





हमारे इष्ट, हमारे परमेश्वर, हमें निरंतर चैतन्यता, मार्गदर्शन और निरंतर जीवन में सफलता और श्रेष्ठता प्रदान करने वाले “सद्गुरुदेवनिखिलेश्वरानंदजी”केअवतरणपर्वपर, उनके निखिलमय स्वरुप के शिष्य और साधकों को कोटि-कोटि शुभ मंगलमय आशीर्वाद प्रदान करता हूँ और शुभ-मंगलमयता के साथ निरंतर उनका चिन्तन बना रहे और उस चिन्तन-भाव से हम चैतन्य बनें रहें, चरैवेति-चरैवेति स्वरुप में अर्थात् निरंतर-निरंतर गतिशील स्वरुप में हम क्रियात्मक भाव से, कर्म शक्ति के भाव से सक्रिय बनें रहें और निरंतर उनकी स्तुति से, उनके मंत्र-जाप से, उनके स्मरण से, उनके भावों को देव स्वरुप में दर्शन करने से निश्चिन्त रुप से जीवन में स्थितियों की प्राप्ति होती है चाहे हम किसी भी देवी-देवता का स्मरण करें, अपने कुल देवता का स्मरण करें, अपने सद्गुरु का ध्यान -चिन्तन करें तो अवश्य ही जो भी हमारे जीवन की अभिलाषाएं, इच्छाएं हैं वे निरंतर-निरंतर शिष्य और सद्गुरु के योगमय भाव से, उनके जुड़ावमय भाव से हमें सिद्धियों की, पूर्णता की प्राप्ति होती है क्योंकि उस समय हम एकाकी नहीं रह पाते, अकेले नहीं हो पाते। हमारा एक इष्ट से, परमेश्वर से आत्मिक संबंध बन जाता है और संबंध का तात्पर्य यह कि समाजगत रुप से भाव-चिन्तन करने वाले कि मेरा भी भाव-चिन्तन अपने इष्ट के प्रति, गुरु के प्रति सकाम भाव से है और गुरु का भी चिन्तन अपने शिष्य के प्रति उस सकाम भाव की पूर्ति का सम्मिलन है। अर्थात् हम एक दूसरे में जुड़ जाते हैं, एकाकार हो जाते हैं या बंध जाते हैं और सही अर्थों में यही स्थायी संबंध कहलाता है। और वह संबंध अनेक-अनेक जन्मों तक, अनेक-अनेक समय तक, अनेक-अनेक युगों तक बराबर बना रहता है बाकि तो जो भी हमारे जीवन में संबंध होते हैं वे तो पति का पत्नी से संबंध हो या संतान से संबंध हो या परिवार का संबंध हो। यह संबंध तो हमारे बड़े-बुजुर्गों द्वारा, हमारे सगे संबंधियों द्वारा, हमारे माता-पिता द्वारा एक जुड़ाव के लिये क्रिया की गई है। उन्होनें तो हमें जोड़ने का कार्य किया अब वह संबंध हमारा किस तरीके से, सात्विक रुप से निरंतर क्रियाशिल रहता है या उग्र रुप से या तामसिक रुप से या फारवर्ड-फारवर्ड रुप से क्रियाशिल रहता है। वह तो हमारे स्वंय के चिन्तन-भाव से होता है क्योंकि वह जुड़ाव हमारे माता-पिता को हमारे साथ में जोड़नें की क्रिया है। हम अपने पत्नी से, बच्चों से, परिवार के सदस्यों से कितना जुड़ पाये व हमारे भीतर में कैसे भाव उत्पन्न हो रहे हैं, उसके माध्यम से हम निरंतर-निरंतर उन भावों के अनुरुप अपने पारिवारिक सदस्यों से जुड़ाव वाली स्थितियाँ बना के रखते हैं परन्तु हमारे इष्ट से, हमारे परमात्मा से, हमारे देवी-देवता से, हमारे सद्गुरु से जो एक जुड़ाव होता है वह आत्मीय रुप से होता है, मानसिक रुप से होता है, शारीरिक रुप से जुड़ाव नहीं होता है आत्मिक रुप से अर्थात् मेरे भीतर में सुश्रेष्ठमय चिन्तन-भाव रहे, निरंतर एक शुद्ध और सात्विक भाव-चिन्तन रहे जिससे की मैं निरंतर अपने इष्ट से, परमेश्वर से, परमात्मा को बराबर मन्दिरमय बना सकूँ, मानसिक रुप से मेरा जुड़ाव बना