





जहां-जहां अकेलापन और अपने आप में रमे रहने का, अपने ही साक्षी बने रहने का भाव है, वहां पुरुष तत्व है। जहां अपने को विसर्जित करके सृष्टि को विस्तारित करने का भाव होगा, वहां स्त्री तत्व है। शरीर का अपना एक सत्य है, पर उससे बड़ा सत्य शरीर के भीतर स्थित चेतना का है, इसी चेतना में पुरुष तत्व भी रहता है और स्त्री तत्व भी। यह संभव है कि हाड़-मांस का शरीर पुरुष का हो, पर उसके भीतर की चेतना में स्त्री तत्व स्पंदित और सफुटित हो रहा हो। यह भी संभव है कि शरीर से स्त्री के रूप में पहचाना गया पिंड अपने भीतर पुरुष की जड़ता और एकाकिरता लिये स्थित हो। लेकिन पुरुष तत्व और स्त्री तत्व एक-दूसरे के बिना अलग-अलग अकेले नहीं रह सकते।
वास्तविक शक्ति का सृजनशील मानस में होता है, काया में नहीं। रचना के स्पंद से युक्त चेतना ही शक्ति है। यह एक स्वाधीन चेतना है। प्रकाश और विमर्श इस चेतना के दो आयाम हैं। प्रकाश के रूप में चेतना शिव है, विमर्श के रूप में वही शक्ति है। शैव दर्शन के ग्रंथों में बार-बार कहा गया है कि शिव अपने आपमें शव है, यदि शक्ति उनके साथ न हो। यही शक्ति कामना है और रचना करने की इच्छा भी है और जूझने की शक्ति भी है। कामना अपने आपका विस्तार करने के लिये होती है, रचना जीवन को और अधिक श्रेष्ठ बनाने के लिये, जूझना जीवन की विषमताओं को मिटाने के लिये। यह शक्ति हम सबके भीतर समाई हुई है, हमारी चेतना में ओत-प्रोत है। गतिशीलता इसका स्वरूप है।
शैव दर्शन में माना गया है कि यह संसार स्पंदन से जन्म लेता है। स्पंदन रचने के लिये चेतना में होने वाली सुगबुगाहट है, सृष्टि को सजाने-संवारने, बनाने और विस्तार देने का संकल्प है। यह स्पंदन अनगिनत रूपों में व्यक्त होती है। अन्याय के विरोध में हमारी आवाज उठती है, समाज में किसी को असहाय, अकेला थका-हारा देखकर उसके सम्बल का साथी बनने का भाव इस स्पंदन का रूप है। यह स्पंदन ही शक्ति है। शक्ति है, तो संसार है। शक्ति है तो रचने का उल्लास है।
यह शक्ति मोहक है, इसलिये उसको माया भी कहा गया है। शक्ति के अनगिनत प्रकार है, सृजन का उल्लास अपने आपको अनंत नामों और रूपों में प्रकट करता है। धर्म और दर्शन की हमारी परम्परा में इन रूपों को भुवनमोहिनी कहा गया है, तो कहीं महामाया कहा गया। शाक्त दर्शनों में शुद्ध चैतन्य रूपिणी शक्ति को ही त्रिपुरा, ललिता, षोड़शी, श्रीविद्या, कामेश्वरी, भुवनेश्वरी तथा त्रिपुरसुंदरी आदि नामों द्वारा बताया गया है। वास्तव में ये सब चेतना के भीतर रचना के लिये होने वाले उल्लास के विविध शक्ति रूप दुर्गा के आयाम हैं।
आद्या शक्ति दुर्गा के विषय में आख्यान है कि सारे देवताओं ने अपनी समग्र शक्ति और अपने-अपने अस्त्र देकर उनकी रचना की। दुर्गा का विग्रह नारी का है, परन्तु उनके भीतर पुरुष तत्व अधिक है, इसीलिये उनके शक्ति तत्व की अलग- अलग रूपों में अभिव्यक्ति हुई है। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री ये दुर्गा के नौ रूप हैं। शैलपुत्री के रूप में वे एक बेटी है, ब्रह्मचारिणी रूप में ज्ञानमयी है।
चंद्रघंटा उनका सौंदर्यमय आहलादक रूप है, तो कूष्मांडा डरावना रूप है। स्कन्दमाता के रूप में वे वात्सल्यमयी हैं, तो कात्यायनी के रूप में एक कन्या हैं। कालरात्रि उनका संहाकर रूप है, तो महागौरी मनस्विनी रूप है और उनका मोक्षदायक रूप सिद्धिदात्री है। दुर्गा सप्तशती के पांचवे अध्याय में देवी को विष्णुमाया, चेतना, बुद्धि, क्षुधा, शक्ति, तृष्णा, क्षांति, जाति (सार्वभौम या वैश्विक तत्व) लज्जा, शांति, श्रद्धा, कांति, लक्ष्मी, वृत्ति (जीविका) स्मृति, दया, तुष्टि तथा माता आदि रूपों में नमन किया है। शक्ति के इन रूपों में सारा संसार समाया हुआ है, ये सारे रूप संसार को श्रेष्ठमय बनाते है। शक्ति के इन विविध रूपों की उपासना का वास्तविक आशय अपने जीवन को सर्व सुखमय बनाने का भाव है।
