





दान के अनेक रूप तथा श्रेणियां हैं। जैसे अन्न दान, वस्त्र दान, ज्ञान दान, गो दान, कन्या दान, प्राण दान आदि। दान किसी भी प्रकार का हो सकता है, जिसका अर्थ है- देना। यह भौतिक जगत की कोई वस्तु भी हो सकती है अथवा यह एक मानसिक अवस्था भी। ऐसी ही एक मानसिक अवस्था है- क्षमा दान की। किसी को क्षमा करना भी एक बहुत बड़ा दान है। क्षमा मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ गुण है। क्षमावान् व्यक्ति धैर्यशील तथा सन्तोषी होता है। शास्त्रों में कहा गया है- ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्।’ अर्थात् क्षमा भावना वीरों का आभूषण होती है। वस्तुतः वह वीर ही है जो अपने मान-अपमान, लाभ-हानि की परवाह किये बिना अपने कर्तव्य का पालन करता है तथा शांत एवं सन्तुष्ट रहता है। उसकी सहनशीलता प्रबल होती है। वह शोषण में नहीं बल्कि पोषण में विश्वास करता है। इसके विपरित, क्षमा मांगने वाला व्यक्ति भी महान् ही होता है, क्योंकि वह न केवल अपनी गलती को स्वीकार करता है, वरन् भविष्य में उस गलती को न दोहराने का संकल्प भी लेता है। क्षमा मांग लेने पर व्यक्ति की निन्दा, नफरत, क्रोध और दुर्भावना समाप्त होती है। क्षमा या माफी मांगने से कोई व्यक्ति छोटा नहीं हो जाता वरन् इस कृत्य से जो विनम्रता का भाव प्रस्फुटित होता है, उससे उसका कद पहले से कहीं अधिक बढ़ जाता है।
क्षमा मनुष्य को बदले की भावना से ऊपर उठाती है। इस भाव से पूर्ण व्यक्ति का हृदय विशाल होता है। इस अवस्था में उसका क्रोध एवं अहंकार समाप्त हो जाता है। पुराणों में एक कथा आती है- एक बार भृगु ऋषि के मन में त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश की परीक्षा लेने का विचार आया। उसका प्रश्न था कि तीनों देवताओं में कौन श्रेष्ठ है? सर्वप्रथम भृगु ऋषि ब्रह्मलोक पहुंचे, वहां उन्होंने ब्रह्मा जी को प्रणाम किये बिना ऐसे शब्दों का उच्चारण किया, जो किसी को भी आहत कर सकते थे। यह देखकर ब्रह्मा जी क्रोधित हो गये और दण्ड देने के लिये उद्यत हुये। देवी सरस्वती ने ब्रह्मा जी का हाथ पकड़ा और भृगु के अप्रत्याशित व्यवहार के लिये क्षमा करने को कहा। भृगु ऋषि ने ब्रह्मा जी से क्षमा-याचना की और वहां से चल दिये।
अब भृगु ऋषि कैलाश पर्वत पर पहुंचे। वहां पर भी शंकर जी के प्रति उन्होंने कठोर तथा अपमान जनक शब्दों का प्रयोग किया। परिणामतः शंकर जी रूष्ट हो गये और मारने के लिये त्रिशूल उठा लिया। यह देखकर भृगु जी ने हाथ जोड़ लिये। इसके बाद ऋषि विष्णु जी के पास वैकुण्ठ धाम में जा पहुंचे। वहां पहुंचते ही भृगु ने विष्णु जी की छाती पर लात से प्रहार किया। लात लगते ही विष्णु जी की नींद खुल गयी। उन्होंने तुरंत ऋषि के पैर पकड़ लिये और बोले- ऋषिवर! मेरे कठोर शरीर से आपको चोट तो नहीं लगी? इतना सुनते ही ऋषि विष्णु जी के चरणों में गिर पड़े, क्षमा मांगी और बोले- ‘भगवन्! तीनों लोकों में आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि आप सहनशील एवं क्षमावान है।’ परमसंत रहीमदास जी कहते हैं-
छिमा बड़ेन को चाहिये छोटिन को उतपात।का रहीम हरि को घट्यो जो भृगु मारी लात।।
आम लोगों की यह धारणा होती है कि क्षमा दुर्बलता का प्रतीक है और क्रोध तथा हिंसा में शक्ति दिखायी पड़ती है। लेकिन महापुरूष कहते हैं कि इस अवधारणा में सत्य का अंश नहीं है। वस्तुतः शक्ति वहीं है, जहां क्षमा का भाव है। बदले की भावना घृणा या हिंसा उत्पन्न करती है जबकि क्षमा में निहित है- अहिंसा का भाव, जो धर्म का प्रमुख लक्षण है। जो व्यक्ति अपने क्रोध पर काबू पा लेता है, वही शक्तिशाली है। किसी पर उत्पन्न क्रोध को भुला देना किसी वीर का काम ही हो सकता है, निर्बल का नहीं। क्षमा करना एक सकारात्मक भाव है। क्षमा न करना और घृणा तथा द्वेष के भावों को पाल लेना विकृत एवं नकारात्मक मानसिकता का प्रतीक है। शत्रुता और द्वेष-ईर्ष्या आदि शब्दों अस्तित्व क्षमा के अभाव के कारण ही है। जहां क्षमा है, वहां इन शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता। क्षमा शत्रुता का नाश करके मित्रता का विस्तार करती है। कहा गया है कि दान के गर्भ में ही निहित है प्राप्ति का मूल। क्षमादान भी इसका अपवाद नहीं। हृदय से किया गया क्षमादान मन को शान्ति और सुकून प्रदान करता है।
क्षमादान मन की एक उदात्त दशा और एक श्रेष्ठ भाव है। क्षमा कर देने से क्षमा निष्काम कर्म की कोटि में आ जाती है और निष्काम कर्म को धर्मशास्त्रों में सबसे उत्तम माना गया है।
तत्त्वदर्शी मनीषियों का कथन है कि जो लोग न क्षमा मांगना जानते हैं और न क्षमा करना, वे अपने लिये इस धरती पर ही नरक की सृष्टि कर लेते हैं। क्रोध और घृणा के रास्ते से मिली विजय की अपेक्षा क्षमा के रास्ते से मिली पराजय अधिक सुखद होती है। यदि प्रेम और क्षमा द्वारा किसी पर विजय पायी जा सकती है तो लड़ाई करने और शत्रुता बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है। आज विश्व में हिंसा तथा अत्याचार का जो तांड़व नृत्य हो रहा है, वह क्षमा भाव के अभाव के कारण ही हो रहा है। सन्तों में क्षमा का भाव कूट-कूटकर भरा होता है। अतः वे न केवल क्षमा की प्रतिमूर्ति होते हैं, वरन् दूसरों को भी इस भाव को अंगीकार करने की शिक्षा देते हैं। तभी तो कबीरदास जी ने कहा है-
संत न छोड़े संतई काटिक मिलै असंत।मलय भुजंगहि बेधिआ सीतलता न तजंत।।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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