





यह स्थिति पशुओं में नहीं होती, मनुष्य चिन्तन कर सकता है कि जीवन को किस प्रकार पूर्णता तक पहुँचाये।
जीवन में ऊँचा उठने की प्रक्रिया केवल उस चिन्तन के माध्यम से संभव है, जिसके माध्यम से एक सामान्य मनुष्य पूर्णता तक पहुँच सकता है। एक सामान्य नर, नारायण तक पहुँच सकता है। एक सामान्य व्यक्ति उस प्रभु के दर्शन कर सकता है, जो जीवन का आधार है, जो जीवन का चिन्तन है, और यदि हम दर्शन नहीं कर सके, तो हमारा जीवन व्यर्थ है।
मगर ऐसी बात तो मुझसे पहले भी सैकड़ों लोगों ने आपको कहीं है। मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ। उन लोगों ने भी तो जीवन में यही कहा है कि हमें प्रभु के दर्शन होने चाहिये, और मैं भी यही बात कह रहा हूँ कि जीवन में प्रभु के दर्शन होने चाहिये, फिर अन्तर क्या है?
कहने और करने में मूलभूत अन्तर है। अगर यह कहें कि लोग राम-राम कहेंगे और राम जी के दर्शन हो जायेंगे, तो नहीं हो सकते, यह संभव नहीं है। यदि हम कहें कि भोजन करें और कहने मात्र से पेट भर जाये, ऐसा संभव नहीं है, उसके लिए खाना बना करके पेट में डालने की प्रक्रिया करनी ही पड़ेगी।
केवल मंत्र जप और ईश्वर का ध्यान लगाने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती, केवल मानसिक शांति ही प्राप्त हो सकती है, दोनों में अन्तर है। हम जब ध्यान लगाने की प्रक्रिया करे और यदि हम यह कहें कि ध्यान लगा लेते है, तो यह हमारी न्यूनता है, यह हमारी कमजोरी है, यह हमारा घमण्ड है, यह हमारा गर्व है कि हम ध्यान लगा लेते है, वास्तव में तो ध्यान आप लगा ही नहीं पाते हैं।
ध्यान का मतलब तो यह है कि हमारा अस्तित्व हमें ज्ञात ही नहीं हो। हमें पता ही नहीं पड़े कि हम कुछ है, बिल्कुल डूब जायें, ऐसा पता ही नहीं चले कि पास में कोई आवाज रही है या रसोई में कोई बरतन की खड़खड़ाहट हो रही है……. यदि कोई आवाज सुनाई नहीं देती, तो समझना चाहिये कि ध्यान लग रहा है, अन्यथा तो ध्यान नहीं लग सकता।
हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने, योगियों ने, संन्यासियों ने, इससे पहले भी जिन लोगों ने आपके सामने प्रवचन किये होंगे, उन लोगों ने भी यही बातें कहीं होंगी कि ध्यान लगाना चाहिये, प्रभु का चिन्तन करना चाहिये, मंत्र जप होना चाहिये, राम-राम करना चाहिये।
प्रैक्टिकली कोई तथ्य आपके सामने नहीं आया, और जब तक प्रैक्टिकली नहीं आयेगा, तब तक….. अभी आप पैंतालीस साल के हो गये यही सोचते सोचते आप पचपन साल के हो जायेंगे, फिर सत्तर साल के हो जायेंगे, फिर समाप्त हो जायेंगे। यदि यह सोचते रहें कि हमने राम नाम का मंत्र-जप तो किया था या मन्दिर में जाकर दर्शन तो किये थे, यह तो केवल आधार है, बेस है। हमें एक मामूली मनुष्य से पूर्णता तक पहुंचना है।
यदि हमें पूर्णता की परिभाषा ज्ञात नहीं है तो हम पूर्णता तक पहुँच भी नहीं सकेंगे। यदि हमें कनाट प्लेस पहुँचना है और मार्ग ही मालूम नहीं है, तो हम कनाट प्लेस नहीं पहुँच कर करोल बाग पहुँच जायेंगे, जाना तो कनाट प्लेस है, और कनाट प्लेस का रास्ता मालूम नहीं है। साधुओं ने योगियों ने आपको कहा कि कनाट प्लेस जाना चाहिये, बच्चे!वहीं शान्ति मिलेगी, पर उन्होंने यह नहीं बताया कि किस तरीके से कनाट प्लेस पहुँचे? जब आपको तरीका ही ज्ञात नहीं होगा, तो जीवन में उन्नति भी नहीं हो सकती, तब आप कनाट प्लेस नहीं पहुँच सकते, प्रभु के दर्शन नहीं कर सकते……. और प्रभु में विलीन नहीं हो सकते, तो पूर्णता भी प्राप्त नहीं कर सकते।
इसलिये ‘ईशावास्योपनिषद’ में कहा गया है कि ‘हम पूर्ण हैं और पूर्णता में विलीन होने पर पूर्ण हो सकते है, प्रभु ने हमें पूर्ण तो बनाया ही है-दो आँखे, नाक, कान, हाथ, पैर कोई कमी रखी नहीं, मगर यह पूर्णता उस पूर्णता में पहुँचेगी, तभी पूर्णता प्राप्त होगी।
यह एक अधूरी पूर्णता है, केवल आप मेरे प्रवचन को सुनकर ही पूर्णता तक नहीं पहुँच सकते। उसको यदि आप प्रैक्टिकल रूप में अपने जीवन में उतारेंगे, तभी आप पूर्णता तक पहुँच सकेंगे…. और जब पूर्णता प्राप्त होगी, तभी उस प्रभु के साक्षात् दर्शन हो सकेंगे, जिनको शास्त्रों में ब्रह्म कहा गया है, कृष्ण कहा गया है, राम कहा गया है, बुद्ध कहा गया है, महावीर कहा गया है……. जो कुछ भी उनके नाम रखे गये हैं। जब हम उनको आत्मसात् कर सकते है, एकाकार हो सकते है, उनमें बिल्कुल विलीन हो सकते है, उनमें अपने आप को निमग्न कर सकते है, और जब उनको निमग्न कर सकते है, तो जीवन में पूर्णता प्राप्त हो सकती है, सफलता प्राप्त हो सकती है।
फिर जीवन में बुढ़ापा व्याप्त नहीं हो सकता, फिर जीवन में कोई अभाव, कोई तकलीफ नहीं हो सकती। फिर जीवन में समस्याएं नहीं आ सकती, जैसा कि इस श्लोक में बताया कि धन, यश, मान, पद, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य यह पूर्णता नहीं है, अगर यह सब पूर्णता होती, तो बिड़ला जी के जीवन में कोई कमी है ही नहीं।
मैं अभी पन्द्रह-बीस रोज मॉरिशस से आया था। मॉरिशस में विश्वशांति यज्ञ था। मॉरिशस जाने के पहले उनसे मिलने का मौका मिला, उनके घर पर।
मैंने कहा-भई ठीक-ठाक हो? उन्हें आशीर्वाद दिया।
उन्होंने कहा-गुरू जी! बाकी सब तो ठीक ठाक है, फाइनेन्सियली थोड़ा टाइटनैस चल रही है, आप थोड़ा उधर ध्यान दीजिये, बाकी सब ठीक ठाक है।
अब अगर बिड़ला जी की फाईनेन्सियली टाइटनैस है, तो हमारी टाइटनैस तो है ही।
-अब आप को क्या बतायें, नींद नहीं आती गुरूजी!
