





नीति है ऐसा आचरण, जो हमारे भीतर से नहीं उपजता, जिसे हम दूसरे को दिखाने के लिये करते है, जिसकी जड़ें हमारे भीतर अंतरात्मा में नहीं होती, जिसे हम ऊपर से ओढ़ते है, जिससे हम भिन्न होते हैं। न केवल भिन्न, बल्कि विपरीत होते हैं। जिससे हमारा कोई तालमेल नहीं होता, लेकिन सम्मान के लिये, समादर के लिये, आस-पास की भीड़ को राजी करने के लिये, समूह के लिये उसे हम अपने ऊपर ओढ़ते हैं। नीति ओढ़ी गई घटना है।
एक तो फूल है, वृक्षों में लगते हैं। उन फूलों का संबंध जड़ों से होता है, भीतर भूमि से होता है, ऊपर आकाश के सूरज से होता है, चांद-तारों से होता है। फिर ऐसे भी फूल हैं प्लास्टिक के कि तुम उन्हें वृक्षों पर लटका दो, शायद दूर से गुजरने वालों को धोखा भी दें, लेकिन वे फूल वृक्ष में नहीं लगे होते, ऊपर से चिपके होते हैं।
नीति प्लास्टिक के फूलों जैसी है। उससे तुम्हारे और समाज के बीच सुविधापूर्ण संबंध निर्मित हो जायेंगे, लेकिन तुम्हारे और परमात्मा के बीच सब संबंध टूट जायेंगे। जिसने समाज को बहुत ज्यादा ध्यान दिया वह आत्मा से वंचित हो जायेगा।
नीति अगर सड़ जाये तो राजनीति का जन्म होता है। नीति अपने आप में झूठ पांखड है, लेकिन उसका भी सबसे सड़ा हुआ रूप, सबसे विकृत रूप राजनीति है। जैसे कि प्लास्टिक के फूल भी सड़ गये। राजनीति का अर्थ है, तुम्हें कुछ प्रयोजन ही नहीं है उससे, तुम जो कर रहे हो। तुम्हारे लक्ष्य कुछ और हैं। तुम करते कुछ और हो, तुम चाहते कुछ और हो। तुम्हारा सारा आचरण साधन की भांति है, साध्य नहीं। तुम मुस्कुराते हो, अगर तुम्हें वोट नहीं लेनी है। तुम उपेक्षा से भर जाते हो, अगर वोट मिल गई। तुम्हारी मुस्कुराहट भी झूठी है। तुम्हारी मुस्कुराहट भी सहज नहीं है, क्षण की घटना नहीं है, वास्तविक नहीं है। उसके पीछे भी लक्ष्य है, साधन है। तुम मुफ्त में मुस्कुराते भी नहीं उसके पीछे भी लोभ है। तुम मुस्कुराते हो कुछ पाने को। तुम भला व्यवहार करते हो कुछ पाने को।
तो राजनीतिज्ञ चढ़ता है सीढ़ियों से और खोदता चलता है। वह जिन नावों में सवार होता है, उन्हीं को डुबाता चलता है। क्योंकि खतरा है। वे नावें खतरनाक हैं। नावों को किससे क्या प्रयोजन है! तुम्हें ले आई राजधानी तक, दूसरों को ले आयेंगी।
उसका सारा आचरण अहंकार की पूजा के लिये समर्पित है। वह सिंहासनों पर होना चाहता है, समादर चाहता है।
लेकिन ध्यान रखना, नीति में भी वह बीज तो छिपा ही हुआ है।
तुम मनुष्यों को दो प्रकार में बांट सकते हो। एक, जो समाधि चाहते हैं, समाधान चाहते हैं। और दूसरे, जो सम्मान चाहते हैं, समादर चाहते हैं। जो समाधि चाहता है, उसे तो भीतर की यात्रा पर जाना होगा। जो सम्मान-समादर चाहता है, उसे दूसरों की आंखों के इशारों को समझना होगा। उसे दूसरों के इशारों पर नाचना होगा। क्योंकि दूसरे तभी तुम्हें आदर देंगे जब तुम उनकी धारणाओं के अनुकूल होओगे। वे तुम्हें तभी आदर देंगे जब तुम मरी हुई प्रतिमा की तरह होओगे-भला संगमरमर की सही! जब तुममें अपने जीवन की कोई झलक भी न होगी। जब तुमसे कोई भी खतरा न होगा तुम्हारे व्यक्तित्व के प्रकट होने का। जब तुम एक आदर्श मात्र होओगे, आत्मा न होगी तुम्हारे भीतर। तुम एक लाश की भांति होओगे-सजी-संवरी, आभूषणों से लदी, लेकिन तुम्हारी श्वास न चलती होगी। क्योंकि जब भी तुम्हारी श्वास चलेगी तभी खतरा है। जहां श्वास है वहां स्वतंत्रता है। जहां स्वतंत्रता है वहां तुम समाज के बाहर और समाज के विपरीत भी जा सकते हो।