रहे, कहीं भी मानस-चिन्तन में कोई भी सुखदपूर्ण स्थिति आए तो मैं उसका विस्तार कर सकूँ। यह मानसिक रुप से जुड़ाव है और यदि पति-पत्नी के बीच कोई विपदा, परेशानी, व्यथा, कष्ट या पीड़ा हो तो उसका निवारण किस तरह से करुँ, वह एक तरह से इष्ट से मानसिक रुप से, आत्मिक रुप से जुड़ाव कहलाता है। वह जुड़ाव हमारे इस जीवन के समाप्ति के बाद भी बराबर बना रहता है, मृत्यु के बाद भी हमारा जुड़ाव अन्तस रुप से आत्मिक रुप से क्योंकि आत्मा का जुड़ाव हुआ है, मन का जुडाव हुआ है। अपने भीतर के मन को हम नहीं देख सकते। आत्मा हमें दिखाई देती नहीं है। मानस-चिन्तन में विचार भले ही आते हैं। हमें विचार तो वेग की गति से आते हैं, वायु की गति से आते हैं और निरंतर चौबीसों घण्टे आते ही रहते हैं परन्तु वे विचार किस तरह से हमें सुश्रेष्ठता की ओर अग्रसर करते हैं, ऐसा ही जुड़ाव निरंतर क्षण-प्रतिक्षण हमारे इष्ट से, हमारे परमेश्वर से, हमारे सद्गुरु से बना रहे, आज इस 21 अप्रैल के महापर्व पर, इस अवतरण पर्व पर, इस जन्मोत्सव पर्व पर अर्थात् निरंतर उनका स्मरण करते हुए प्रत्येक क्षण मेरा उत्सवमय व्यतीत हो, आनन्दमय व्यतीत हो क्योंकि जैसे-जैसे हमारा अपने इष्ट से जुड़ाव होता है तो जन्मोत्सव रुप में हम उन्हें प्रेम-भाव से उनका स्मरण करते हैं तो प्रत्येक क्षण हमारा बहुत ही सुश्रेष्ठमय बन पाता है। और जैसा कि मैंने बताया कि परिवार से हमारा जुड़ाव उत्सवमय नहीं होता है। वह तो एक तरह से हमारे बन्धन का भाव है और वह बंधन हमें भौतिक रुप से बराबर क्रियाशील रखे रहती है, सांसारिक रुप से हमें बराबर क्रियाशील रखना होता है और सांसारिकता में, भौतिकता में हम सुश्रेष्ठमय चेतना से युक्त हों। हमारे इष्ट से, सद्गुरु से वह जुड़ाव निरंतर-निरंतर आप के भी जीवन में अलौकिक स्वरुप से बना रहे। ऐसा ही एक बार फिर पुनः कोटि-कोटि स्वरुप में आपको हृदय भाव से, इस सिद्धाश्रम साधक परिवार की ओर से शुभ-मंगलमय आशीर्वाद प्रदान करता हूँ कि उनकी चेतना, उनकी क्रियाशिलता, उनकी आभा प्रत्येक स्वरुप में, आप जिस स्वरुप में उन्हें स्मरण करें। वे आपके सामने निश्चित रुप से, आत्मिक भाव से आ सकें।
इसीलिए कहते हैं कि अपने इष्ट से जुड़ाव की क्रिया करने से जो भी हमारे मन के भीतर में कामनाएं होती हैं, इच्छाएं होती हैं, उन कामनाओं की पूर्ति हो जाती है तो वह कामना सिद्धि कहलाती है। अर्थात् मेरा अपने इष्ट से, अपने सद्गुरु से कैसा जुड़ाव है वह हमारी कामना स्थिति का भाव-चिन्तन होता है। और जो भी हमारे कार्य में विघ्न, बाधाएं आती हैं, उन विघ्नों का हरण हो जाता है अर्थात् दुर्भाग्य वाली स्थितियाँ समाप्त हो जाती हैं जिसके कारण दुर्गतिनाशाय स्वरुप में सौभाग्य की स्थिति की प्राप्ति होती है। सिद्धि का तात्पर्य ये नहीं है कि मुझे बगलामुखी को सिद्ध करना है, या धूमावती को सिद्ध करना है या हनुमान को सिद्ध करना है। वह सिद्धि का भाव-चिन्तन नहीं है। सद्गुरु का स्मरण करने से कामना की सिद्धि के साथ-साथ सौभाग्यता की सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। अर्थात् मेरे जीवन का सुसौभाग्य के स्वरुप