





कुछ-कुछ ऐसा है जैसे कोई हवा को मुट्ठी में पकड़े। हवा को मुट्ठी में पकड़िये तब खयाल आयेगा-तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। पकड़िये मुट्ठी में जोर से, बांधिए मुट्ठी को-और हवा बाहर निकली। बांधते चले जाइए, आखिर में मुट्ठी ही रह जायेगी, हवा उसमें नहीं बचेगी। खोल दें मुट्ठी को, मम बांधे। और हवा बड़ी प्रगाढ़ होकर बहती है। खुली मुट्ठी में हवा होती है, बंद मुट्ठी में हवा खो जाती है। जिसने जितने जोर से बांधा, उतनी ही खाली हो जाती हैं जिसने पूरी खोल दी, कभी खाली नहीं होती, सदा भरी होती है। और प्रतिपल ताजी हवाएं, प्रतिपल ताजी हवाएं भरती चली जाती हैं। कभी देखा, खुली मुट्ठी कभी खाली नहीं होती। बंधी मुट्ठी सदा खाली हो जाती है। कुछ थोड़ा-बहुत बच भी जाये तो गंदा और बासा और पुराना और जरा-जीर्ण हो जाता है। सड़ जाता है।
इस जगत में, इस जीवन में छोड़ने के लिये जो जितना राजी है, उतना ही उसे मिलता है। जीवन के सभी नियम बड़े विरोधाभासी हैं। विरोधी नहीं हैं, विरोधाभासी है। दिखाई पड़ते है कि विपरीत हैं। यहां जिस आदमी ने चाहा कि सम्मान मिले, उसे अपमान सुनिश्चित हैं जिस आदमी ने चाहा कि मैं धनी हो जाऊं, जितना धन मिलता जाता है, वह आदमी भीतर उतना ही निर्धन होता चला जाता है। जिस आदमी ने सोचा कि मैं कभी न मरूं, वह चौबीस घंटे मौत में घिरा रहता है। मौत का भय पकड़े रहता है। जिस आदमी ने कहा कि हम अभी मरने को राजी है, उसके दरवाजे पर मौत कभी नहीं आती। जो मरने को राजी हुआ, उसे अमृत का पता चल जाता है। और जो मौत से भयभीत हुआ, वह चौबीस घंटे मरता है। वह मरता ही है, जीने का उसे पता ही नहीं चलता। जिसने भी कहा कि मैं मालिक बनूंगा, वह गुलाम बन जाता है और जिसने कहा कि हम गुलाम होने को राजी हैं, उसकी मालकियत का कोई हिसाब नहीं।
इस विरोधाभास को बचाने के लिये जो हम अर्थ निकालते हैं-वे गलत होते हैं। इसका भी वैसा ही अर्थ लोगों ने निकाला है। लोगों ने निकाला-तेन त्यक्तेन भुंजीथाः- तो निकाला कि दान करो तो स्वर्ग में मिलेगा। गंगा के तट पर एक पैसा दो तो एक करोड़ गुना मोक्ष में मिलने वाला है!
असल में महावाक्यों की जितनी दुर्दशा होती है जगत में, उतनी और किसी चीज की नहीं होती। और ऋषियों के साथ जितना अन्याय होता है, उतना किसी और के साथ नहीं होता। क्योंकि उन्हें समझना कठिन हो जाता है। हम उनसे जो अर्थ निकालते हैं, वे अर्थ हमारे होते हैं। हमने सोचा कि यह बात बिलकुल ठीक है। कुछ दान करोगे तो परलोक में पाओगे। लेकिन पाने के लिये करना दान। दान करना पाने के लिये।
और ध्यान रखना जो छोड़ता है, उसे मिलता है, लेकिन जो मिलने के लिये छोड़ता है, उसको मिलता है, ऐसा नहीं कहता है। जो मिलने के लिये ही छोड़ता है, वह तो छोड़ता ही नहीं। वह तो सिर्फ मिलने का इंतजार कर रहा हैं। जो आदमी कहता है कि मैं दान कर रहा हूं यहां, ताकि मुझे स्वर्ग में मिल जाये, वह छोड़ ही नहीं रहा। वह सिर्फ मुट्ठी आगे तक कस रहा है। वह कह रहा है कि यहां तो ठीक, वहां भी! हम छोड़ेंगे नहीं। वहां भी चाहिये। और अगर वहां मिलने का कोई पक्का भरोसा होता हो, तो हम यहां कुछ इनवेस्टमेंट कर सकते हैं। हम कुछ लगा सकते हैं पूंजी यहां, अगर परलोक में कुछ मिलने का पक्का हो।
जो छोड़ता है, उसे मिलता है। यह यह नहीं कहता कि तुम इसलिये छोड़ना ताकि तुम्हें मिले। क्योंकि मिलने की जिसकी दृष्टि है, वह तो छोड़ ही नहीं सकता। वह तो सिर्फ इनवेस्ट करता है, वह छोड़ता कभी नहीं। वह तो सिर्फ पूंजी नियोजित करता है ताकि और मिल जाये।