इसलिये समाज मरे-मराए आदर्शो में भरोसा करता है। वह तुमसे चाहता है कि तुम आदर्श पूरे कर दो, तुम्हारा भी सम्मान है। ध्यान रखना, समाज को तुम्हारे सम्मान से मतलब नहीं, उसके अपने आदर से है। अगर तुम उनके अनुकूल बैठ जाओ, अगर तुम उनके तराजू पर तुल जाओ, अगर तुम उनकी कसौटी पर ठीक पड़ जाओं, तो तुम्हारा आंतरिक सुरक्षा के लिये नियत की गई हैं।
तुम्हें भी समाज से कुछ मतलब नहीं है। तुम्हें अपना सम्मान चाहिये। समाज के साथ व्यक्ति के सारे संबंध झूठे होते हैं। दोनों अपना-अपना लाभ देख रहे हैं। व्यवसाय का संबंध है।
नीति का अर्थ है, व्यक्ति की सारी आकांक्षा सम्मान की है। तुम अपने बच्चों को भी समझाते हो, तुम्हारे माता-पिता ने भी तुम्हें समझाया था- कि अगर सम्मान चाहते हो, ईमानदार बनना।
लेकिन सम्मान चाहने के लिये बनी गई ईमानदारी कितनी ईमानदारी हो सकती है! बात बीज से हो झूठ हो गई। अगर अपमान मिलता हो तब? तब ईमानदार होना या नहीं होना? तब जरा खतरा है।
सम्मान चाहते हो तो ईमानदार होना। लेकिन चाह सम्मान की है। सम्मान यानी अहंकार की पूजा और प्रतिष्ठा चाहते हो। अहंकार से ईमानदारी का क्या संबंध हो सकता है?
समाज ने सिखाया है कि अगर पूजा चाहते हो तो सच्चे होना। अगर पूजा चाहते हो तो आचरणवान होना।
लेकिन पूजा की चाह ही तो सबसे बड़ा दुराचरण है। तो तुम दुराचरण की सेवा में आचरण को संलग्न कर रहे हो। तुमने झुठला दिया व्यक्ति को प्रारम्भ से ही।
तुमने अहंकार के आधार पर ही सारी व्यवस्था खड़ी की है। और जब भी व्यक्ति पाता है, अपमान मिल रहा है, तब अहंकार को चोट लगती है। तब वह फिर सम्मान को पाने की चेष्टा शुरू कर देता है। जितना ज्यादा सम्मान मिलता जाता है, उतना ही अहंकार पूजित होता चला जाता है। और अहंकार जितना भरता है, उतने स्वयं से संबंध टूट जाते हैं। अहंकार तुम्हारी तुमसे ही दूरी का नाम है। तुम कितने घर से दूर निकल चुके हो, उस फासले का नाम ही अहंकार है।
एक दूसरे तरह का व्यक्ति है, जो समादर नहीं चाहता, समाधान चाहता है। जो चाहता है कि मेरे भीतर एक अपूर्व शांति हो। मेरे भीतर एक आनंद की वर्षा हो। जो चाहता है कि मैं जीवन की कृतकृत्यता को उपलब्ध हो जाऊं। कि मैं जान लूं जीवन क्या है। कि मेरा जीवन ऐसे ही न खो जाये।
व्यर्थ के चांदी-सोने के ठीकरे इकट्ठे करने में मैं व्यतीत न हो जाऊं। मैं ऐसे ही समाप्त न हो जाऊं बिना कुछ जाने, बिना कुछ भीतर के रस को उपलब्ध हुये। भीतर की वीणा न बजे और कहीं जीवन का अवसर न चूक जाये। ऐसा व्यक्ति धार्मिक है।
नीति धर्म नहीं, नीति धर्म का धोखा है। धोखा है और बड़ा कुशल धोखा है। क्योंकि जो व्यक्ति भीतरी समाधान चाहता है, वह भी सच्चा होता है, लेकिन उसकी सचाई का कारण सम्मान पाने की आकांक्षा नहीं होती, वह सम्मान पाने के लिये सच्चा नहीं होता। वह सच्चा होता है इसलिये सम्मान मिलता है, यह बात दूसरी। वह सच्चा ही रहेगा, चाहे अपमान मिले। वह सच्चा ही रहेगा, चाहे नरक में फेंक दिया जाये। क्योंकि उसने सच्चाई के स्वर्ग को अनुभव कर लिया। अब कोई और चीज उसकी सच्चाई को हटा नहीं सकती।
