





अतः यह समझा जा सकता है कि यदि मन व्यवस्थित किया जा सके तो जीवन की सारी समस्याओं का समाधान हो सकता है। मनुष्य को ईश्वर द्वारा विलक्षण शक्ति-बुद्धि का वरदान प्राप्त है, जिसकी योग्यता से मानव सृष्टि का सर्वोत्कृष्ट प्राणी जाना जाता है।
जन्म, वृद्धि, व्याधि, जरा, क्षय, मृत्यु की प्रक्रिया पूर्वनियत है, इन घटनाओं का हम स्वेच्छा से चयन नहीं कर सकते। हम जिन शेष सीमित क्षेत्रों में जीवन एवं उसकी घटनाओं को सँवार सकते हैं उसी ओर हमारा ध्यान और प्रयास रहना चाहिये।
जो क्षेत्र हमारे प्रयास-संवरण की सीमा के बाहर के हैं और जो घटनाएं जैसी आती हैं उन्हें वैसी ही स्वीकार करना है उनके प्रति मन के स्तर पर सोत्साह स्वीकार्य भाव जाग्रत करना होगा अथवा उनसे विरत होना होगा। पारलौकिक सत्ता के विचार हेतु पुनर्जन्मवाद एवं कर्मफलवाद के दर्शन की मान्यता को स्वीकार कर समुचित पुरूषार्थ जुटाना होगा।
इन सब समाधानों की पुष्टि अध्यात्म है, स्वयं का अध्ययन अर्थात् आत्मा का अनुसन्धान ‘मैं’, ‘मेरे’ का विवेक, संसार एवं उसके नियन्ता का ज्ञान, जीवन जीने की कला, मृत्यु की समझ आदि-ये सभी अध्यात्म के विषय हैं इस अध्यात्म मार्ग पर चलते-चलते ये हमारे लिये सुगम हो जायँगे।
आगे बढ़ने से पूर्व मन के विकारों का विवेचन लाभदायक होगा, यह सर्वविदित है कि काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, ईर्ष्या तथा भय आदि वृत्तियाँ हमारे मुक्त-जीवन के मार्ग को अवरूद्ध किये हुये हैं। इन सबके मूल में ‘इच्छा’ अथवा ‘कामना’ के भाव ही हैं। मैं पन अथवा अहंता का भाव होने पर ही कामना हो सकती है, जैसे कि ‘मुझे यह चाहिये’ कामना अथवा संकल्प उत्पन्न करती हे। अपूर्ण होने पर अथवा प्रतिकूल फल मिलने पर क्रोध उत्पन्न होता है, जो अविवेक की पशुवत् व्यवहार का जनक है। कामना पूर्ण होने पर सुख-भाव उत्पन्न होता है जिसकी और अधिक की भोगेच्छा लोभ उत्पन्न करती है। इच्छित प्राप्त फल से लगाव-मोह उत्पन्न हो जाता है, जो ‘मेरे’ की भावना सुदृढ़ करता है। उसके समाप्त होने की चिन्ता भय उत्पन्न करती है। इच्छित वस्तु प्राप्त होने का भय ईर्ष्या का जनक है।
पुनः इन सबके पीछे ‘मैं’ की अहंता का विचार ही सर्वोपरि है। ‘मैं’ नहीं तो इच्छा कौन करेगा? कल्पित ‘मैं’ नहीं रहेगा तो भोग कौन करेगा?
मृत्यु का भय भी अहंता के कारण ही होता हैं। ‘मैं’ का संसार से सम्बन्ध नहीं तो जीना कौन चाहेगा? निष्कर्ष यही है कि इस प्रपंच से मुक्ति पाने का मार्ग ‘मैं’ और ‘मेरे’ की गुत्थी सुलझाना ही है।
व्यवहार जगत में मन को संयत रखने के जो मुख्य मार्ग हैं, उन पर किंचित् विचार प्रस्तुत है-
भक्तिमार्ग-इसका आधार अनन्य-प्रेम अथवा श्रद्धा-जन्य अटूट शरणागति का भाव है। किसी विपरीत आशंका की स्थिति में बच्चा सीधा माँ की गोद में छुप जाता है अथवा सोने से लिपटकर आँखे बंद कर लेता है। परिस्थितियों से माँ (अथवा इष्ट)- को जूझने हेतु छोड़ देता है।
मीरा का अनन्य भाव-‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई।’ और इतना विश्वास कि ‘विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे।’ इसके जीवन्त उदाहरण है।
प्रेम अनेक भावों में व्यक्त हो सकता है, जैसे- वात्सल्य, माधुर्य, दास्य, सखाभाव आदि। प्रेम में ‘मैं’ का अस्तित्व ही नहीं रहता, मेरा केवल इष्ट ही हो जाता है, अन्य विकल्प संभव ही नहीं है। इष्ट में लीन होने से द्वैतभाव बना रहता है, लीन होने पर जीवन्मुक्ति की अवस्था हो जाती है।