मैंने कहा-नहीं आ सकती… नहीं आ सकती… तो पैसा तुम्हारे किस काम आयेगा? जब पैसे से आप नींद ही नहीं खरीद सकते, तो फिर पैसे से आप क्या खरीद सकेंगे……. और वह रात को करवटें बदलते रहते है, दो-तीन ट्रंक्विला लेते है, फिर भी पूरी नींद नहीं आती है, और सबुह छः बजे आंख खुल जाती है।
उनसे हम ज्यादा सुखी है…… इसलिये सुखी है कि हमें शाम को आठ बजे नींद आ जाती है, पैसो से खरीदनी नहीं पड़ती…. और पैसों से नींद खरीदी भी नहीं जा सकती। पैसों से भूख नहीं खरीदी जा सकती। पैसों से अरोग्य नहीं खरीदा जा सकता। पैसों से आनन्द नहीं खरीदा जा सकता। पैसों से प्रभु नहीं खरीदे जा सकते।
ये सब चीजें तो व्यर्थ है, फिर और कोई ऐसी चीज है, जिसके माध्यम से आनन्द की प्राप्ति हो सकती है? इन चीजों से नहीं हो सकती, यह हमारा अनुभव हो गया है, क्योंकि जब वे फाइनेन्सियली टाइट हैं, जब उनको नींद नहीं आ सकती और हमें नींद आ रही है, तो हम उनसे ज्यादा सुखी है, हमें इतना तनाव नहीं है और फिर वे भी यही चाहते हैं कि प्रभु के दर्शन हों।
उनसे मैंने पूछा- प्रभु के दर्शन के लिये आप क्या करते हैं?
उन्होंने कहा- घर में मंदिर बनवा रखा है, ऐसा होता है गुरूजी! आप समझते है कि भाग-दौड़ बहुत ज्यादा होती है, मगर फिर भी मैं चला ही जाता हूं, गुरूजी!
वे बिचारे नित्य चले ही जाते है, और हम नित्य आनन्द के साथ यहां आकर बैठ जाते है। अब बताइये, इसमें कितना सुन्दर अन्तर है? हम तो अपनी इच्छा से आकर बैठ जाते है, वे मजबूरी में चले जाते हैं
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि उनमें न्यूनता है, मेरे कहने का तात्पर्य है कि समस्त भौतिक सुख हमें जीवन में पूर्णता नहीं दे सकते, ये केवल एक संतोष दे सकते है…. यह संतोष कि पिछले साल मेरे पास चार लाख रूपये थे, अब साड़े चार लाख हो गए, बस खत्म। बस पचास हजार रूपये तुमने बेईमानी से, छल से, झूठ से, कपट से जैसे भी कमाये, एक लाख रूपया कमाया और कमाने के बाद में ……….
अभी तक आप आठ नौ कपड़े तो पहिनते आये है, और अब पांच लाख रूपये हो गए, तो आपको दस-बारह कपड़े पहिनने चाहिये, क्योंकि एक लाख रूपये ज्यादा बढ़ गए इस साल, और पहले पांच रोटी खाते थे, अब आपको पन्द्रह-बीस रोटी खानी चाहिये, लेकिन आप चार ही खायेंगे और कपडे़ चार ही पहिनेंगे, चाहे बीस लाख रूपये हो, चाहे पचास लाख रूपये हों।
फिर उस आपाधापी में, उस भागदौड़ में, उस छल-कपट में, जहाँ से हम गुजरते है, उसके माध्यम से हमें क्या मिलता है, सिवाय तनाव, परेशानियों और अड़चनों के, उस माध्यम से जीवन में पूर्णता नहीं मिल सकती। जीवन में हमारा, शास्त्रों का, वेदों का, पुराणों का, उपनिषदों का, आपका, आपके पिताजी का, आपके दादाजी का, आपके संगी साथियों का और आस-पड़ोस का मूल लक्ष्य यही है कि जीवन में आनन्द मिलना चाहिये।
आनन्द और सुख में अन्तर है। आप एक पंखा खरीद कर लायेंगे, घर में गर्मी है, तो एक सुख मिलेगा, आनन्द नहीं मिलेगा। आनन्द एक अलग चीज है, आनन्द तो यह है कि आप मस्ती के साथ सो रहे है, चाहे पंखा चल रहा है, चाहे पंखा नहीं चल रहा है, वह आनन्द है। आप बैठे हुए है, सर्दी पड़ रही है, ओढ़ने के लिये, पहिनने के लिये ऊनी कपड़े नहीं मिल रहे है, फिर भी मस्ती के साथ बैठे हुऐ है, वह आनन्द है।
सुख के माध्यम से तो भोग मिलेगा। जब मकान अच्छा होगा, जब पंखे होंगे, उसमें रेडियो होगा, टेपरिकॉर्डर होगा, यह सुख तो है, मगर क्या टेपरिकॉर्डर सुनने से आनन्द मिल सकता है? क्या आपको हवाई जहाज में बैठने से आनन्द मिल सकता है? आनन्द एक अलग चीज है, आनन्द अन्दर से मिल सकता है और सुख बाहर से पैदा होता है। बाहर से पंखा लगने पर सुख तो हो सकता है, हीटर तो लग सकता है, पर हीटर लगने के बाद भी अगर आप बहुत परेशानी में बैठें है, पति-पत्नी के लड़ाई-झगड़े हो रहे है, आप सोच रहे है कि मैं कहां फंस गया इसके बीच में, इनसे जीवन में आनन्द की उपलब्धि नहीं हो सकती।
आनन्द तो आपके अंदर से प्राप्त होगा, जब अंदर से एक आवाज आयेगी, एक चिन्तन आयेगा, जब ध्यान में डूब सकेंगे, जीवन में एक तृप्ति मिल सकेगी, तब जीवन में एहसास होगा कि मैंने कुछ प्राप्त किया है, मुझे कुछ उपलब्ध हो रहा है, वह जो उपलब्ध होने की क्रिया है, वही आनन्द है, और मैं फिर यह कह रहा हूं कि अगर यह नहीं है, तो हमारे जीवन में और पशु जीवन में कोई अन्तर नहीं है। हम भले ही यह घमण्ड कर लें कि हम महान है, हम पड़ौसी से ऊँचे है, हमारा मकान बहुत ऊँचा है, हम ज्यादा सुन्दर है, यह केवल घमण्ड है….. और इस घमण्ड के माध्यम से तो जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता।
हम भारतवर्ष में हैं, उसको महान कहते है, और यहां अकबर महान कहलाया, सिकन्दर महान कहलाया , बाकी राजा लोग सम्राट कहलाये, ‘‘महान’’ शब्द केवल दो-तीन लोगों के साथ ही लगा और सिकन्दर महान सभी छोटे-बड़े राष्ट्रों को लूटता हुआ सोने चांदी से भरे हुए दो हजार हाथी यूनान ले गया।
इसलिये कि वह राजा था, इसलिये कि वह आक्रमणकारी था, इसलिये कि यहां के राजा लोग उसका सामना नहीं कर सके, और इसलिये कि उसमें एक विजयी होने की भावना थी, एक लूटने की भावना थी, एक छीनने की भावना थी, और अपने आप को बहुत धनवान बनाने की इच्छा थी।
परन्तु जब उसकी मृत्यु निकट आई, जब उसको एहसास होने लगा कि मैं चार-छः घण्टों में मर जाऊँगा, जब सांस उठने लगी, तो उसने सेनापति को बुलाया, वैध को बुलाया और उनसे कहा-अब मेरी आयु कितनी बाकी है?
