





चैतन्यमय होकर जिन्होंने संसार को छोड़ा। चैतन्यमय होकर! दुखमय होकर नहीं, क्रोध से भरकर नहीं, परेशान-पीड़ित होकर नहीं, पूरे आनंदभाव से, लेकिन होश से जब उन्होंने देखा जिंदगी को कि वह बेकार है। यह बेकार होना किसी बाहरी कारण से नहीं, भीतरी बोध से है।
यह बेकार होना दो तरह से हो सकता है। बहुत लोग कहते सुने जाते हैं कि धन में क्या रखा है! लेकिन अक्सर ये वे ही लोग होते हैं, जिनके पास धन नहीं होता। इनकी बात का कोई भी बहुत अर्थ नहीं है। यह मन को समझाना है। यह बार-बार इनका कहना कि धन में क्या रखा है! और धन इनके पास है नहीं, इन्हें धन का पता भी शायद कुछ नहीं है। शायद धन में कुछ नहीं रखा है, ऐसा बार-बार कहकर अपने को भरोसा दिला रहे हैं कि अपन कुछ चूक नहीं रहे, अगर धन अपने पास नहीं है।
नहीं, जब किसी के पास धन है और वह कहता है, धन में क्या रखा है, तब इस बात के आमूल अर्थ बदल जाते हैं। आमूल ही अर्थ बदल जाते हैं। परिस्थिति प्रतिकूल हो, तब जो त्याग होता है, वह त्याग सम्यक त्याग नहीं है। परिस्थिति जब बिलकुल अनुकूल हो, तब जो त्याग होता है, वह सम्यक त्याग है। संसार को जिन्होंने पीड़ित होकर छोड़ दिया है, वे संसार से बंधे ही रह जाते हैं। क्योंकि जिससे हमें पीड़ा मिल सकती थी, अभी हम उसका त्याग नहीं कर सकते हैं।
जिससे हमें पीड़ा मिल सकती थी, वह मिलती ही इसीलिये थी कि हमें अब भी उससे सुख पाने की अपेक्षा थी। अन्यथा पीड़ा का कोई कारण न था। इसीलिये जो जानता है, वह यह नहीं कहता कि संसार दुःख है, वह कहता है, संसार असार है। इन दोनों में बड़ा फर्क है। वह यह नहीं कहता कि दुःख है, वह कहता है, दुःख के योग्य भी नहीं है। क्योंकि जिससे सुख मिल ही नहीं सकता, उसे दुःख कहने का क्या अर्थ है। जिससे सुख मिलने की आशा बंधी है और नहीं मिलता, उससे लगता है कि दुःख मिला।
जो जानता है, भीतर बोध जिसका जगता है, चैतन्यमय हो जाता है, वह देखता है, संसार असार है। इतना भी सार नहीं कि वह दुःख दे सके। इतना भी अर्थ नहीं उसमें, दुःख देने जैसा। क्योंकि जो दुःख दे सकता है, वह सुख क्यों नहीं दे सकता!
जिससे दुःख मिल सकता है, उससे सुख क्यों नहीं मिल सकता! क्योंकि कम दुःख, और उससे कम दुःख सुख हो जाता है। और कम सुख और उससे कम सुख दुःख हो जाता है। तारतम्यतायें हैं। पानी को थोड़ा और कम ठंडा करो, गर्म हो जाता है। पानी को थोड़ा और कम गर्म करो, ठंडा हो जाता है। गर्मी और सर्दी कोई शत्रु नहीं मालूम होते, तारतम्यतायें, मालूम होते हैं। सुख-दुःख भी ऐसे ही हैं।
अगर कोई कहता है, संसार से बहुत दुःख मिलता है इसलिये छोड़ दो, तो गलत कहता है। क्योंकि बहुत दुःख जिससे मिलता है, उससे सुख मिल क्यों नहीं सकता। कोई कारण नहीं है। जिससे दुःख मिल सकता है, उससे सुख भी मिल सकता है। असल में सुख की आशा जहाँ है, वहीं दुःख मिलता है। दुःख मिलता ही इसलिये है कि उससे पहले सुख की आशा खड़ी थी।
नहीं, संसार असार है। दुःख भी नहीं है वहां, सुख भी नहीं है वहाँ। वहाँ कुछ है ही नहीं। वहाँ जो भी हम देखते हैं, वह हमारा ही डाला हुआ है। वहाँ जो भी हम पाते हैं, वह हमारी ही देन है। वह हमने ही दिया है। संसार से जो भी हम पाते हैं, वह हमारी ही प्रतिध्वनि है।
इसलिये दुःख के कारण जो छोड़ दे- प्रियजन मर गया हो, कि प्रियजन न मिल पाया हो, कि प्रियजन प्रिय सिद्ध न हुआ हो, वह आदमी संसार छोड़ दे- उसका छोड़ना त्याग नहीं, आत्मघात जैसा है। जब धन नहीं होता तो व्यक्ति आत्महत्या करने की सोचने लगता है। प्रियजन बिछड़ जाये, तो आत्महत्या की सोचने लगता है। प्रियजन प्रिय सिद्ध न हो, तो आत्महत्या की सोचने लगता है। यश खो जाये, तो आत्महत्या की सोचने लगता है।
सम्यक संन्यास बाह्य कारणों से नहीं, आंतरिक आविर्भाव, चैतन्य से होता है। एक तो है जो बाहर की वस्तुओं से मिले हुये दुःख के कारण आदमी सोचने लगता है। और ऐसा आदमी खोजना कठिन है जिसने कभी संन्यास के बाबत न सोचा हो। ऐसा व्यक्ति ही खोजना कठिन, जिसने कभी आत्महत्या के बाबत न सोचा हो।
