





महापुरूषों के अनुसार मन की पांच विशेषताएं होती हैं- मन चंचल होता है, क्योंकि यह कभी स्थिर नहीं रहता। यह मैला होता है, क्योंकि यह बुरे और निम्न विचारों का उद्गम-स्थल है और जल की तरह नीचे की और बहता है। यह सदा भूखा रहता है, क्योंकि यह कभी तृप्त ही नहीं होता। मुर्ख है, क्योंकि यह समझाने से भी समझता नहीं है। यह पागल है, क्योंकि यह बार-बार धोखा खाने के बाद भी विषयों के पीछे दौड़ता रहता है। मन की इन्हीं खामियों के कारण इसे मनुष्य का शत्रु कहा गया है। इसलिये आध्यात्मिक गुरूजन अपने प्रवचनों में साधकों को सेचत करते हुये कहते हैं कि मन को मनमानी मत करने दो-‘मन के मते न चालिये, यह सतगुरू की सीख’ मनसुख व्यक्ति पतन के मार्ग पर चल पड़ता है और अन्त समय पछताता है। भगवान् आदिशंकराचार्य जी का कथन है कि मन की जीत मनुष्य की सबसे बड़ी जीत है। जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसी ने सारे जगत पर विजय प्राप्त कर ली है- ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’
मुख्यतः मन के दो प्रकार के दोष माने गये हैं-स्थायी तथा आवेगजन्य। लोभ, मोह, आसक्ति तथा मान-सम्मान की इच्छाएँ स्थायी दोष है, जो निरन्तर मन में बने रहते हैं। विवेक, वैराग्य और सत्संग द्वारा ही इनका शमन किया जा सकता है। काम और क्रोध आवेगजन्य दोष हैं, जो अल्पकालिक और अस्थायी होते हैं। काम या क्रोध कब उत्पन्न हो जाय, इसका पता भी नहीं चलता। बुद्धि में यदि सावधानी हो तो इन पर काबू पाया जा सकता है। महापुरूषों का कथन है कि मन ही मनुष्य का परम शत्रु है और मन ही उसका सबसे बड़ा मित्र भी है। मन ही उन्नति और अधोगति का मूल स्त्रोत है। जब मन विषयों में आसक्त हो जाता है तो वह शत्रु की भूमिका में आ जाता है, क्योंकि विषयासक्ति पतन का मार्ग है और यही मन जब परमात्मा में आसक्त हो जाता है तो वह सबसे अच्छे मित्र की भूमिका में होता है, क्योंकि परमात्मा का मार्ग परम शान्ति का मार्ग है।
मन की यह दुर्बलता है कि उसे आसक्ति, अहंकार और विषय -भोग में रस आता है। वह इन्द्रियों का दास बनकर विषयों के पीछे दौड़ता रहता है। मन बहुत चंचल, उद्दण्ड, बली और हठी है। मन को वश में करना वायु को वश में करने के समान है। महाबली अर्जुन भी इस सत्य को स्वीकार करते हुये भगवान से कहते है-
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढ़म्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदष्करम्।।
इसलिये देखा यह जाता है कि मन को वश में करने के लिये मनुष्य को अपने आपसे संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन उसका यह संघर्ष पूरे मनोयोग से नहीं होने के कारण अक्सर असफल ही रहता है। सतही स्तर पर वह एक ओर अपने विषयभोग के रस को बनाये रखना चाहता है तो दूसरी ओर जीवन के उन्नत आध्यात्मिक सोपान पर भी आसीन होना चाहता है। यह संभव नहीं है, क्योंकि आन्तरिक उन्नति भी ऊँची मंजिल पर चढ़ने के समान है। नीचे के पायदान को छोड़े बिना कोई ऊपर उठाये बिना दिव्यता के असीम संसार में प्रवेश नहीं हो सकता। विषयों का आकर्षण बड़ा प्रबल है। इसके लिये दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है, जिससे पूर्व संस्कारों, विचारों, मान्यताओं और अनुभवों को निर्मूलकर नवीन संस्कारों को स्थापित किया जा सके।
सन्त-मनीषियों का अनुभव है कि मन को समझाना बड़ा कठिन है। इस कार्य में सफलता तभी मिल सकती है जब मन को अपना मित्र बनाया जाय। मन को प्रकाशित करने का एक सहज मार्ग है- विषय-चिन्तन को त्यागकर ईश्वरीय चिन्तन करना। इसके लिये मन पर निगरानी रखनी होगी। मन की दिशा को बदलना एक दुष्कर कार्य है, क्योंकि मन को विषय-विचार में बड़ा रस आता है। जिस प्रकार मधुमक्खी बार-बार स्वाभाविक रूप से मीठे रस की ओर मँडराने लगती है, वैसे ही मन बड़ी सहजता से विषय-रस से भी अधिक रसदार विषय-वस्तु नहीं मिलती, तब तक वह विषयानन्द में मग्न रहता है।