भीतर का समाधान खोजने वाला आदमी भी नीति के गहनतम आदर्शो को पूरा करता है, लेकिन वे उसका लक्ष्य नहीं होते, वे छाया की तरह आते हैं। जैसे-जैसे भीतर की समाधि बढ़ती है और भीतर की अराजकता मिटती है और भीतर की समस्वरता पैदा होती है, भीतर का नाद जैसे-जैसे बजता है, वैसे-वैसे उस व्यक्ति के जीवन से अंधकार गिरने लगता है, उसका बाहर का व्यवहार भी बदलने लगता है। लेकिन बदलता है भीतर के कारण बदलता है भीतर की क्रांति के कारण ।
अंतस पहले बदलता है, आचरण पीछे आता है, तब तो फूल जड़ों से जुड़े है। अगर आचरण तुमने बदल लिया और अंतस बदला ही नहीं, तो फूल कागजी हैं। वे जड़ों से नहीं जुड़े हैं, झूठे हैं। झूठे फूलों को सम्मान भला मिल जाये, लेकिन झूठे फूलों से तुम्हारी संतुष्टि न होगी। आखिर में तुम पाओगे, व्यर्थ ही गंवा दिया सब।
नीति अनिवार्य रूप से धर्म नहीं है। धर्म अनिवार्य रूप से नीति है। धार्मिक व्यक्ति नैतिक है ही। उसे नैतिक होने के लिये कुछ भी करना नहीं होता। धार्मिक होने से उसकी नीति ऐसे ही निकलती है जैसे फूलों से गंध निकलती है, दीये से प्रकाश निकलता है, सुबह पक्षियों के कंठ से गीत फूटता है। वह सुबह की सहज घटना है। सूरज के उगते ही भीतर भी कुछ उगता है। सारे जगत के जागते ही भीतर भी कुछ जागता है। फूल खिलने लगते है, पक्षी गीत गाने लगते हैं। कोई भी न हो सुनने वाला। सुनने वाले से कोई प्रयोजन ही नहीं है।
नीति ऐसा गीत है जो तुमने दूसरों के लिये गाया। भला तुम्हारे कंठ में उठता हो, न उठता हो। भला तुम्हारे हृदय से आया हो। भला तुम्हारे प्राण गाना चाहते थे कि नहीं गाना चाहते थे। तुम गौण हो। तुम हो ही नहीं। तुमने अपने को बाद दे दी है। दूसरों के लिये गाया, सम्मान के लिये गाया, तालियों के लिये गाया, पुरस्कारों के लिये गाया।
धर्म ऐसा गीत है जो तुमने अपने लिये गाया। किसी ने सुन लिया, बात और। और कोई आनंदित हुआ, धन्यभाग! कोई सुनने न आया, कुछ भेद नहीं पड़ता। क्योंकि मजा गाने में है, किसी के सुनने में नहीं। आनंद तो था गीत के फूटने में, अभिव्यक्ति में। वह किसी ने तालियां बजाई या निर्जन एकांत ने उसे सुना, कोई भेद नहीं पड़ता। तुम्हारा आनंद पूरा है। तुम्हारे आनंद से ही तुम्हारा गीत जन्मा है। गीत के कारण तुम्हें आनंद मिलने वाला नहीं है, आनंद से ही गीत बहा है।
धर्म भीतर से पैदा हुआ संगीत है। स्वभावतः नीति उसके साथ बहती चली आती है। लेकिन नीति के साथ धर्म बहता हुआ नहीं चला आता।
ऐसा समझो कि तुम सुंदर हो तो तुम्हारा आचरण सुंदर स्वभावतः हो जाता है। तुम ज्योतिर्मय हो तो तुम्हारे कृत्यों में भी ज्योति झलकती है, दीये जलते हैं।
तुम ऊपर से सुंदर बनने की कोशिश कर रहे हो। तुमने खूब आभूषण पहन लिये हैं खूब सुंदर वस्त्र पहन लिये है, खूब सजा-संवार लिया है। ज्यादा से ज्यादा तुम असौंदर्य को थोड़ा सा ढांक लोगे, सुंदर नहीं हो जाओगे। ढंकी कुरूपता सुंदर नहीं हो जाती। ढंकी कुरूपता और भी कुरूप हो जाती है। उघड़ा रूप शायद कभी सुंदर भी हो जाये। अगर तुम उघाड़ ही दो अपने को-कुरूप हो तो कुरूप सही, जैसे हो वैसे हो, परमात्मा ने ऐसा तुम्हें बनाया, जैसा रखता है वैसे रहोगे- तो शायद तुम्हारी इस सहजता से तुम्हारी कुरूता भी बह जाये। सहज तुम्हारे स्वीकार से शायद सौंदर्य का आविर्भाव हो जाये।
लेकिन तुम ढांकते हो, छिपाते हो। उस छिपाने से घाव मिटते नहीं, बढ़ते है। घाव धीरे-धीरे नासूर हो जाते हैं, नासूर धीरे-धीरे कैंसर बन जाते हैं। पूरे प्राणों में महामारी फैल जाती है।
