





जन्मों-जन्मों में न मालूम कितने कर्म का भाव हमारे भीतर इकट्ठा हो जाता है। हम बड़े कर्ता हो जाते हैं। जब कि कर्ता सिवाय परमात्मा के और कोई भी नहीं है। तो हम झूठ ही कर्ता होने का खयाल अपने भीतर बना लेते हैं। फिर सब कर्मों को संभालकर रखते हैं, लेखा-जोखा रखते हैं। क्या-क्या मैंने किया, क्या-क्या मैंने नहीं किया। वही हमारे चारों तरफ भीड़ इकट्ठा हो जाती है। वही हमारे भीतर भर जाता है कूड़ा-कबाड़। उसकी वजह से जीवन के सत्य का अनुभव नहीं हो पाता, प्रभु का नित्य दर्शन नहीं हो पाता।
कैसे कटेंगे ये कर्म? यह ऋषि क्या कहता है? ये कर्म कैसे कटेंगे? ये कट जाते हैं एक क्षण में। अगर इतना ही स्मरणपूर्वक अपने भीतर कोई सजग हो जाये कि मैं अपने कर्मों का कर्ता नहीं, सब कर्म परमात्मा के हैं। मैं केवल उसके हाथ की बांसुरी हूँ। स्वर उसके हैं, गीत उसके हैं, मैं सिर्फ बांस की पोंगरी हूँ।
कबीर ने कहा है कि जिस दिन यह जाना कि मैं बांस की पोंगरी हूं, उसी दिन झंझट कट गई। अब वह जाने, उसका झंझट जाने। अपना कोई लेना-देना न रहा।
मरने लगे कबीर तो काशी छोड़कर चले गये। काशी लोग मरने आते हैं। मरे मराए लोग काशी मरने आते हैं। खयाल है कि जो काशी में मरता है, वह स्वर्ग में जन्म लेता है। काशी के पास एक छोटा सा गांव है, मगहर। कि जो मगहर में मरता है, वह गधा होता है नर्क में। कबीर मरते वक्त मगहर चले गए। बहुत समझाया मित्रों ने, प्रियजनों ने, शिष्यों ने कि क्या करते हैं, मगहर में कोई मरता ही नहीं! मगहर में आदमी मर भी जाए, तो उसके रिश्तेदार उसे लेकर भागते हैं कि अभी थोड़ी सांस चल रही है, मगहर के बाहर निकाल लो, नहीं तो नर्क में गधा होता है। तो काशी लोग मरने आते हैं दूर-दूर से और तुम काशी जिंदगीभर रहे और मरने के वक्त मगहर जा रहे हो, दिमाग खराब तो नहीं हो गया!
कबीर ने कहा कि काशी में रहकर अगर मैं मरा और स्वर्ग में गया, तो कर्ता का भाव पकड़ जायेगा- अपनी वजह से। मगहर में मरूं, तो जहाँ उसकी मर्जी हो। नर्क का गधा बना दे, तो भी उसकी मर्जी रही। हम तो मगहर में ही मरेंगे। और अगर स्वर्ग गए तो फिर कह सकेंगे, तेरी अनुकंपा, तेरी कृपा। मरे तो मगहर में थे, होना तो गधा था। लेकिन काशी में मरकर अहंकार पकड़ेगा कि काशी में मरे, रहे काशी में, गए काशी- इसलिये।
हमारे हर कर्म के पीछे कर्त्ता खड़ा हो जाता है, मैं कर रहा हूँ।
कर्मों की निर्जरा न हो, तो मुक्ति नहीं है, स्वतंत्रता नहीं है, चेतना का परम विकास नहीं है। संन्यासी यह कहता है कि अब कुछ मैं नहीं करता। अब वह जो करता है, करता है। अब मैंने अपने सिर पर से वह बोझ हटा दिया। नर्क जाऊं, तो वह जाने, स्वर्ग जाऊं, तो वह जाने। जीऊं तो ठीक, मरूं तो ठीक। जो भी हो, अब मैं नहीं हूं अपने कर्मों के पीछे। अगर कोई ऐसा सरक जाए पीछे से कर्म के, तो आज के कर्म ही नहीं क्षीण हो जाते, अनंत-अनंत जन्मों के कर्मों से संबंध टूट जाता है।
कर्म निर्मूल तभी होंगे, जब मूल कट जाए, और मूल है अहंकार। मूल है कर्ता का भाव कि मैं कर रहा हूँ। मैं ध्यान कर रहा हूँ, इतना भी पकड़ जाए, तो कर्म का बंध होता है। मैं धर्म कर रहा हूँ, प्रार्थना कर रहा हूँ, पूजा कर रहा हूँ, इतना भी पकड़ जाए, तो कर्म का बंध होता है।
जब कर्म को निर्मूल करना हो, जड़ से ही काट डालना हो, तो कर्ता को काटना पड़ता है, कर्मों को नहीं। कर्म तो पत्ते हैं, मूल नहीं है। और उस मूल अहंकार को कि मैं करने वाला हूँ, कैसे काटेंगे? कौन सी तलवार काम पड़ेगी वहां? कौन सी कुदाली वहां खोदेगी? कौन सी कुल्हाड़ी वहां काटेगी?
