





भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की विलक्षणता और व्यापकता अपने आप में अद्भुत ही कही जा सकती है, जीवन के सभी पक्षों को उन्होंने जीया और किसी भी पक्ष में कोई न्यूनता नहीं रही। यह सत्य है कि वे भगवान विष्णु के अवतार थे, किन्तु अवतारों में भी वे ही पूर्ण पुरूष की संज्ञा से विभूषित किये गये हैं, षोडश कला युक्त कहे गये हैं, जिस प्रकार पूर्णिमा का चन्द्र होता है।
भगवान श्रीकृष्ण के देवत्व का प्रमाण, उनके द्वारा बचपन से ही सम्पन्न की जाने वाली अलौकिक घटनाये तो रही ही, साथ ही उनके अन्दर कुछ ऐसे लक्षण भी थे, जिनके माध्यम से उनकी अलौकिकता प्रकट होती थी। भगवान श्रीकृष्ण अपनी बाल्यावस्था में जब अपने गुरू सान्दीपन के आश्रम में गये, तब उनके गुरू ने उनके इन लक्षणों को पहली दृष्टि में ही पहचान लिया था।
शास्त्रों में ऐसे देवत्व युक्त व्यक्तित्व के सोलह लक्षण वर्णित किये गये हैं, यद्यपि इनमें से एक या दो लक्षण किसी-किसी विशिष्ट व्यक्ति में भी देखने को मिल जाते हैं, किन्तु सभी सोलह लक्षण अति दुर्लभ होते हैं। कहते हैं भगवान बुद्ध जैसे महापुरूष के हाथों में भी, इनमें से केवल छः लक्षण या चिन्ह ही थे और वे उनके बाद भी विश्वविख्यात हुये। उज्जैन में इस विषय से सम्बन्धित एक हस्तलिखित ग्रंथ प्राप्त हुआ है, जिसमें सभी षोडश चिन्हों के वर्णन स्पष्टता से किये गये हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार यह ग्रंथ स्वयं ‘गुरू सान्दीपन’ द्वारा लिखा गया है, जो वर्तमान में काशी के विद्वान ‘पण्डित पीताम्बरदत्त जी’ के पास सुरक्षित है, यद्यपि यह ग्रंथ तो काफी बड़ा है, जिसमें षोडश चिन्हों और षोडश कलाओं का विस्तृत शास्त्रीय विवेचन हुआ है, लेकिन यहां मैं संक्षेप में उन चिन्हों का वर्णन प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो षोडश कला चिन्ह कहे जाते हैं-
कमल- हाथ में जहां से जीवन रेखा प्रारम्भ होती है, उसके आगे ही यह चिन्ह नाल सहित अष्टदल-कमल के रूप में मिलता है, यह प्रथम कला चिन्ह है और इसे ‘ब्रह्म चिन्ह’ भी कहा जाता है, यदि कोई व्यक्ति इस चिन्ह का दर्शन मात्र कर लेता है, तो भी उसके सारे पाप कट जाते हैं। जिस व्यक्ति के हाथ में यह चिन्ह होता है, वह एक ऐसी विशिष्ट आत्मा होती है, जो पृथ्वी ग्रह में उचित समय पर अवतरित होती है, ऐसा व्यक्ति मंत्र का अध्येता और सिद्ध पुरूष होता है, जिसे पूर्णता से वाक्सिद्धि प्राप्त होती है।
आर्या- हथेली में सूर्य पर्वत के नीचे यह चिन्ह सूर्य के समान वृत्ताकार होता है, जिसके चारों ओर किरणें विकीर्ण हुई होती है। ऐसे चिन्ह से युक्त व्यक्ति तेजस्वी, योग्य और विद्वान होता है, पूरा युग उनके ज्ञान से प्रभावित होता है और आने वाली पीढि़यों के लिये ऐसा व्यक्तित्व उन ग्रंथों की रचना करके जाता है, जो पाथेय और मार्गदर्शक सिद्ध होते है।
