





इस जगत में कुछ भी दृश्यमान है, श्रवण में आनेवाला है, सोचने-विचारने का विषय है- सब कुछ सर्वशक्तिमान का विधान है। यही नहीं सबको प्रभु ने कृपा करके अपनी ही संकल्प शक्ति से अपना स्वरूप भी प्रदान कर दिया है-सब कुछ प्रभुमय है, श्रद्धा और विश्वास के साथ ऐसा भाव अपनाकर सर्वत्र प्रभुदर्शन करते हुए जीवन-व्यापार को चलाना ही मानव-जीवन की सफलता और कल्याण का मार्ग है।
उनका अंश जीव अकेला आया, साथ में लाने के लिये कुछ नहीं मिला, जो कुछ पाया, प्रभु के रचित संसार से पाया, यहाँ की पायी वस्तु यहीं छोड़कर जाना है, इसको विचार से सोचना है। मल-विकार से निर्मित, मल-मूत्र विकार के साथ माता के गर्भ में वास, घृणित मार्ग से मल-मूत्र के साथ जन्म-कैसी दुर्गति और दुर्दशा? इसकी कल्पना मात्र ही रोमांचकारी है और हम मायावश तोता तथा बन्दर के समान बँधकर इसी जन्म का उत्सव मनाते हैं।
एक निरीह जीव को अस्थि-मांस के पिंजर में बँधा पाकर तथा देखकर अपने-आप को बड़भागी समझते हैं। प्रभु की मोहिनी माया शक्ति से यह सारी प्रक्रिया एक उल्लास, हर्ष और उत्सव का रूप बन जाती है, जिसमें भ्रमित जीव मार्ग भूलकर मकड़ी के जाले के समान अपने चारों ओर माया, मोह, अहं, प्रलोभन आदि के जाल बुन लेता है और उसी में सुखी-दुःखी होता रहता है और अन्ततोगत्वा एक दिन सारा बाजार यहीं छोड़कर चला जाता है। जाने की तैयारी तो उसने की नहीं। कौन-सी श्वास अन्तिम है-यह ज्ञात नहीं है, जब जाने का समय निकट आता है तब जिनके लिये सारा जीवन उत्सर्ग किया, वे ही काम नहीं आते।
व्यक्ति अपने शरीर-पिंजर की सीमा में बन्दी है। इस पिंजरे से मुक्त होने के केवल मनुष्य-जीवन ही प्रभु की अहेतु की कृपा वरदान है। अन्य जितनी भी योनियाँ है, कर्मफल भोग हेतु हैं, पर मानव कर्मफल भोगने के साथ-साथ सत्कर्म करके, प्रभुस्मरण-भजन करके अपना मरण सुधारने में समर्थ है।
यह मनुष्य शरीर प्रभु की उत्कृष्ट रचना है, अपनी इस अपूर्व कृति पर प्रभु को अवश्य ही गर्व के साथ स्नेह और अपेक्षाएं होंगी-ऐसा सांसारिक जीवन में हमारे साथ होता है, अपनी अच्छी वस्तु से प्रेम होता है, अपनी सन्तान से उसकी उन्नति, उत्थान की आशा होती है, अतः सर्वनियन्ता की सर्वोत्तम कृति मनुष्य पर विशेष स्नेह और कृपा स्वयंसिद्ध है।
सृष्टि की रचना में मनुष्य पर सर्वाधिक स्नेह का कारण है कि मानव को ही मरण सुधारने की शक्ति युक्त प्रभु ने कृपा करके प्रदान की है। अलौकिक विवेक शक्ति प्रदान करके हमें अपना मार्ग सोचकर नियत करने तथा करणीय और अकरणीय पर विचार करने की शक्ति प्रदान की है। हमें स्वयं अपना मार्ग निर्धारित करना है, मानव जन्म के अन्तिम सोपान से गिरकर प्रभु के भजन-चिन्तन से आवागमन के बन्धन से मुक्त होना है।
सप्ताह में सात दिन होते हैं। इन्हीं सात दिनों में किसी दिन हमारी जीवन लीला समाप्त होने वाली है, पर कब? किस दिन? एक क्षणपर भी हमारा अधिकार नहीं है। राजा परीक्षित जी को सात दिनों में जाना था, उन्होंने श्रीशुकदेव जी से सात दिनों तक भगवतामृत- कथा का पान किया। परिणाम रूप में तक्षक के आने के पूर्व ही वे प्रभु के धाम में पहुँच गये। पांच भौतिक स्थूल शरीर ही तक्षक की विषाग्नि से भस्म हुआ। मरण भगवान्नाम से ही सुधरता है। संसार में फँसा जीव अपना उद्वार केवल हरिनाम-स्मरण और कीर्तन से ही कर सकता है। भगवान् स्वयं कहते हैं- जो भक्त मेरे नामों का गान करते हैं, मुझे अपने समीप जानकर प्रभुभाव से तन्मय हो नृत्य करते है, मैं सत्य कहता हूँ कि मैं उनके द्वारा खरीद लिया गया हूँ। यह जनार्दन किसी अन्य के हाथों नहीं बिक सकता है- मैं अपने भक्तों के हाथ बिक जाता हूँ।