नीति चेष्टा है समादर की। नीति का विकृतमय रूप राजनीति है। वह अत्यंत रूग्ण दशा है नीति की। तब व्यक्ति अपने को छोड़ ही दिया। अब कोई के लिये हंसता है, किसी के लिये रोता है। सारा व्यवहार बाहर हो गया।
मंदिर में जब तुम परमात्मा के सामने खड़े हो, तब परमात्मा और तुम्हारी मौजूदगी, दो की मौजूदगी है। तुम ऐसा व्यवहार करोगे जो प्रार्थना के योग्य है। लेकिन जहां तुम बिलकुल अकेले हो अपने स्नानगृह में, जहां तुम दर्पण के सामने खुद ही खड़े हो, कोई भी देखने वाला नहीं, वहां तुम्हारा सच्चा रूप प्रकट होता है।
नीति नहीं है लक्ष्य, धर्म है लक्ष्य। धर्म का अर्थ हैः व्यक्ति का अपने एकांत में अपने से ही व्यवहार। इस व्याख्या को याद रखो। एकांत के साथ तुम जो व्यवहार करते हो वहीं तुम्हारे धर्म का पता चलता है कि तुम धार्मिक हो या नहीं।
निश्चित ही उसके पीछे नीति के सभी रथ अपने आप चले आते है, उन्हें लाना नहीं पड़ता। वे दौड़े चले आते हैं, वे अपने से ही भागे चले आते हैं। पर वे न भी आएं तो भी धार्मिक व्यक्ति को उनके कारण कोई चिंता नहीं होती। और अगर धर्म की गहनता बढ़ती जाये, तो जैसे नीति का विकृततम रूप राजनीति है, वैसे धर्म का प्रगाढ़तम, विकसिततम रूप निर्वाण है, मोक्ष है, मुक्ति है।
ये दो अलग यात्राएं हैं।
नीति को भूल कर धर्म मत समझना, अन्यथा तुम खोटे सिक्के पर राजी हो गये। उस सिक्के से इस संसार में बहुत कुछ मिलेगा, लेकिन उस सिक्के से नदी के उस पार न जा सकोगे। वह इसी पार चलता है। नदी में पार जाना तो दूर, नाव में भी न बैठ सकोगे। क्योंकि वह मांझी कहेगा, यह सिक्का उस तरफ चलता ही नहीं। यह इसी किनारे चलता है। तुम इसे यहीं चलाओं।
ऊपरि आलम सब करै, साधु जन घट मांहि।
ऊपर से दिखावा सभी लोग करते हैं। ऊपर-ऊपर सभी लोग सजाते हैं। ऊपर-ऊपर सभी लोग सुंदर बनने की चेष्टा में संलग्न होते हैं।
ऊपरि आलम सब करै…….
सारा संसार यही कर रहा है- ऊपर-ऊपर। क्योंकि दूसरों को तो तुम्हारी परिधि ही दिखाई पड़ती है। तुम्हारा केंद्र तो सिवाय तुम्हारे कौन देख सकेगा?। वहां तो तुम्हारा ही एकांत प्रवेश है। किसी और को भी वहां प्रवेश का उपाय नहीं है। तुम्हारे आत्यंतिक हृदय के केंद्र पर तो तुम्ही जा सकोगे। लेकिन तुम्हारी देह तो सभी को दिखाई पड़ेगी।
तुमने ध्यान किया या नहीं, यह किसी को दिखाई नहीं पड़ेगा। तुमने स्नान किया या नहीं, यह तो सभी को दिखाई पड़ जायेगा। तुमने भीतर के सौंदर्य को निखारा या नहीं, इसको देखने वाली आंखें तुम कहां खोज सकोगे! लेकिन तुमने स्नान किया है, सुगंधित होकर घर से निकले हो, ताजे कपड़े पहने है, यह तो अंधे को भी समझ में आ जायेगा। धीरे-धीरे तुम यह भूल ही जाते हो कि एक तुम्हारा ऐसा रूप भी है जिसे तुम ही जानोगे। और एक तुम्हारा रूप है जो बाहर से दिखाई पड़ता है। अगर तुम बाहर के ही रूप को संवारने में लगे रहे, तो तुमने दूसरों की आंखों को भला तृप्ति दी हो, तुम अपनी जीवन की खोज से वंचित हो जाओगे। तुम दूसरों को ही समझाते रहे कि मैं सुंदर हूं। और तुम सुंदर न हो पाओगे। क्योंकि यह सवाल किसी को समझाने का नहीं है। तुम सुंदर हो तो तुम सुंदर हो, किसी को समझाने की बात नहीं है। कोई समझ ले, उसका सौभाग्य, न समझे, उसका दुर्भाग्य। समझ ले तो वह भी यात्रा पर निकल जायेगा। न समझे तो जहां पड़ा है वहीं पड़ा रहेगा और सड़ जायेगा। लेकिन तुम्हें दूसरे को समझाने की आकांक्षा नहीं है।