जहां-जहां कर्ता का भाव हो, वहां-वहां साक्षी का भाव स्थापित कर लें। जहां-जहां लगे कि मैं कर रहा हूं, वहीं-वहीं जाने कि मैं कर नहीं रहा हूं, केवल ऐसा हो रहा है, इसे देख रहा हूं।
किसी के प्रेम में आप पड़ गए हैं। आप कहते हैं, मैं बहुत प्रेम करता हूं। लेकिन अब तक कोई प्रेमी सच नहीं बोला। सच इसलिए नहीं बोला कि प्रेम कभी किसी ने किया है? हो जाता है! नहीं तो करके दिखाएं। बता दें आपको कि यह रहा, इस आदमी को प्रेम करके बताओ। हाँ, फिल्म की स्टेज पर बात और है, बताया जा सकता है। लेकिन आप प्रेम करके बता नहीं सकते। इसके लिए आर्डर नहीं किया जा सकता कि चलो, करो प्रेम। अगर हो भी थोड़ा-बहुत, तो तिरोहित हो जाएगा एकदम, आर्डर सुनते ही।
इसलिए तो बच्चें का प्रेम नष्ट हो जाता है, क्योंकि बच्चों को हम आर्डर कर रहे हैं। कह रहे हैं, यह तुम्हारी माँ है, करो प्रेम। यह पागलपन की बात है। अगर माँ है तो प्रेम पैदा अब तक हो जाना चाहिये था। अगर माँ है और अब तक प्रेम पैदा नहीं हुआ, तो क्या कहने से अब हो सकेगा? माँ के होने से नहीं हुआ साथ रहकर, तो अब कहने से क्या होगा? लेकिन माँ ही कह रही है कि चलो, करो प्रेम। यह तुम्हारे पिताजी हैं, इनके पैर छुओ। बच्चे बेचारे जबर्दस्ती कर-करके उस हालत में पहुँच जाते हैं कि फिर उनसे कभी बिना जबर्दस्ती के होता ही नहीं। यह पत्नी है, करो प्रेम। यह पति है, करो प्रेम। फिर पूरी जिंदगी करो।
लेकिन प्रेम तो एक घटना है, हैपनिंग है। किया नहीं जाता, हो जाता है। अगर जब आपको प्रेम हो, तब आप यह समझ पायें कि यह हो रहा है, मैं कर नहीं रहा हूँ तो आपको प्रेम का कर्म बांधेगा नहीं। आप कहेंगे, अवश्य हूँ, विवश हूँ मेरे हाथ के बाहर है, कुछ हो रहा है। तब आप साक्षी बन सकते हैं, द्रष्टा बन सकते हैं। और जो व्यक्ति प्रेम का द्रष्टा बन जाए, वह और सब चीजों का द्रष्टा बन सकता है, क्योंकि प्रेम बहुत गहरा अनुभव है। और सब चीजें तो ऊपर-ऊपर हैं, बहुत ऊपर-ऊपर हैं।
द्रष्टा बनें। जहाँ-जहाँ कर्ता का भाव सघन होता हो, वहाँ-वहाँ द्रष्टा को लाएं। धीरे-धीरे जड़ कट जायगी कर्म की और आप अचानक पायेंगे कि कर्मों का सारा जाल आपसे दूर होकर गिर पड़ा, जैसे आपके वस्त्र गिर गये हों और आप नग्न खड़े हैं। और जिस दिन कर्मों से नग्न होकर कोई खड़ा हो जाता है, उस दिन परमात्मा के लिये द्वार सीधा खुल जाता है। हमारे और उसके बीच कर्मों की श्रृंखला की आड़ है, दीवार है।
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