वैद्य ने कहा-महाराज! अब आप की नाड़ी टूटने लगी है, हो सकता है कि तीन चार घण्टे आप और जीवित रहे, जो आया है, उसको तो जाना ही पड़ेगा महाराज!
सेनापति से कहा-मैंने जो कुछ प्राप्त किया है, उन हीरों का यहां मेरे सामने ढे़र लगा दो, मैं एक बार देख लेना चाहता हूँ।
हीरों का ढे़र लगा दिया, एक तरफ सिक्कों का ढे़र लगा दिया गया, दूसरी तरफ माणिक्य, मोती, मूंगे का ढेर लगा दिया, उसके निकट ही बारह-तेरह हजार रानियों को खड़ा कर दिया…. और सिकन्दर लेटा हुआ अंतिम घड़िया गिन रहा था, जब वह हीरों के ढे़र को देखे तो गर्दन पीछे मुड़े…. इतनी ऊँचाई …… इतना ढे़र! एक-एक हीरा दो-दो, ढ़ाई-ढ़ाई लाख का था, कल्पना करें कि कितना धन होगा।
उसने सेनापति को पूछा-यह सब मेरा है?
उसने कहा-हाँ महाराज!आपका है, आप ही तो लेकर आये हैं, जितने भी देश है, उन सब को लूट कर लायें है, यह सब आपका है।
-और ये रानियां?
-ये भी आपकी हैं महाराज!
उसने पूछा-मरने के बाद मेरा क्या होगा?
सेनापति ने कहा- मरने के बाद महाराज कुछ नहीं होता, बस बांस की दो खपच्चियां लाते है, उनके ऊपर मूंज बांधते है, फिर आपको लिटा दिया जायेगा, और फिर चार कंधों पर आपको उठा करके, श्मशान में ले जाकर आपको जला देंगे।
-फिर ये सब?
-ये सब किसी के साथ गये ही नहीं महाराज!
-तो एक काम करना, मेरी अंतिम इच्छा यही है। कोई वसीयतनामे में लिखकर जाता है कि यह मेरे बेटे को दे देना, यह मेरे पोते को दे देना, उसने कहा- मेरी वसीयतनामें में और कुछ नहीं लिखना है, मैं जो कह रहा हूँ वही काम करना है।
-महाराज आप हुक्म दें? जो आप कहेंगे, वही होगा। आप तो महान है, पूरे संसार में ‘‘महान’’ शब्द केवल आपके पीछे ही लगा है।
उसने कहा-अर्थी पर आदमी को कैसे बांधते है?
सेनापति ने कहा-महाराज इसमें तो कोई लम्बी-चौड़ी बात नहीं है, आदमी को लिटा देते है, हाथ पैर यूं सीधे कर लेते है, उसके ऊपर सफेद कपड़ा ओढ़ा देते है, उसके मुंह पर कपड़े को पूरा लपेट देते है, और श्मशान में चिता पर रखकर के जला देते हैं।
सिकन्दर ने कहा- मुझे जब बांधो तो दोनों हाथ नीचे लटका देना, बाकी शरीर को कफन से बांध देना, बस हाथ नीचे लटके रहने चाहिये।
उसने कहा- महाराज ऐसा तो आज तक नहीं हुआ, हाथ तो उसके शरीर से चिपका कर, उसके ऊपर कफन लगाते है, यह आप नई बात कह रहे हैं, ऐसा कैसे होगा?
सिकन्दर ने कहा – जैसा मैं कह रहा हूं वैसा करना है। मेरी आज्ञा, मेरी इच्छा तो यह है कि दोनों हाथ लटके हुए होने चाहिये।
सेनापति ने कहा-महाराज कोई कारण तो होगा कि दोनों हाथ क्यों लटके होने चाहिये अर्थी के बाहर?
सिकन्दर ने कहा- सभी लोगों को और आने वाली पीढ़ियों को यह मालूम पड़ जाये कि इतना बड़ा सिकन्दर महान भी खाली हाथ जा रहा है, इसलिये मेरे दोनों हाथ बाहर लटके हुए होने चाहिये।
अगर सिकन्दर महान भी खाली हाथ जाता है, तो आप भी गारण्टी के साथ खाली हाथ ही जायेंगे, क्योंकि वह कुछ नहीं ले जा सका, तो हम भी नहीं ले जा सकेंगे……जब कुछ नहीं ले जायेंगे, तो यह सब साथी झूठे है, बेकार है। यह धन अगर बेकार है तो फिर हमारे पास ले जाने के लिये चीज क्या है… क्या ले जायें …..कैसे ले जाये…….. न पत्नी जा सकेगी, न पुत्र जा सकेंगे, न भाई, बंधु…. कोई नहीं जा सकेगा, फिर साथ में कौन जायेगा? जब अकेले ही यात्रा करनी है, तो फिर यह तामझाम क्यों करें? फिर क्यों इतनी हाय तौबा करें? क्यों हम चार लाख के पांच लाख बनायें?