में आगे की ओर वृद्धि हो और सौभाग्य की, सिद्धि की, चेतना की प्राप्ति स्मरण करने से, चिन्तन करने से, कर्म भाव के साथ अपने जीवन के जो भी कार्य हैं, जो भी पारिवारिक जिम्मेंदारियाँ हैं, उन सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के साथ-साथ, मैं निरंतर उनका स्मरण करता हूँ तो निश्चित रुप से मनोकामना की, सौभाग्य सिद्धि की प्राप्ति होती है और साथ ही साथ जीवन में जो भी दुर्गती वाली स्थितियाँ आती हैं आर्थात् जो भी संताप-दोष, रोग, कष्ट, पीड़ा, अनेक तरह की विलक्षण स्थितियां होती हैं, उन विलक्षणताओं से भी……. क्योंकि आपको एक चिन्तन-भाव रखना है कि अगर ये परेशानियाँ हैं तो इन परेशानियों का निवारण भी मेरे इष्ट, मेरे सद्गुरु के पास निश्चित ही है और वे मुझे सद्मार्ग प्रदान करेंगे।
इससे सद्मार्ग की सिद्धि की प्राप्ति होती है। अर्थात् उन बाधाओं से, उन अनर्गल क्रियाओं से, अनर्गल तरह के जो भी शत्रु भाव हैं, उनसे किस तरह से निकला जाय, वह हमें मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उस सुदर्शन स्वरुप में, मार्गदर्शन स्वरुप में भी हमें सिद्धि की प्राप्ति होती है। सिद्धियों के भी कई स्वरुप हैं ठीक उसी तरह से हम भक्त के रुप में, शिष्य के रुप में उनका स्मरण करते हैं तो निरंतर जितना अधिक हम गुरु-गीता, निखिल स्तवन के माध्यम से, गुरु मंत्र के माध्यम से उनका स्मरण करते हैं तो वह भक्ति की सिद्धि होती है और भक्ति की सिद्धि के साथ-साथ हम जितना एकाकार स्वरुप में सामुज्यता की प्राप्ति करते हैं तो परमात्मा की सिद्धि अर्थात् गुरुत्व की सिद्धि प्राप्त होती है, सद्गुरु सिद्धि की प्राप्ति होती है। निरंतर चिंतन-भाव जा रहा है तो वह मुझे एक परमात्मा स्वरुप में, देव स्वरुप में, ईश्वर स्वरुप में, सद्गुरु स्वरुप में, मुझे सिद्धि की प्राप्ति होती है। अनेक-अनेक स्वरुपों में केवल और केवल अपने इष्ट का स्मरण करने से, चिन्तन करने से इस तरह की सुस्थितियों के स्वरुप में सिद्धियों की प्राप्ति होती है और साथ ही साथ मुझे, विशेष रुप से संसार में कोई ‘राग’ नहीं रहे। ‘राग’ का मतलब द्वेष भावना, ईर्ष्या, वैमनस्यता, शत्रुता, वह राग-द्वेष की स्थितियाँ हैं। ये रागमय स्थितियाँ नहीं रहें, मेरे जीवन में शत्रुओं की वृद्धि नहीं हो, कलुषित भावनाओं का विस्तार नहीं हो, ईर्ष्या या द्वेष की भावनाओं का विस्तार नहीं हो। क्योंकि मेरा चिन्तन फिर ईर्ष्या-भाव की ओर, द्वेष भाव की ओर, कलुषितता की भाव की ओर जायेगा जिससे मैं अपने इष्ट का स्मरण नहीं कर पाऊँगा तो उससे भी वैराग्यता की सिद्धि की प्राप्ति होती है अर्थात् मैं उनसे निवृत्त हो जाता हूँ। इस तरह से सद्गुरु का स्मरण करने से जो भी रागमय स्थितियाँ हैं उससे हमें निवृत्ति की प्राप्ति होती है अर्थात् ये नहीं कि घर-परिवार-संसार को छोड़ना है बल्कि इस तरह की कलुषित भावनाओं का निराकरण करना है। वह इष्ट के स्वरुप में ईश्वर का स्मरण करने से, निखिल का स्मरण करने से वैराग्यता की सिद्धि की प्राप्ति होती है। और साथ में जो भी शुभकामनाओं की प्राप्ति हो जाय। कामनाएं तो सभी लोग शुभ-शुभ करते हैं। मुझे आरोग्यता की प्राप्ति रहे, शतायु जीवन की प्राप्ति रहे, परिवार में निरंतर सुस्थितियों की वृद्धि हो, संतान सुख की वृद्धि हो, सौभाग्यता की वृद्धि हो। तो ये शुभकामना ही तो हम निरंतर करते रहते हैं। उन शुभकामानों की सिद्धि का भाव-चिन्तन भी करते रहना चाहिए कि किस तरह से निखिल का, सद्गुरु का स्मरण करने से, उनका चिन्तन-भाव करने से, शुभकामनाओं की सिद्धि की हमें प्राप्ति होती है।
