





ऐसा व्यक्ति कभी इच्छाओं एवं कामनाओं से, कभी लोभ से, कभी क्रोध और कभी ईर्ष्या से जलता है। इसलिये इन पर विजय प्राप्त किये बिना मन शुद्ध कैसे होगा ? इस शुद्धता के लिये सद्विचारों का होना अति आवश्यक है। ये सद्विचार तभी प्रवेश करेंगे जब असत् विचार मन से दूर होंगे। एक व्यक्ति के रहते मकान में दूसरा मनुष्य कैसे रह सकता है ? जिसके मन में जितने सद्विचार होंगे, वह उतना ही सुखी होगा।
भारतीय मनीषियों ने इस दृश्य शरीर के अलावा अन्य शरीरों का भी विवेचन किया है। दिखाई देने वाला शरीर स्थूल है जबकि अन्य सूक्ष्म शरीर की श्रेणी में आते हैं। जहां विचारों और भावों का स्फुरण होता है वह मनोमय शरीर कहलाता है। इसका प्रभाव स्थूल शरीर पर पड़ता है। यदि यह कहा जाये कि स्थूल शरीर को संवारने-निखारने में इस सूक्ष्म शरीर का महत्वपूर्ण हाथ है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। तभी तो शरीर को देखकर काफी हद तक मन की स्थिति का अनुमान हो जाता है। सौन्दर्य प्रतियोगिताओं की कसौटी अब इसीलिये बदली है क्योंकि विज्ञान ने इस बात की पुष्टि की है कि स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अंतर मात्र है तन-मन। अर्थात मन को खूबसूरत बनाये बिना कोई भी मनुष्य शरीर की सुंदरता नहीं प्राप्त कर सकता।
सौन्दर्य क्या है ? यह एक ऐसा प्रश्न है, जो साधारण प्रश्नों के दायरे में नहीं लाया जा सकता। सौन्दर्य को समझने का मतलब है- हृदय में करुणा की अनुभूति होना। इसका आगमन तब होता है, जब हमारा मन व हृदय किसी सुन्दर वस्तु के प्रति बिना किसी रुकावट के पूरी तरह संवादित होता है।
इसी तरह दुनिया के तमाम विचारक आंतरिक सौन्दर्य को वास्तविक सौन्दर्य मानते हैं। प्राणिक, मानसिक और शारीरिक सौन्दर्य भटकाने वाले होते हैं, आंतरिक सौन्दर्य के लिये ईश्वरीय प्रकाश जरूरी होता है। ईश्वरीय प्रकाश जैसे ही अंतर में भासित होता है, सारे बाहरी सौन्दर्य बेकार लगने लगते हैं। विश्व प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि वर्ड्सवर्थ ने कहा है- जिस व्यक्ति में आंतरिक सौन्दर्य नहीं, वह सुगंधरहित उस फूल के समान है, जो देखने में तो बहुत सुन्दर लगता है, लेकिन महक एकदम नहीं होती।
सुन्दर मनुष्य वही कहलाता है जिसका हृदय अत्यंत सुन्दर है, जो आकृति से बड़ा मनमोहक है और जिसके शरीर की बनावट बहुत आकर्षक है। परन्तु जिसके हृदय में दोष एवं दुर्गुण भरे हैं, वह मनुष्य बाहरी रूप से सुन्दर होते हुये भी असुन्दर है। क्योंकि ज्यों ही उसके हृदय के भाव बाहर आते हैं, त्यों ही वह सबकी घृणा का पात्र बन जाता है। इसलिये हृदय को शुद्ध करो, प्रत्येक दोष को निकाल दो और सद्गुणों को ढूंढ-ढूंढकर हृदय में बसाओ। इस प्रकार तुम्हारा हृदय भी देवपुरी बन जायेगा।
हमारा अंतर हृदय जब तक सौन्दर्य से ओत-प्रोत नहीं हो जाता, बाहरी चमक-दमक केवल भटकाने का कार्य करती है। भगवान कृष्ण गीता में पवित्रता और शुचितापूर्ण अंतःकरण पर विशेष जोर देते हैं। जिनका हृदय अपवित्रता और विभिन्न दोषों से भरा है, उसके हृदय में परम पवित्र प्रकाशवान देवता नहीं बस सकते।
