





भ्रम भी जरूरी हैं, और झूठ भी उपयोगी हैं। सत्य का कोई अर्थ ही नहीं है। जो असत्य काम पड़ जाये, वही सत्य है। और असत्य काम पड़ते हैं, चौबीस घंटे काम पड़ रहे हैं। थोड़ा सा हम देख लें कि किस भांति काम पड़ते हैं।
हमें कोई पता नहीं है कि आत्मा अमर है, लेकिन अब जिंदा रहना है, तो मन में यह खयाल लेकर चलना चाहिये कि आत्मा अमर है, नहीं तो जिंदा रहना मुश्किल हो जायेगा। हमें कोई पता नहीं है कि प्रेम शाश्वत होता है। चारों तरफ देखें तो क्षणिक होता है, शाश्वत नहीं होता है। सब क्षण में बिखर जाता है। लेकिन अगर जिंदा रहना है, तो मानकर चलना चाहिये कि प्रेम शाश्वत चीज है। कवितायें बड़ी जरूरी है आदमी के आसपास जीने के लिये। उनके सहारे वह अपने को भुलाये रखता है।
कल होगा, इसका कोई निश्चय नहीं है। लेकिन हम कल का इंतजाम करके सोते हैं। नहीं तो रात सोना ही मुश्किल हो जायेगा। यह सवाल कल से इंतजाम का इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, आज की रात सोने का सवाल है। कल का इंतजाम कर लेते हैं, और कल होगा ही, ऐसी मान्यता मन में रख लेते हैं, तो रात नींद आसानी से आ जाती है। अगर पक्का हो जाये कि कल सुबह नींद होगी, कल सुबह मौत है, तो कल सुबह मौत होगी कि नहीं होगी, यह बड़ा सवाल नहीं है, आज की नींद खराब हो जायेगी। फिर आज सोया नहीं जा सकता है।
तो सोना हो, तो कल का भ्रम बनाये रखना जरूरी है। अगर जिंदगी के दुःखों से गुजारना हो, तो भविष्य की आशा को जिलाये रखना जरूरी है कि कोई बात नहीं, सुख मिलेगा। अगर इस मकान में नहीं मिला, दूसरे मकान में मिलेगा। अगर इस व्यक्ति से नहीं मिला, दूसरे व्यक्ति से मिलेगा। आज नहीं मिला, कल मिलेगा। भविष्य की तरफ आशाओं को दौड़ाये रखना जरूरी है।
मनोवैज्ञानिक एक बहुत कीमती बात कहते हैं, जो बहुत नई खोज है एक अर्थों में, पहले कभी किसी ने नहीं खयाल किया था। रात आप सपने देखते हैं, तो आप सोचते होंगे कि सपनों से नींद में बाधा पड़ती है। ऐसा सदा सोचा जाता रहा है। कई व्यक्ति मेरे पास भी आते हैं। वे कहते हैं, रात बहुत सपने आते हैं, तो नींद ठीक से नहीं हो पाती। सभी का यह खयाल है।
लेकिन मनोवैज्ञानिक ज्यादा अनुभव पर हैं। और वे कहते हैं कि अगर सपने न हों, तो आप सो ही न पाओं। वे बहुत उलटी बात कहते हैं। वे कहते हैं, सपने जो हैं, वे नींद में बाधा नहीं है, सहयोगी हैं। नींद टूट ही जाये, अगर सपने न हों तो। नींद को सतत जारी रखने के लिये सपने काम करते हैं। समझ लें, तो खयाल में आ जायेगा।
आपको प्यास लगी है जोर से नींद में। आप एक सपना देखना शुरू कर देंगे कि पानी पी रहे हैं। झरना बह रहा है, झरने के पास बैठे पानी पी रहे हैं। अगर यह सपना न आये, तो प्यास आपकी नींद तोड़ देगी। आपको उठकर पानी पीने जाना पड़ेगा। नींद में बाधा पड़ जायेगी। यह सपना जो है, एक इल्यूजन पैदा करता है। कहता है, कहाँ जाने की जरूरत है, नींद टूटने का तो कोई सवाल ही नहीं। झरना यह रहा, पीयो। भूख लगी है, राजमहल में निमंत्रण मिल जाता है। नहीं तो भूख नींद को तोड़ देगी।