नामस्मरण अथवा भगवान्नाम कीर्तन से है। भक्त अपने आराध्य के प्रेम में विह्ल होकर, भजन-कीर्तन तथा गीतों के माध्यम से उनके नाम, गुण, धाम और लीला में हृदय की श्रद्धा, भक्ति एवं प्रेम सहित लीन होकर अपने भाव पुष्प अर्पित करके आनन्दित होता है। इस क्रम में भक्तों के चरित्र भी प्रेरणादायक होते हैं। स्वरसंगति-संगीत तथा विन्यास के साथ-साथ हृदयगत कोमल भावना, प्रेम, आह्लाद, विरह तथा कारूणिक प्रसंग संवेगों के साथ जब जुड़ जाते हैं और उन्हें आत्मसात् करके जब भजन-कीर्तन में हम लीन हो जाते हैं-फिर तो सत्य मानिये, उतने समय तक संसार से हम बहुत दूर हो जाते हैं। इसी उपलब्धि हेतु अनेक साधन-व्रत, तीर्थाटन आदि का विधान है। यह प्रभु की अहेतु की कृपा प्रत्यक्ष वरदान है।
अपनी संसार सृष्टि के सौन्दर्य विधान के लिये प्रभु ने अपनी शक्ति माया (उन्हें ही प्रभु की चिरसंगिनी लक्ष्मी भी कहते हैं) का सहारा लिया और विश्व में आकर्षण भर दिया।
इस प्रबल माया का वेग प्रभुशरण, भक्ति ही सँभाल सकती है। हमारे साथ सर्वत्र संसार छाया हुआ है, यहाँ शरीर-इन्द्रियों के साथ रहना है। संसार हमारा नहीं है, साथ कुछ नहीं आया। यहाँ आने पर संसार बोध हुआ। हम ईश्वर-अंश हैं। हमारा सजातीय नहीं है, वह हमारा सजातीय नहीं है। हमारा सजातीय तो सत्य, अंशी है, जिसको जानने और उसमें मिलने के लिये यह अन्तिम सोपान-मानवतन जो कि सुरदुर्लभ है, प्राप्त हुआ है। संसार में रहकर हमें विवेक (प्रभु का अलौकिक वरदान जो मानव को ही मिला है)-पूर्वक व्यवहार करना है और संसार के वास्तविक रूप को जानना है। सारी सृष्टि प्रभु की लीलास्थली है, जहाँ प्रत्येक वस्तु, पशु-पक्षी, प्रकृति की उत्पति का एक लक्ष्य है, जिसे पूर्ण कर लेने के उपरान्त पटाक्षेप होता है। हमारा और संसार का, सत्य और असत्य का संग क्षणिक-अस्थायी है। इस लीलास्थली-रंगमंच पर पात्र, अभिनेता, स्थान, वेशभूषा, समय-सब उस सूत्रधार द्वारा नियोजित है। यह सब एक निर्धारित निश्चित समय के लिये दिया गया है। कार्य सम्पन्न होने के पश्चात् जैसे एक अभिनेता रंगमच से हटता है और पटाक्षेप होता है, यही रूपक हमारे जीवन और संसार का है, अभिनेता को रंगमच, अभिनय आदि में कोई आसक्ति, वियोग या दुःख नहीं होता। कृत्रिम बनावट, साज-सज्जा, वस्त्र आदि वापस लौटाकार वह मूल रूप में आ जाता है, फिर घर जाकर विश्राम करता है।
दूसरा दृष्टान्त रेलगाड़ी या वायुयान द्वारा यात्रा का है। निश्चित समय पर यात्रा का प्रारंभ और उसकी समाप्ति होती है, छोड़ने का दुःख नहीं, बैठने में मोह-आसक्ति नहीं होती। हमें स्वयं को संयमित करके वास्तविकता को स्वीकार करना है। यह तभी संभव है, जब प्रभु में पूर्ण श्रद्धा-विश्वासपूर्वक प्रेम दृढ़ हो जाय। भक्ति ही सर्वोच्च मार्ग है। प्रभु प्राप्ति के लिये मूल्य अधिक चुकाना है, वह चिन्तामणिरत्न प्राप्त करना सहज नहीं है, पर असम्भव भी नहीं है।
जब से जन्म हुआ, जीव निरन्तर संसार की उपलब्धियों के लिये प्रयास में लग जाता है। प्रभु, गुरू, माता-पिता, फिर पाठशाला समाज आदि आते है। सर्वत्र श्रम, अनुशासन, अध्ययन, प्रतिस्पर्धा-अनेक प्रकार से व्यक्ति स्वयं को समाज में नियोजित करके सम्मानित पद के योग्य बनता है-यह सब संसार में स्वयं को सिद्ध करने के लिये होता है। अन्त में यही दृष्टिगत होता है और स्वयं अनुभव भी होता है कि सुख और शान्ति यहां नितान्त अभाव है। प्रायः जीवन की कठिनाइयों, चिन्ता, असन्तोष और संसारिकता में ही उलझा रहकर जीव सुखी-दुःखी होता रहता है-क्या यही सब कुछ है? या इससे भी आगे कोई मार्ग है जिससे मिथ्या आवरण हटे? वह परम पावन सत्य है- जो सर्वदा है, सर्वदा हमारे साथ रहता है। परमात्मा प्रभु के अतिरिक्त उनकी कृपा, नामस्मरण के समान सुखधाम संसार में कुछ भी नहीं है, इसके चमत्कार से दुःख दिखायी ही नहीं पड़ता।
नाम-स्मरण, नाम-संकीर्तन प्रभु की साक्षात् साकार शब्दोपासना है और उसकी भव्यता श्रद्धा-विश्वास और प्रेम की पराकाष्ठा में निहित है। भक्ति का प्यासा भक्त संसार में ही बार-बार जन्म लेकर प्रभु प्रेम, प्रभुस्मरण में, भक्ति के आनन्द सागर में अवगाहन करके जीवन मुक्त हो जाता है।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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