





क्रियायोग जीवन से अलग केवल ऋषि, मुनियों और मनीषियों की ही साधना क्रिया नहीं है क्रिया योग से सामान्य व्यक्ति भी अपने जीवन को सम्पन्न कर सकता है उसके लिये उसे अपने जीवन में एक विशेष सन्तुलन बनाना पड़ता है क्रिया योग कुण्डलिनी जागरण का विशिष्ट रूप है और जब क्रियायोग के मार्ग पर साधक आगे बढ़ता है तो उसकी देह में दिव्य परिवर्तन होने लगते है कुण्डलिनी का एक-एक चक्र धीरे-धीरे जाग्रत होने लगते है वह साधक हर समय अपने देह और मन को स्वस्थ तरोताजा और उमंगित अनुभव करने लगता है
क्रियायोग शास्त्रोय विवेचन
तपस्या, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्रणिधान- ये क्रियायोग कहलाते है। वैसे क्रियायोग का शाब्दिक अर्थ है-कर्म के आश्रय से योग का अभ्यास करना। शरीर, प्राण एवं इन्द्रिय आदि का उचित रूप से अभ्यास द्वारा वशीकरण को तप कहा गया है। प्रणव आदि पवित्र भगवन्नाम के जप एवं उपनिषद इत्यादि विवेकज्ञानोत्पादक सत्-शास्त्रों के नियमित अध्ययन को स्वाध्याय कहा गया है। एवं सब कर्मो के कर्मफल को ईश्वर को अर्पण करना ईश्वरप्रणिधान है। इन तीनों का सामूहिक अभिधान क्रियायोग या कर्मयोग है, जिसके लिये गीता में कहा गया है-
योगःकर्मसुः कौशलम्।
प्रथम परिच्छेद में योग प्राप्ति के मुख्य उपाय अभ्यास एवं वैराग्य के साथ विविध विधियों का विधान है, किन्तु उनके आश्रय से समाहित चित्त-युक्त उत्तम अधिकारी ही योग साधना कर सकता है। मध्यम वर्ग के अधिकारी जिनका चित अभी सांसारिक भोग-वासनाओं एवं राग-द्वेष आदि से चंचल एवं विक्षिप्त है, उन्हें उस रीति से योग की प्राप्ति दुर्लभ है। विक्षिप्त चित्त-युक्त जिज्ञासु क्लेश क्षीण करके अभ्यास-वैराग्य पूर्वक समाधि की भावना कर सके, यही क्रियायोग का विधान है।
तपस्या शारीरिक, स्वाध्याय वाचिक एवं ईश्वप्रणिधान मानसिक क्रियायोग है।
तप-‘नातपस्विनो योगसिद्धयति’ इस के अनुसार अतपस्वी को योग सिद्ध नहीं होता। अनादिकालीन क्लेश एवं कर्म के संस्कारों से संकुचित चित्त का मल तप के बिना विरल नहीं हो सकता। अतः क्रियायोग की प्राप्ति के लिये तप उसका प्रथम सोपान है, किन्तु यह तपश्चर्या इस प्रकार की होनी चाहिये, जिससे शारीरिक धातु-वैषम्य से योग-साधना में विघ्न न पड़े अर्थात् शरीर तथा इन्द्रियों में बाधा उत्पन्न न हो और मन प्रसन्न रहे-ऐसा तप योगेच्छु से सेव्य है। इस प्रकार शीत-ऊष्ण, क्षुधा-पिपासा, सुख-दुःख, हर्ष-शोक एवं मान-अपमानादि समस्त द्वन्द्वों की दशा में विक्षेप शून्य स्वास्थ्यकारक एवं चित्त की निर्मलता हेतु तप सात्विक कहलाता है। सात्विक तप से ही योग-साधना में स्थिर प्रवृत्ति होती है। शारीरिक पीड़ा, व्याधि, इन्द्रिय-विकार एवं चित्तमालिन्य का उत्पाक तामसी तप योग में निन्दित है, क्योंकि व्याधि, शारीरिक पीड़ा आदि चित्त की प्रसन्नता एवं योगमार्ग के विघ्न हैं।
जिस प्रकार स्वर्ण को अग्नि में तपाने से धातु-मल रहित होकर स्वर्ण स्वच्छ एवं दीप्त हो उठता है, उसी प्रकार तपस्या की अग्नि में शरीर एवं इन्द्रियादि तप्त होकर रज एवं तम का मल नष्ट हो जाने से सत्वगुण के प्रकाश में वृद्धि होती है।
