





वैदिक धर्म और दर्शन भिन्नताओं का योग है। स्वामी विवेकानन्द वेदान्त दर्शन को मानते थे। वेदान्त के भी तीन रूप हैं- द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत। स्वामी जी अद्वैत के समर्थक थे। इनके अनुसार द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत, इनमें कोई अन्तर नहीं है; ये तीनों वेदान्त दर्शन के तीन सोपान हैं, जिनका अन्तिम लक्ष्य अद्वैत की अनुभूति ही है।
धर्म और दर्शन के प्रति स्वामी जी का दृष्टिकोण बड़ा वैज्ञानिक था। इन्होंने स्पष्ट किया कि कला, विज्ञान और धर्म, एक ही परम सत्य को व्यक्त करने के तीन विभिन्न साधन हैं। एक स्थान पर इन्होंने कहा है-जब विज्ञान का शिक्षक यह कहता है कि समस्त वस्तुएँ एक ही शक्ति की द्योतक है तो क्या आपको ईश्वर की याद नहीं आती जिसके विषय में आपने उपनिषदों में पढ़ा है। और यही तो अद्वैत वेदान्त कहता है।
अद्वैत दर्शन के अनुसार ‘ब्रह्म’ इस सृष्टि का आदि तत्त्व है और वही इस ब्रह्माण्ड की रचनाकर्ता और उपादान कारण है। वेदान्तियों का तर्क है कि जिस प्रकार मकड़ी अपने जाले का निर्माण स्वयं करती है और जाले बनाने का पदार्थ अपने अन्दर से निकालती है ठीक उसी प्रकार है ब्रह्म इस ब्रह्माण्ड का निर्माण स्वयं करता है और इसका उपादान कारण भी वह स्वयं ही है। स्वामी विवेकानन्द इस सत्य को स्वीकार करते थे। इस सिद्धान्त के अनुसार संसार के सभी स्थूल पदार्थ और सूक्ष्म आत्माएँ ब्रह्म अर्थात परमात्मा के अंश हैं। दूसरे शब्दों में यह सारा संसार ब्रह्ममय है।
प्रश्न उठता है कि इस ब्रह्म का स्वरूप क्या है। अद्वैतवादियों के अनुसार ब्रह्म एक ऐसी शक्ति है जिसका कोई स्वरूप हीं नहीं है, यह निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञ है। माया के योग से यह साकार ब्रह्म (ईश्वर) का रूप धारण करता है। यह स्थूल इन्द्रिय ग्राह जगत और उसके पदार्थ उसके साकार रूप हैं।
आत्मा के सम्बन्ध में भी स्वामी जी अद्वैतवादियों के विचार से सहमत हैं। इनके अनुसार सभी आत्माएँ परमात्मा का अंश मात्र हैं और परमात्मा की भाँति वे भी अनादि और अनन्त हैं अतः उनके जन्म और मरण का प्रश्न नहीं उठता। अद्वैत के अनुसार संसार के अन्य पदार्थ भी ब्रह्म अर्थात् परमात्मा के ही अंश हैं पर आत्मा और अन्य पदार्थों में अन्तर इतना है कि आत्मा सर्वव्यापी और सर्वज्ञाता है और उसमें अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मा को समझने और उसे प्राप्त करने का गुण है जबकि अन्य पदार्थों में यह गुण नहीं है। इस सिद्धान्त के अनुसार जब तक आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मा को नहीं पहचानती और उसे प्राप्त नहीं कर लेती तब तक वह एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करती रहती है और जब वह अपने वास्तविक स्वरूप को समझ लेती है और उसे प्राप्त हो जाती है तब वह ऐहिक जीवन से मुक्त हो जाती है, इसी को स्वामी जी मुक्ति कहते थे।
मनुष्य को विवेकानन्द शरीर, मन और आत्मा का योग मानते थे और यह मानते थे कि मनुष्य जीवन के दो पक्ष हैं एक भौतिक और दूसरा आध्यात्मिक। ये मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों पक्षों के विकास पर बल देते थे। इनका कथन था कि जब तक मनुष्य शारीरिक दुर्बलता, अज्ञानता और राजनैतिक दासता से मुक्त नहीं होता तब तक वह आत्मिक मुक्तता की ओर नहीं बढ़ सकता।
मनुष्य के विकास के सम्बन्ध में विवेकानन्द का दृष्टिकोण बड़ा व्यापक था। ये मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के लिए भारतीय ज्ञान एवं क्रियाओं को आवश्यक मानते थे और उसके भौतिक एवं आर्थिक विकास के लिए पाश्चात्य ज्ञान, विज्ञान एवं तकनीकी को आवश्यक मानते थे। आज तो ज्ञान किसी देश की सीमा में सीमित नहीं है, आज तो ज्ञान के क्षेत्र में भूमण्डलीकरण हो गया है।
