





केवल काल चक्र के बंधन से मुक्त होकर जीवन मुक्त होने के लिये ही नहीं, अपितु तेजस्विता की तो इस जीवन में पग-पग पर आवश्यकता पड़ती ही है चाहे वह अर्थोपार्जन का विषय हो अथवा समाज में अपना एक वर्चस्व युक्त प्रभाव बना कर सम्मानजनक जीवन जीने का। दुर्बल व्यक्ति की गति न तो इस लोक में हो पाती है और न ही इस लोक से इतर किसी अन्य लोक में, ऐसा ही शास्त्रों में भी प्रमाण है।
गायत्री मंत्र में भी तो मूल रूप से यही व्याख्या है, कि हे सविता (सूर्यदेव) आप हमें अपनी तेजस्विता प्रदान करें, लेकिन संक्रमण काल में सूर्य का आवाहन किस प्रकार किया जाये, यह महत्वपूर्ण हैं मूल रूप से संक्रमण का अर्थ है परिवर्तन। जीवन में सन्धि काल – संक्रमण काल आता ही रहता है। संक्रमण शुभ से अशुभ की ओर भी हो सकता है और अशुभ से शुभ की ओर भी। लेकिन क्या हम संक्रमण में भी स्थित चित्त से जीवन को निरन्तर शुभ की ओर गतिशील कर सकते है। क्या ऐसा सम्भव है ? संक्रमण काल में सूर्य साधना से यह सम्भव हो सकता है।
भगवान सूर्य के विषय में भविष्य पुराण में ब्रह्म पर्व में कथा वर्णित है – वही अव्यक्त ईश्वर भगवान सूर्य के रूप में दृश्यमान होते हुए इस गगन मण्डल पर अभिव्यक्त अथवा प्रकट होते है जिन्होंने सभी देवताओं तथा प्रजा की सृष्टि करने के उपरान्त अदिति के गर्भ से बारह रूपों में अवतरण लिया और इस जगत में द्वादश आदित्यों के रूप में विख्यात हुये-
भगवान आदित्य सूर्य के द्वादश नाम इस प्रकार है-
1- इन्द्र के रूप में भगवान सूर्य देवराज में स्थित हो सभी दैत्यों एवं दानवों का संहार करने जाते हैं।
2- धाता के रूप में वे ही प्रजापति में स्थित हो तेजस्विता प्रदान करते हैं।
3- पर्जन्य रूप में ही किरणों में स्थित हो तेजस्विता प्रदान करते हैं।
4- पूषा रूप में वनस्पतियों एवं औषधियों में समाहित हैं।
5- त्वष्टा रूप में वे वनस्पतियों एवं औषधियों में समाहित है।
6- अर्यमा रूप में पुरों में स्थित हो रक्षाकारक है।
7- भग रूप में ही पर्वतों एवं पृथ्वी में समाए है।
8- विवस्वान् रूप में अग्नि की तेजस्विता है।
9- अंशु रूप में चन्द्रमा में स्थित हो इस जगत पर अमृत वर्षा करते है।
10- विष्णु कला द्वारा इस जगत में ईश्वर के अवतरण सम्भव होते हैं।
11- वरुण रूप में भगवान सूर्य ही समुद्र में उपस्थित है।
12- मित्र रूप में सर्वज्ञ इस जगत का कल्याण करने के लिए सदैव उपस्थित रहने वाले हैं।
यदि पौराणिक शैली में किये गये भगवान सूर्य के इस वर्णन को गूढ़ता से परखें, तो वास्तव में उन्हें ही समस्त जगत का नियता और पालनकर्ता वर्णित करने की ही तो चेष्टा की गई है। ओर जो सूक्ष्म बात है वह यह, कि इस प्रकृति में समस्त उपादानों की क्रियाशीलता अथवा तेजस्विता का आधार भगवान सूर्य को ही घोषित किया गया है। आज विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार कर चुका है, कि इस पृथ्वी का समस्त चक्र केवल सूर्य की उपस्थिति के कारण ही सम्भव है। कदाचित यही कारण है जिसका हजारों वर्षों पूर्व उपनिषदकारों ने अनुभव कर सूर्य को साक्षात् प्राण की ही संज्ञा दी थी। सूर्य की उपासना यथार्थ में प्राण की ही उपासना है, क्योंकि प्राण ही अध्यात्म व भौतिक जगत दोनों का आधार है।
मकर संक्राति का पर्व हिन्दू परम्परा में प्राचीन काल से ही अत्यन्त श्रद्धा से मनाया जाने वाला पर्व है। ज्योतिष की गणना के अनुसार इसी पर्व पर सूर्य का धनु राशि से मकर राशि पर संक्रमण होता है। यद्यपि संक्रमण तो पूरे वर्ष भर में बारह राशियों के क्रम में बारह बार होते है, किन्तु विशेष कारणों से इसी संक्रमण का महत्व सर्वोपरि माना गया है। ज्योतिष की दृष्टि से क्यों इसी संक्रमण का विशेष महत्व माना गया है, यह पृथक वर्णन और विवेचना का विषय है। कैसे इस पर्व विशेष का अधिकतम लाभ प्राप्त किया जाये यही इस मुख्य विषय वस्तु है।