एक आदमी एक लाख रूपया कारखाने में लगता है, तो दान कर रहा है? नहीं। वह डेढ़ लाख मिल सकेगा इसलिये लगा रहा है। फिर वह डेढ़ लाख भी लगा देता है, तो दान कर रहा है? वह तीन लाख मिल सके इसलिये लगा रहा है। वह लगाये चला जाता है, वह लगाए चला जाता है, इसलिये कि मुट्ठी को और कसना है। और पकड़ लेना है। जो आदमी भी दान करता है पाने के लिये, उसने दान के राज को नहीं समझा। वह दान का खयाल ही उसको पता नहीं चला कि क्या है।
यह सूत्र यह कहता है, इतना ही कहता है, सीधी-सीधी बात कि जो छोड़ता है वह भोगता है। यह यह नहीं कहता कि तुम्हें भोगना हो तो तुम छोड़ना। यह यह कहता है कि अगर तुम छोड़ सके, तो तुम भोग सकोगे। लेकिन तुम भोगने का खयाल अगर रखे, तो तुम छोड़ ही नहीं सकोगे।
सब परमात्मा का है। उसमें ही छोड़ना आ गया। जिसने जाना, सब परमात्मा का है, फिर पकड़ने को क्या रहा? पकड़ने को कुछ भी न बचा। छूट गया। और जिसने जाना कि सब परमात्मा का है और जिसका सब छूट गया और जिसका मैं गिर गया, वह परमात्मा हो गया। और जो परमात्मा हो गया, वह भोगने लगा, वह रसलीन होने लगा, वह आनंद में डूबने लगा। उसको पल-पल रस का बोध होने लगा। उसके प्राण को रोआं-रोआं नाचने लगा। जो परमात्मा हो गया, उसको भोगने को क्या बचा? सब भोगने लगा वह। आकाश उसका भोग्य हो गया। फूल खिले तो उसने भोगे। सूरज निकला तो उसने भोगा। रात तारे आये तो उसने भोगे। कोई मुस्कुराया तो उसने भोगा। सब तरफ उसके लिये भोग फैल गया। कुछ नहीं है उसका अब, लेकिन चारों तरफ भोग का विस्तार है। वह चारों तरफ से रस को पीने लगा।
धर्म भोग है। और जब मैं ऐसा कहता हूं, धर्म भोग है, तो अनेकों को बड़ी घबराहट होती है। क्योंकि उनको खयाल है कि धर्म त्याग है। ध्यान रहे, जिसने सोचा कि धर्म त्याग है, वह उसी गलती में पडे़गा-वह इनवेस्टमेंट की गलती में पड़ जायेगा। त्याग जीवन का तथ्य है। इस जीवन में पकड़ना नासमझी है। पकड़ रहा है, वह गलती कर रहा है-सिर्फ गलती कर रहा है। जो उसे मिल सकता था, वह खो रहा है, पकड़कर खो रहा है। जो उसका ही था, उसने घोषणा करके कि मेरा है, छोड़ दिया। लेकिन जिसने जाना कि सब परमात्मा का है, सब छूट गया। फिर त्याग करने को भी नहीं बचता कुछ। ध्यान रखना, त्याग करने को भी उसी के लिये बचता है, जो कहता है, मेरा है।
एक आदमी कहता है कि मैं यह त्याग कर रहा हूं, तो उसका मतलब हुआ कि वह मानता था कि मेरा है। सच में जो कहता हैं, मैं त्याग कर रहा हूं, उससे त्याग नहीं हो सकता है। क्योंकि उसे मेरे का खयाल है। त्याग तो उसी से हो सकता है जो कहता है, मेरा कुछ है नहीं, मैं त्याग भी क्या करूं। त्याग करने के लिये पहले मेरा होना चाहिये। अगर मैं कुछ कह दूं कि दे दिया मंगल ग्रह आपको, दान कर दिया। तो पहले मेरा होना चाहिये। त्याग का भ्रम उसी को होता है जिसे स्वामित्व का खयाल है।
नहीं, त्याग छोड़ने से नहीं होता। त्याग इस सत्य के अनुभव से होता है कि सब परमात्मा का है। त्याग हो गया। अब करना नहीं पड़ेगा। घटित हो गया। इस तथ्य की प्रतीति है कि सब परमात्मा का है, अब त्याग किया जा सके। और जो ऐसे त्याग की घड़ी में आ जाता है, सारा भोग उसका है। जीवन के सब रस, जीवन का सब सौंदर्य, जीवन का सब आनंद, जीवन का सब अमृत उसका है।
इसलिये यह सूत्र कहता है, तेन त्यक्तेन भुंजीथाः, जिसने छोड़ा उसने पाया। जिसने खोल दी मुट्ठी, भर गई। जो बन गया झील की तरह, वह भर गया। जो हो गया खाली, वह अनंत संपदा का मालिक है।
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