





अशोक वृक्ष क्या होता है?
प्राचीनकाल में प्रसन्नता के लिये एवं शोक को दूर करने के लिए अशोक वाटिकाओं एवं उद्यानों का प्रयोग होता था और इसी आश्रय से इसके नाम शोकनाश, विशोक, अपशोक आदि रखे गये हैं। सनातनी वैदिक लोग तो इस पेड़ को पवित्र एवं आदरणीय मानते ही हैं, किन्तु बौद्ध भी इसे विशेष आदर की दृष्टि से देखते हैं; क्योंकि कहा जाता है कि भगवान बुद्ध का जन्म अशोक वृक्ष के नीचे हुआ था। इसका सम्बन्ध कामदेव से भी है। पुष्प धन्वा (कामदेव) के पंचपुष्प बाणों में अशोक पुष्प की भी गणना की गई है और इसके पर्यायवाची नामों में स्मराधिवास, नट आदि नाम भी सम्मिलित किये गये है।
मुख्यतया अशोक की दो प्रजातियां होती हैं, जिनका प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। काष्ठदारु (Polyalthia longifolia½) की प्रायः अशोक वृक्ष के रूप में पहचान की जाती है, जो गलत है; वास्तविक अशोक (Saracaasoca) या सीता अशोक होता है, जिसमें सिंदूरी या लाल रंग के फूल आते हैं तथा काष्ठदारु में पीले-हरे रंग के फूल आते हैं। काष्ठदारु वृक्ष की लम्बाई (15-20 मी तक) भी वास्तविक अशोक (6-9 मी तक) से अधिक होती है।
अशोक का औषधीय गुण
अशोक प्रकृति से लघु, रूखा, चरपरा, विपाक में कड़वा और शीतल होता है। यह दर्दनिवारक, रंग गोरा करने वाला, हड्डी जोड़ने वाला, सुगन्धित, हृद्य,तीन दोषों को हरने वाला, प्यास, जलन, कृमि, सूजन, दर्द, पेट का रोग, आध्मान या पेट का फूलना, विष, अर्श या पाइल्स, रक्त संबंधी रोग, गर्भाशय की शिथिलता, सर्व प्रकार के प्रदर या लिकोरिया, बुखार, जोड़ो का दर्द और अजीर्ण या अपच आदि रोगों का नाशक है। इसका प्रयोग कष्टार्तव, रक्तपित्त (नाक-कान से खून बहना), अश्मरी या पथरी तथा मूत्रकृच्छ्र या मूत्र संबंधी रोग में करते हैं। अशोक की छाल (ashok chhal½) कटु, तिक्त या कड़वी, बुखार व तृषा (प्यास) नाशक, रक्त-विकार, थकावट, शूल या दर्द, अर्श या पाइल्स इत्यादि रोगों में लाभदायक होता है। इसके अतिरिक्त पेट बढ़ने की बीमारी, अत्यधिक रक्तस्राव तथा गर्भाशयगत रक्तस्राव में उपयोगी होता है। अशोक के बीज मूत्रल या मूत्र रोग नाशक होते हैं। अशोक के पुष्प रक्तजप्रवाहिका (खूनी दस्त) नाशक होते हैं।
अशोक प्रकृति से कटु, तिक्त, उष्ण या गर्म, लघु तथा रूक्ष यानि रूखा होता है। यह कृमि रोग में फायदेमंद तथा बुखार व कुष्ठ रोग से छुटकारा दिलाने में मदद करता है। इसका प्रयोग आमदोष, कब्ज तथा कृमिरोग में अत्यन्त लाभकारी होता है।
अशोक वृक्ष के फायदे-
वैसे तो अशोक वृक्ष मूल रूप से स्त्रीजनित रोगों के लिये लाभकारी होता है लेकिन इनके अलावा अशोकारिष्ट के अन्य लाभ भी हैं।
रक्तातिसार से दिलाये राहत अशोक वृक्ष-
अगर ज्यादा मसालेदार खाना, पैकेज़्ड फूड या बाहर का खाना खा लेने के कारण दस्त है कि रूकने का नाम ही नहीं ले रहा तो अशोक का पौधा का घरेलू उपाय बहुत काम आयेगा। अशोक के 3-4 ग्राम फूलों को जल में पीसकर पिलाने से रक्तातिसार में फायदेमंद होता है।
सांस संबंधी बीमारी में फायदेमंद अशोक वृक्ष-
अगर किसी कारणवश सांस लेने में समस्या हो रही है तो तुरन्त आराम पाने के लिये अशोक का पौधा का सेवन ऐसे करने से लाभ मिलता है। 65 मिग्रा अशोक बीज चूर्ण को पान के बीड़े में रखकर खिलाने से सांस संबंधी रोग में लाभप्रद सिद्ध होता है।
शिशु के उल्टी में फायदेमंद अशोक वृक्ष-
शशुओं के उल्टी होने की समस्या बहुत आम होती है। इससे राहत दिलाने के लिये अशोक के फूलों को जल में पीसकर स्तनों पर लेप कर दूध पिलाने से स्तनपाई शिशुओं की उल्टी रुक जाती है।
रक्तार्श में फायदेमंद अशोक छाल-
जब बवासीर का रोग गंभीर अवस्था में चला जाता है तब मस्सों से खून निकलने लगता है। अशोक का सेवन इस तरह से करने पर जल्दी आराम मिलता है।
अशोक की छाल का काढ़ा बनाकर 15-25 मिली मात्रा में पिलाने से अर्शजन्य रक्तस्राव (Haemorrhoids) तथा मासिक विकारों में लाभ होता है।
