





यह वह अवसर होता है, जब जगज्जननी का साक्षात् या आभास होता है और कभी-कभी तो स्वयं का बोध भी विलीन हो जाता है। हम अपने जीवन में जिस वस्तु को भी लेकर गर्वित हो रहे होते हैं- चाहे वह यौवन हो, रूप हो, धन हो या बुद्धिमता हो, एक छोटे से खिलौने से अधिक नहीं लगती है ….. जब स्वयं ‘माँ’ सामने आती हैं, तो किसी भी खिलौने का क्या मूल्य रह जाता है? भले ही वह कितना ही बेशकीमती क्यों न हो।
इसी कारणवश उनका वर्णन सम्भव ही नहीं, क्योंकि जब चित्त सभी प्रकार से शून्य हो जाता है, तभी उनका बोध होता है और ज्यों ही हम उनका वर्णन करने का प्रयास करते है, त्यों ही ज्ञान के अधीन होकर चित्त की सहजता खो देते हैं। ज्ञान के द्वारा हम दस महाविद्याओं में से किसी का वर्णन तो कर सकते है, साधना की अत्यन्त श्रेष्ठ पद्धति तो खोज सकते हैं, किन्तु जगज्जननी के साक्षात् का वर्णन नहीं कर सकते।
जो भगवती हैं, वे अपने प्रिय को कभी भी कुछ देने नहीं आती, अपितु हर बार आकर उसका कुछ ले ही जाती हैं। और शनैःशनैः यह स्थिति आ जाती है, कि जीवन में कुछ नहीं बचता। तब टुकुर-टुकुर देखने के अतिरिक्त हमारे हाथ कुछ नहीं रह जाता। हम इस प्रकार से हो जाते है, कि न अपने ज्ञान का, न साधना का, न यौवन का या किसी भी प्रकार का गर्व कर सकें। एक प्रकार से बलात् उन पर आश्रित होने की बाध्यता हो जाती है और तब वे स्वतः ही पोषण का दायित्व संभाल लेती हैं। ठीक भी है, बिना शिशु हुए मातृत्व का आगमन हो भी कैसे? और हम तो दम्भ में इतना रच-पच गये है, कि सहज शिशु बनने को भी तैयार नहीं होते। किन्तु जो भगवती जगज्जननी हैं, उनके पास अपनी सभी संतानों के लिये अलग-अलग उपाय है।
यह एक मिथ्या बात है, कि साधक को अपना अहं छोड़ देना चाहिये। आज तक अपना अहं स्वयं कौन छौड़ सका है? यह तो ‘माँ’ ही है, जो सब कुछ छीन लेती है और तब ज्ञात होता है, कि हम व्यर्थ में कितना अधिक बोझ ढो रहे थे, व्यर्थ में कितने अधिक मैं-मेरे द्वन्द्व में पडे़ थे और यह बोझ हटते ही जब चित्त स्वतन्त्र होता है, तो स्वतः ही आंखों से अश्रु प्रवाह होने लग जाता है। पीड़ा होने लग जाती है, कि मैं तो सदा से आश्रित ही था, सदा से बलहीन ही था, फिर जीवन के इतने दिन मिथ्या क्यों गंवा दिये?
किन्तु जगज्जननी भगवती तो ‘मां’ है, उनकी दृष्टि में कोई भेद कहां? जो दिन भर उनके पास बैठा रहा, वह भी उनका अपना और जो दिन भर इधर-उधर की खाक छानकर लौटा, वह भी उनका अपना। हम सभी इधर-उधर की खाक छान कर लौटने वाले उन्हीं के पुत्र तो हैं।
प्रत्येक साधक की अभिलाषा होती है, कि वह महाविद्या साधना करें, शक्ति साधना करें, क्योंकि साधना का मूल स्वरूप ही शक्तिमयता होता है, जिसकी पूर्णता इस प्रकार से संभव होती है, किन्तु क्या इसके रहस्य को समझने की कभी चेष्टा की गई? शक्ति साधना का सीधा सा रहस्य है, अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को कटिबद्ध हो जाना। ‘सर्वस्व का अर्थ धन-सम्पति आदि नहीं, अपितु अन्तर्मन का सर्वस्व है। शक्ति साधना अर्जित करने की बात नहीं, अपितु निवेदित कर देने की बात है। शक्ति के चरणों में अपने को खाली करते ही अपार शक्ति का प्रादुर्भाव हो जाता है। हम जब शक्ति के स्वामी बनना चाहते है, तो कुछ -एक सिद्धियां ही हाथ लगती हैं, जबकि समर्पण कर देने पर विश्व की समस्त शक्तियां हमारी हो जाती है।
