





सद्गुरु तो पारस ही होते हैं। वे नहीं देखते कि उनके सम्पर्क में आने वाला शिष्य किस प्रकार का बना है। वे उसकी अपूर्णता की ओर किंचित मात्र भी ध्यान नहीं देते, वे केवल और केवल एक ही विचार करते हैं कि इसे भी मुझे सामान्य से स्वर्ण की भांति कान्ति युक्त और तेजस्वी बनाना है।
पूर्णिमा का तात्पर्य है पूर्णता, पूर्णिमा में दिन के समय गगन मण्डल में सूर्य अपने तेज प्रकाश द्वारा धरा को आलोकित कर रहा होता है, तो उसी धरा को रात्रि में चन्द्रमा अपने शुभ्र शीतल प्रकाश द्वारा शीतलता एवं प्रेम का प्रवाह देता है और यही कार्य सद्गुरुदेव करते हैं। जो साधक के जीवन में सभी सुखों में आनन्द, हर्ष, प्रसन्नता का संचार हो व जीवन निरन्तर शीतलमय क्रियाशील हो और यही भाव गुरु पूर्णिमा पर्व का होता है, जीवन में ऊष्णता हो, तेजस्विता हो, प्रकाश हो, वही जीवन में प्रेम की फुहार हो, पूर्णता की शान्ति हो, जीवन में सारे रस प्रेम, सौन्दर्य, हास्य, करुणा, विनोद, सहजता की धारा हो।
सन् 1994 में सद्गुरुदेव ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर शिष्यों का आह्वान करते हुये कहा- तुम शिष्य रूपी एक-एक पुष्प को संवारने में कितनी बार तुम्हारे दामन पर उगे कांटों को अपनी उंगलियों पर सहा है, कितनी-कितनी बार उन छलछला आयी लहू की बूंदों को चुपचाप अपने दामन से पोंछ दिया है, इसका कोई लेखा-जोखा ही नहीं, फिर भी मुझे संतोष होगा कि तुम्हारी सुगन्ध फैले, तुम खुद सुवासित हो और दूसरों को भी सुवासित करो। तुम सभी शिष्यों के मुखरित होते, सुगन्धित होते और रंग बिखेरते उपवन की एक कल्पना मैंने की है और तुम! मेरे रोपे पौधे, मेरे संवारे बीज आज इसी क्रिया में अब खिलने को तैयार हो। आज मेरे इस भौतिक स्वरूप को, मेरे इस देहगत स्वरूप से किये गये कार्यों को तुम साठ वर्षों के दायरे में बांध कर आंकने का प्रयास कर रहे हो, किन्तु मैं तो तुम्हें इससे भी कई गुने अधिक समय से अपने प्रेम की भुजाओं में बांधकर रखे हूं, इस जन्म से नहीं पिछले कई-कई जन्मों से। मेरी कामना, मेरी इच्छा और मेरा प्रयास केवल इतना ही है, कि मैं तुम्हें अपनी प्रेम की भुजाओं में बांध कर अपने वक्षस्थल के पास ला रहा हूं, जिससे कि वहां स्थित अमृत के कुण्ड में तुमको आकण्ठ तृप्त करा दूं। अन्तर केवल इतना है कि बार-बार मेरे और तुम्हारे शरीर बदल रहे हैं और प्रत्येक बार नये सिरे से परिचय प्रारम्भ करना पड़ रहा है।
वास्तव में कैसा है यह संसार, जिसमें गुरु आपको खींच-खींच कर अपने पास ला रहा है, अपने हृदय का समस्त प्रवाह आप में उड़ेल देना चाह रहा है और आप अपनी ही क्षुद्र दुनिया में, क्षुद्र स्वार्थों में, पद और सम्मान के लालच में खोये जा रहें हैं।