जगत के आधार के रूप में ही नहीं वरन द्वादश रूपों में आदित्य की धारणा करके साधना के मर्मज्ञों ने प्रत्येक रूप का वर्ष के प्रत्येक माह से सम्बन्ध भी स्थापित किया है, जिसका सूत्र रूप में वर्णन पुराण आदि शास्त्रों में मिलता है। भविष्यपुराण के ही अनुसार चैत्र में विष्णु, वैशाख में अर्यमा, ज्येष्ठ में विवस्वान, आषाढ़ में अंशुमान, श्रावण में पर्जन्य, भाद्रपद में वरुण, आश्विन में इन्द्र, कार्तिक में धाता, मार्गशीर्ष में मित्र, पौष में पूषा, माघ में भाग तथा फ़ाल्गुन में त्वष्टा नाम के आदित्य तपते हैं।
शास्त्रों में वर्णित है, कि पौष माह में भगवान सूर्य अपने पूषा नामक आदित्य स्वरूप में रहकर समस्त मंत्रों में पुष्टि का कार्य करते हैं तथा पौष के पश्चात् माघ माह में भाग के स्वरूप में अवस्थित हो समस्त पृथ्वी व पर्वतों में समाहित हो जाते हैं। मकर संक्राति का पर्व एक प्रकार से पौष व माघ माह के संक्रमण काल पर घटित होने वाला पर्व है और कदाचित यही मकर संक्रान्ति को सर्वोच्च संक्रान्ति मानने का कारण भी है, क्योंकि इस अवसर पर समस्त मंत्रों को पुष्ट व जाग्रत कर भगवान सूर्य का आगमन इस धरा पर होता है या दूसरे शब्दों में पूरी की पूरी धरा मंत्रमय होने की दशा में आ चुकी होती है। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक ही होगा, कि साधक किसी भी साधना को क्यों न सम्पन्न करे, उसे पूर्ण सफ़लता प्राप्त होती ही है। आगे की पंक्तियों में भगवान सूर्य के इन्हीं द्वादश आदित्य रूपों से सम्बन्धित साधना विधान को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे साधक को सम्पूर्ण वर्ष भर के लिये एक प्रकार की सर्वांगीणता प्राप्त हो सके या अधिक स्पष्ट रूप से कहें, तो उसके लिए सम्पूर्ण वर्ष ही मंत्रमय, साधनामय होने की दशा निर्मित हो सके। प्रस्तुत साधना विधि की यह विशेषता है, कि किसी भी संक्रान्ति पर सम्पन्न किया जा सकता है। योग्य साधकों को तो इसी साधना विधि का प्रत्येक संक्रान्ति के अवसर पर पुनरावृत्ति करते देखा गया है।
इस साधना को सम्पन्न करने एवं सूर्य की तेजस्विता को अपने प्राणों में समाहित कर सर्वांगीण रूप से उन्नति प्राप्त करने के इच्छुक साधकों को चाहिए कि वे दिनांक 14-1-2026 को प्रातः सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि नित्य कर्म कर या तो श्वेत वस्त्र धारण करें अथवा लाल वस्त्र धारण कर गुरु पीताम्बर ओढ़ लें। पूर्व की ओर मुख करके बैठ जाएं। जिस रंग के वस्त्र धारण करें उसी रंग का आसन व यंत्र भी होना चाहिये।
अपने समक्ष किसी ताम्रपात्र में ‘सूर्य यंत्र’ स्थापित कर उसके चारों ओर सूर्य के द्वादश स्वरूप ‘द्वादश आदित्य हकीक’ को स्थापित करें तथा यंत्र व द्वादश आदित्यों का पूजन कुंकुंम, अक्षत, पुष्प (यथा सम्भव लाल पुष्प) धूप व दीप से कर, सम्पूर्ण वर्ष के लिए तेजस्विता प्राप्त एवं दुःख दैन्य के नाश की प्रार्थना कर ‘लाल हकीक की माला’ से निम्न मंत्र की 15 माला मंत्र जप सम्पन्न करें।
मंत्र
।। ऊँ अं आदित्याय तेजो धेहि ऊँ प्रचोदयात् नमः।।
मंत्र जप के काल में दीपक को निरन्तर प्रज्ज्वलित रखना अत्यावश्यक है।
मंत्र जप के पश्चात् नेत्र बंद करके, अपने आसन पर बैठे-बैठे ही भावना करें, कि सूर्य भगवान अपनी सम्पूर्ण तेजस्विता के साथ उदित होते हुये अपनी रश्मियों के माध्यम से आपके सम्पूर्ण शरीर व प्राणों में समाहित हो रहे हैं और एक प्रकार के आल्हाद की भावना से सम्पूर्ण शरीर आप्लावित होता जा रहा है। इसी स्थिति में बैठे-बैठे मानसिक रूप से उन्हें अर्घ्य प्रदान करें।
इस प्रकार से इस दिवस की यह साधना सम्पूर्ण होती है। सायंकाल सूर्यास्त के बाद यंत्र, हकीक पत्थर व माला को किसी पवित्र स्थान पर विसर्जित कर दें। यथा सम्भव आगे भी नित्य अथवा प्रत्येक रविवार एवं प्रत्येक संक्रान्ति को उपरोक्त मंत्र का जप इच्छानुसार सम्पन्न करते रहें। यह कोई चमत्कार प्रधान साधना विधि नहीं है, किन्तु इसे सम्पन्न करने के पश्चात् आपके मनोबल में हो रहे परिवर्तन स्वतः ही एक चमत्कार के रूप में अनुकूलता प्रदान करते हैं।
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