



हे सिद्धेश्वरी! हे ज्ञानमूर्तिं! हे निखिलेश्वरी!


अपनी ममतामयी आँचल के छत्र-छाया में सबको शीतलता प्रदान करने वाली, असंख्य त्याग, कष्टों और पीड़ाओं को हँसकर ग्रहण करने वाली, अश्रुओं को छिपाकर अपने कमनीय मनोहरी मुस्कानों से सबको सम्मोहित करने वाली हे माँ निखिलेश्वरी! हम आपके चरणकमलों में सस्नेह प्रणाम करते हैं।
विद्या रुपं मुक्ति स्वरुपम्
मुक्तेश्वरी त्वम् कल्पेश्वरी त्वम्
खण्डितज्ञानम् अहम्निवारिणि
निखिलेश्वरानंदम् कंठेविहारिणि ।।
एक भारतीय नारी अपने अंदर विविध स्वरुपों को समाहित की हुई होती है, तभी तो वह कभी बेटी बनकर अपने माता-पिता की सेवा करती नजर आती है, तो कभी बहन के रुप में भाई से मान-मनुहार करती है, तो कभी प्रेमिका के रुप में अपने प्रेमी के प्रति सम्पूर्ण रुप से समर्पित हो उसकी प्राणों की धड़कन बन बैठती है और जब वह पत्नी बनती है, तो अपने पति के प्रति पूर्ण निष्ठावान बन कर अपना पूरा जीवन उसके चरणों में अर्पित कर देती है। “यह मेरा है” जैसा उसके पास कुछ नहीं होता, यदि वह सुख-सौभाग्य की कामना करती है, तो वह भी अपने पति के लिये ही। भारतीय नारी का एक रुप, जिसके आगे पूरा विश्व वन्दनीय होकर नमित होता है, वह है — ‘माता का स्वरुप’। इस स्वरुप के कारण ही तो ‘भारत’ को भी “भारत माता” शब्द से संबोधित किया जाता है। बड़े से बड़े ऋषि भी वन्दना करते हुए कहते हैं —
या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
त्याग और सेवा की भावना में, वह अन्यतम थी। शादी के कुछ ही समय बाद, जबकि वह नववधू थीं, आँखों में लाज और अधरों में मधुरिमा थी, हाथों में मेंहदी और मन में पति के साथ रहने की ललक थी, ऐसे समय में इस महिला ने पति उन्नति की बलिवेदी पर स्वयं को न्यौछावर कर दिया, अपनी सारी खुशियां लंबी प्रतिक्षा की झोली में डाल दी और जीवन के कीमती वर्ष उदासी और कठिनाइयों में दान कर दिये।
स्वयं पूज्यपाद सद्गुरुदेव ने माता जी के बारे में एक प्रवचन में कहा था — “संन्यासवत जीवन जीने के लिये मुझे कहते हुए झिझक हो रहा था, और जब उनको ज्ञात हुआ, तो उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी। स्वीकृति ही नहीं दी, साथ ही कहा भी — ‘जीवन बिता देना अपने आप में कोई विशिष्टता नहीं, विशिष्टता तो इस बात में है, कि जीवन इस प्रकार से जिया जाय कि वह इतिहास बन जाये, जीवन में कुछ ऐसे कार्य हों, जिससे मानव जाति का सही अर्थों में कल्याण हो सके, मृत्यु ऐसी हो कि लाखों-करोड़ों की आँखें छलछला जायें।’”
उस समय कहे हुए उनके ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं। यह मेरी पत्नी ही नहीं पथ-प्रदर्शिका भी है, आज जो कुछ भी मेरा निर्माण हुआ है, वह इनकी सेवा और त्याग की पृष्ठभूमि पर आधारित है, इसलिये मैं जीवन भर इनका ऋणी हूँ।
इस निर्णय के बाद माताजी ने केवल वियोग-पीड़ा ही नहीं अपितु जरूरत से ज्यादा कष्ट एवं परेशानियों का सामना किया। स्वसुर का स्वभाव अत्यंत उग्र था और क्रोधावेश में तो वे पूरे दुर्वासा बन जाते थे, परंतु उनके क्रोध के वेग को भी शांति के साथ सहन किया और इसके साथ ही परेशानियों, समस्याओं एवं कष्टों का लंबा सिलसिला चला, पर उन्होंने कभी उफ् तक नहीं किया।
सास-स्वसुर के साथ गांव में रहने के कारण उनकी सेवा को ही जीवन का धर्म बना लिया था। कठोर ग्राम्य जीवन, श्वसुर की क्रोधातिरेकता और लम्बे वियोग ने शरीर को तोड़ दिया, यद्यपि ये बाधायें मन को न तोड़ सकीं, पर शरीर को कमजोर और शिथिल बना दिया।
जंगल से गायों के लिये घास का गट्ठर सिर पर उठा कर लाना, जलाने के लिये लकड़ियां ढोना, दूर-दूर स्थान से पानी लाना, चक्की चलाना और घर के छोटे से बड़े सभी कार्यों को अपने हाथों से ही करना, भोजन पकाना आदि — प्रातः चार बजे से रात्रि ग्यारह बजे तक निरन्तर शारीरिक श्रम थका देता था। लेकिन फिर भी हमेशा चेहरे पर मुस्कुराहट बनी रहती, आँखों में सुखद स्वप्न तैरता रहता… “एक दिन ‘वे’ अवश्य आयेंगे और मेरे जीवन में खुशियां लौट आयेंगी।”