पांचजन्य शंख- यह चिन्ह शुक्र पर्वत पर मिलता है। जिसके भी हाथ में ऐसा चिन्ह होता है, उस व्यक्ति का पूरा जीवन मधुरता एवं आनन्द के साथ व्यतीत होता है, दूसरों के साथ उसका व्यवहार अत्यन्त सरल और मधुर होता है और ऐसा व्यक्ति धर्म और विज्ञान के क्षेत्र में अद्वितीय कार्य सम्पन्न करता है।
त्रिगुणा- शनि पर्वत से नीचे जहां से भाग्य रेखा प्रारम्भ होती है, वहीं यह चिन्ह तीन पत्तियों के समान गुथे हुये पुष्प के रूप में विद्यमान रहता है, यह चिन्ह सत्व, रज और तम तीनों गुणों से सम्बन्धित चिन्ह है। ऐसा व्यक्तित्व साधनात्मक बल से प्रकृत में परिवर्तन लाने में सहायक होता है और सारे शास्त्र उसे स्वतः कण्ठस्थ होते है।
पुष्कल- चन्द्र पर्वत के नीचे छोटी-छोटी रेखाओं से मिलकर बना यह चिन्ह ऐसा लगता है, मानो द्वितीया का चन्द्र खिल रहा हो। यह चिन्ह लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है और जो ऐसे चिन्ह का स्पर्श भी कर लेता है, वह अपने जीवन में लक्ष्मी का प्रिय बनने की क्रिया सम्पन्न कर लेता है। जिसके हाथ में यह चिन्ह होता है, वह पूर्ण पौरूष युक्त, आकर्षक व्यक्तित्व होता है।
अनंग- शुक्र पर्वत एवं लघु मंगल पर्वत के बीच यह अनंग अर्थात् कामदेव चिन्ह मानवाकृति के रूप में विद्यमान होता है। ऐसे व्यक्तित्व के हृदय में जोश, आनन्द, उत्साह तथा उमंग का समुद्र लहराता रहता है, उसे कायाकल्प की क्रिया का पूर्ण ज्ञान होता है और उसके साहचर्य में आने वाला व्यक्ति भी रोग रहित, आनन्द युक्त जीवन जीने में समर्थ रहता है।
गजलक्ष्मी- यदि हाथ में तीन मणिबन्ध हो और भाग्य रेखा वहां से प्रारम्भ होकर ऊपर की ओर उठ रही हो तथा जीवन रेखा के समापन स्थल पर गजलक्ष्मी का चिन्ह अंकित हो और यदि यह चिन्ह दोनों हाथों में विद्यमान हो, तो व्यक्ति साधारण घर में जन्म लेकर भी अत्यन्त उच्च स्तरीय सम्मान व सौभाग्य अर्जित करता है।
अतुल्या- दाहिने हाथ में बुध पर्वत के नीचे सात छोटे-छोटे चिन्ह वृत्ताकार बने होते हैं, मानो सात सूर्य एक साथ उदित हो रहे हों। यह चिन्ह करोड़ों-करोड़ों लोगों में से किसी एक के हाथ में ही स्थित होता है और ऐसे व्यक्ति को साधनाये नहीं करनी पड़ती है, वरन् साधनाये उसका वरण करने के लिये आतुर रहती हैं।
ब्रह्माण्ड- बृहस्पति पर्वत के मूल में जहां जीवन रेखा प्रारम्भ होता है, उसके आस-पास यह चिन्ह अंकित होता है, जो दण्ड के आकार का होता है। ऐसे चिन्ह से युक्त व्यक्तित्व ब्रह्माण्ड में कहीं भी विचरण करने में समर्थ होता है और इसी नई कला के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण रासलीला में सैकड़ों रूप धारण कर प्रत्येक गोपी के साथ खड़े होने में समर्थ थे।
कलात्मिका- यह चिन्ह शनि पर्वत और सूर्य पर्वत के बीच में स्थित होता है, जो कि वृत्ताकार होता है और उसमें से सोलह किरणें निकलती हुई प्रतीत होती है। ऐसा व्यक्तित्व पूरे युग को मार्गदर्शन देने में समर्थ होता है और जिसको भी चाहे दूसरे लोक अथवा सिद्धाश्रम के दर्शन कराने में भी समर्थ होता है।