सपना नींद को संभालने का उपाय है। ठीक ऐसे ही जिंदगी में भी भ्रांति जागरण को संभालने का उपाय है। जिसे हम जागरण कहते हैं, उसके आस-पास भ्रांति चाहिये, नहीं तो हम मुश्किल में पड़ जायेंगे।
वही भ्रम बार-बार खड़ा करना पड़ता है। जीना मुश्किल है। एक कदम चलना मुश्किल है। इसलिये गृहस्थ उसे कहें हम, जो बिना भ्रम के नहीं जी सकता। अगर इसकी ठीक मनोवैज्ञानिक परिभाषा करनी हो, तो गृहस्थ वह है, द वन हू कैन नाट लिव विदाउट इल्यूजन्स। उसे भ्रमों के घर बनाने ही पड़ेंगे, उसे कदम-कदम पर भ्रम की सीढ़ियां निर्मित करनी पड़ेगी।
संन्यासी वह है, जो बिना भ्रम के रहने के लिये तैयार हो गया। जो कहता है, सत्य के साथ ही रहेंगे, चाहे सत्य जार-जार कर दे, तोड़ दे, खंड-खंड कर दे, मिटा दे, नष्ट कर दे, लेकिन अब हम सत्य जैसा है, उसके साथ ही रहेंगे। अब हम भ्रम खड़े न करेंगे।
इसलिये संन्यासी भ्रमों को तोड़ने में लगा रहता है, भ्रांतियां को तोड़ने में लगा रहता है। जहाँ-जहाँ उसे लगता है, भ्रांतियां खड़ी की जा रही हैं, वहां-वहां वह तोड़ता है। मन के प्रति सजग होता है कि मन कहां-कहां भ्रांतियों खड़ी करवाता है। देखता है अपने चारों तरफ कि मैं कोई सपने तो नहीं रच रहा हूँ जागने में या सोने में। मैं बिना सपने जीऊंगा।
बिना सपने के जीने की बात बड़ा दुस्साहस हैं साधारण साहस नहीं है यह, दुस्साहस है, क्योंकि इंचभर सरकना मुश्किल है बिना सपने के। एक कदम न उठेगा। अगर सपने आपसे छीन लिये जायें, आप यहीं गिर जायेंगे। मिट्टी के ढेर हो जायेंगे।
संन्यासी फिर भी चलता है, उठता है, बैठता है, सारे भ्रम को तोड़कर। और जैसे ही भ्रमों को तोड़ देता है पूरे, वैसे ही उसकी सत्य में गति हो जाती है। असत्य को असत्य की भांति जान लेना सत्य की ओर एकमात्र मार्ग है। भ्रांति को भ्रांति की भांति पहचान लेना सत्य की अनुभूति का द्वार है। इसलिये प्राथमिक रूप से संन्यासी को भ्रांतियां तोड़नी पड़ती है।
इसलिये संन्यासी के पास अगर कोई रहे, तो बड़ी मुश्किल में पड़ जाता है। संन्यासी तो मुश्किल में होता है अपने ढंग की, लेकिन उसकी मुश्किल तो ठीक है, उसके पास कोई रहे, तो बहुत मुश्किल में पड़ जाता है। क्योंकि संन्यासी भ्रम नहीं पोसना चाहता और जो भी उसके पास रहेगा, वह भ्रम पोसना चाहता है। अगर संन्यासी सत्य के ही साथ सीधा जीता है, तो जो भी उसके निकट है, वह अड़चन में पड़ना शुरू हो जाता है। क्योंकि संन्यासी ऐसी बातें कहेगा, इस ढंग से जीयेगा कि आप अपने भ्रमों को न पोस पायेंगे। इसलिये एक बहुत दुर्घटना इस जमीन पर घटती रही है और वह यह है कि इस जमीन पर जिन लोगों ने भी सत्य की खोज की है, उनके आस-पास के लोग कभी भी उनको प्रेम भी नहीं कर पाये और कभी उनको समझ भी नहीं पाये।
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