





भगवान विष्णु के ये अवतार मानव जीवन में जो राग-द्वेष है उनसे मुक्त होकर संसार रूपी सागर से पार होने की शिक्षा देते है। राग-द्वेष रहित जीवन व्यतीत कर मोक्ष मार्ग की प्राप्ति की जा सकती है।
कमला मेधा शक्ति वर्धन हयग्रीव साधना
साधना विधि –
श्रावण मास की पूर्णिमा या किसी भी रविवार के प्रातः काल स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें तथा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुंह कर आसन बिछाकर पूजा स्थान में बैठ जायें। अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर किसी पात्र में ‘‘विष्णु नारायण हयग्रीव यंत्र’’ को स्थापित करें, फिर संक्षिप्त गणेश व गुरू पूजन संपन्न कर गुरू मंत्र की एक माला जप करें।
तत्पश्चात् यंत्र का पूजन कुंकुम, पुष्प, सुपारी, दीप, अक्षत व नैवेद्य आदि से करें। अब दोनों हाथ जोड़ कर भगवान हयग्रीव से जीवन में शत्रुबाधा हरण, मेधा शक्ति वृद्धि हेतु आशीर्वाद ग्रहण कर साधना सफलता हेतु प्रार्थना करें। इसके पश्चात् ‘‘अक्षय माला’’ से निम्न मंत्र की 5 माला मंत्र जप 11 दिनों तक सम्पन्न करें।
साधना की पूर्णता पर 12वें दिन सामग्री एकत्रित कर जब भी गुरूदेव से मिले उनके चरणों में अर्पित कर आशीर्वाद ग्रहण करें। साधना काल में एक समय शुद्ध सात्विक भोजन लें और बह्मचर्य व्रत का पालन करें व भूमि शयन करें।
जब राजा बलि ने घोर तपस्या के माध्यम से देवताओं को पराजित कर स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया तब सभी देवताओं ने रक्षा हेतु भगवान विष्णु से सहायता मांगी। जिन्होंने वामन अवतार के रूप में जन्म लिया। राजा बलि अत्यन्त शक्तिशाली और महादानी था परन्तु उसे अपनी शक्तियों पर घमंड था जिसके कारण वह स्वयं को भगवान समान मानता था। वामन देव ने राजा बलि की यज्ञशाला जहां वह महान यज्ञ कर रहा था वहां प्रस्थान किया जब यज्ञ सम्पन्न हुआ उसके पश्चात् बलि ने वामन देव को कुछ भेंट देने की इच्छा प्रकट की। पहले तो बहुत आग्रह करने पर भी वामन देव ने कुछ नहीं मांगा लेकिन जब राजा बलि ने उन्हें उपहार स्वरूप कुछ देने की अत्यधिक इच्छा प्रकट की तब अंत में वामन देव ने तीन पग जितनी भूमि दान स्वरूप देने को कहा। और इस प्रकार वामन देव ने अपनी छोटी काया को विराट रूप में परिवर्तित कर एक पग में पृथ्वी, दूसरे पग में स्वर्ग को नाप लिया, जिसके पश्चात् उनका तीसरा पग रखने की कोई स्थान नहीं बचा तब राजा बलि ने उन्हें उसके सिर पर तीसरा पग रखने को दे दिया, पैर उसके सिर पर रखकर वामन देव ने राजा बलि को पाताल लोक में धकेल दिया। लेकिन उसकी दानवीरता और वचनबद्धता से भी वे प्रसन्न हो गए थे, इसीलिये वामन देव ने राजा बलि को चिरंजीवि होकर सदा के लिये पाताल का शासक बना दिया।
इस प्रसंग से यही ज्ञान मिलता है कि जीवन में घमंड नहीं करना है क्योंकि ईश्वरीय सत्ता से ऊपर कुछ नहीं है। चाहे कितने भी बलवान, उच्चपद पर हो परन्तु दंभ और दर्प से दूरी बनाकर रखनी चाहिये। घमंड व्यक्ति को अधर्म की ओर लें जाता है और पाप-पुण्य कुछ ज्ञात न होकर व्यक्ति कब गलत पथ पर चल पड़ता है, यह उसे स्वयं को भी मालुम नहीं पड़ता, परन्तु उसके स्वजन, आस-पास, परिवार के लोग इससे कुंठित हो उठते हैं, घमंड सदा अपयश लेकर ही आता है।
श्री हरि समर्पणम् साधना से साधक का चित्त शांत होता है, मानसिक कष्ट दूर होते हैं। इस साधना के माध्यम से साधक सांसारिक पापों से जैसे झूठ-छल, कपट, घमंड आदि से मुक्त होकर सदा न्याय के पथ पर ही अग्रसर रहकर जीवन को सात्विकता व निर्मलता के साथ व्यतीत करने में सफल होता है। किसी भी प्रकार का लोभ-लालच, प्रलोभन, चकाचौंध उसे जीवन कर्तव्य पथ से विमुख नहीं कर पाते।
श्री हरि समर्पणम् दीक्षा प्राप्त कर साधक समस्त मानसिक संताप, दुख-व्यथाओं से मुक्त होकर श्री हरि के चरणों में स्वयं को समर्पित कर सर्वस्व शांति को प्राप्त करता है।
श्री हरि समर्पणम् साधना
साधना विधि-
भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वादशी या किसी भी रविवार के प्रातः काल स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें तथा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुंह कर आसन बिछाकर पूजा स्थान में बैठ जायें। अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर किसी पात्र में ‘‘विष्णु महायंत्र’’ को स्थापित करें, फिर संक्षिप्त गणेश व गुरू पूजन संपन्न कर गुरू मंत्र की एक माला जप करें।
तत्पश्चात् यंत्र का पूजन अबीर, गुलाल, कुंकुम, केसर, चन्दन, मौली, पुष्प, सुपारी, दीप, अक्षत व नैवेद्य आदि से करें। पूजन पश्चात् ‘‘वैजयन्ती माला’’ से निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप 11 दिनों तक सम्पन्न करें।
साधना की पूर्णता पर 12वें दिन सभी सामग्री एकत्रित कर जब भी गुरूदेव से मिले उनके चरणों में अर्पित कर आशीर्वाद ग्रहण करें। साधना काल में एक समय शुद्ध सात्विक भोजन लें और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें व भूमि शयन करें।
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