राज-राजेश्वरी- यह दस महाविद्या एवं षोडश चिन्ह है, जो कि व्यक्ति के हाथ में ठीक मध्य में अंकित होता है। दाहिने हाथ के मध्य में 108 छोटी-छोटी रेखाओं से निर्मित यह चिन्ह ऐसा प्रतीत होता है, मानो सिंहासन पर त्रिपुर सुन्दरी भव्यता के साथ बैठी हो। यह सप्त लोक और तीनों प्रकार की महाप्रकृति से सम्बन्धित चिन्ह है, जिसे अजिता और अपराजिता कहा गया है, जिसके हाथ में यह चिन्ह होता है, वह समस्त ब्रह्माण्ड से जो भी चाहे, जिस प्रकार से भी चाहे, प्राप्त करने में सफल रहता है। ऐसा व्यक्ति किसी दरिद्री को भी कुबेर तुल्य बना सकता है।
सर्वानन्दा- यह चिन्ह दाहिने हाथ में ठीक मध्य में स्थित होता है, जिसके एक तरफ चन्द्र पर्वत और दूसरी तरफ शुक्र पर्वत का संयोग बनता है। यह बारहवीं कला है और जिसके भी हाथ में यह कला चिन्ह होता है, वह पृथ्वी के अलावा अन्य विशिष्ट ग्रहों पर भी आ-जा सकता है।
श्री प्रज्ञा- यह तेरहवीं कला भगवान श्रीकृष्ण के हाथों में गुरू पर्वत के नीचे अंकित थी, जिसके कारण वे समस्त सिद्धियों और समस्त सुखोंपभोग के स्वामी बन सके। यह चिन्ह ‘वैभव चिन्ह’ है और इसे देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानों लक्ष्मी कमल-दल पर बैठी हो और दो हाथी कलश से स्वर्ण वर्षा कर रहे हों। जिसके भी हाथ में यह चिन्ह होता है, उसके घर में सभी प्रकार की लक्ष्मियां स्थायी रूप से निवास करती हैं।
भ्रामरी- यह चिन्ह राहु पर्वत के पास उठा हुआ प्रतीत होता है और देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो कोई भ्रमर आकाश की ओर ऊंचा उठ रहा हो। जिसके हाथ में भी इस प्रकार का चिन्ह होता है, वह समस्त प्रकार के तंत्रें का ज्ञाता और सिद्ध पुरूष होता है। वह साक्षात् शिव स्वरूप ही होता है।
विधात्री- यह चिन्ह शनि पर्वत और सूर्य पर्वत का जहां संधि स्थल होता है, वहीं पर अंकित होता है, यदि इसे सूक्ष्मता से देखें, तो ऐसा लगता है, जैसे स्वयं चतुर्मुख ब्रह्मा का बिम्ब अंकित हो। यह चिन्ह जिसके भी हाथ में अंकित होता है, वह किसी भी व्यक्ति के भाग्य को नये सिरे से निर्धारित कर सकता है।
परा- यह सोलहवीं कला है और परा-अपरा विद्या की साक्षीभूत स्वरूपा है। यह चिन्ह सूर्य पर्वत पर होता है और देखने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो जवा कुसुम पूर्ण क्षमता के साथ खिला हो। इस चिन्ह की आठ पंखुडि़यां होती हैं, जिनके नाम हैं- क्षमा, शान्ति, प्रीति, बुद्धि, लज्जा, सिद्धि, प्रज्ञा और ख्याति।
इन चिन्हों का हाथ में होना तो एक विलक्षण घटना होती है, किन्तु जो व्यक्ति अपने जीवन में इन चिन्हों के दर्शन भी किसी व्यक्तित्व के हाथ में कर लेता है, तो उसका भी पूरा जीवन संवर जाता है।
निधि श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,