लेकिन साधारणतः हमारी अपने संबंध में कोई दृष्टि ही नहीं होती। हम अपने संबंध में भी दूसरों की दृष्टि को ही जुटाते हैं। अगर लोग तुम्हें अच्छा कहते हैं तो तुम अपने को अच्छा मानते हो। अगर लोग बुरा कहते हैं तो तुम अपने को बुरा मानते हो। जैसे कि तुम्हारी अपने से सीधी कोई पहचान ही नहीं है। जो लोग कहते हैं वही तुम अपने को मानते हो।
यही तो तकलीफ है। इसीलिये तो तुम इतने भयभीत हो लोगों से कि कहीं लोगों का मन न बदल जाये। कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हें चुनाव में मत न दें। कहीं ऐसा न हो कि वे तुम्हारे संबंध में कुछ और सोचने लगें। तुम पुरे वक्त शंकित, चिंतित, व्यथित, उनकी आंख में तुम्हारी प्रतिमा सुंदर बनी रहे इसके लिये बेचैन हो।
और दूसरों की आंखों में बनी तुम्हारी प्रतिमाएं पानी पर बने प्रतिबिंब से ज्यादा मूल्यवान नहीं है। आंख भी बस पानी है। उस पर बने प्रतिबिंब है। जरा में डगमगा जाते हैं। कुछ भरोसा है? आज किसी का मन ठीक था, उसने तुम्हें कहा, सुंदर हो। कल उसका मन ठीक नहीं है और उसने कहा कि तुमसे ज्यादा कुरूप कोई व्यक्ति नहीं। हट जाओ! तुम्हें देख कर भी मुझे घृणा पैदा होती है।
तुम जानते हो, रोज यह घटता है। किसी दिन तुम किसी को कहते हो, मैं प्रेम करता हूं। तेरे बिना न जी सकूंगा। और एक दिन ऐसा आता है, तुम कहते हो कि मुझे इतनी घृणा है तुझसे कि तेरे साथ न जी सकूंगा। अब अलग ही जीने की उपाय है।
लोगों के मन तो धुंए की तरह बदलते रहते हैं। आकाश में बादलों के बने हुये आकार जैसे हैं लोगों के मन। तुम पूरी तरह देख भी नहीं पाये कि बदलाहट शुरू हो गई। नदी की धाराओं की तरह हैं लोगों के मन। बह रहे है, कुछ भी थिर नहीं है। उसमें तुम अपना प्रतिबिंब झांक रहे हो। एक मछली उछल जाती है, प्रतिबिंब डांवाडोल हो जाता है। दूसरे के मन में एक विचार उछल जाता है, प्रतिबिंब डांवाडोल हो जाता है।
झील शांत हो, चांद दिखाई पड़ता है। जरा सी लहर आ जाये हवा की, टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं चांद के। अगर चांद भी झील पर ही भरोसा करता हो, तो रोता-रोता मरेगा कि यह मेरी क्या गति हो गई। हजार टुकड़े हो गया! अभी तो सब ठीक था। यह झील ने मन क्यो बदल लिया?
कोई झील चांद के लिये मन को नहीं बदल रही है। झील की अपनी मुसीबतें हैं। झील को चांद से क्या लेना-देना है? शायद झील को पता भी न हो कि चांद का प्रतिबिंब बन रहा है।
तुम जिन आंखों के लिये बड़ा भरोसा किये हो, उन आंखों को शायद तुम्हारी कोई खबर भी न हो, शायद चिंता भी न हो। लेकिन तुम्हारी चिंता यही है कि सभी आंखों में मेरा प्रतिबिंब अच्छा बना रहे। एक प्रतिमा हो आदर्श की। लोग सम्मान दें, आदर दें।
जीवन बहुत छोटा है। लोगों के मन बड़े प्रवाहमान हैं। इस भांति तो तुम खो जाओगे। झील में देखते-देखते तुम्हारा चांद ही नष्ट हो जायेगा। अपने को देखो। झील से क्या प्रयोजन है? भीतर की अखंडता को खोजो। फिर झीलें कुछ भी कहें। कम से कम तुम्हें तो व्यथित नहीं होना चाहिये। तुम तो जानते हो, मैं अखंड हूं। झील के कहने से क्या फर्क पड़ता है?
लेकिन जरा सी झील के मन में शंका आती है और तुम शंकित हो जाते हो। बात जाहिर है। तुम स्वयं से अपरिचित हो। आत्म-अज्ञानी व्यक्ति दूसरों की आंख में अपनी पहचान खोजता है कि मैं कौन हूं? वह अपना तादात्म्य खोज रहा है कि मैं अपने को क्या समझूं?