अगर सपूत बेटा होगा, तो कमा कर अपनी जिन्दगी व्यतीत कर लेगा, और कपूत बेटा होगा, तो पांच लाख भी उड़ा देगा, आप उसमें क्या करेंगे? कपूत बेटा तो सात दिन में उड़ा देगा, उसके बाद खाली हाथ हो जायेगा और सपूत बेटा होगा तो तुम्हारे पैसों को उसकी जरूरत नहीं है, वह खुद पांच लाख और इकट्ठे कर लेगा।
सिकन्दर महान ने एक ही बात कही (आप यूनान का इतिहास पढ़े)-‘‘मैंने जीवन में सब कुछ प्राप्त किया, किन्तु आनन्द नहीं प्राप्त कर सका, उसकी अपेक्षा यदि मैं प्रभु में लीन हो सकता, उस आनन्द को प्राप्त कर सकता, जो आनन्द आम आदमी प्राप्त नहीं कर सकता, जिस पूर्णता को आम आदमी प्राप्त नहीं कर सकता, वह पूर्णता अगर मैं प्राप्त कर सकता, तो आज मैं बहुत प्रसन्नता के साथ जाता, और तब आज मेरे चेहरे पर मुस्कराहट होती, होठों पर हंसी होती, पर आज मेरी आंखों में आंसू है, आज मेरे हृदय में पश्चाताप है कि मैंने ये कंकर-पत्थर एकत्र किये, जो मुझे एकत्र करने चाहिये था, वह मैं एकत्र नहीं कर पाया।’’
सिकन्दर तो चला गया, मगर एक इतिहास लिख कर छोड़ गया, कि जीवन में भजन गाने से, मंदिर जाने से, हाथ जोड़ने से और आंखे बंद करके बैठने से पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती…… यह केवल ढ़ोंग है, पाखण्ड है, अपने-आप को समझाने की एक प्रक्रिया है।
यदि आप मंदिर में गये और आपके मानस में घुमड रहा है कि चार सौ वसूल करने है, आज उधर से होते हुए निकल जाऊं, तो उससे चार सौ रूपये ले लूंगा, आपके मस्तिष्क में तो वह घूम रहा है, और आप मंदिर में भगवान के सामने खड़े होकर यह चिंतन कर रहे है कि हे भगवान! उसको सद्बुद्धि आ जाये, साल भर से मेरे चार हजार रूपये फंसे है, उसने दिये नहीं है, हे ईश्वर! मेरे चार हजार रूपये दिलवा देना, तो ठीक है मैं इधर से निकल जाता हूं, मैं कल आपको जरूर पांच रूपये का भोग लगा दूंगा।
अब चार हजार रूपये लेने के लिये पांच रूपये का तो आप दान दे ही सकते है…. सोचा कि इसमें नुकसान ही क्या है, फंसे हुये रूपये तो हैं ही, और पांच रूपये देने से अगर काम निकल जाता हो, तो हमें क्या तकलीफ है…. अब आप खुद सोच लिजिये कि मंदिर में जाने की प्रक्रिया क्या है। मैं आप में से अधिकतर लोगों के चिन्तन की बात कर रहा हूँ।
यह डूबने की प्रक्रिया नहीं है, और यह बात सभी लोग कहते है……..मगर हम कैसे डूबे? अपने आप में आनन्दमय कैसे हो? किस तरीके से पूर्णता तक पहुँचे, वह तरीका कौन सा है, यह किसी ने नहीं बताया। ऊपरी-ऊपरी बातचीत तो आपको सब ने कहीं मैं भी कह कर चला जाऊंगा, अभी एक घण्टा हो जायेगा, मैं प्रवचन करके चला जाऊंगा, आप कहेंगे कि गुरूजी बहुत अच्छा बोले, और मैं कहूंगा कि चलो मैं भी बोल कर आ गया।
मगर उस रास्ते को नहीं बतायेंगे, जिस रास्ते पर चल कर हम पूर्णता प्राप्त कर सकते है। आपके पास उस अंधेरे में टटोलने के अलावा कुछ नहीं रहेगा, मैं भी आपको अंधेरा ही दे रहा हूँ, जो बाकी साधु, संन्यासियों ने आपको दिया, बस जाओ मंदिर में दर्शन कर लो, राम-लला के दर्शन करके तुम मंदिर में खड़े हो जाओ, बस राम-लला तुम्हारे पास आ जायेंगे।
ऐसे तो राम लला नहीं आ सकते, ऐसे प्रभु आपके पास नहीं आ सकते, और न आप प्रभु के पास पहुँच सकते है, क्योंकि तुम्हारे और उनके बीच में एक गैप है। मेरे और तुम्हारे बीच में एक कड़ी है। मैं इसको हटा दूं, तो मैं आप तक नहीं पहुंच सकता, और जब तक गुरू आपको बीच का माध्यम, आधार नहीं बतायेगा, तब तक आप प्रभु के पास पहुँचेंगे नहीं…… और जब पहुंचेंगे नहीं तो पूर्णता भी नहीं मिल सकती।
यह माध्यम साधना है। साधना का मतलब है ‘‘ शरीर साधयति सः धर्म’’, जो शरीर को साधता है, वह साधना है। यह जो शरीर को कन्ट्रौल करती है, शरीर को नियंत्रित करती है…… और आपका शरीर नियंत्रित तो है नहीं, इसलिये नियंत्रित नहीं है कि आप दो घण्टे एक जगह आराम से बैठ नहीं सकते, हाथ पैर हिलाने पड़ते है, कभी इस पांव को इधर करना पड़ता है, कभी उस पांव को उधर करना पड़ता है, कभी विश्राम लेना पड़ता है, कभी जम्हाई लेनी पड़ेगी, दो घण्टे आप प्रभु के चरणों में बैठ नहीं सकते, पन्द्रह मिनट आंख बंद करके आप उसमें लीन नहीं हो सकते।
सांस आंख बंद करके बैठी और हे राम! हे राम जी…. अरे बहु! दूध उफन जायेगा, थोड़ा ध्यान रखना, और फिर -हे राम जी! हे राम जी!!
अब दूध उफने या नहीं उफने, तुम्हें क्या मतलब है? प्रभु के चरणों में बैठी हो, उफन जायेगा, यह बहू की ड्यूटी है…….. मगर दूध दस रूपये किलो है गुरूजी! आप तो बैठे-बैठ बोल जायोगे, और यहां दस रूपये बर्बाद हो जायेंगे, हमको तो बताना पड़ता है। आप तो अभी उठ कर चले जाओगे, पर दस रूपये का कौन हिसाब करेगा?
बहू के लक्षण नहीं है, गुरूजी! अगर बहू में ज्यादा गुण होते, तो मुझे यह क्यों करना पड़ता गुरूजी!
और मैं पूछता हूं कि कल जब आपकी आंख बंद हो जायेगी और दूध उफनेगा, तब आप क्या करोगे? फिर कौन कहने को आयेगा?
मगर हम उस मृत्यु को याद नहीं कर पाते…… और आपके पास कितना समय बचा है, यह तो आपको पता ही नहीं है।
जब महाभारत का युद्ध हो रहा था, कौरव और पाण्डवों का युद्ध हो रहा था, वह धर्म युद्ध था, छल युद्ध नहीं था, और धर्म युद्ध का तात्पर्य था कि सूर्यास्त के बाद में युद्ध नहीं करेंगे। वापिस सूर्यादय होने के बाद ही कौरव और पाण्डव आपस में युद्ध करते थे, दिन भर युद्ध करते थे और शाम को दुर्योधन, अर्जुन, भीम इत्यादि एक साथ बैठ करके, एक ही भोजनशाला में भोजन करते थे। युधिष्ठर भी बैठा हुआ है, दुर्योधन भी बैठा हुआ है, भोजन भी कर रहे हैं।
एक दिन रात को आठ -नौ बजे की बात है, युधिष्ठर, भीम, नकुल, सहदेव और अर्जुन पांचों भाई मिलकर मंत्रणा कर रहे थे कि कल कैसे युद्ध करे? किस पर प्रहार करे? किस तरफ जायें? क्या करें? कौन से अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करें?