दो बातें हैं। एक तो त्याग है जो वस्तुगत होता है, और एक त्याग है जो आत्मगत होता है। वस्तुगत त्याग वस्तु से हुई पीड़ा के कारण होता है। आत्मगत त्याग चैतन्य के बढ़ जाने के कारण होता है। इसलिये जो त्याग ध्यान के परिणामस्वरूप आता है, उसके अतिरिक्त और कोई त्याग, त्याग नहीं है। क्योंकि ध्यान अकेली कीमिया है जिससे आपकी चेतना बढ़ती है। ध्यान तेल है, जिससे भीतर की चेतना की ज्योति बड़ी और प्रखर होती है। ध्यान ईंधन है, जिससे भीतर की चेतना जागती है और आंदोलित होती है।
चेतना भीतर बढ़ती है, तो जगत असार मालूम पड़ता है। अगर वस्तुओं के कारण आदमी त्याग की सोचता है, तो जगत दुःखपूर्ण मालूम पड़ता है, पीड़ादाई मालूम पड़ता है। जगत शत्रु मालूम पड़ता है। जगत को छोड़ देने से सुख मिलेगा, ऐसा मालूम पड़ता है। लेकिन चैतन्य भीतर जगता है, तो जगत असार है। न उसे पकड़ने से सुख का कोई संबंध है, न उसे छोड़ने से सुख का कोई संबंध है।
हाँ, जगत चित्त से गिर जाये तो चित्त खाली हो जाता है- परमात्मा को झेलने और संभालने और देखने और पाने के लिये। भरा हुआ चित्त कैसे उसे जाने! जगह भी चाहिये भीतर।
इतने बड़े मेहमान को बुलाते हैं, परमात्मा को, भीतर जगह नहीं, वहाँ कूड़ा-कबाड़ भरा हुआ है। वहां रत्तीभर जगह नहीं। परमात्मा कई दफे आपकी पुकार सुनकर चारों तरफ चक्कर लगाकर लौट जाता है। देखता है भीतर, जगह ही नहीं है। आप खुद ही अपने भीतर घुसें, तो पता चलेगा। कितनी ही कोशिश करें, भीतर आप न पहुँच पायेंगे। इतना सब कचरा इक्ट्ठा किया हुआ है कि वहां भीतर जगह भी तो चाहिये गति के लिये कोई।
जो लोग ध्यान में उतरना शुरू करते हैं, वे बहुत घबराते हैं। वे कहते हैं, हम अपने भीतर ऐसी चीजें देख रहें हैं, जो हमने सोची भी नहीं थी कि हमारे भीतर हो सकती है। हैं ही, सोची नहीं थी, भलीभांति जानते थे। आपने ही डाली, क्योंकि वहां कुछ ऐसा नहीं हो सकता जो आपके बिना डाले हो। यह बात दूसरी है कि डाले बहुत देर हो गई हो, जन्म-जन्म हो गए हो। डाली आपने ही है। अभी भी डाल रहे हैं।
अगर कोई व्यक्ति किसी की निंदा सुनाने लगे तो चेतना ऐसी सजग हो जाती है, जीवन में रस आ जाता है, कान फैल जाते हैं, सजग हो जाते हैं, फिर बैंड-बाजे भी बजते रहें दुनिया में, वह सुनाई नहीं पड़ते। और वह व्यक्ति फुसफुसाकर बोले, तो भी सुनाई पड़ता है।
फिर भीतर जाने को जगह नहीं मिलती। और हम परमात्मा को बुलाते हैं, बहुत कठिन हो जाता है। भीतर जाना हो, तो भीतर खाली होना जरूरी है। और खाली वही हो सकता है, जो संसार को अपने भीतर प्रवेश न करने दे।
संन्यासी का सूत्र आपसे कहता हूँ। संन्यासी भी संसार में रहता है और गृहस्थ भी संसार में रहता है। लेकिन एक बात में फर्क है। संन्यासी संसार में रहता है, लेकिन संसार संन्यासी में नहीं रहता। और गृहस्थ भी संसार में रहता है, लेकिन संसार भी गृहस्थ में रहता है। अपने भीतर भरता चला जाता है सब। संन्यासी घूमता है, इन्हीं रास्तों पर चलता है, लेकिन उन्हें धूल नहीं छूती, बाजारों की ध्वनियां उनके कानों में प्रवेश नहीं करती।
ऋषि कहते हैं, जिस दिन तुम पानी में चलो और पानी तुम्हें न छू पाये, समझना कि तुम संन्यासी हो गये। इसीलिये कहता था कि संसार में चलो और संसार तुम्हें न छू पाये, तुम्हारे भीतर प्रवेश न कर पाये।
जिनके भीतर बोध इतना जग जाता है कि उस बोध के कारण जो कचरा है वह कचरा दिखाई पड़ने लगता है, फिर उसे संभालने की जरूरत नहीं रह जाती, हाथ से छूट जाता है और गिर जाता है। त्याग किया नहीं जाता, त्याग हो जाता है ज्ञान में। अज्ञानी त्याग करता है। ज्ञानी से त्याग होता है।
अब जिसे संसार में ही व्यर्थता की, असारता की आग लगी दिखाई पड़े, उसे छोड़ना नहीं पड़ता, छूट जाता है। इसलिये ऋषि कहता है, चैतन्यमय होकर संसार का त्याग ही उनके हाथ की लकड़ी है, उनका दंड है।
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