





वैदिक युग में रूद्र रूप में सुपूजित, उपनिषद युग तक आकर त्रिदेवों में परिणत भगवान शिव परब्रह्म के रूप में सर्वस्व पूजे जाते हैं। कितने ही पुराण केवल शिव से सम्बन्धित कथाओं मंदिरों, पूजा विग्रहों आदि के वर्णन से युक्त हैं। शिव सभी विद्याओं के अधिष्ठाता हैं, उनके डमरू निनाद से ही सारी वर्णमाला उत्पन्न हुयी। प्राणि मात्र के कल्याणार्थः देवाधिदेव शंकर लिंग रूप में विविध तीर्थों में रहते हैं। भारत के विशाल विस्तार में 12 तीर्थ ऐसे हैं, जहाँ शिव का स्वयंभू लिंग ज्योतिर्लिंगं रूप में स्थित हैं। शिव पुराण में इनका सम्पूर्ण विवरण दिया गया हैं। इसके नाम स्मरण से ही सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं-
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुन्।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम्ं।।
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम्।
वाराणस्यां च विश्वेशं त्रयम्बकं गौतमीतटे।।
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।
सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये।।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्याय यः पठेत्।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।
सोमनाथ मंदिर महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर हैं, जिसकी गणना 12 ज्योतिर्लिंगंमें सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंगं के रूप में होती हैं। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह के प्रभास क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है, जिसे अत्यंत पावन पवित्र धाम माना जाता हैं। यहीं समुद्र तट पर पारस्परिक कलह में यादव वंश नष्ट हुआ था। यहीं पर भालूका तीर्थ पर श्री कृष्ण विश्राम कर रहें थें, तब जरा नाम के शिकारी ने उनके पैर के तलुए को हिरण की आँख समझ कर गलती से तीर मार दिया था, जिस कारण कृष्ण ने देह त्याग कर यहीं से वैकुण्ठ गमन कर गये थे। इस स्थान पर बड़ा रमणिक कृष्ण मंदिर बना हुआ है। पूर्वकाल में शापग्रस्त चन्द्रमा ने शिव की पूजा करके यहीं क्षय रोग से छुटकारा पाया था।
दक्ष प्रजाप्रति ने अपनी सत्ताईस पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा के साथ किया था। चन्द्रमा सभी पत्नियों में रोहिणी नामक पत्नी से अधिक प्रेम करते थे। चन्द्रमा के इस पक्षपात से दुखी होकर उनकी अन्य पत्नियां अपने पिता दक्ष के पास गई। उनकी व्यथा सुनकर दक्ष ने चन्द्रमा को बहुत समझाया, किंतु चन्द्रमा का व्यवहार पूर्ववत् रहा। तब राजा दक्ष ने चन्द्र देव को क्षय रोगी हो जाने का श्राप दे दिया। फलस्वरूप हर दूसरे दिन चंद्र का तेज घटने लगा। चन्द्रमा के क्षीण होने जाने पर समस्त देवलोक व मृत्युलोक में त्राहि-त्राहि होने लगी। सभी देवता मिलकर ब्रह्मा जी के पास गये और उन्हें पूरी व्यथा बतायी। ब्रह्मा जी ने बताया कि यदि चन्द्रमा पवित्र प्रभास क्षेत्र में तपस्या में महामृत्युंजय मंत्र जप करके शिव को प्रसन्न कर लें तो उन्हें क्षय रूपी रोग से मुक्ति मिल सकती है।
चन्द्रमा ने प्रभास क्षेत्र में शिवलिंग स्थापित करके अत्यंत कठोर तपस्या और जप किया। प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुये और चन्द्रमा को पन्द्रह दिन क्षीण होने और पन्द्रह दिन बढ़कर पूर्णिमा को पूर्ण स्वस्थ होने का वरदान दिया। चन्द्रमा की प्रार्थना पर भगवान शिव ने चन्द्रमा के ही नाम अर्थात् सोम से वहां सदा स्थित रहना भी स्वीकार किया। तभी से सोमनाथ ज्योतिर्लिंगं प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यता के अनुसार चन्द्रमा द्वारा निर्मित मंदिर समय प्रवाह में जीर्ण होता गया। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता हैं। इसे अब तक 17 बार नष्ट किया और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया। पहले रावण के द्वारा और फिर श्री कृष्ण के द्वारा पुनर्निर्माण कराया गया।
इसके बाद राजा भीमदेव सोलंकी ने यहाँ कई परकोटों वाला भव्य मंदिर बनवाया। इस मंदिर की भव्यता, शिल्प, सौन्दर्य और अपार सम्पत्ति की कथा-कहानियां ग्यारहवीं ईस्वी में भारत और भारत के बाहर भी प्रचलित थी। ग्यारहवीं ईस्वी में महमूद गजनवी ने भयंकर युद्ध करके इस पूरे मंदिर को ध्वस्त कर दिया और रत्न जटित शिवलिंग के टुकड़े भी गजनवी ले गया, अनेकों बार इस पर विधर्मी आक्रमणकारियों का कहर टूटता रहा, किन्तु धर्म की आस्था नष्ट नहीं हुई। सत्रहवीं ईस्वी तक यहां मंदिर तो नाम मात्र का बचा था। लेकिन इस स्थान की ज्योतिर्लिंगं रूप में मान्यता के कारण भक्तजन आते-जाते रहते थें। 18 वीं ईस्वी में रानी अहिल्या बाई होल्कर को स्वप्न में शिव दर्शन प्राप्त हुआ। प्रातःकाल उस स्थान पर जाकर रानी ने स्वंयभू लिंग प्रकट हुआ देखा, उस स्थान पर उन्होने पूजा अर्चना की विधिवत् व्यवस्था करके मंदिर निर्माण कराया और उसके एकदम ऊपर भी एक कक्ष में शिवलिंग स्थापित किया।
1950 ईस्वी में सरदार वल्लभाई पटेल सोमनाथ आये और समुद्र तट पर खड़े होकर उन्होंने मूल स्थान पर पुनः मंदिर निर्माण का प्रण लिया। सन् 1995 में नया सोमनाथ मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में विविधत् प्रारम्भ हुआ। रानी अहिल्या द्वारा स्थापित मंदिर से यह केवल दो सौ गज की दूरी पर हैं। अत्यंत अलंकृत तोरण द्वारों के भीतर भगवान शिव के लिंग स्वरूप के दर्शन दूर से ही सुलभ होने लगते हैं। मन्दिर के पीछे लहराता समुद्र जल मानों श्री शंकर के चरण स्पर्श के लिए प्रयासरत रहता है। यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मों के लिए भी प्रसिद्ध हैं। चैत्र, भाद्र, कार्तिक माह में यहाँ श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया हैं। इन तीन महीनों में यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ लगती हैं। इसके अलावा यहाँ तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।
निधि श्रीमाली
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