





शरीर के सारे क्रियाकलाप जब सामान्य और स्वभाविक रूप में चलते रहते हैं तब शरीर स्वस्थ माना जाता है, लेकिन ज्यों ही इनमें कोई छोटा-बड़ा विकार आ जाता है, तब रोगकारक स्थितियां बन जाती है। रोग की यह स्थिति कभी-कभी बहुत मामूली होने से बिना विशेष उपाय के खुद ही दूर हो जाती है। लेकिन गम्भीर होने पर बहुत प्रयत्न करने पर भी दूर नहीं होती।
और खाँसी ऐसा विकार है, जो स्वतंत्र रोग के अलावा किसी अन्य बीमारी के लक्षण के रूप में भी पनप सकती है। बचपन से बुढ़ापे तक खाँसी का रोग प्रायः हर स्त्री-पुरूष को कभी भी हो सकता है, फिर चाहे वह मामूली रूप में हो या कष्टकारी बीमारी के लक्षण रूप में किसी प्रकार से इसलिए हमें अपने शरीर में लगने वाले हर छोटे-बड़े रोग से बचने का उपाय करते रहना चाहिए।
कांसे के फूटे हुए बर्तन जैसी आवाज जब मुंह से निकलती है, वह धों-धों या खों-खों की आवाजें मुंह से निकलती है, तो उसे खाँसी कहा जाता है। खाँसी को आयुर्वेद में कास कहा गया है, मुंह से कुशब्द निकलने की वजह से इसे कास कहा गया है- कास नात् कास उच्यते। फेफड़ों में भरी हुई हवा,श्वासनली या मुंह के द्वारा बाहर फेंकने की क्रिया से एक तरह की आवाज होती है, जिसे हम खाँसी कहते है। अंग्रेजी में इसे Cough कहा जाता है।
खाँसी को हम एक विकार मानते है, लेकिन वास्तव में कई मायनें में यह एक ऐसी क्रिया है, जो श्वसन संस्थान में प्रवेश कर गये निरूपयोगी और नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों को बाहर निकालने में मददगार भी बनती है। खाँसी से निकलने वाली हवा इन तत्वों को बाहर निकालकार श्वसन संस्थान को साफ कर देती है, लेकिन खाँसी जब ज्यादा जोर पकड़ने लगती है तब वह दुखदायी बन जाती है। ऐसे में सीने और गले में दर्द होने लगता है, सांस फूलती है और बेचेनी होने लगती है।
बीड़ी-सिगरेट पी रहे व्यक्ति के पास बैठे अन्य व्यक्ति को अपने आप खाँसी आने लगती है, क्योंकि बीड़ी-सिगरेट में से जो धुआं निकलता है वह पास वाले आदमी की सांस के माध्यम अन्दर पहुंचता है, तो उसका शरीर उस अप्रिय धुए को बर्दाश्त नहीं कर पाता लेकिन कई बार खाँसी आने की वजह कोई अन्य बीमारी भी होती है। जैसे-
गले के विकार- गले की जलन, टांसिल्स की जलन या गले का कैन्सर आदि।
नाक के विकार- साइनोसाइटिस बीमारी में रात के समय खाँसी की शिकायत देखी जाती है।
श्वास नलिका के विकार- दूषित, विषाक्त वायु या धूल कणों की वजह से।
इसे गीली खाँसी भी कहते है, खाँसी के साथ कफ का आना इसका लक्षण है, कई बार कफ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बाहर निकलता है यानी दिनभर में 5-6 बार ही कफ खाँसी के साथ बाहर निकलता रहता है।
पीला और बदबूदार कफ निकलने से यह संभावना होती है, कि फफेड़ों में मवाद बन रहा है या व्यक्ति ब्रांकायक्टेसिस रोग से पीडि़त है।
यदि कफ का रंग हल्के से हरे रंग का हो तो यह गले या स्वर यन्त्र के विकारों को दर्शाता है और संभावना होती है, कि व्यक्ति दमा से पीडि़त है।
कम भूख लगना, वजन का धीरे-धीरे कम होने व निरन्तर खाँसी बने रहना भी कैंसर का एक लक्षण हो सकता है।
इस स्थिति में खाँसी खूनी हो जाती है और कफ में खून आने लगता है।
वैसे तो सर्दी-जुकाम का खाँसी से सीधा सम्बन्ध तो नहीं है, पर यह तकलीफ सर्दी में ज्यादा होती है।
अन्ननलिका या श्वासनलिका में कोई विकार होने से नवजात खाँसी से ग्रस्त हो सकता है। छोटे बच्चे गले के वायरस, क्षय रोग, न्यूमोनिया या दमा की वजह से इसकी गिरफ्त में आने से खाँसी हो जाती है।
काली खाँसी बचपन से हो सकती है, यह खाँसी ज्यादा दिनों तक रहती है, और ज्यादा तेजी लिए रहती है, इसकी तीव्रता रात में ज्यादा रहती है, कई बार इस खाँसी में खून भी आ जाता है।
पके केले का थोड़ा सा छिलका हटाकर एक पीपर अथवा पांच काली मिर्च दबाकर रात को ओस में छत पर रखकर सुबह छिलका दूर करके पहले पीपर या काली मिर्च खाकर बाद में केला खा लें। इससे पित्तजा और वातज दोनों खाँसी ठीक होती है।
तुलसी के पत्ते और अदरख 1-1 ग्राम, लौंग-2 ग्राम मिलाकर चबा के खाने से सूखी खाँसी मिट जाती है।
बड़ी इलायची को आग में भूनकर शहद के साथ मिलाकर चाटने से पित्त की खाँसी समाप्त होती है।
काली मिर्च, मुलहठी और मिश्री-दानों को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना ले इस चूर्ण को तीन ग्राम मात्रा में दिन में 4-5 बार सेवन करने से कफ खाँसी में आराम मिलता है।
यदि बच्चे के सीने में सर्दी का असर हो तब थोड़े से प्याज का रस और सरसों का तेल मिलाकर पका लें उसी तेल से बच्चे की छाती पर मालिश करने से छाती में जमा कफ पतला होकर निकल जाता है।
अदरख के रस के साथ गाय का घी पकाकर, इस घी की थोड़ी-थोड़ी मात्र में गरम दूध में मिलाकर पिलाने से कूकर खाँसी मिटती है।
अदरक के रस के साथ शहद मिलाकर पीने से कास, श्वास, जुकाम आदि रोग शीघ्र दूर होते है।
बिना वायु के श्वास रोग नहीं होता, बिना कफ के खाँसी नहीं होती, बिना रक्त के पित्त नहीं होता और बिना पित्त के क्षय नहीं होता। यह सिद्धान्त की बात है। पर हर व्यक्ति को अपने शरीर के प्रति हमेशा सचेत रहने की आवश्यकता हमेशा हैं।
इसलिये हमें भगवान ने जो शरीर दिया हैं, उसके प्रति भी हमारी जिम्मेदरी बनती है, कि हम अपने आस-पास सफाई रखें जिससे हमारे घर परिवार का वातवरण स्वच्छ व बीमारियों से रहित रहें।
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