प्रकृति नियम है कि जब मनुष्य को कोई बड़ी वस्तु मिल जाती है तो निम्न स्तर की वस्तु स्वतः ही छूट जाती है, तब उसे छोड़ना नहीं पड़ता। जैसे कि साइकिल वाले व्यक्ति को मोटरसाइकिल मिल जाय तो वह साइकिल की सवारी नहीं करता, एक मोटरसाइकिल वाले को कार की सुविधा मिल जाय तो वह मोटरसाइकिल को छोड़ देता है, जिसे हवाई जहाज की यात्रा सुलभ हो जाय, वह बस या रेलगाड़ी से सफर नहीं करता। इसी प्रकार जब मन को यह अनुभूति हो जायेगी कि ब्रह्मानन्द का रस विषययानन्द से कहीं अधिक मीठा है तो वह श्रेय मार्ग पर चल पड़ेगा। विषयों की सीमा में जो रसानुभूति है, वह दिव्यानन्द की छाया से भी तुच्छ है, इसका मन को एहसास कराना अनिवार्य है।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के मत से सहमति जताते हुये कहते हैं कि यद्यपि मन बहुत चंचल है और इसका निग्रह करना भी अत्यन्त कठिन है, फिर भी अभ्यास और वैराग्य द्वारा इसे वश में किया जा सकता है। अभ्यास से तात्पर्य है किसी भी क्रिया को बार-बार दोहराना। अभ्यास में इतनी शक्ति होती है कि वह मनुष्य को पारंगत और सफल बना देती है। महापुरूषों ने कहा भी है-
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात ते सिल पर परत निषान।।
भगवान् श्री आदिशंकराचार्य का कथन है कि चित्तवृत्तियों को रोककर निरन्तर आत्मस्वरूप में ही स्थिर रहने से साधक का मन नष्ट हो जाता है और उसकी वासनाओं का भी क्षय हो जाता है। इसलिये स्वाध्याय का अभ्यास करना और आत्मसाक्षात्कार की वासनाओं को प्रबल बनाया जाना चाहिये। जब तक आत्मसाक्षात्कार की वासना प्रबल नहीं होगी, तब तक मन को वश में करना भी संभव नहीं होगा। विवेकचूड़ामणि -में कहा गया है-
स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नष्यति योगिनः।
वासनानां क्षयष्चातः स्वाध्यासापनयं कुरू।।
मन को साधने के लिये गीता में भगवान श्रीकृष्ण प्रिय अर्जुन से कहते हैं कि साधक को चाहिये कि मन जहाँ-जहाँ जाय, जिस-जिस कारण से जाय, जैसे-जैसे जाय, जब जब जाय, उसको वहाँ-वहां से, उस कारण से, वैसे-वैसे और तब-तब हटाकर परमात्मा में लगाना चाहिये-
यतो यतो निश्चरित मनश्चंचलमस्थिरम्
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।
महर्षि पतंजलिने योगदर्शन में कहा है-
‘अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः’ अर्थात् अभ्यास और वैराग्य से ही चित्त का निरोध होता है। जब तक संसार की वस्तुएँ सुन्दर और सुखप्रद मालूम होती हैं, तभी तक मन उन में जाता है। जब यह ज्ञात हो जाय कि संसार के विषय-पदार्थादि दुःखकारक हैं, जो यथार्थतः ऐसे ही है तो मन उधर नहीं जायेगा। मन को वहाँ से हटाने के लिये पदार्थो में दोष और दुःख की प्रत्यक्ष भावना करनी चाहिये। यही वैराग्य है। अभ्यास और वैराग्य के साधन अपनाने से मन विषयों से हटकर ईश्वर में लग जायेगा। मन आपका विश्वस्त मित्र बन जायेगा और आप दिव्यानन्द प्राप्त करने में सफल हो जायेंगे। सारा खेल मन का ही है- ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ परम सन्त रविदास जी इस परम सत्य को अपने जीवन में सिद्ध कर चुके हैं। यह सामर्थ्य हम सब में भी है, केवल मन से दोस्ती गाँठने की आवश्यकता है। जब मन बुरे विचारों की पहुँच से बाहर हो जाता है और इन्द्रियाँ इसे लुभा नहीं पाती, तब यह परम सत्य का साक्षात्कार करता है और अनीश्वर पद को प्राप्त करता है।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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