





जीवात्मा जब संसार में नवजात रूप में आता है, तो उसका प्रथम नाता माँ से ही जुड़ा होता है। माँ शिशु को पूरे 9 माह अपनी कोख में रखने के बाद असहनीय पीड़ा सहन करते हुये संतान को जन्म देती है और इस संसार में वृद्धि की प्रमुख कारक होती है। इन 9 महीनों में शिशु और माँ के बीच एक अदृश्य प्यार भरा गहरा नाता जुड़ जाता है। यह नाता शिशु के जन्म के पश्चात् साकार रूप लेता है और जीवन पर्यन्त बना रहता है। माँ और बच्चे का रिश्ता इतना प्रगाढ़ और प्रेम से भरा होता है, कि बच्चे को जरा सी तकलीफ होने पर भी माँ परेशान हो उठती है। इसीलिये ही ममता और स्नेह के रिश्ते को पावनतम कहा गया है।
माँ सदा अपने संतान के लिए एक सुरक्षा कवच होती है क्योंकि वह संतान को सुज्ञान व चेतना निरन्तर प्रदान करती है। माँ और बच्चे का स्नेह और प्यार कोई और कभी नहीं समझ सकता। देवताओं ने भी माँ को सर्वोपरि और पूजनीय कहा है। एक बार की बात है सभी देवता बहुत मुश्किल में थे।
सभी देवगण भगवान की शरण में अपनी समस्या लेकर गये। उस समय भगवान शिव के साथ भगवान गणेश और कार्तिकेय भी बैठे थे। देवताओं की मुश्किल को देखकर भगवान शिव ने गणेश और कार्तिकेय से उनकी सहायता मांगी और एक प्रतियोगिता करवायी जिसके अनुसार जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करेगा, वही देवताओं की मुश्किलों को दूर करेगा कार्तिकेय तो अपना वाहन लेकर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने।
पर भगवान गणेश अपने पिता शिव और माता पार्वती के पास गये और उनकी सात परिक्रमा करने लगे, तब उनसे उनकी माँ पार्वती ने पूछा कि पुत्र तुमने ऐसा क्यों किया ? भगवान गणेश ने कहा कि माता-पिता में ही पूरा संसार होता है, जो सम्पूर्ण पृथ्वी से विशाल है, मेरा तो पूरा संसार ही आप दोनों के चरणों में है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि देव शक्तियां भी अपने माता-पिता को सर्वोपरि मानते हैं, उनका सम्मान, आदर श्रद्धा पूर्वक करते थे।
जीवन की पहली पाठशाला माँ के संरक्षण में ही प्रारम्भ होती है। बाल्यकाल में माँ ही सबसे प्रिय मित्र हुआ करती है, संतान के साथ खेलना-कूदना, पढ़ना, चलना सीखाना, रात-रात भर जाग कर संतान को लोरी सुनाना, बात-बात पर डांट देना और हर बात पर प्यार की झपकी देना। ऊंगली थाम कर बाहर घुमाना। यह समझाना कि देखो बेटा यह रास्ता सही है और यह गलत, अच्छे-बुरे का भेद बताना, जीवन में बालक को सुदृढ़ बनाने के लिए माँ निरन्तर ज्ञान व चेतना से आपूरित करती रहती है। उस माँ के प्रति, उस जननी के प्रति जितनी भी कृतज्ञता व्यक्त की जाये, कम है। माँ ईश्वर का अनमोल रूप है, जिसका संसार में कोई मोल नही, माँ की कृतज्ञता के प्रति केवल नतमस्तक हो सकते हैं।
स्वामी विवेकानन्द जी से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया कि माँ की महिमा ही संसार में क्यों गायी जाती है, स्वामी जी मुस्कुराये, उस व्यक्ति से बोले पांच सेर वजन का एक पत्थर ले आओ। जब व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने उससे कहा अब इस पत्थर को किसी कपड़े में लपेट कर अपने पेट पर बांध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे पास आओ तो मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा, आदेशानुसार व्यक्ति ने पत्थर अपने पेट पर बांध लिया और चला गया।