और उसके साथ जो भी, जैसा कि मैंनें बताया कि भाग्य में नहीं लिखा हुआ है; मेरे भाग्य में सामान्य रुप से ही केवल जीवन का निर्वाह करना है। मैं जो कामनाएं इच्छाएं कर रहा हूँ कि उस भौतिक स्वरुप में, गृहस्थ स्वरुप में, सांसारिक स्वरुप में सुश्रेष्ठताओं की प्राप्ति हो और वे कामनाएं, इच्छाएं भी परिपूर्ण नहीं हो रही हैं तो निश्चित रुप से निखिल का, सद्गुरु का स्मरण करने से जो भाग्य में नहीं है, उस भाग्य में सौभाग्य की प्राप्ति अवश्य ही होती है।
इसीलिए निरंतर एक ही इष्ट को धारण करने से, एक ही गुरु को धारण करने ही इस तरह अनेक-अनेक स्वरुपों में हमें सिद्धियों की प्राप्ति होती है। अधिकांश साधना में प्रविष्ट शिष्य या साधक ठीक से जुड़ाव नहीं कर पाते हैं। जब एक से एक जुड़ाव वाली प्रक्रिया नहीं हो पाती है, एकाकार की क्रिया नहीं हो पाती है तो हमारा जीवन अनेक-अनेक स्वरूपों में विभक्त सा हो जाता है, टुकड़ों-टुकड़ों में बँट सा जाता है। कि निखिल का, हनुमान का, महामाया का स्मरण करने से हमें कुछ प्राप्त नहीं हुआ। उनको छोड़ के मैं शिव का स्मरण करुँ, शिव का स्मरण छोड़ के मैं विष्णु का स्मरण करुँ, विष्णु को छोड़के मैं गणपति का स्मरण करुँ। स्वरुप वही है पर हमारा मानस-चिन्तन एकाकार स्वरुप में नहीं रह पाता, एक भाव-चिन्तन तक नहीं रह पाता है। हमारे मन में चौबीस घण्टों में अनेक-अनेक विचार जागते हैं और समाप्त भी हो जाते हैं और वे जागते हैं फिर समाप्त क्यों हो जाते हैं…? क्योंकि हमारा एकाकार स्वरुप में किसी एक गुरु से जुड़ाव नहीं रह पाता है। घर-परिवार में भी हम पति से, पत्नी से, संतान से सही ढ़ंग से जुड़ाव वाली स्थितियाँ नहीं रखते हैं। जब तक सुखमय स्थितियों की प्राप्ति हो रही है, पति से या पत्नी से। तब तक हमारा सही रुप से जुड़ाव बना रहता है। संतान से सुखमय स्थितियों की प्राप्ति हो रही है तो हमारा उससे एक मेल-जोल बना रहता है और ज्यों ही विलेन (Villain) वाली स्थितियाँ आती हैं अर्थात् राग वाली, द्वेष वाली, रोग वाली स्थितियाँ आती हैं तो धीरे-धीरे हमारा मन उनसे कुचक सा जाता है। वैसा ही जीवन में होता है ज्योंहि कोई कष्ट या बाधा आता है तो हम चिन्तन करते हैं कि हे सद्गुरुदेव! मैनें तो ऐसा कुछ कर्म किया ही नहीं था। मेरे साथ ऐसा क्यों घटित हो गया? मेरा इतना क्यों नुकसान हो गया? क्यों इतनी हानि हो गई? क्यों इतना जटीलमय रोग से ग्रसित हो गया? क्यों मेरा व्यापार में इतना बड़ा घाटा हो गया? हम उस समय केवल सही चिन्तन भाव करते हैं कि मैंने तो इतना सद्गुरु की भक्ति किया, इतना सद्गुरु के सानिध्य में रहा और फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?
