





जीवन का तात्पर्य यह नहीं है, कि हमे जीवित रहना ही तो हमारी मजबूरी है, मृत्यु हमारे पास नहीं, इसलिये हम जीवित है। यह अपने आप में कोई श्रेष्ठतम क्रिया नहीं है, श्रेष्ठतम कार्य तो है, कि हम दरिद्रता को, गरीबी को, दीनता को, हजारों मील दूर धकेल दें, जिससे कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के पास दरिद्रता आ ही नहीं पाये।
केवल दरिद्रता मिटाने से ही जीवन नहीं संवर जाता। दरिद्रता मिटाने के बाद हम सम्पन्न बनें,
धन से पूर्णता नहीं आ सकती, उस के साथ यश हो, ऐसा यश हो कि समाज के लोग हमें देखने के लिये तरसें। धन से सम्मान नहीं मिल पाता, वह तो बिल्कुल अलग चीज है, समाज में हमारा प्रभुत्व हो, श्रेष्ठता हो….. और यह तभी हो सकता है जब व्यक्ति में कोई विशेषता हो, कोई अद्वितीयता हो।
ऋषियों याज्ञवल्क्य और विश्वामित्र ने मिलकर जिस साधना का निर्माण किया, उसका नाम उन्होंने ‘अक्षय पात्र साधना’ रखा अर्थात् इस साधना के माध्यम से अक्षयता प्राप्त हो, कि कोई कमी रहे ही नहीं, न्यूनता नहीं रहे, क्षय नहीं रहे। इसलिये इस साधना के महत्व को स्पष्ट किया, ताकि दरिद्रता को हम हजारों मील दूर धकेल सकें और सम्पन्नता एवं लक्ष्मी हमारे गले में वरमाला पहनाने को आतुर हो, मगर साथ ही साथ हम अद्वितीय यश और सम्मान के सहभागी भी बनें।
और यह तभी हो सकता है, जब स्वास्थ्य हो, जब व्यक्ति पूर्णतः स्वस्थ हो और यही जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।
जीवन को ‘पात्र’ भी कहते है। ‘पात्र’ का अर्थ कोई थाली, लोटा नहीं, यह शरीर ही अपने आप में एक पात्र है, यह अपने आप में अक्षय बने, इसको, ‘अक्षय पात्र साधना’ कहते हैं। इस पात्र में से कुछ क्षय नहीं हो और जब ऐसा क्षय नहीं है, तो वह अक्षय है। इसलिये जीवन को पूर्ण बनाने की क्रिया है यह।
साधना के दौरान शरीर के प्रतीक के रूप में मोती शंख सामने रखते हैं, यह अक्षय पात्र का सूचक है।
अगर उच्चकोटि का योगी है, तो वह शरीर को ही पात्र बनाकर अक्षय साधना कर लेगा। उसके लिये कोई जरूरत नहीं प्रतीकों की, लेकिन अगर उस स्टेज तक नहीं पहुँचे तो फिर प्रतीक की आवश्यकता है, इसलिये इस पात्र का उपयोग किया जाता है, जिसे मोती शंख कहा जाता है।
इस साधना को किसी भी गुरूवार के दिन अथवा कृतिका नक्षत्र के दिन से प्रारम्भ कर सकते है। यह 11 दिन की साधना है, जिसे मध्याह या मध्य रात्रि में ही सम्पन्न करना चाहिये।
श्री गणेश पूजन समस्त विघ्नों के नाश एवं सफलता हेतु भगवान गणपति का पूजन करें-
ऊँ गं गणपतये नमः
गणपतिम् आवाहयामि नमः।
स्थापयामि पूजयामि नमः।
स्नानं समर्पयामि नमः।
गन्धं समर्पयामि नमः।
पुष्पं समर्पयामि नमः।
धूपं दीपं च दर्शयामि नमः।
नैवेद्यं निवेदयामि नमः।
दोनों हाथ जोड़े तथा सम्पूर्ण मंगल के लिये प्रार्थना करें-
गजाननं भूत गणधिसेवितं
कपित्य जम्बू फलं चारू भक्षणम्।
उमा सुतं शोक विनाश कारकं,
नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।
श्री गुरू पूजन
फिर श्रद्धायुक्त हो, हाथ जोड़कर गुरू पूजन करें-
अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्,
तत्पदं दर्शितं येन तस्मैं श्री गुरवे नमः।
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकया,
चक्षुरून्मीलितं येन तस्मैं श्री, गुरवे नमः।।
गुरूः साक्षात् परब्रह्म तस्मैं श्री गुरवे नमः।।
ऊँ श्री गुरवे नमः आवाहयामि स्थापयामि
पूजयामि नमः
संकल्प
फिर दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें, कि मैं (अमुक नाम, अमुख गोत्र) इस साधना को इस उद्देश्य (अपना प्रयोजन बोलें) से कर रहा हूं। मेरी मनोकामना पूर्ण हो और जल जमीन पर छोड़ दें।
फिर मोती शंख, अक्षय यंत्र एवं विद्युत माला का पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा दुर्वा (दूब) से करें। शंख को जल से स्नान कराएं, फिर कुंकुंम से उस पर 21 बिंदिया लगाकर यंत्र पर स्थापित करें। फिर विद्युत माला से निम्न मंत्र का 21 माला जप करें-
मंत्रः
।। ऊँ श्रौं क्रौं रौं अक्षय पात्र सिद्धिं हृीं श्रीं ऐं ऊँ नमः।।
।। Om Shraum Kraum Raum Akshaya Patra Siddhim
Hreem Shreem Ayem Om Namah ।।
इसमें ध्यान रखना है, कि बीजों के उच्चारण में ‘म’ की जगह ‘ग’ की ध्वनि आयेगी, यानि ‘ऐं’ का उच्चारण होगा ‘एंग’। विद्युत माला से इस मंत्र का जप करना चाहिये और कम से कम 21 माला जप करें, फिर दोबारा से गुरू पूजन करें, 1 माला गुरू मंत्र जप करें, ताकि जो आपने मंत्र जप किया है उसकी पूर्ण सिद्धि आपको मिल जाये, चाहे आपसे कोई त्रुटि हो गई हो, मगर फिर भी वह पूर्णता के साथ आपके जीवन में उतर जाये………
फिर नित्य 11 दिनों तक 1 माला मंत्र जप करें और हर बार मंत्र बोलकर एक अक्षत मोती शंख में डालें, तो नित्य 108 अक्षत उस मोती शंख में जायेंगे। फिर 11वें दिन अक्षत में भरे मोती शंख को लाल वस्त्र में इस तरह से बांधे कि उसमें से कोई दाना न गिरे। फिर उसे अपनी तिजोरी में या व्यापार स्थली पर, या पूजा स्थान में रख दें। पर उचित होगा कि यह तिजोरी या रूपये पैसे के साथ ही रहे, ताकि अक्षयता प्राप्त हो सकें।
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