झील में देख कर चांद को पता चला। मगर यह बड़ा खतरनाक सौदा है। क्योंकि और भी झीलें हैं। किसी और झील में देख कर शक हो जायेगा कि सुंदर नहीं हूं।
तुम कभी विचार करना कि तुम अपने संबंध में जो भी जानते हो वह सब दूसरों की आंखों में देखे गये प्रतिबिंबो की कतरन को जोड़ कर बनाया गया प्रतिरूप है, या तुम अपने संबंध में सीधे कुछ जानते हो? कौन क्या कहता है तुम्हारे संबंध में, उस पर तुम निर्भर हो। छोटे-मोटे बच्चों पर निर्भर होते हो। छोटा बच्चा है, मां उस पर निर्भर होती है कि वह कहे कि तुझसे अच्छी मां कोई भी नहीं। छोटा सा बच्चा! उससे भी राजनीति का खेल शुरू हो जाता है। और बच्चा अगर कहे दे, तू कुछ भी नहीं है-किसी नाराजगी के क्षण में- तू हमारी मां भी नहीं है! तो मां का भी दिल टूट जाता है। आंसू आ जाते है कि अपना ही बेटा ऐसा कह रहा है। तो उस पर भी निर्भर हैं।
आदमियों को तो छोड़ दें, कुत्ता पाल रखा है। वह आप आते हैं दफ्तर से तो पूंछ हिलाता है, चित्त प्रसन्न होता है। कुत्ते की पूंछ में प्रतिबिंब देखते हैं अपना! कोई कुत्ता, आप पूंछ हिलाते रहो, फिक्र नहीं करता। मगर आप फिक्र करते हो। कुत्ते समझ गये राजनीति। समझ गये आदमी की मूढ़ता कि यह गरीब आदमी है, इसका कोई हिसाब नहीं। जरा पूंछ हिला दो, यह राजी हो जाता है। यह बड़ा प्रसन्न हो जाता है। इसे लगता है जैसे सम्राट हो गये।
कुत्ते पालने का यही तो सुख है। कुत्ता भरोसे-योग्य है। कभी भी आओ, डांटो-डपटो, नाराज होओ, भगा दो उसे, फिर वापस खड़ा है, फिर पूंछ हिला रहा है। वह तुम्हें फुसला ही लेगा। वह तुम्हें बता ही देगा कि तुम सिकंदर हो। तुम बड़े महान हो। कुत्ते राजनीति समझ गये, आदमी की मूढ़ता समझ गये।
जितना ही आत्म-अज्ञान होगा, उतना ही हम आत्मज्ञान की खोज करते हैं दूसरों के विचारों में-कौन मेरे संबंध में क्या कह रहा है। अगर लोग अच्छा कह रहे हैं, तो मै अच्छा हूं इसीलिये अच्छा कह रहे हैं। अगर लोग बुरा कह रहे हैं, तब? तब स्वभावतः भीतर शक होता है, मैं बुरा होऊंगा। तो किस तरह लोगों को राजी करूं कि वे सदा मुझे अच्छा कहते रहे!
सिर्फ साधु भीतर की यात्रा पर निकलता है। वह भीतर के घट मांहि-वहां खोजता है कि मैं कौन हूं। वह वहां मनन और ध्यान करता है कि मेरी प्रतिमा क्या है? मैं हूं कौन? वह अपने से पूछता है, किसी और से नहीं कि मैं कौन हूं। वह तुम्हारे घर के सामने भीख मांगता हुआ खड़ा नहीं होता कि थोड़ा मुझे आत्मज्ञान की भीख दे दो! कि थोड़ा मुझे बता दो कि मैं कौन हूं! जरा कह दो!
कितने लोग मिमियाते हैं एक-दूसरे के सामने कि जरा कह दो कि तुमसे ज्यादा ईमानदार और कोई भी नहीं। हृदय के कमल खिल जायेंगे। कि जरा कह दो कि तुम्हारी जैसी कोकिल कंठ आवाज कहीं नहीं सुनी। प्राण-प्राण पुलकित हो जायेंगे। कि जरा कह दो कि तुम्हारी आंखों में झीलों की शांति है, कि तुम्हारी आंखों में हिमालय का सौंदर्य है। और श्वास-श्वास सुगंधित हो जायेगी।
हर आदमी एक-दूसरे के सामने भीख मांगता खड़ा है कि कह दो। और बदले में वह कहने को तैयार है कि नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं। आपके सामने क्या हूं, पैर की धूल हूं, एक लेन-देन है। एक पारस्परिक समझौता है। हम एक दूसरे को सहारा दे रहे हैं। हम एक-दूसरे की पीठ थपथपा रहे है। जिसकी तुम पीठ थपथपा रहे हो, वह तुम्हारी थपथपा रहा है। वह भी तभी तक थपथपायेगा जब तक तुम थपथपा रहे हो। ऐसे हम एक-दूसरे को धोखा देने में साझीदार हैं।
इस धोखे का नाम माया है, प्रपंच है। इस धोखे का नाम संसार है।