अशोक की छाल और इसके फूलों को बराबर मात्रा में लेकर 10 ग्राम मात्रा को रात्रि में एक गिलास पानी में भिगोकर रख दें। सुबह पानी छानकर पी लें। इसी प्रकार सुबह का भिगोया हुआ शाम को पी लें। इससे रक्तार्श में शीघ्र लाभ होता है।
पथरी जन्य दर्द से दिलाये राहत अशोक छाल-
आजकल के प्रदूषित खाद्य, पैकेज्ड फूड और असंतुलित आहार के सेवन का फल पथरी की समस्या है। अशोक के 1-2 ग्राम बीज को पानी में पीसकर दो चम्मच की मात्रा में पीने से किडनी में पत्थर के कारण जो दर्द होता है उससे राहत दिलाने में मदद करता है।
मधुमेह को नियंत्रित करने में फायदेमंद अशोक छाल-
अशोक छाल का प्रयोग मधुमेह को नियंत्रित करने में सहायक होता है क्योंकि एक रिसर्च के अनुसार अशोक छाल में एंटी-डायबिटिक का गुण पाया जाता है जो की शर्करा की मात्रा को रक्त में बढ़ने से रोकता है।
संक्रमण दूर करने में अशोक फायदेमंद-
अशोक छाल संक्रमण को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। क्योंकि अशोक में एंटी-बैक्टीरियल गुण पाया जाता है जो कि संक्रमण को फैलने से रोकता है।
पेट से कीड़ा निकालने में अशोक फायदेमंद-
अगर पेट में कीड़ो की समस्या है तो अशोक का प्रयोग आपको फ़ायदा पहुँचा सकता है क्योंकि अशोक में कृमिघ्न गुण पाये जाने के कारण यह पेट के कीड़ों को भी दूर करने में मदद करता है।
दस्त को रोकने में फायदेमंद अशोक-
अशोक में एंटी डायरियल गुण पाये जाने के कारण यह डायरिया या दस्त को रोकने में मदद करता है। साथ ही इसमें कषाय गुण होने के कारण यह आँतों में होने वाले अत्यधिक जलीयांश के स्राव को रोकता है जिससे डायरिया में आराम मिलता है।
टूटी हुई हड्डी को जोड़ने में फायदेमंद अशोक छाल-
अशोक टूटी हड्डियों को जोड़ने और हड्डियों को मजबूत करने में फायदेमंद होता है। 6 ग्राम अशोक छाल चूर्ण को दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से तथा इसी का प्रलेप करने से टूटी हुई हड्डी जुड़ जाती है और दर्द कम होता है।
स्किन डिजीज में फायदेमंद अशोक वृक्ष-
आजकल के प्रदूषण भरे वातावरण में त्वचा संबंधी रोग होने का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। हर कोई किसी न किसी त्वचा संबंधी परेशानी से ग्रस्त हैं। अशोक छाल इन सब परेशानियों को कम करने में मदद करता है। अशोक छाल के रस में सरसों को पीसकर छाया में सुखा लें, उसके बाद जब उबटन लगाना हो तब सरसों को इसकी छाल के रस में ही पीसकर त्वचा पर लगाएं। इससे त्वचा का रंग निखरता है।
अल्सर के परेशानी से दिलाये राहत अशोक वृक्ष-
कभी-कभी अल्सर का घाव सूखने में बहुत देर लगता है या फिर सूखने पर पास ही दूसरा घाव निकल आता है, ऐसे में अशोक छाल का सेवन बहुत ही फायदेमंद होता है।
घी, प्रियंगु, अशोक रोहिणी की त्वचा, त्रिफला, धातकी, लोध्र तथा सर्जरस को समान मात्रा में लेकर, सूक्ष्म चूर्ण कर, अल्सर के घाव पर छिड़कने से घाव ठीक होने लगता है।
यादाश्त बढ़ाने में सहायक अशोक छाल-
उम्र बढ़ने के साथ यादाश्त कमजोर होने लगती है। अशोक की छाल तथा ब्राह्मी चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर एक-एक चम्मच सुबह-शाम, एक-कप दूध के साथ नियमित रूप से कुछ माह तक सेवन करने से बुद्धि तीव्र होती है।
बदन दर्द से दिलाये आराम अशोक-
अशोक का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से पूरे बदन में जो दर्द होता है उससे राहत मिलता है।
अशोक का पौधा प्रकृति का एक कालातीत उपहार है जो स्वास्थ्य के लिये कई लाभ प्रदान करता है, खासकर महिलाओं के स्वास्थ्य, त्वचा की देखभाल और मानसिक स्वास्थ्य के लिये। इसकी बहुमुखी प्रतिभा और प्रभावशीलता इसे आयुर्वेद का एक अनिवार्य अंग बनाती है। अशोक को अपने दैनिक जीवन में शामिल करके, आप इसके चिकित्सीय गुणों का उपयोग करके एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली अपना सकते हैं। यह भारतीय वनौषधियों में एक दिव्य रत्न है। भारतवर्ष में इसकी कीर्ति का गान बहुत प्राचीनकाल से हो रहा है, क्योंकि सीता माता जी को लंका में प्रायः एक वर्ष तक इसी वृक्ष के नीचे रावण ने रखा था।
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