उन दिनों को याद कर माता जी अक्सर विचलित हो जाती थीं और उनकी आँखें भीग जाती थीं, पर उनके मन में किसी के प्रति कोई कटुता नहीं था। पता नहीं इस विदुषी महिला ने कितना हलाहल अपने कंठ से नीचे उतारा था, फिर भी इनकी जीभ से अमृत बरसता था, जो सभी को अपनी मधुरता से आप्लावित करता रहता है।
अंग्रेजी में कहावत है — “मां संस्कारित होती है तो पूरा घर और आने वाली पीढ़ियां भी संस्कारित हो जाती हैं।” माताजी के व्यक्तित्व का, उनकी सरलता का, उनकी मधुरता का, उनकी पवित्रता और धार्मिकता का प्रभाव प्रत्येक शिष्य पर है, सम्पूर्ण घर पर है, घर के एक-एक अणु पर है।
न जाने कितने ही अनाथ बच्चे माता जी की सहायता से पलते हैं, कितने ही बच्चों की फीस माता जी की तरफ से जमा होती होगी, कितने ही रोगियों के फल, दूध आदि माताजी की तरफ से पहुँचता है। इतना सब करने के पश्चात जब भी कोई प्रसंग छिड़ता है, तो एक ही वाक्य में उत्तर मिलता है — “सब रामजी करते हैं, मैं कौन होती हूँ करने वाली।” वस्तुतः माताजी मातृ-शक्ति स्वरुपा हैं।
या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता।
एक बार बातचीत के प्रसंग में सद्गुरुदेव ने आश्रम के शिष्यों से कहा — “प्राणमय कोष को जागृत करने के लिये अन्नमय कोष का कम-से-कम सहारा लेना चाहिये, अतः भोजन कम करना चाहिये। ज्यादा भोजन से आलस्य और अकर्मन्यता आती है। भोजन तो केवल शरीर को चलायमान रखने का साधन मात्र है, भोजन में स्वाद लेना लक्ष्य की तरफ से हटना है।”
अगले दिन से ही आश्रम के सभी शिष्यों ने भोजन की मात्रा कम कर दी। उस दिन तो चल गया, पर दूसरे ही दिन माँ ताड़ गईं। बोलीं — “क्या बात है? भोजन में कमी कैसे हो रही है?”
एक शिष्य बोला — “हम सब गुरुजी के उपदेशों पर चल रहे हैं। गुरुजी ने कहा, भोजन की मात्रा जितनी कम हो, उतना ही ठीक रहेगा।”
थोड़ी देर बाद जब गुरुजी उधर से निकले, माता जी बोलीं — “यह आप बच्चों को उल्टा-सीधा क्या पढ़ाने लग गये हैं? मार डालेंगे क्या उन्हें?” … और कहते-कहते दो-दो रोटियां सबकी थाली में और डाल दीं। जब तक सबने खा न लिया तब तक हटी नहीं। बोलीं — “ये तो आधे साधु हैं और आधे गृहस्थ… पर तुम तो पूरे गृहस्थ हो… गृहस्थों की तो उपासना ही खाना और ठूंस-ठूंस कर खाना ही है…” कहते-कहते खिलखिलाकर हँस पड़ीं — कितनी मोहक, मधुर, शांत और पवित्र हँसी है माँ की।
एक दिन दोपहर तीन बजे तक माताजी अपने कार्यों से निवृत्त हुईं। आश्रम में नित्य नियमानुसार चार बजे चाय बनी, पर माताजी कमरे में सो रही थीं। माताजी का शयन — और दिन में? कुछ अटपटा सा लगा। देखा तो बुखार था। सिर भट्ठी की तरह जल रहा था, आँखें लाल हो गई थीं। थर्मामीटर से देखा, तो बुखार एक सौ तीन से भी ऊपर था।
— “कब से बुखार है?”
— “कल रात से ही है…” (माताजी ने संक्षिप्त उत्तर दिया)
— “तो आपने बताया नहीं और दिन में भी कार्य करती रही आप?”
— “बताती तो तुम बच्चे लोग चिन्ता करते, मेरी वजह से तुम्हें कष्ट, परेशानी या चिन्ता हो — क्या ऐसा उचित होता?”
बुखार होने पर भी उठीं, सबके साथ उन्होंने चाय ली। दर्द को मन ही मन छुपाये रखना और सहन करना — कोई माताजी से सीखे।
महीने में लगभग बीस दिनों तक तो उनके व्रत, उपवास आदि चलते रहते हैं। एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, प्रदोष आदि कई व्रत के दिन — कुछ भी नहीं खातीं… निराहार रहती हैं।
एक दिन एक साधिका ने पूछा — “माताजी! इतने अधिक व्रत रखने से क्या फायदा, भूखे रहने से क्या लाभ?”
माताजी द्वारा दिया उत्तर भारत देश की भारतेश्वरी ही दे सकती थी। माता जी ने बहुत सहज होकर एक वाक्य में उत्तर दिया — “इसलिये कि तुम्हें भरपेट भोजन मिलता रहे, आनन्द-उमंग में क्षण व्यतीत हो सकें।” छोटी सी बात, पर कितनी गहरी, कितनी सारगर्भित।
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