संसार का अर्थ तुम यह मत समझना कि वृक्ष, आकाश के तारे, समुद्र, पहाड़। इनसे संसार का कोई लेना-देना नहीं। ये तो परमात्मा के हिस्से हैं संसार तो उस धोखे का नाम है जो आदमी-आदमी ने अपने बीच निर्मित किया है। उसका परमात्मा से कोई संबंध नहीं है। परमात्मा ने सृष्टि तो बनाई है, संसार नहीं बनाया।
इस भेद को समझने में तुम्हें शायद थोड़ी कठिनाई हो, क्योंकि तुम सदा दोनों को एक ही मानते रहे हो। संसार आदमी ने बनाया है। उसका स्त्रष्टा आदमी है। सृष्टि परमात्मा की है, लेकिन संसार आदमी का है। संसार उस प्रपंच का नाम है जो आदमी अपने बीच में खेल रहे है। उस खेल का नाम है जो आदमी-आदमी आपस में खेल रहे हैं।
तुम जरा गौर करना अपने ही संबंध में, तो तुम पाओगे कि चौबीस घंटे जाने-अनजाने तुम यही कर रहे हो। एक खेल खेल रहे हो। रास्ते पर कोई आदमी है, तुम झुक कर नमस्कार करते हो। नमस्कार के लिये नहीं, तुम देखते हो कि वह नमस्कार करता है कि नहीं। अगर न करे नमस्कार, बड़ी पीड़ा हो जाती है।
नमस्कार जैसा पवित्र कृत्य भी बाजार में बिक गया है। वह भी पारस्परिक व्यवसाय का हिस्सा हो गया है। हम उन्हीं को नमस्कार करते हैं जिनसे हम आश्वस्त हैं कि वे लौटायेंगे उत्तर। नहीं तो हम भी बच कर निकल जाते हैं। क्योंकि यह बात बड़ी बेचैनी की मालूम पड़ती है कि हम झुके और तुम न झुके!
साधु भीतर की साधता है। वह अपनी खोज पर निकलता है, लेकिन दूसरों के माध्यम से नहीं, वह सीधा ही खोज पर जाता है। यह भी क्या पागलपन है कि मैं अपना काम पूरा सिर घुमा कर पकडुं! नाहक हाथ को कष्ट देना है। जो कान सीधा ही पकड़ा जा सकता है उसके लिये पूरे सिर का चक्कर हाथ को लगवाने की क्या जरूरत है? मैं अपने को जानूं, तुम्हारे द्वारा, यह बात ही फिजूल है।
मैं सीधा ही अपने को जान सकता हूं। मैं अपने भीतर विराजमान ही हूं। आंख बंद करनी है और अपने को देखना है। आंख बंद करनी है और अपने से पूछना है कि मैं कौन हूं। तुमसे क्यों पूछूं? और बड़ा मजा यह है कि तुम्हें खुद अपना पता नहीं, तुम्हें मेरा क्या पता होगा! तुम मुझे कैसे पहचानोगे? तुम अभी अपने को ही नहीं पहचान पाये। यह तो ऐसा हुआ, दो भिखमंगे एक-दूसरे के सामने हाथ फैलाये खड़े हों भीख की आशा में। और दोनों भिखमंगे हैं। दोनों मांग सकते हैं, दे नहीं सकते हैं।
दो अज्ञानी जब तक-दूसरे को ज्ञान का भरोसा दिलाने लगते हैं तो संसार पैदा होता है। न मुझे पता है मैं कौन हूं, न तुम्हें पता है तुम कौन हो। मैं तुम्हें समझाता हूं कि तुम कौन हो, तुम मुझे समझाते हो कि मै। कौन हूं।
मैंने सुना है, एक शिकारी तीन दिन तक जंगल में भटका रहा। थक मरा, लहूलुहान हो गया सब शरीर, कांटे ही कांटे छिद गये। भूखा-प्यासा, रास्ता न मिले, बौखला गया। करीब-करीब विक्षिप्त हालत में हो गया। चौथे दिन सुबह सूरज के उगते ही उसने देखा कि अरे……! एक आदमी दिखाई पड़ा उसे एक वृक्ष के नीचे खड़ा हुआ। वह भागा खुशी से कि अंत हुआ इस झंझट का। जाकर उस आदमी को गले लगा लिया।
लेकिन वह आदमी वैसा ही खड़ा रहा, जैसे ठूंठ हो। यह जरा बेचैन हुआ। उस आदमी ने कहा, ज्यादा खुश मत होओ, मैं सात दिन से भटका हुआ हूं। तुम प्रसन्न हो रहे हो कि रास्ता मिल गया? इसलिये नाच रहे हो, कूद रहे हो? हम खुद ही भटके हैं। ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा, हम दोनों साथ-साथ भटकेंगे अब। और कोई ज्यादा लाभ नहीं हो सकता।
लेकिन तुमने कभी खयाल किया, अकेले भटकने से साथ-साथ भटकना अच्छा लगता है। कम से कम कोई साथ तो है। कोई सहारा तो है। किसी से बात तो कर लेंगे। अपनी पीड़ा तो रो लेंगे, दुःख तो रो लेंगे। इसीलिये तो लोग दुःख रोते हैं। मिला नहीं कोई कि उन्होंने दुःख रोना शुरू नहीं किया। वह दूसरा भी सुनता है कि तुम रूकोगे तो हम शुरू करेंगे।