तप शारीरिक, वाचिक एवं मानसिक तीन प्रकार के होते हैं-
शारीरिक तप
देवता, ब्राह्मण गुरूजन एवं ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्र, सरल, ब्रह्मचर्य एवं अहिंसापूर्ण जीवनयापन शारीरिक तप कहलाता है। आसन, प्राणायाम तथा शुद्ध सात्विक आहार-विहार शारीरिक तप के अन्तर्गत ही हैं। भगवद्गीता में इन्हें युक्त आहार-विहार कहा गया है। आहार-विहार युक्त साधक की योग साधना दुःखनाशक होती है-
युक्तहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।
युक्तहार से तात्पर्य शुद्ध, सात्विक योगोपयोगी एवं परिमित भोजन से है। योगाभ्यासी को आहार के विषय में पूर्ण सचेत रहना चाहिये, क्योंकि अन्न का शरीर एवं मन पर प्रकृष्ट प्रभाव पड़ता है। अन्न सात्विक एवं पवित्र साधनों से अर्जित होना चाहिये। स्वाद के वशीभूत न होकर, शरीर में आसक्ति एवं ममता त्यागपूर्वक, शरीर एवं चित्त को केवल भजन कार्य में उपयोग बनाने वाले स्निग्ध, मधुर, प्रिय, एवं क्षुधा-परिमाण के चतुर्थ भाग से न्यून आहार करना युक्ताहार या मिताहार कहलाता है। मिताहार का विशेष विवरण हठयोग के ग्रंथों में दृष्टव्य है।
युक्त विहार
अत्यन्त थकान की उत्पति से भजन में विघ्नकारक लम्बी एवं कठिन यात्रा वर्जित है। चलना-फिरना बिल्कुल बंद कर देने से भी तमरूप आलस्य एवं प्रमाद का आविर्भाव होता है। ये भजन में बाधक है। अतः घूमने-फिरने का कार्य इतनी मात्रा में होना चाहिये, जिससे शरीर स्वस्थ एवं प्रसन्न हो इससे साधना सफलतापूर्वक होती है।
युक्त चेष्टा
नित्य नियमित कर्त्तव्य एवं नियत सत्कर्मो को करते रहना तथा अधिक शारीरिक श्रम न करना एवं कर्त्तव्य त्याग न करना युक्त चेष्टा है।
युक्त स्वप्नावबोध
आवश्यकता से अधिक या न्यून मात्रा में न सोना युक्तस्वप्नाबोध है। तमवृद्धि बचाने के लिये रात्रि में उचित परिमाण से अधिक नहीं सोना चाहिये। निद्रा को क्रमिक अल्प करना चाहिये (स्वास्थ्य आदि पर लक्ष्य रखकर), कृच्छ, चन्द्रायण आदि उग्र तप साधारणतया योग में वर्जित है।
आवश्यकतानुसार केवल सत्य, प्रिय एवं सबके यथायोग्य सम्मानपूर्वक वाणी में व्यवहार करना वाचिक तप है। वाणी को संयत रखने की दृष्टि से प्रयत्नपूर्वक सप्ताह में एक दिन का मौनव्रत रखना प्रशस्त है।
मानसिक तप
मन का संयम मानसिक तप है। हिंसात्मक क्लिष्ट भावनाओं को तथा अपवित्र विचारों को मन से दूर करने का प्रयत्न करना तथा मैत्री, करूणा, मुद्रिता आदि शुद्ध, पवित्र भावों को मन में धारण करना मानसिक तप है।
शरीर एवं इन्द्रियों को अपनी इच्छानुसार कार्य न करने देकर अपने वश में रखना ही तपस्या है।
स्वाध्याय
स्वाध्याय से तात्पर्य भगवान के पवित्र प्रणव आदि नामों तथा गायत्री आदि मंत्रों के जप तथा उपनिषद्, गीता आदि मोक्ष शास्त्रों के अध्ययन से है। इसमें भी वृत्तिनिरोध होता है तथा योगसाधन में श्रद्धा होती है।
ईश्वरप्रणिधान