पत्थर बांधे हुए दिन भर वो अपना काम करता रहा, किन्तु हर क्षण उसे परेशानी और थकान महसूस हुई, शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना-फिरना उसके लिए असहनीय हो गया, थका-मांदा वह स्वामी जी के पास पहुंचा और बोला, मैं इस पत्थर को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख सकूंगा, एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं इतनी कड़ी सजा नहीं भुगत सकता।
स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे भी नहीं उठाया गया और माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे नौ माह तक ढ़ोती है और गृहस्थी का सारा काम करती है, संसार में माँ के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है, इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं।
सामान्तयः हम सभी का ध्यान अपने जीवन की खुशियों या अवसरों के बजाय कमियों और समस्याओं पर ज्यादा होता है। जिस तरह से एक सफेद कागज पर बीच में काला बिन्दु लगा दिया और अनेक लोगों से पूछा तो लगभग सभी ने यही जबाव दिया कि इस कागज पर काला धब्बा है और उस विशाल सफेदी का जिक्र ही नहीं किया। कभी विचार कर एक सूची बनायें कि जिनके लिए मैं कृतज्ञ या आभारी हूं, जैसे मेरे पास आंखें हैं, सोचने के लिए दिमाग है, मैं अपने हाथों से काम कर सकता हूं, पैरों से चल सकता हूं अर्थात् शरीर के भीतर कर्मेन्द्रियों-ज्ञानेन्द्रियों का भाव-चिंतन, चेतना सर्वस्व रूप में माँ के गर्भ से ही पल्लवित हुई है। जन्म लेने के बाद माँ के चिन्तन से ही घर, परिवार मिला और उसके सुसंस्कारों से शिक्षा ग्रहण कर पाया, उसी के फलस्वरूप इज्जत है, कोई प्यार करने वाला है आदि-आदि।
मैं आभारी हूं उस परम पिता का जो इतने तरह के सुखों से अभिभूत हूं। दूसरी तरफ अपनी तकलीफें लिखने को कहा गया तो सब आश्चर्यचकित हो जाते हैं, जब उन्हें ये एहसास होता है कि हमारी तकलीफों की सूची कृतज्ञता की सूची से बहुत ही छोटी है और लगभग नहीं के बराबर है। इसके बाद उन्हें एहसास होता है कि वे ढूंढ कर समस्यायें निकाल रहें हैं। जबकि जीवन में खुश होने के लिए बहुत कुछ है। यदि आप कमियां नहीं खुशियां ढूंढेगें, समस्या पर कम समाधान पर ज्यादा समय लगायेंगे, परिस्थितियों पर रोयें नहीं, सुधारने का प्रयास करेंगे तो जीवन में खुशियों का विस्तार निश्चिन्त रूप से होगा ही। उक्त सभी सुस्थितियां प्राप्त होती हैं, जहां घर में माँ-बहन, बेटी, पत्नी का सम्मान होता है। वहां पर सैकड़ो-सैकड़ो रूपों में लक्ष्मीमय स्थितियों का विस्तार होता है।
माँ से बढ़कर कब हुआ, कोई और मुकाम ।
चाहे आवें साथ में, मिलकर देव तमाम ।।
माँ के दिल को पढ़ लिया, जिसने भी इंसान।
नहीं जरूरी बांचना—गीता और कुरान।।
नैनन में है जल भरा, आंचल में आशीष।
तुम सा दूजा नहि यहां, तुम्हें नवायें शीश।।
रहीं लहू से सींचती, काया तेरी देन।
संस्कार सारे दिए, अद्भुत तेरा प्रेम।।
रातो को जागकर हमें लिया है पाल।
ऋण तेरा कैसे चुके, सोंचे तेरा लाल।।
स्वार्थ है कोई नहीं, ना कोई व्यापार।
माँ का अनुपम प्रेम है, शीतल सुख बयार।
जननी को जो पूजता, जग पूजै है सोय।
महिमा वर्णन कर सके, जग में दिखै न कोय।
जीवन पूरा लगा दिया, पाला सब परिवार।
आज उसे मिलती नहीं, घर में रोटी चार।।
जीवन भर देती रही, जी भर जिसे दुलार।
अपनी माँ को दे रहा, बेटा वही उधार।।
जब तक माँ सिर पर रही, बेटा रहा जवान।
उठ साया जब से गया, लगा बुढ़ापा आन।।
कंटक सा संसार है, कहीं न टिकता पांव।
अपनापन मिलता नहीं, माँ के सिवा न ठांव।।
माँ तो जग का मूल है, माँ में बसता प्यार।
मातृ-दिवस पर पूजता, तुझको सब संसार।।
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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