सम्भवतः साधक से अधिक स्थिर चित्त और कोई भी व्यक्ति इस संसार में नहीं होता होगा, क्योंकि जो भोगी हैं, वे जगत के विषयों में लीन है, जो योगी है, वे ईश्वर में लीन है, किन्तु साधक न तो भोगी है और न ही योगी, अतः उसका चित्त घड़ी के पेण्डुलम की ही भांति योग और भोग दोनों के मध्य यात्रा करता रहता है। एक क्षण को उसे भोग सार्थक लगते हैं, तो दूसरे ही क्षण वह उनसे विरक्त होकर योग की ओर भागता है। ठीक इसी मनःस्थिति में आने पर शक्ति साधना या जगदम्बा साधना की आवश्यकता एवं महत्ता समझ में आती है। ऐसी स्थिति में भगवती जगज्जननी स्वतः अपने साधक के कल्याण करने का उपाय करती हैं। इसी कारणवश उनकी साधना के विषय में कहा गया है-‘भोगस्थ मोक्षस्थ करस्थ एवं’। वे ही अपनी क्रियाओं के द्वारा जीवन के दोनों आयामों का स्पर्श करवा कर साधक को वस्तुस्थिति का बोध कराती हैं। इसकी कोई व्याख्या नहीं की जा सकती, क्योंकि जैसा कि इस लेख के प्रारम्भ में ही कहा है, कि यह तो मां ही जानती है, कि उसकी कौन सी संतान किस प्रकार से संतुष्ट होगीं
अधिकांश साधक जगदम्बा के उस स्वरूप का दर्शन करने की इच्छा मन में संजोए रहते है, जब वे अष्टभुजी या चतुर्भुजी स्वरूप में ‘प्रकट’ होंगी। मैं उनकी इन मनोभावना पर चोट करना नहीं चाहता, किन्तु यह अवश्य कहना चाहता हूं, कि इस प्रकार से वे ऐसे अनेक दुर्लभ अवसर खो देते हैं, जब ‘जगदम्बा’ विविध रूपों में न केवल साधक के समक्ष उपस्थित होती है, अपितु हित रक्षा का भी ध्यान रखती हैं। इसी कारणवश श्रेष्ठ साधक प्रत्येक नारी मूर्ति को ही जगदम्ब-भगवती का विग्रह मानते हैं और श्रेष्ठतम साधक सम्पूर्ण चराचर जगत को ही उनका स्वरूप मानते हैं, क्योंकि जगज्जनी का स्वभाव है अपने पुत्रों का पालन करना, अतः जिस रूप में हमारा पालन हो रहा है, वह एक प्रकार से उन माँ भगवती का ही ‘दर्शन’ है।
‘मां’ को अपने पुत्र के समक्ष आने के लिये कोई आडम्बर नहीं रचना पड़ता, उन्हें आने के लिये कोई विशेष मुहुर्त भी नहीं देखना पड़ता और न ही अपनी कृपा प्रदान करने के लिये कोई आडम्बर रचना पड़ता है। बस हम जितना सहज होते जाते हैं, वे उतनी ही स्पष्ट होती जाती हैं। अनेक श्रेष्ठ साधकों ने इस बात को भली-भांति अनुभव किया हैं, कि जीवन की अनेक विकट घड़ियों में, जब कहीं से आशा की कोई किरण नहीं दिखाई पड़ती, तब सहसा ‘चमत्कार’ सा होता है और हम उन विकट परिस्थितियों से निकल आते हैं। यदि कोई हमारा पल-पल ध्यान नहीं रख रहा है, तो ऐसा संभव कैसे होता है?
भगवती जगज्जनी की इस प्रकार प्रति क्षण सूक्ष्म या स्थूल उपस्थिति मानना ही यथार्थ में ‘आस्था’ है और इस प्रकार मानते हुए सदैव प्रमुदित रहना ही ‘साधना’ या उपासना’ है, क्योंकि ‘मां’ को अपने शिशु से मुस्कान की अपेक्षा होती है, किसी आरती या धन्यवाद ज्ञापन की नहीं।
शक्ति साधना का सीधा सा रहस्य है, अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को कटिबद्ध हो जाना। ‘सर्वस्व’ का अर्थ धन-सम्पत्ति आदि नहीं, अपितु अन्तर्मन का सर्वस्व है। शक्ति साधना अर्जित करने की बात नहीं, अपितु निवेदित कर देने की बात है। शक्ति के चरणों में अपने को खाली करते ही अपार शक्ति का प्रादुर्भाव हो जाता है। हम जब शक्ति के स्वामी बनना चाहते हैं, तो कुछ-एक सिद्धियां ही हाथ लगती है, जबकि समर्पण कर देने पर विश्व की समस्त शक्तियां हमारी हो जाती है।
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