ईश्वरप्रणिधान भी योग का साधना है। मनसा, वाचा, कर्मणा जो कुछ भी कर्म करे, उन सबको ईश्वर को अर्पित कर देना ईश्वरप्रणिधान है। जैसा कि निम्न श्लोक में कहा गया है-
कामतोऽकामतो वापि यत्करोमि शुभाशुभम्।
तत्सर्वं त्वयि संन्यस्तं त्वत्प्रयुक्तः करोम्यहं।।
अर्थात्, फल की इच्छा से या निष्काम भाव से जो भी शुभ या अशुभ कर्म मैं करता हूँ, वह सब मैं आपको अर्पित करता हूँ, क्योंकि ( हे अन्तर्यामी परमेश्वर) मैं आपके द्वारा प्रेरित होकर कर्म करता हूँ, अर्थात् इसमें मेरापन कुछ नहीं है।
अथवा ईश्वरप्रणिधान का दूसरा अर्थ फल प्राप्ति की इच्छा के परित्यागपूर्वक कर्मो का अनुष्ठान है। जैसा कि गीता में भगवान ने कहा है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भू मा ते सडगोऽस्त्वकर्मणि।।
वस्तुतः साधनपाद में मध्यम अधिकारियों के हेतु अष्टांग योग के साधनों का विधान है। तप, स्वाघ्याय एवं ईश्वरप्रणिधान तो वक्षयमाण पांचो नियमों के ही अन्तिम तीन भाग है, फिर भी व्यावहारिक जीवन को शुद्ध एवं सात्विक बनाने में ये विशेष रूप से सहायक हैं। इनसे चित्त शुद्ध एवं निर्मल होकर अष्टांगयोग सुनकर हो जाता है।
तप से शरीर, वाणी एवं अन्तःकरण की शुद्धि होती है। स्वाध्याय से तत्वाज्ञान की प्राप्ति एवं चित्त की एकाग्रता का सम्पादन होता है। ईश्वरप्रणिधान से कर्मो में कामना एवं कर्मफल में अनासक्ति तथा ईश्वर की कृपा उपलब्ध होती है। इसी से इन्हें क्रियायोग नाम देकर अष्टांग योग के पूर्व अनुष्ठान करने को बताया गया है। वैसे तपः – स्वाध्याय-क्रियायोग का व्यापक अर्थ लेने पर योग के आठों अंग इन्हीं में अन्तर्भूत हो सकते हैं।
वर्तमान जीवन और क्रियायोग
वर्तमान जीवन में क्रियायोग की प्रथम स्थिति तक पहुँचने के लिये धारणा, ध्यान, त्राटक आवश्यक है और जब वह अपने दैनिक जीवन में इन तीनों स्थितियों का अभ्यास प्रारम्भ करता है तो वह क्रिया योग की भाव भूमि बनाता है।
धारणा
प्राणायाम, आसन आदि के द्वारा अपने चित्त को स्थिर करने की क्रिया को धारणा कहते है, इसमें प्राणायाम महत्त्वपूर्ण हैं।
यह सामान्य नियम है कि एक स्वस्थ मनुष्य स्वाभाविक रूप से एक मिनट में पन्द्रह बार श्वास लेता है, इस श्वास लेने की क्रिया के चार क्रम होते है।
इस प्रकार जब साधक श्वास-प्रश्वास की गति को अपने बस में कर लेता है, तो शरीर के अन्दर प्रवाहित होने वाली प्राणों की सारी सूक्ष्म गतियां उसके वशीभूत हो जाती है, और साधक अद्भूत कल्पनातीत दृश्यों को देखने में समर्थ हो पाता है, इससे केवल उसकी आयु ही नहीं बढ़ती, अपितु वह जब तक चाहता है, तब तक जीवित रहता है, इससे कुण्डलिनी जाग्रत होने लगती है तथा मस्तिष्क विचार शून्य हो कर एकस्थ हो जाता है चंचल मन वशीभूत होने लगता है।
ध्यान
क्रिया योग का दूसरा प्रारम्भिक चरण ध्यान है, जब व्यक्ति आसन प्राणायाम आदि के द्वारा धारणा में सफल हो जाता है, तब वह ध्यान की ओर बढ़ता है किसी भी विषय या बिन्दु पर दिमाग को केन्द्रित कर देने की क्रिया को ध्यान कहते है।