देवता वही है जिसके हृदय में दैवी गुण भरे हैं। सबसे प्रेमपूर्वक आचरण करने पर सभी प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं। यदि हृदय में यह भाव प्रकट हो गया तो मानो ईश्वर का प्रेम मिल गया और जो ईश्वर के प्रेमी हो गये, उनका जीवन सफल हो गया। इस सच्ची सफलता का लौकिक ऐश्वर्य, यश और सम्मान आदि से कोई संबंध नहीं है।
यह जगत भले ही हमें सफल और सद्भावी समझे परन्तु यदि हमारे मन में दोष और दुर्गुण भरे हैं, कामना की ज्वाला धधक रही है एवं ईश्वर प्रेम का प्रवाह नहीं है तो निश्चय ही यह जीवन निष्फल है। इसके साथ-साथ जिन व्यक्तियों को कोई भी नहीं जानता अथवा जिनके जीवन को लोग निष्फल समझते हैं, उनमें भी हमें ऐसे व्यक्ति मिल सकते हैं जिन्हें सही अर्थों में सफल और भाग्यशाली कहा जाता है।
आंतरिक हृदय में आंतरिक सौन्दर्य की प्रतीति व्यक्ति की वाणी, व्यवहार, कर्म, विचार और भावों से होती है। जिसके हर स्तर पर सरलता, सहजता, करुणा, दया, पवित्रता, विश्वास और शुभता दिखे, वह व्यक्ति अंदर से सौन्दर्ययुक्त होता ही है। जिनकी नजर में प्रकृति की हर वस्तु सुन्दर और सुरुचिपूर्ण लगे, जिसके रोम-रोम में सबके हित की भावना भरी होती है, कथनी-करनी में किसी स्तर पर अंतर न हो, हृदय प्रेम, अहिंसा, सत्य-अभय और दया से भरा हो, सबके अंतर में परमात्मा को वैसे समझे, जैसे नित हृदय समझता है, ऐसे दिव्य हृदय को आंतरिक सौन्दर्य से परिपूर्ण कहा जाना चाहिये।
यजुर्वेद में कहा गया है- हमारा हर कार्य मधुमय हो, बोलना, पढ़ना लिखना-सोचना, बढ़ना, खाना-पीना यानी हर स्पंदन में मधु भरा हो। मधु यानी मीठा सौन्दर्य। यह मिठास ही अंतर हृदय को दिव्यता(भव्यता) से भर देता है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी कैसी है, इस पर ध्यान दें, तो आंतरिक हृदय की दशा को सही रूप में हम समझ सकते हैं। अंदर से हम दिव्य हैं, छिछले, हम जितना स्वतः जान सकते हैं दूसरा नहीं जान सकता। अंदर यदि सुगंध या मधु से परिपूर्ण है, तो बाहरी कुरूपता(शारीरिक) का कोई मतलब नहीं।
यदि हम सच्चे अन्वेषक बन जाये, तो हमारी जिंदगी का हर लम्हा दिव्यता से भरा हो सकता है। ऐसी दिव्यता, ऐसी सुन्दरता जैसी परमात्मा की है। निराकार होकर भी परमात्मा परम सुन्दर है। जैसे परमात्मा की सुन्दरता का कोई रूप-रंग नहीं, वैसे ही दिव्य आंतरिक सुन्दरता का भी नहीं है। जैसे प्रेम, करूणा और सहृदयता का कोई आकार नहीं, फिर भी यह विशाल जनसमूह को बदलने की शक्ति रखते हैं, वैसे आंतरिक सुन्दरता का भी कोई आकार नहीं है, लेकिन जिसके पास यह है वह प्रकृति में सबसे सुन्दर कहा जा सकता है।
ऐसे लोग दिखावे से जरूर दूर होते हैं। वे मन से निश्छल और प्रेम से भरे हुये होते हैं। अतएव इस जगत को दिखावे की भावना से दूर रखकर हृदय को शुद्ध बनाओ। हृदय से सारे दोषों तथा दुर्गुणों को निकालकर उसे दैवी गुणों और भगवत प्रेम से भर दो। चेष्टा करो क्योंकि कोई भी कार्य कठिन नहीं है। विश्वास करो, सफलता अवश्य मिलेगी।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,