथ थामें रखना। इन्हीं भाव-विचार-चिंतन के साथ सद्गुरु जन्म दिवस पर उपस्थित होकर निश्चित रूप से आप नारायण भगवती के वरदहस्त की प्राप्ति कर सकेंगे और परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी व वन्दनीय माता जी के दिव्य सानिध्य में सिद्धाश्रम संस्पर्शित नारायण भगवती महामाया सहस्त्र लक्ष्मी मातंगी चण्डिका अक्षय सौभाग्य शक्ति साधनात्मक क्रियायें व दीक्षायें आत्मसात कर धन लक्ष्मी गणपति कार्तिकेय रिद्धि सिद्धि शुभ-लाभ शिव महामाया चेतना युक्त हो सकेंगे।
अर्जुन! तुम्हें यह सब कुछ, तुम्हारा धर्म, तुम्हारा जीवन, तुम्हारे माता-पिता, भाई-बहन, सम्बन्धी, रिश्तेदार सबको त्याग कर मुझमें लीन हो जाना है, मुझमें समर्पित हो जाना है और मैं तुम्हें इन सब बन्धनों से मुक्त कर ब्रह्मानन्द तक पूर्णत्व तक पहुंचा दूंगा।
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