





हे भगवान यह तूने क्या किया- या भीख माँगते है- हे परमात्मा बचाले कुछ ज्ञान चेतना बची होती है तो अपनी गलतीयों का आभास होता है वह भी तभी जब सूक्ष्म रूप में कभी कोई दिव्य चेतना साथ होती है।
जब उस अग्नि में जल रहे हो, कष्ट भोग रहे हो तो क्या मंत्र जप, क्या साधना, जीवन के उस तिरस्कार, अपमान को भोग रहे हो तो उस क्षण जो उस कष्ट से बाहर निकाले हाथ पकड़ कर आपको वो चेतना प्रदान करे कि यह अंत नहीं है जो सोच रहे हो, जो नकारात्मकता आपके मन में ग्रसित गुठ कर गई है वह सत्य नहीं और आप इससे बाहर निकल सकते हो, मैं खड़ा हूँ साथ वह गुरू है।
इस भव सागर के भाव में वह बह जाता अपितु अपने गुरू का हाथ पकड़, गुरू द्वारा बतलाये मार्ग पर चल विजय होना ही उस शिष्यता कि प्राप्ति है उस पूर्णता कि प्राप्ति है। जब आपका कोई नहीं होता, कोई साथ नहीं देता कोई बात सार्थक नहीं लगती, सब केवल उपदेश व बकवास, चाहकर भी विद्रोह करने की क्षमता न हो तो केवल अपने गुरू के पास चल, उनकी बात मानो उनका कथन मानो क्योंकि गुरू ने दीक्षा के माध्यम में अपने साधक में स्वयं की अन्तश्चेतना का प्रवाह किया है। सद्गुरूदेव का तो कथन भी यही है-
‘‘मैं तुम्हें भय मुक्त करने के लिये आया हूँ चित्त से संशय के घने काले बादल को दूर करने के लिये आया हूँ, तुम्हारे झुके हुए सिर को गर्व से ऊँचा उठाने के लिये आया हूँ।’’
दीक्षा के उस भाव को न तो परिभाषित किया जा सकता है न ही व्याख्यान इसे तो सिर्फ आत्मसात् किया जा सकता है क्योंकि यह तो आत्मा से आत्मा का मिलन, मन से मन का मिलन, एक प्रेमी से प्रेमी का मिलन, एक गुरू शिष्य का मिलन है।
नहीं कर पाये उस समय साधना, नहीं कर पाये उस समय मंत्र जप!! गुरू आपको उस कष्ट से बाहर निकालेंगे, आपको तो केवल अपना समर्पण अपने गुरू को देना है, विश्वास करना है अपनी चेतना पर, अपने हर उस कृत्य को कुकर्म को उस पाप को जो पूर्व में आपने किये है जिसका फल आप आज भोग रहे है उसे स्वीकारना है, मानना है। गुरू का कार्य केवल उपदेश देना नहीं अपितु अपने शिष्य के चित्त पर अंकित होकर उसे गतिशील करना है, उसमें पुनः उस चेतना का प्रवाह करना है जो उसके शिष्य के जीवन में हर्ष, आनन्द की अनुभूति लाये। अपने शिष्य को सम्पूर्णता की तरफ धकेले। नवीन रूप से पुनः उसे सृजन करे, उस चेतना से संक्रमणित करें। कष्ट-विषाद तो आपको नीचें खीचेंगे, परन्तु गुरू चेतन रूपी यह संक्रमण आपको परिपूर्णता की ओर ले जायेगा।
इस 29-30 मार्च को सूर्य ग्रहण तेजस्वितामय सर्वांगीण उन्नति प्रगति प्राप्ति महोत्सव, मधुबनी, बिहार में सम्मिलित होकर आप उस चेतना से आत्मसात् हो।
आपका अपना
विनीत श्रीमाली
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