ध्यान के लिये पूर्ण रूप से शान्त और एकान्त स्थान होना चाहिये, शान्त और एकान्त का तात्पर्य है, किसी प्रकार का कोलाहाल न हो, ध्यान में विघ्न पैदा करने वाला कोई कारण उत्पन्न न होता हो, तथा स्वच्छ वातावरण हो, इसके लिये जंगल, नदी का किनारा, समुद्र तट या घर का कोई एकान्त स्थान होना चाहिये।
त्राटक
त्राटक करने के लिये अपने सामने दीवार पर या कागज पर एक छोटा सा लाल बिन्दु लगा देना चाहिये और बिना पलक झपकाये उसे अपलक देखते रहने की क्रिया को त्राटक कहते हैं, प्रयत्न करके साधक को लगभग 32 मिनट का त्राटक कर लेना चाहिये।
त्राटक करने से मन सभी विषयों से हट कर एकाग्र, शांत और स्थिर हो जाता है, जब मन चंचल होता है, तो तरह तरह के कुविचार मनुष्य को घेर लेते है ऐसी हालत में त्राटक के द्वारा ही ध्यान प्राप्त कर इन सभी कुविचारों से मन को हटाया जा सकता है, दिमाग को विचार शून्य बनाया जा सकता है, और पूर्ण रूप से ध्यान करने पर साधक का हृदय पवित्र, दिव्य और निर्मल हो जाता है, इससे उसे सभी प्रकार के दुःखों और तनावों से मुक्ति मिल जाती है।
इस प्रकार का त्राटक करने से पूरे शरीर में हलचल होने लगती है, और शरीर के अन्दर स्थित मूलाधार आदि चक्र जाग्रत होने लगते हैं।
समाधि
मन को सभी प्रकार के विषयों से हटा कर त्राटक और ध्यान के द्वारा जब पूर्णतः एकाग्र कर दिया जाता है तो उसे समाधि कहते है समाधि में साधक को यह भान नहीं रहता कि मैं ध्यान कर रहा हूँ, वह अपने इष्ट के प्रति एकाकार हो जाता है, और उसे केवल अपने ध्येय का ही भान होता है इसी को समाधि कहते है, जब साधक समाधि अवस्था में पहुँच जाता है तो उसके चेहरे के चारों ओर प्रकाश का आभा मंडल बन जाता है।
क्रियायोग के दो प्रयोजन है- समाधि की भावना करना एवं क्लेशों को क्षीण करना।
क्रियायोग से अशुद्धि का क्षय होता है। समस्त अन्तर्बाह्य इन्द्रियों की राजस चंचलता एवं तामस जड़ता ही उसकी अशुद्धि है। यही अशुद्धि क्लेशों की प्रबल अवस्था है। अतः अशुद्धि का आवरण हटने से ही क्लेश क्षीण होते है। क्लेश क्षीण होने से समाधि की और अभिमुख होता है अर्थात् समाधि की भावना होती है।
शंका हो सकती है, कि यदि क्रियायोग से क्लेश क्षीण हो सकते हैं, तो विवेकख्याति व्यर्थ है अथवा प्रसंख्यानाग्नि क्लेशों को दग्ध करने में समर्थ होता है, तो क्रियायोग से क्लेशों का तनूकरण व्यर्थ है।
इसका समाधान यह है, कि क्रियायोग से क्लेशों को क्षीण किये बिना प्रसंख्यानाग्नि रूप विवेकख्याति उत्पन्न नहीं हो सकती, क्योंकि प्रबल एवं विरोधी क्लेशों से सम्बद्ध चित्त विवेकख्याति उत्पन्न करने में असमर्थ है। क्रियायोग के अनुष्ठान से चित्त अभ्यास एवं वैराग्य से क्रमप्राप्त सम्प्रज्ञात समाधि का उदय होता है। सम्प्रज्ञात समाधि के अभ्यास की दृढ़ता से उसकी अन्तिम अवस्था में विवेकख्याति का उदय होता है क्षीणकृत क्लेश प्रसंख्यानाग्नि के द्वारा भृष्टबीजवत् उत्पादकशक्ति शून्य बनते हैं। तब परवैराग्यजन्य संस्कारों की दृढ़ता से चित्त का विवेकख्याति रूप अधिकार भी समाप्त होकर समाधि का उदय होता है।
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