तभी एक साधु आया, अलख लगाई और ‘‘भिक्षाम् देहि’’ की आवाज दी, तब पांचो पाण्डव यह निर्णय कर रहे थे कि कल युद्ध कैसे करना है? बीच में वह साधु आ गया, तो युधिष्ठर ने कह दिया-महाराज! कल सुबह आना, कल सुबह आपको भिक्षा देंगे।
युधिष्ठर का कहना हुआ, अर्जुन उठा और जोर-जोर से ढ़ोल बजाना शुरू किया।
भीम ने कहा- अर्जुन क्या कर रह हो, इतने जोर से रात्रि को युद्ध का नगाड़ा क्यों बजा रहे हो?
उसने कहा-अब यह निश्चित हो गया कि कल सुबह तक कम से कम युधिष्ठर नहीं मरेंगे, क्योंकि युधिष्ठर झूठ बोलते नहीं और इनको कल सुबह भिक्षा देनी है, इसीलिये सुबह तक ये मर ही नहीं सकते।
युधिष्ठर ने कहा-मैंने कितनी बड़ी गलती कर दी, मुझे क्या मालूम कि घण्टे भर बाद में जिन्दा रहूंगा भी या नहीं। एक सत्यवादी होने के बावजूद ऐसा आश्वासन कैसे दे दिया कि कल सबुह मैं तुम्हें भिक्षा दूंगा? सबुह होगी, किन्तु जीवित रहूंगा भी कि नहीं?
इसलिये मैं भी पूछ रहा हूँ-आपके पास समय कितना है…. ज्ञान नहीं है। संसार में कोई मशीन नहीं बता सकती कि कितना समय आपके पास है, आयु कितनी है कोई विज्ञान नहीं बता सकता, कोई साइन्टिस्ट नहीं बता सकता, कोई डॉक्टर नहीं बता सकता, मैं भी नहीं बता सकता, आप भी नहीं बता सकते।
अब आप सोचते है कि गुरूजी ‘‘ ध्यान ’’ दो-तीन साल बाद लगाना शुरू कर देंगे, यह साधना जो आप कह रहे हैं…. अभी जरा बेटे की शादी हो जाये, घर में बहू आ जाये, उसको काम-धाम सौंप दूं, फिर आपके पास आयेंगे गुरूजी!
अब कब शादी होगी, कब बहू आयेगी, कब आप उसको सिखायेंगे रसोई बनाना, और फिर मेरे पास आयेंगे, तो इस बीच में कब क्या हो जायेगा, मौत कब झपट्टा मार देगी, आपको कुछ पता नहीं है। अतः जो क्षण आपके पास में है, वे आपके है, और जब आप उन क्षणों का उपयोग करेंगे, तभी आपके जीवन में पूर्णता आ पायेगी।
मैंने यह बताया कि उस पूर्णता तक पहुँचने के लिये जो कुछ ऊपरी बातचीत की जाती है, उस बातचीत से पूर्णता नहीं मिल सकती। साधना एक ऐसा माध्यम है आपके और प्रभु के बीच में, जिसके माध्यम से ही उस जगह पहुँच सकते है ….. दान देने से प्रभु प्राप्त नहीं हो सकते, एक सुख मिल सकता है, संतोष मिल सकता है केवल।
एक मंदिर बनाने से संतोष मिलता है कि मैंने एक मंदिर बनाया है, प्रभु का स्थापन किया है….. यह पूर्णता तक पहुँचने का रास्ता नहीं है, यह क्रिया नहीं है, यह एक परोपकार है, एक सामाजिक सेवा है, इसको समाज सेवा कहते हैं।
आप प्रवचन सुनते है, यह एक मन की संतुष्टि है, साधना नहीं है, साधना एक अलग चीज है। साधना का मंदिर में जाने या नहीं जाने से, इस बगीचे में बैठने या नहीं बैठने से कोई सम्बंध नहीं हैं।
साधना ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा आप उस जगह पहुँच सकते हैं, जहां परमानन्द की प्राप्ति होती है।
ब्रह्मानन्दं परम सुखदं केवलं ज्ञान मूर्तिं,
द्वन्द्वातीतं गगन सदृषं तत्वमस्यादि लक्ष्यं।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधी साक्षिभूतं,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरूं तं नमामि।।
‘‘द्वन्द्वातीतं’’ जहां कोई द्वन्द्व नहीं है, जहां कोई भय नहीं है, जहां मृत्यु का भय नहीं है, जहां मृत्यु झपट्टा मार नहीं सकती, क्योंकि राम अगर नहीं मरे, तो आप भी नहीं मर सकते, कृष्ण नहीं मरे तो आप भी नहीं मर सकते, यदि गौतम बुद्ध नहीं मर सके, महावीर नहीं मर सके, तो आप भी नहीं मर सकते।
क्योंकि नहीं…….. राम का नाम तो आपको ज्ञात है, कि एक रामचन्द्र जी थे, जो दशरथ जी के पुत्र थे, इतना तो आपको भी ज्ञात है, पर दशरथ जी के पिता का नाम क्या था, वह आपको ज्ञात नहीं है। उनके दादाजी का नाम क्या था, यह आपको ज्ञात है ही नहीं।
क्योंकि वे मर गए, राम मरे नहीं…….. राम मरे नहीं, इसलिये आज भी हमें उनका नाम याद है, पर राम जी के जो दादा जी थे…… वे मर गये। आपको अपने पिताजी का नाम ज्ञात है, इतना मुझे ज्ञान है और दादाजी का नाम भी मालूम है, यह भी मुझे ज्ञात है, पर आप में से पचास प्रतिशत लोगों को परदादा का नाम मालूम नहीं है, और परदादा के पिताजी का नाम तो आप में से किसी को भी मालूम नहीं हैं।
जब चार पीढ़ी पहले का आदमी मर गया, तो चार पीढ़ी बाद आप भी मर जायेंगे। आपके बेटे आपका नाम याद रख लेंगे, आपके पोते आपका नाम याद रख लेंगे, अगले पौतों के बेटे आपका नाम याद नहीं रखेंगे, क्योंकि आपने परदादा के पिताजी का नाम याद रखा ही नहीं……. आदमी इतनी जल्दी मर जाता है।
और नहीं मरे, इसलिये बिचारा बहुत कोशिश करता है और पत्थर पर लिख देता है ‘‘लक्ष्मी नाथ मार्ग’’, कुछ नहीं तो मर जाने के बाद लोग लक्ष्मी नाथ मार्ग तो याद रखेंगे। कोई ताजमहल बनाकर मर जाता है, कोई मन्दिर बना कर मर जाता है, कोई धर्म ध्वजा लगा कर मर जाता है।
वह इसीलिये, कि शायद मेरे मरने के बाद भी मैं जिन्दा रह सकूं। बाकी यह सब लक्ष्मी नाथ मार्ग लिखकर के और पट्टी लगाकर के ……. घर के बाहर कौशल्या भवन लिखने से तो कौशल्या जिंदा नहीं रह सकती…. वह तो आपकी बहू आयेगी और कौशल्या हटाकर सुमित्रा भवन लिख देगी, फिर तुम क्या करोगे?