स्वामी जी मनुष्य को आत्माधारी मानते थे और शंकर की इस बात से सहमत थे कि मनुष्य जीवन का अन्तिम उद्देश्य मुक्ति है, इस संसार के आवागमन से छुटकारा प्राप्त करना है, आत्मा को परमात्मा में लीन करना है; परन्तु ये इस वस्तु जगत और उसमें मानव जीवन को भी सत्य मानते थे इसलिए वस्तु जगत में उसे शारीरिक दुर्बलता, मानसिक दासता, आर्थिक अभाव और हीनता की भावना से भी मुक्त कराने पर बल देते थे। इन दोनों प्रकार की मुक्ति के लिए इन्होंने सम्पूर्ण मानव जाति को अध्ययनशील, विवेकशील एवं कर्मशील होने का उपदेश दिया है और सत्संग, भक्ति एवं योग (ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग और राज योग) साधना का उपदेश दिया है।
मनुष्य के आचार-विचार के सम्बन्ध में स्वामी जी का स्पष्ट मत है कि मनुष्य को सदैव सत्य का पालन करना चाहिये। इनकी अपनी दृष्टि से सत्य वह है जिससे व्यष्टि और समष्टि दोनों का हित (भौतिक हित एवं आध्यात्मिक हित) होता है और असत्य वह है जिससे व्यष्टि अथवा समष्टि किसी का भी अहित (भौतिक अथवा आध्यात्मिक) होता है। स्वामी जी मनुष्य को ईश्वर का मन्दिर मानते थे और मानव सेवा को सबसे बड़ा धर्म मानते थे। इनकी दृष्टि से मनुष्य को मन, वचन और कर्म से शुद्ध होना चाहिए, अपनी जीविका ईमानदारी से कमानी चाहिए, दीन हीनों की सेवा करनी चाहिये और इस प्रकार अपने को शुद्ध एवं निर्मल बना कर योग साधना के योग्य बनाना चाहिये और फिर किसी भी योग मार्ग (ज्ञान, कर्म, भक्ति, अथवा राज) द्वारा आत्मानुभूति करनी चाहिये। योग साधना के लिये इन्होंने सात सोपानों शम-दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा, समाधान, मुमुक्षत्व और नित्यानित्य विवेक के मार्ग का समर्थन किया है।
भौतिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए अल्प योग (अल्पकालीन एकायता) ही पर्याप्त होता है परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए पूर्ण योग (दीर्घकालीन एकाग्रता) की आवश्यकता होती है। आज के मनोवैज्ञानिक भी तो यही कहते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के लिए सीखे जाने वाली वस्तु अथवा क्रिया पर ध्यानकेन्द्रित करना आवश्यक है। हमारा अपना अनुभव भी यही बताता है कि सीखने वाले में सीखने के लिए जितना अधिक योग होता है, वह उतनी ही शीघ्रता से सीखता है। स्वामी विवेकानन्द तो बचपन से ही इस विधि का प्रयोग करते थे।
स्वामी विवेकानंद जी ने आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों प्रकार के मूल्यों का अद्भुत समावेश दर्शाया है। इनके शैक्षिक विचार आज भी पूर्णता नये ही प्रतीत होते हैं। जो शिक्षा के क्षेत्र में सेतु की तरह कार्य कर रहे हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में मानवीय मूल्यों में जो गिरावट आई है उसमें स्वामी जी के शैक्षिक विचार मेरुदण्ड के समान हैं। मानव निर्माणकारी शिक्षा भी वर्तमान परिदृश्य में अत्यंत आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद के जीवन का भाव-चिंतन यह है कि मनुष्य को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वास से भरपूर और निस्वार्थ सेवाभावी होना चाहिए, जो सार्वभौमिक भाईचारे और शिक्षा के माध्यम से आत्म-विकास और समाज के कल्याण की प्राप्ति करे। उनके विचार शिक्षा, संस्कृति और शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं, जिससे व्यक्ति और राष्ट्र दोनों का उत्थान होता है।
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