जहां कहीं अपने आपको उत्सर्ग करने की, अपने आपको खपा देने की भावना प्रधान है, वहीं शक्ति तत्व है। जहां कहीं अपने आपको निचोड़कर अपने आत्मीय को तृप्त करने की भावना प्रबल है, वहीं शक्ति तत्व है, शक्ति आनन्द-भोग के लिये नहीं आती, वह आनंद लुटाने के लिये आती है।
यह शक्ति जो सर्वत्र व्याप्त है। कभी वह अग्नि शिखाओं में कभी आंधी और तूफान में होती है। कभी वह निर्मल आकाश में जगमगाती है तो कभी नदियों में उफनती हुई अनंत के सागर में ऐसे विलीन हो जाती है कि उसे खोज पाना कठिन हो जाता है। ऋषि विश्वामित्र ने बताया था कि माता विश्वमोहिनी है, वह अपने गर्भ में अनंत रहस्यों को लिये हुये घूम रही है।
पुराणों में उल्लिखित है कि- दुर्गा को कभी प्रेत पर चढ़ी हुई चामुण्डा के रूप में देखा गया है, कभी गरुड़ पर बैठी हुई लक्ष्मी के रूप में दिखाई दी, तो कभी हंस पर आरुढ़ सरस्वती के रूप में, देखने वाली जितनी आंखे हैं, शक्ति के उतने ही स्वरूप है। समुद्र में उठने वाली ऊंची लहरों में माता प्रत्यक्ष होती है। हिमालय के उन्नत श्रृंगों पर माता की प्रसन्न मुद्रा अंकित है।
दुखी-दरिद्रों में, बेचैन आत्मा में, तड़पते हुये प्राणों में, निर्बल की काया में, निरीह पशु-पक्षियों में और नवजात शिशुओं में माता रक्षा का कवच बनकर ठहर जाती है। ज्योति कलश छलकाती हुई जब वह उषा सुंदरी बनकर आती है या रात में शीतल चांदनी बनकर उतरती है, तब उसका दिव्य आलोक पवित्र लिपि की तरह पृथ्वी पर फैल जाता है। सुगंधित धूप के साये में माता जीवन के जो बीज बोती है, उनमें से उत्सवता फूटती है।
वह माता है, इसलिये अपने पुत्रों में उसकी ममता स्वाभाविक है। वह हमारे भीतर सौंदर्य और सामंजस्य की अभीप्सा जगाती है और देव प्रतिष्ठा के लिये अनुकूल परिवेश बनाती है। इसके लिये उसे जो भी काट-छांट करनी होती है, वह अवश्य करती है। जब वह हृदय में आसन लगाकर बैठती है, तो जीवन के मंत्र की नींव गहरी हो जाती है और उचारे हुये शब्द महाकाव्य बन जाते हैं।
माता देवताओं की स्फूर्ति है। देवलोक का समग्र अनुशासन माता ही सुनिश्चित करती है। माता जीवन के समर में विजय का उल्लास लाने वाली आनंद की राज-राजेश्वरी है। अज्ञान और जड़ता के महादैत्य का विध्वंस करने के लिये मनीषियों के अंत करण से निकल पड़ती है। त्रिलोक सुंदरी माता का एक ही वैश्व नियम है, वह है शाश्वत प्रेम और शाश्वत सौन्दर्य। यही उसकी क्षुधा, तृष्णा, यही उसकी वृत्ति और यही उसकी तुष्टि है। प्राणियों में जो चेतना है, माता-पिता की जो छत्रछाया है, नारी की जो लज्जा है, विष्णु की जो लक्ष्मी है, दार्शनिकों की जो बुद्धि है, कृष्ण की जो मोहन मुरली है, बुद्ध की जो करुणा है और महावीर की जो क्षमा है, वह सब माता का स्वरूप है।
माता के पास अपने शस्त्र है और अपने शास्त्र भी। खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिध और शूल धारण कर जब वह सिंह पर आरूढ़ होकर निकलती है, तो असुर कांपने लगते हैं। काम, क्रोध, लोभ और मोह के राक्षसों को वह कुचल देती है, अंधेरा सिमटने लगता है और महिषासुर के मर्दन से अधर्म का नाश होता है।
माता के तीन चरित्र प्रसिद्ध हैं। ये हैं- महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। महाकली प्रचण्ड वेग से दौड़ती है और झूठ, आलस्य, द्वेष, अज्ञान और जड़ता को झपट्टा मारकर नष्ट कर देती है। हमारे आस-पास जो कुछ अशुभ, असुंदर, निस्तेज और मलिन है, वह सब महाकाली के रौद्र रूप के आगे भस्म हो जाता है। इसके बिना महालक्ष्मी अपना साम्राज्य स्थापित नहीं कर सकती। महालक्ष्मी के आकर्षण में यह विश्व सुंदर श्रृंगार में झिलमिलाने लगता है, धन-धान्य, ऐश्वर्य, प्रेम का झरना बहने लगता है, कामनायें पूर्ण होने लगती हैं और फिर जब महासरस्वती का उदय होता है, प्रकृति के ऋतुसंहार में मन मयूर नाचने लगता है, देवमृदंग बजने लगते हैं, कर्म प्राण शक्ति का संचार होने लगता है।
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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