इस तरह से जिन्दा नहीं रह सकते, यह संभव नहीं है, यह तरीका नहीं है, यह हम अपने से छल कर रहे है कि शायद इससे हम जिन्दा रह जायें, इससे जिन्दा नहीं रह सकते।
राम ने ऐसा कोई पट्टा नहीं लगाया था, कृष्ण ने ऐसा कोई बोर्ड नहीं लगाया था कि यह बोर्ड लगाने से जिंदा रहेंगे। गौतम बुद्ध ने कोई ऐसा पट्टा या बोर्ड नहीं लगाया, मगर वे फिर भी जिंदा है, आपको और मुझको उनके नाम मालूम है, संसार के 27-28 देशों में भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के बीच जिन्दा है, वे मरे नहीं, शरीर मर गया है। जब वह व्यक्ति जिंदा है, तो आप भी जिंदा रह सकते हैं।
और जिंदा रह सकते है, साधना के माध्यम से, क्योंकि राम ने भी तेरह साल तक जंगल में रह करके योगी और संन्यासियों के बीच में साधनाएँ सीखी, सांदीपन आश्रम में कृष्ण ने साधनायें सीखीं, भगवान बुद्ध भी साधना के माध्यम से ही जीवित रह सके, भगवान महावीर साधना के माध्यम से जीवित रह सके, शंकराचार्य जीवित रहे, गोरखनाथ जीवित रह सके, तो आप भी साधना के माध्यम से जीवित रह सकते है।
मंदिर में जाने से…… मंदिर में जाना चाहिये, मैं यह नहीं कह रहा कि मंदिर में नहीं जाना चाहिये, दान देना चाहिये, गरीबों की सेवा करनी चाहिये, कथा सुननी चाहिये, प्रवचन सुनना चाहिये, पैसा कमाने चाहिये, यह सब कुछ जरूरी है गृहस्थ के लिये, मगर इनके माध्यम से आप पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते…… और अगर पूर्णता नहीं है, तो जीवन में श्रेष्ठता भी नहीं है।
यह साधना …… साधना एक अलग चीज है, उपदेश एक अलग चीज है, राम नाम का मंत्र जप एक अलग चीज है। आप अगर यह कहें कि ‘हरे राम!हरे कृष्ण’ की पच्चीस मालाएं कर लीं……. और भक्ति का तात्पर्य यह है कि मैं प्रभु के चरणों में निमग्न हूँ, प्रभु से प्रार्थना है कि वह दर्शन दें, किन्तु यह कोई जरूरी नहीं है कि वह दर्शन दें ही, आप प्रार्थना कर सकते हैं।
एक भिखारी आपके पास आया और उस भिखारी ने गिड़गिड़ा कर आंख में आंसू भरकर कहा-मैं बहुत भूखा हूं, मेरे बच्चे भूखे है, पांच रूपये दे दो, यदि आपको दया आयेगी, तो आप दे देंगे, दया नहीं आई तो आप नहीं देंगे, यह तो आपकी इच्छा पर निर्भर करता है……. और दूसरा व्यक्ति आपके सामने तन कर खड़ा होता है कि भूखा हूँ और मुझे पाँच रूपये चाहिये, और हर हालत में चाहिये, तो आप सोचेंगे कि इसको दे ही देना चाहिये और आप दे देते हैं।
जब भक्ति करते है, तो कोई जरूरी नहीं कि आपकी भक्ति में इतनी गहराई हो कि प्रभु आपको पूर्णता दे ही दें, पर साधना में तो यह आवश्यक है ही कि उसके माध्यम से पूर्णता मिलेगी ही, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि आप साधना करें ओर उसमें पूर्णता नहीं मिले, ऐसा हो ही नहीं सकता कि आप साधना करें और आपके जीवन के अभाव दूर नहीं हों।
-हम साधना कब करें?
साधना तब हो पायेगी, जब आपके जीवन के अभाव दूर हो पायेंगे। आपके पास खाने को रोटी नहीं है, तो साधना नहीं हो सकती, पेट में रोटी नहीं है और यदि आप आंख बंद करके बैठ जायें और सोचें साधना पूरी हो जाये, कैसे होगी?
हिटलर का नाम सुना होगा, वह एक बहुत खतरनाक शासक रह चुका है और उसने लाखों लोगों का कत्ल करवाया। उसने एक प्रयोग किया था, उसने देश के पांच मौलवियों और पांच पण्डितों को बुलाया और पूछा-
-भगवान कैसे होते है? तुम्हारे खुदा कैसे होते है?
उन्होंने कहा-खुदा कैसे होते है, ईश्वर कैसे होते है यह तुम्हें कैसे बतायें, हिटलर! वह राम के रूप में धनुष -बाण लिये हुये होते है, बांसुरी लिये हुये होते है।
नहीं…….. नही! भगवान तो एक ही तरह का होगा, पचास तरह के थोड़े ही होते है, वे तो कपड़े अलग-अलग पहिने हुये हैं।
उन्होंने कहा- वह हम आपको समझा चुके है, अलग-अलग होते है। भगवान मुरली लिये हुये भी हो सकते है और धनुष-बाण लिये हुये भी हो सकते है, और भी कई रूपों में हो सकते है। भगवान नटवर नागर भी हो होते है। दुर्गा, भवानी, जगदम्बा भी हो सकती है, हाथ में तलवार लिये अष्टभुजा वाली भी हो सकती है।
-नहीं, ऐसा नहीं होता, मुझे तो आप सब मिलकर यह बताइये कि राम कैसा होता है? ईश्वर कैसा होता है? खुदा क्या है? वह कैसा होता है? एक ही तो होता होगा, ब्रह्म तो एक है।
वे नहीं समझा सके, तो उसने कैद में डाल दिया। उन पाँच मौलवियों को और उन पाँच पण्डितों को कैद में डाल दिया गया। पीने के लिये पानी ही दिया गया, खाना दिया ही नहीं। एक दिन बीत गया, तो मौलवियों ने खुदा की इबादत की, एकदम से घुटने टेक करके, पंडितों ने भी राम-राम, कृष्ण-कृष्ण किया, दो दिन बीत गये। अब क्या होगा, यह तो बहुत बदमाश है, और सुबह हुई सुबह होने के बाद उन्होंने नमाज पढ़ी, इबादत की, पूजा की और उस दिन भी शाम हो गई और दूसरे दिन शाम होते ही पांच बार नमाज पढ़ना भूल गये, दो बार नमाज पढ़ना शुरू किया, उन्होंने कहा- खाना तो आना चाहिये, बिना खाने के कैसे चलेगा? यह कोई तरीका हुआ? हमने कोई पाप किया था क्या? उसने फिर पानी भिजवा दिया उस कैद में, वहां रोशनी भी नहीं थी।
तीसरा दिन भी हो गया, अब वे सीखने लगे कि पहले खाना दीजिये, बाकी सब बात बाद में, यह सब तुम क्या कर रहे हो? हम लोगों को क्यों कैद किया है? अब वे बिचारे पांचो नमाज तो भूल गए और रोटी-रोटी करने लग ये। पंडित भी राम, कृष्ण सब भूल गए, उस दिन भी उन्हें रोटी नहीं दी गई। चौथा दिन पूरा बीत गया और पांचवा दिन हो गया, तो वे एकदम पस्त। अब वे आंखे बंद करें, तो सामने गोल – गोल रोटी दिखाई दे, उस मुसलमान को भी हिन्दू को भी।
हिटलर ने उनको फिर बुलाया और पूछा-ईश्वर कैसा होता है?