कर्ममार्ग-‘मैं’ आत्मा हूं, जो परमात्म तत्त्व ही है। शरीर प्रकृति अथवा संसार का भाग है। मैं कुछ नहीं करता, शरीर संसार का है, अतः उसी के लिये है, उसके द्वारा किये गये कर्म भी संसार के नियन्ता के लिये हैं। कर्मफलों से भी मेरा कोई लेना-देना नहीं, यही कर्मयोग कहलाता हैं। मैं कर्ता ही नहीं हूँ, यह ‘कर्म-सन्यास’ भाव है।
मैं जब कर्ता नहीं तो भोक्ता कैसे? फिर कर्म विपाक फल का प्रश्न ही नहीं उठता। यही जीवन्मुक्ति की अवस्था है।
अहं की भावना से किये गये पापकर्म, लोहे की बेड़ी के समान हैं और पुण्यकर्म सोने की बेड़ी के समान, क्योंकि दोनों ही प्रारब्ध के जनक होंगे, बुरे या अच्छे।
निःस्वार्थ भाव से किये गये कर्म जैसे- किसी तैराक का डूबने वाले को बचाने हेतु कूद पड़ना है- वह यह नहीं देखता कि डूबनेवाला धनाढय है अथवा भिखारी। यह शुद्ध निष्काम कर्म ही है। कर्म तो होंगे ही, करने ही हैं जब तक शरीर है। केवल, किस भाव से किये जा रहे है, यह विवेक का विषय है।
ज्ञानमार्ग-विवेकशील मानव बुद्धि द्वारा वास्तविकता का अनुसन्धान कर सकता है, जिसे ‘ज्ञान’ कहते है। ‘ज्ञान’ द्वारा मन में स्वाभाविक रूप में उठने वाले भावों को संयत किया जा सकता है। ‘ज्ञान’ है सत्-असत् का विवेक, मैं यह जड़ और विनाशी ‘असत्’ शरीर नहीं हूं, मैं तो चेतन और अविनाशी सत् आत्मा हूँ। सबकी आत्मा एक है (सर्वात्मैक्यभाव), आत्मा परमात्म सनातन अंश है। (ब्रह्मात्मैक्यभाव, ईश्वर अंस जीव अबिनासी, ‘ममैवांषो जीवलोके जीवभूतः सनातनः’) भेद नाम एवं रूपधारी भौतिक तथा नाशवान् कृत्रिमता का ही है। यह प्रकृति और उसके सभी द्रव्य-पदार्थ एवं शक्तियाँ चेतन सत्ता के ही घनीभूत रूप हैं। जो संसार दृष्टिगोचर होता है, वह मिथ्या है और जो मूल सत्ता है वह दृश्यमान नहीं है (‘नासतो विद्यते भावो। नाभावो विद्यते सतः’) जैसे अन्धकार में हमें रस्सी में सर्प का भान होता है जो असत्य है, क्योंकि प्रकाश होते ही उसकी वास्तविकता रस्सी के रूप में प्रतीत हो जाती है।
आभूषणों के मूल में स्वर्ण है, तरंगों के मूल में जल है, घट मिट्टी के बिना नहीं है, इसी प्रकार चेतन तत्व के बिना प्राण नहीं है, वही सबका उपादान (आधार) है। सभी पदार्थ आत्म तत्व पर ही प्रकाशित हैं, परंतु वह लिप्त नहीं होता, जैसे दर्पण में आकृति और चित्रपट पर चलते द्रव्य न दर्पण को और न चित्रपट को प्रभावित करते हैं। इसी प्रकार चेतनतत्व शुद्ध आत्मारूप में होता है और शरीरादि उपकरणों द्वारा केवल भासित (व्यक्त) होता है।
‘मैं आत्मा हूं, शरीर नहीं’ यह तत्त्व विचार द्वारा अनुभवजन्य है, तर्क का विषय नहीं है। इसे जानने में कठिनाई हो तो पहले मानना ही श्रेयस्कर है।
जगत्-कल्पित प्रपंच है जो मन के विक्षेप के कारण प्रतीत होता है, इसीलिये माया कहा जाता है। सुषुप्ति, समाधि आदि में वह विलीन हो जाता है, जब मन नहीं तो जगत् नहीं। जाग्रत अवस्था में जैसे स्वप्न को विकार जान लिया जाता है। अनन्त चेतना भाव में जगत् के विकार की प्रतीति हो जाती है।
आन्तरिक वैराग्य ही मुक्ति का मार्ग है।
मैं, ‘अहंता’ की अविद्या और मेरा ‘ममता’ की अविद्या, इनसे विरत होते ही स्वतः सिद्ध मुक्ति प्राप्ति है।
(‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा‘)।
सस्नेह आपकी मॉं
शोभा श्रीमाली
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