





आध्यात्मिक दर्शनः दुर्गा सप्तशती में गीता की तरह पाप तथा अधर्म के विनाश के लिये दैवीय शक्ति के पृथ्वी पर अवतरित होने की बात कही गयी है, मां आद्या शक्ति कहती हैं-
जब-जब संसार में दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का संहार करूंगी। दुर्गा सप्तशती शक्तिशाली आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत है। आदि कालीन मां आद्या शक्ति की पूजा तथा भक्ति कर हम अपनी मौलिक शक्ति का विकास तथा विस्तार कर अपने आध्यात्मिक ऊर्जा के स्तर को ऊंचा करने में सक्षम हो पाते हैं। मां दुर्गा को श्रद्धा, लगन, विश्वास तथा पूरी तन्मयता से आवाहन किया जाये तो उनकी कृपा एवं आशीर्वाद से हमारे लिये कल्याण के मार्ग स्वयं प्रशस्त हो जाते हैं और हम सभी प्रकार की बुराइयों तथा नकारात्मक विचारों से मुक्त हो जाते हैं। दैवीय शक्ति को नारी-शक्ति के रूप में दर्शाने से दुर्गा सप्तशती में सांख्य दर्शन की भी झलक मिलती है।
राजा सुरथ अपना राज-पाट दुश्मनों के हाथों खोकर बलहीन और श्रीहीन होकर अपने राज्य के बारे में सोचकर बड़े दुखी एवं चिन्तित हैं-
अर्थात् जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उससे अब भी मेरा लगाव बना हुआ है। समाधि वैश्य जो बड़े धनवान थे, अपनी स्त्री तथा पुत्रों के द्वारा घर से निष्कासित होकर भी उनके कल्याण के बारे में सोच-सोच कर काफी परेशान हैं-
अर्थात् पत्नी तथा पुत्रगणों में मेरे प्रति प्रेम का सर्वथा अभाव है, तो भी उनके प्रति मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पा रहा है। मोह तथा लोभ जो दुःख के मूल कारण हैं, उससे कैसे मुक्त हुआ जाये, यही दुर्गा सप्तशती का मुख्य विषय है। राजा सुरथ तथा समाधि वैश्य माया तथा ममता में जकड़े जीवन के प्रतीक हैं। महाभारत में जिन्होंने सुई की नोक भर भी जमीन देने से इनकार कर दिया तथा द्रौपदी का चीर हरण किया, ऐसे कौरवों के प्रति भी अर्जुन मोह-वशीभूत हो जाते हैं।
अर्जुन यहां जीवात्मा का प्रतीक है। मेधा ऋषि कहते हैं कि मनुष्य तथा अन्य सारे जीव माया जाल में फंसे हैं-
अर्थात् मनुष्य समझदार होते हुये भी लोभ एवं अपने किये हुये उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों से आकांक्षा तथा उम्मीद करता है। संसार की जन्म-मरण की परम्परा बनाये रखने वाली भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ये ममतामय भंवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये गये हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी यही कहते हैं-
हे अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुख आदि द्वन्द्वों से युक्त मोह रूप में सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं।
बुराई पर अच्छाई की विजयः अच्छाई तथा बुराई दोनों एक ही ईश्वर के अंश है। असत् और सत् की लडाई में सत् की विजय के लिये व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर विजय पाना होता है। वध होने के बाद भी महिषासुर एवं रक्तबीज आदि राक्षसों की आत्माएं समाप्त नहीं हो सकीं और आज भी वे विभिन्न रूपों में मनुष्य के अन्दर विद्यमान हैं। ममता, मोह, क्रोध तथा लोभ आदि बुराईयों को सदा के लिये समाप्त करना असम्भव है। महिषासुर जब मां दुर्गा से घायल होता है तो अपना रूप भैंसा, सिंह, हाथी, मनुष्य आदि रूपों में बदल लेता है। हम एक वस्तु या व्यक्ति के प्रति ममता तथा मोह को समाप्त करने का प्रयास करते हैं, तो दूसरी वस्तु या व्यक्ति के प्रति ममता हो जाती है। ये राक्षसी प्रवृत्तियां अच्छाई से ही दबाई जा सकती है और इन्हें दबाकर रखने के लिये अच्छाई को हमेशा बरकरार रखने की आवश्यकता है।
मुक्ति के लिये भक्ति ही सुलभ मार्ग- भक्ति मार्ग में आत्म समर्पण की आवश्यकता होती है। आत्म समर्पण में अहं स्वयं समाप्त हो जाता है। अहं की समाप्ति ईश्वर प्राप्ति का प्रथम सोपान है। सारे देवतागण महिषासुर तथा अन्य राक्षसों से त्रस्त होकर मां दुर्गा के आवाहन के लिये भक्ति मार्ग ही अपनाते हैं। राजा सुरथ भक्तिमार्ग से ममता मुक्त हो अपना राज्य पुनः वापस लेने का वरदान प्राप्त करते हैं। समाधि वैश्य भक्ति मार्ग से ही मोह-पाश से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। अर्जुन भी मोह से मुक्त नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा होने की बात स्पष्ट रूप से स्वीकारते हैं। भगवान श्रीकृष्ण मोक्ष की प्राप्ति हेतु भक्ति मार्ग ही सुलभ बताते हैं-
अर्थात् जो भक्त मुझ परमेश्वर का निरन्तर चिन्तन करते हुये निष्काम भाव से भजता है, उन नित्य निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुषो का योग क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूं। दुर्गा सप्तशती में पूर्ण समर्पण के साथ भक्ति करने पर देवी प्रसन्न होकर मोक्ष प्रदान करती हैं-
अर्थात् जो प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधा मैं निश्चय ही दूर कर दूंगी। कर्म मार्ग एवं ज्ञान मार्ग में व्यक्ति को हमेशा सावधान तथा जागरूक रहने की आवश्यकता होती है जबकि भक्ति मार्ग पूर्ण समर्पण में सभी विघ्न-बाधाओं से परिष्कृत रहता है और भक्त की पतवार प्रभु के हाथों में रहती है।
कलात्मक रचनाः दुर्गा सप्तशती धार्मिक ग्रंथ है परन्तु इसका प्रारम्भ, विकास तथा अन्त कलात्मक है। दानवी प्रवृत्ति पर दैविक शक्ति की विजय के लिये लौकिक तथा अलौकिक दोनों प्रकार के पात्र हैं। दुर्गा सप्तशती में राजा सुरथ तथा समाधि वैश्य के अन्तर निहित एवं स्वजनित लोभ, मोह तथा कायरता का विनाश भगवती दुर्गा के विभिन्न रूपों के द्वारा महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, शुंभ-निशुंभ तथा रक्तबीज आदि राक्षसों का वध प्रतीकात्मक रूप में अच्छाई तथा बुराई के धरातल को दर्शाता है।
सभी राक्षस मनुष्य के अन्दर अज्ञानता जनित कायरता, कामना, क्रोध, अहंकार, वर्चस्व, लोभ, मोह आदि अवगुणों के प्रतीक ही हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान ये सब आसुरी सम्पदा के साथ उत्पन्न हुये पुरुष के लक्षण हैं।
दुर्गा सप्तशती में आध्यात्मिक अनुभव का बहुत ही सुन्दर वर्णन है। इसमें आस्था, श्रद्धा तथा अध्यात्म दर्शन की अद्भुत धारा प्रवाहित होती है। आवश्यकता है केवल समर्पण के साथ भक्ति भावना की।
आपकी मां
शोभा श्रीमाली
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