ईश्वर गोल-गोल होता है, फूला हुआ रोटी जैसा, मुसलमानों का खुदा भी वैसा ही हुआ और हिन्दुओं का ईश्वर भी वैसा ही हो गया।
अगर तुम्हारे पेट में रोटी नहीं है, और मैं तुम्हें साधना सिखाऊंगा, तो तुम्हें साधना की शक्ल भी रोटी की तरह ही दिखाई देगी।
इसलिये पहले साधना के माध्यम से तुम्हारे जीवन के अभाव दूर होने चाहिये…….जब जीवन के अभाव दूर होंगे, तब हमारे जीवन में पूर्णता आ पायेगी…………….आवश्यक है, क्योंकि हम गृहस्थ में हैं।
साधना का तात्पर्य यह है कि हमारे जीवन में जो भी अभाव हो….. अगर जीवन में बहुत ज्यादा रोग है, तो मैं साधना कितनी ही बताऊं, आपको सफलता मिल ही नहीं सकती, क्योंकि आप साधना कर नहीं सकते। खांसी करेंगे कि साधना करेंगे?
अगर पुत्र नहीं है, तो भी आप साधना नहीं कर पायेंगे, क्योंकि मन में एक टेन्शन है। लड़की बड़ी है, तो भी साधना में ध्यान नहीं लग पायेगा। घर में पत्नी लड़ाई-झगड़ा कर रही है या पति लड़ाई -झगड़ा कर रहा है और मैं कहूंगा भी, तो अभी आप जाकर आंख बंद करके बैठेंगे…. पर वहां पत्नी शुरू हो जायेगी-लो मैंने पहले ही कहा था मत जाओ, वहां कुछ नहीं सिखाते,फालतू में आंखे बंद करके बैठ गए, दुकान जाना है या नहीं, क्या कर रहे हो तुम…. और लड़ाई-झगड़ा!
इसलिये साधना के उस श्लोक का, जो मैंने पहले आपके सामने रखा, उसका तात्पर्य यह है कि उस साधना के माध्यम से गुरू उनकी उन समस्याओं का निवारण करें, जो उनके जीवन के अभाव है, अगर वह जीवन के उन अभावों को दूर करता है, तभी वह गुरू है, उपदेश देकर चला जाने वाला गुरू नहीं हो सकता……. वह तो उनकी रोजी-रोटी का साधन है, क्योंकि मैं तुम्हें उपदेश दूंगा और तुम मुझे पांच, दस, पच्चीस रूपये भेंट चढ़ाओगे ही चढ़ाओगे, इस प्रकार दिन में सौ, दो सौ रूपये चढेंगे ही, महिने में आठ दस हजार रूपये हो जायेंगे।
मुझे तो काम करना नहीं पड़ता, आपको तो दुकान में भी बैठना पड़ता है। मैं तो आपसे गप्पे मारकर आठ दस हजार रूपये कमा लूंगा, क्योंकि तुम पांच-पांच रूपये तो चढ़ाओगे, और इतने लोग चढ़ायेंगे, तो रोज के दो हजार रूपये ही हो जायेंगे…. इससे अभाव दूर नहीं होते, उसको गुरू नहीं कह सकते।
गुरू वह है, जो आपकी समस्याओं को समझे। गुरू वह है, जो आपकी तकलीफों में साथ हो। गुरू वह है, जो आपकी तकलीफों को दूर करने के लिये उस साधना को समझाये, उस मंत्र को समझाये, जिसके माध्यम से वे तकलीफें दूर हो सकें।
आपके प्रयत्नों से तकलीफें दूर नहीं हो सकती…… होती तो आप कर लेते, फिर मेरे पास आते ही नहीं। आपके प्रयत्नों से ही आपकी गरीबी दूर हो जाये या कर्जा दूर हो जाये, तो फिर आप मेरे पास क्यों आयेंगे, तो फिर गुरू के पास आने की जरूरत ही क्या है? आप पैंतालीस साल मेहनत करके देख चुके है, आप सब कुछ करके देख चुके हैं।
पैंतालीस साल करके देख लिया है कि बेटा कहना नहीं मान रहा है, आप भले ही कितना समझाएं, बेटा आपका कहना नहीं मानेगा। लड़का नहीं पढ़ रहा है, तो नहीं पड़ रहा है। घर में पति-पत्नी में लड़ाई-झगड़े है, तो है। बीमारी अगर है, तो आप सैकड़ों बार दवा ले चुके है, अब आपके प्रयत्नों से और डाक्टरों के प्रयत्नों से बीमारी नहीं मिट रही है, तो क्या तरीका है?
वह तरीका यह है कि सही गुरू हो, जो आपकी समस्याओं को समझ सके, और वह खुद पूर्ण हो। यदि वह खुद ही अधूरा होगा, तो आपको क्या देगा? जो खुद ही आपसे पांच रूपये की याचना रखेगा, तो वह आपको सम्पन्न बनायेगा भी कैसे?