सद्गुरु का वास तो होता है शिष्य के पास। सद्गुरु तो पानी के समान होते है, शिष्य पत्थर की भांति होता है। सद्गुरु अपने प्रवाह से धीरे-धीरे शिष्य पर प्रहार करते हैं और अन्ततः शिष्य को आप्लावित कर देते हैं, उसे अपने प्रवाह में गतिशील कर गुरुमय स्वरूप देते हैं। एक स्पष्ट दिशा-निर्देश देने के लिये सद्गुरु का कार्य निरन्तर प्रहार करना ही तो है, जिससे शिष्य कुछ बन जाये, वह अनगढ़ पत्थर से तराशा हुआ हीरा बन जाय। इन चर्म चक्षुओं में बहुत अधिक निर्मलता लानी होगी, वह तो दिव्य चक्षुओं का विषय वस्तु है। सद्गुरु शिष्य को शीतल छाव देते हैं, जहां अपार विश्रान्ति है, जीवन के अन्तर्द्वन्द्वों में भी मौन है। शिष्य पर चोट पड़ती है और उसके सारे विचार टूट-बिखर कर गायब हो जाते हैं और होता है केवल एक गहन मौन, एक शून्यता और उसी शून्यता में तो सद्गुरुदेव विराजमान होते हैं।
सद्गुरुदेव ने कहा- कि संसार के सारे रिश्ते बेमानी हैं, अर्थरहित हैं, क्योंकि उन पर तुम्हारा कोई नियंत्रण था ही नहीं, आपका अपने जन्म पर कोई नियंत्रण नहीं था। जिस माता के गर्भ में जन्म ले लिया, उसे अपनी माता कहा और माता ने जिसे तुम्हारा पिता बताया, उसको तुमने अपना पिता कहा। माता-पिता के एक, दो और संतान हो गये तो उन्हें तुमने अपना भाई-बहन कहना प्रारम्भ कर दिया। इन सब स्थितियों में तुम्हारा निर्णय कहां था। ये सब तो जो तुम्हें सिखाया गया, रटाया गया वहीं तो बोलते गये।
लेकिन एक निर्णय तुमने अपने आप लिया, वह था अपने गुरु को चुनने का निर्णय। वह निर्णय तुम्हारा अपना था और यह सम्बन्ध ही तुम्हारा सम्बन्ध है, क्योंकि यह सम्बन्ध तुमने अपने मन, बुद्धि के विवेक के अनुसार अपनी आत्मा की आवाज पर स्वयं लिया। यह भाव तुम्हारे हृदय में स्वयं उपजा, क्योंकि यह सम्बन्ध दैहिक सम्बन्धों से ऊपर भावनात्मक सम्बन्ध था।
और ऐसे ही गुरु-शिष्य सम्बन्ध को पूर्णता प्राणवान, जीवन्त व आत्मिक भाव से जुड़े रहने का महापर्व होता है गुरु पूर्णिमा, जिस दिन शिष्य अपने गुरु के समक्ष अपना सब कुछ न्यौछावर कर जीवन की बंजर जमीन को सद्गुरु के शीतल साधनात्मक फुहार से स्वयं के तन-मन को शीतलता प्रदान करता है और संसार के किसी भी कोने में ही क्यों ना हो वो, गुरु पूर्णिमा दिवस पर वह अपने परम आराध्य गुरु का सानिध्य व उनका आशीर्वाद अवश्य आत्मसात करने उनके चरण कमलों में पहुंचता ही है। ऐसा ही दिव्य महापर्व चन्द्र ग्रहण पूर्णिमा पर्व पर आयोजित गुरु-शिष्य एकाकार गुरु पूर्णिमा कोरबा छ-ग में सम्पन्न होगी।
मैं तुम्हें पिंजरे से मुक्त करना चाहता हूं, मैं तुम्हें आवाज दे रहा हूं, मैं चाहता हूं कि तुम अपने आप में स्वतन्त्र राजहंस बनो। तुम्हें यह समझाना चाहता हूं कि यह जीवन छोटा सा है, यदि तुम अभी भी नहीं सम्भले तो पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा, जीवन के अंतिम क्षण में तुम अहसास करोगे कि गुरु ने मुझे आवाज दी थी और मैंने पिंजरों में कैद हो कर जिन्दगी काट दी, जिन्दगी का आनन्द नहीं लिया, उन्मुक्त विचरण के सौभाग्य से वंचित रह गया।
परम पूज्य सद्गुरुदेव
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,