दुःख ही दुःख है। अज्ञान ही अज्ञान है। लेकिन भीड़-भाड़ हो जाती है तो भरोसा आ जाता है। इसीलिये तो आदमी के मन में भीड़ के साथ संबंधित होने की बड़ी आकांक्षा होती है।
ये आदमी की रूग्ण चित्त की दशाएं हैं। कहीं भी समूह खोजता है-बिलांगिंग। ऐसा कुछ हो जिससे पता चले कि मैं किसी के साथ हूं, अकेला नहीं हूं। नारे खोजता है। सड़कों पर भीड़े निकलती हैं, प्रोसेशन निकलते है, जुलूस निकलते हैं सारी दुनिया में। कौन उनमें सम्मिलित होता है? किसलिये उनमें सम्मिलित होता है? कोई बहुत गहरा सुख होगा।
वह सुख यही हैः भीड़ के साथ तुम अकेले नहीं रह जाते। और जब भीड़ जोर से नारा लगाती है, तो जोर की आवाज तुम्हारे भी भय और शंकाओं को गिरा देती है। और तुम्हें भी लगता है कि ठीक ही होंगे ये लोग। जब इतने जोर से कह रह हैं तो गलत बात कोई कहीं इतने जोर से कहता है! तुम भी जोर से आवाज देते हो। अकेले तो तुम कभी जोर से आवाज न दे सके थे, डरते थे कि गलती न हो जाये। अब दस हजार आदमी साथ हैं।
भीड़ में तुम्हारा दायित्व समाप्त हो जाता है। तब तुम्हारी कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं है। तुम भीड़ के एक हिस्से हो। ध्यान रखना, भीड़ से सावधान रहना, अन्यथा तुम्हारे जीवन में साधुत्व का दीया कभी भी न जल सकेगा।
चलो भीतर की तरफ, एकांत की तरफ, अकेले की तरफ। क्योंकि वहीं सत्य है और वहीं से द्वार परमात्मा का है। तुम्हारे ही घट में बसा है वह, जिसे तुम न मालूम घट-घट में खोज रहे हो।
साधु में और असाधु में, सांसारिक में इतना ही अंतर है। इसलिये बनती नहीं दोनों में।
साधु की समाज से कभी नहीं बनती। और अगर तुम कहीं ऐसा साधु पाओ जिसकी समाज से बनती है, तो समझना कि वह साधु न होगां साधु की समाज से बन कैसे सकती है! अंसभव है। क्योंकि साधु की यात्रा ही उलटी है। वह भीड़ को छोड़ कर चलता है।
कबीर ने कहा हैः सिंहों के नहीं लेहड़े, साधु की नहीं जमात।
सिंह कोई भीड़ और जुलूस और प्रोसेशन तो निकालते नहीं। साधु की क्या कोई जमात है! उसने तो जान लिया, अकेला आया हूं, अकेला जाना है, अकेला हूं। ये दो अकेलेपन के बीच में साथ झूठ है, प्रपंच है। आया अकेला, जाऊंगा अकेला, बीच में साथ कैसे हो जायेगा? अकेला होना मेरा स्वभाव है। जन्मा अकेला, मरूंगा अकेला, तो साथ होना धोखा है।
इस साथ होने का नाम संसार है। वह संसार आदमी की ईजाद है। वह तुमने-हमने बनाया है। वह हम-तुम ने मिल कर बनाया है। वह एक सपना है- साथ होने का सपना! पति है, पत्नी है, बेटा है, मां है, भाई है, मित्र हैं, सहधर्मी है, गुरूभाई हैं-हजार रास्ते है आदमी के। साथ हूं, अकेला नहीं हूं, जन्मे तुम अकेले थे, मरते वक्त अकेले हो जाओगे, बीच की दो घड़ी को तुमने साथ का संसार बसाया।
नहीं, साधु उसमें भरोसा नहीं करता। साधु कहता है, जैसा आया था, जैसा जाऊंगा, वैसा ही रहूंगा। अकेला हूं। अकेला होना मेरा स्वभाव है। अपने को साधूंगा। उस साधने से जो भी जीवन बन जायेगा, स्वीकार करूंगा। दूसरों की आंखों में न झांकूंगा। सम्मान और समादर मेरे लिये मूल्यवान नहीं है। क्योंकि मौत सब छीन लेगी।
तो समाज जिस चीज को मूल्य देता है, साधु मूल्य नहीं देता। साधु जिस चीज को मूल्य देता है, समाज की समझ के बाहर।
इतना अंतर है दोनों में। छोटा ही अंतर है ऐसे तो। एक अपनी तरफ चल पड़ा, दूसरा दूसरों की तरफ चल रहा है। चल दोनों रहे है, दिशा का जरा सा भेद है। जरा तुम भी करवट ले लो तो साधु की तरफ चल पड़ोगे।
परम पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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