मैं उम्मीद करूं कि आप मुझे दस रूपये भेंट चढ़ायेंगे, तो मैं आपको क्या सम्पन्न बनाऊंगा? मैं तो खुद भिखारी हूं, कैसे करूंगा? मुझमें खुद साधना की पूर्णता होनी चाहिये।
जो मैं कह रहा हूँ, वह इसलिये कह रहा हूँ, क्योंकि हमारे जीवन की उन समस्याओं का निराकरण साधना से ही हो सकता है। शास्त्रों में एक ही श्लोक, एक ही मूल चिन्तन दिया है-
पूर्वे मतां पूर्ण मदैव तुल्यं, ज्ञानोर्वतां परितं भवतं सदैव।
चिन्त्योवमेवचिन भवतं परिपूर्ण पूर्ण, पूर्णो त्वदां भवत पूर्ण मदैव पूर्णं।।
अलग-अलग मंत्र जप और मंत्रों के माध्यम से उस दैवी सहायता को प्राप्त करना, जिसके माध्यम से हम जीवन में पूर्णता प्राप्त कर सके, उसको साधना कहते है। लक्ष्मी साधना के माध्यम से लक्ष्मी प्राप्त हो सकती है और सरस्वती साधना से हमें विद्या प्राप्त हो सकती है। हम तो मनुष्य है, मनुष्यों के माध्यम से, मनुष्यों की सहायता से हम पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते, साधना नहीं कर सकते।
साधना के लिये यह जरूरी है, कि हम उन देवताओं से परिचित हों। आप देवताओं का मंत्र जप करें, परंतु देवता आपसे परिचित है भी कि नहीं? आप राम जी को भेंट चढ़ा देते है, राम जी आपसे परिचित है कि नहीं, यह आपको ज्ञान नहीं। दोनों का बराबरी का संबंध होने से, पानी से पानी मिलेगा, घी से घी मिलेगा, तेल से तेल मिलेगा।
साधना के द्वारा ईश्वर से आपका संबंध स्थापित होगा, वह आपको पहिचानेंगे, आप उनको पहिचानेंगे। इसलिये इस श्लोक में बताया गया है, उस मंत्र को, जो लक्ष्मी से संबंधित मंत्र है, जो सरस्वती से संबंधित मंत्र है, जो भगवान शिव से संबंधित मंत्र है, उस मंत्र का नित्य जप करें, और पूर्णता के साथ, श्रेष्ठता के साथ करें, तो निश्चय ही आपके और उनके बीच की दूरी कम होगी।
निश्चय ही वे पूर्ण है, इसलिये हमने उनको भगवान कहा है, इसलिये उनको लक्ष्मी कहा है, इसलिये उनको सरस्वती कहा है, इसलिये उनको शिव कहा है, ब्रह्मा कहा है, विष्णु कहा है, जो कुछ शब्द कहे, इसलिये कि उस विशेष तथ्य के वे पूर्णता प्राप्त योगी है, देवता है, जब कमी दूर होगी तो उनसे वह चीज प्राप्त हो सकती है।
एक करोड़पति से हम सौ हजार रूपये प्राप्त कर सकते है, क्योंकि वह करोड़पति है। लक्ष्मी अपने आप में करोड़पति है, अरबपति है, असंख्य धन का भण्डार है उसके पास, उससे हम धन प्राप्त कर सकते है, मगर तब जब आपके और उनके बीच की दूरी कम हो जाए…… और वह दूरी कम होने की स्थिति है साधना है, और साधना का तात्पर्य है-मंत्र जप और मंत्र का तात्पर्य है- उन शब्दों का चयन, जिन्हें देवता ही समझ सकते है। मैं अभी आपको ईरान की भाषा में या चीन की भाषा में बताऊं और आधे घण्टे तक बोलूं, आप नहीं समझेंगे।
यह कोई जरूरी नहीं कि जो जन्म से आपके गुरू है, वे जिन्दगी भर आपके गुरू रहें। भगवान दत्तात्रेय के तो चौबीस गुरू थे। भगवान राम के छः गुरू थे, पहले गुरू वशिष्ठ थे, फिर विश्वामित्र हुए, उनसे दीक्षा प्राप्त की, शस्त्र विद्या सीखी, फिर गर्ग हुए, अत्रि हुए, कणाद हुए, पुलस्त्य हुए। कृष्ण के भी सांदीपन और द्रोण दो गुरू थे। गुरू वह जो ज्ञान दे सके, जहां से भी ज्ञान प्राप्त हो सके, और उनके माध्यम से आप उस मंत्र को, उस साधना को प्राप्त करे, जो आप पूजा-पाठ करते है, वह करें, जो भक्ति आप कर रहे है, वह करें, मगर दस साल भक्ति करने के अगले बीस साल के बाद भी समस्यायें नहीं सुलझ पायेंगी।
उसका रास्ता अलग है, कनाट प्लेस का रास्ता अलग है, करोल बाग का रास्ता अलग है, करोल बाग जाना चाहे, तो करोल बाग जायेंगे और यदि कनाट प्लेस जाना चाहें, तो उसके लिये फिर दूसरा रास्ता चुनना पडे़गा, और जब चुनेंगे, तब वहां पहुँच पायेंगे, और तभी ये समस्यायें दूर हो पायेंगी।
दूसरी सीढ़ी उस ब्रह्मत्व को प्राप्त करने की है, और तीसरी सीढ़ी अपने आप में पूर्ण आनन्दमग्न होने की क्रिया है, ये तीनों सीढ़ियां साधना के माध्यम से संभव है। इस छोटे से प्रवचन में यह सब कुछ संभव नहीं था, कि मैं आपको साधना की बारीकियां समझाता, फिर भी मेरी कुछ पुस्तके है, जिनके माध्यम से आपको साधना का प्रारम्भिक ज्ञान हो सकता है, अपने जीवन के अन्य क्रियाकलाप करते हुये भी, भक्ति करते हुए भी।
मैं भक्ति के बारे में भी इतना ही अच्छा बोल सकता था, जितना साधना के बारें में बोला हूँ। मैं वेद पर भी, उपनिषद पर भी, पुराण पर भी और ब्रह्म पर भी बोल सकता था, जो आपको समझ में ही नहीं आता।
जो बहुत उच्चकोटि के विद्वान होते है, उनके बीच में ब्रह्मत्व का उपदेश भी देता हूँ, ब्रह्म क्या है? ब्रह्म की क्या उपस्थिति है, वह बोल सकता था, मगर आपके जीवन में जो आवश्यक है उसके बारें में मुझे बोलना था, और बोला।
मैं तो चाहता हूँ, कि आपके जीवन में कोई अभाव रहे ही नहीं, भौतिक भी, आध्यात्मिक भी, दोनों ही दृष्टियों से आप पूर्णता प्राप्त करें……. आप अपने जीवन में वह सब कुछ प्राप्त करें, जिसको धर्म कहा गया है। आपके हाथों में इतना पैसा आये कि आप मंदिर बनवा सकें, देवालय बनवा सकें, स्कूल बनवा सकें।
इसलिये अर्थ की प्राप्ति हो, आप सम्पन्न हो सके, काम की प्राप्ति हो, आपको पत्नी, पुत्र, बंधु-बान्धव, सुख-सौभाग्य, ऐश्वर्य सब कुछ मिल सके….. और जब यह सब कुछ होगा तो आप बहुत शांति के साथ मोक्ष को प्राप्त कर सकेंगे, मगर इन सबके लिये गुरू की भी आवश्यकता है, इसलिये गुरूर्ब्रह्मा, गुरूर्विष्णु, गुरूर्देवो महेश्वर, गुरू साक्षात् परब्रह्म…… वह परब्रह्म दिखाई नहीं दे रहा, मगर यदि गुरू है, तो परब्रह्म है, और पाखण्डी है, तो परब्रह्म नहीं हो सकता।
गुरू पाखण्डी हो सकते है छलिये हो सकते है, धोखेबाज हो सकते है, विश्वासघाती हो सकते हैं, और आपको लूटने वाले भी हो सकते हैं, मगर वे गुरू नहीं होते हैं। जो आपको निष्छल भाव से रास्ता बता सकते है, वे गुरू होते हैं, ऐसे ही जीवन में आपको गुरू मिलें।
हमारे राजस्थान में यदि किसी को गाली देनी होती है, तो उसको कहते हैं ‘‘निगुरा’’ जिसका कोई गुरू ही नहीं जिन्दगी में। वह अपने-आप में गाली है, ऐसी गाली जैसी मां की गाली होती है, कि ‘तू निगुरा है’,तेरी जिन्दगी में कोई गुरू ही नहीं है, फिर रास्ता कैसे पार होगा तेरा? निगुरा एक गाली है।
आपके जीवन में कोई सच्चा गुरू प्राप्त हो सके, जीवन में पूर्णता प्राप्त हो सके, मैं आपको ऐसा ही आशीर्वाद दे रहा हूँ, जिससे कि आपके जीवन में पूर्णता आ सके, ऐश्वर्य आ सके।
एक बार आपको फिर हृदय से आशीर्वाद दे रहा हूँ।
परम् पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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