क्योंकि हम उनका केवल साकारात्मक भाव में चिन्तन करते हैं कि अच्छी-अच्छी चीजें हमारे जीवन में होती रहें और हम कर्महीन बने रहें। हम कर्म नहीं करें और हमें सब कुछ स्वभाविक, सुकर्म स्वरुप में सुस्थितियों की प्राप्ति हो। इस कारण से हमारा कभी-कभी अपने इष्ट से, अपने सद्गुरु से, अपने ईश्वर से, अपने देवी-देवता से ऊर्ध्व वाला भाव-चिन्तन हो जाता है; उनसे एक विलखता वाला भाव-चिन्तन आ जाता है। ज्यों-ज्यों विलखता का भाव आता है त्यों-त्यों हम और अधिक दुःखी, व्यथित और परेशान से हो जाते हैं और उसके फलस्वरुप हम अपने जीवन में अनेक-अनेक स्वरुपों में अनर्गल, पापमय क्रियाएं करते हैं। इसीलिए तो कहते हैं ना कि ज्यों ही मनुष्य 60-70 वर्ष का होता है तो वे वचन के माध्यम से, चिन्तन में माध्यम से, कार्य के माध्यम से अनेक-अनेक तरह की अनर्गल क्रियाएं करते हैं, पाप की क्रियाएं करते हैं और हमें एहसास भी होता है कि मुझे अपने कुकर्मों का या अनर्गल पापों के ही उचित परिणाम की प्राप्ति हो रही है और उस परिणाम को समाप्त करने के लिये ही यह मंत्र जाप है। पाप तो अनगिनत स्वरुप में कर रहे हैं, पापों का कोई हिसाब-किताब ही नहीं। जीवन के 60-62 की उम्र में हम अनेक-अनेक स्वरुपों में अनर्गल क्रियाएं कर चुके होते हैं।
यदि उसका निस्तारण करना है, निवारण करना है तो हमें ईश्वर की उपासना, अपने सद्गुरु, अपने इष्ट की अराधना करनी ही पड़ेगी। अगर मंगल दोष है तो किस तरह हनुमान की उपासना करनी है। अगर रिद्धि-सिद्धि शुभ-लाभ का भाव-चिन्तन है तो केवल बारह शुक्ल-पक्षीय कृष्ण-पक्षीय चतुर्थी पर ही मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करनी है।
कैसे होगा गुरुजी….?
इस समय तो मैं यहाँ रहूँगा, वहाँ रहूँगा। इस तरह से हम पापों के नाश के लिए गिन-गिन कर ही केवल मंत्र-जाप करते हैं। इसी कारण हमारे जीवन में पापों का निरंतर विस्तार होता रहता है। उन पापों के क्षय के लिए ही…. पाप हो जाते हैं, कुबुद्धि के फलस्वरुप, अनर्गल क्रियाओं के फलस्वरुप, स्व-बुद्धि का उपयोग नहीं करने के फल स्वरुप और अनेक तरह के पाप हो जाते हैं। पर उन पाप-संताप का निवारण तो स्वयं को ही करना पड़ता है। सद्गुरुदेव को स्वयं धारण करना होता है क्योंकि कुबुद्धि तो हमें दूसरों से प्राप्त होगी ही होगी। दूसरे लोग हमारे माइन्ड (Mind) का ब्रेन वॉश (Brain Wash) कर देते हैं। एक तरह से हमारे दिमाग का संतुलन बिगाड़ देते हैं। हम उन लोगों के अनुसार क्रियाशील हो जाते हैं और उसका परिणाम हमें स्वयं भोगना पड़ता है और जब उस पाप को समाप्त करने के लिये उनको कहा जाय कि तुम मेरे साथ थोड़ा सहयोग करना, मेरे लिए थोड़ा उपवास रखना तो वह नहीं कर पाता। उस पापों का, रोगों का नाश करने के लिए, कर्महीनता का निस्तारण करने के लिये या शुभ कार्यों की प्राप्ति के लिए स्वयं को ही हमें साकारात्मक रुप में साधना, पूजा, अर्चना करने की आवश्यकता रहती है। इसीलिए इस अभ्युदय पर्व पर, सद्गुरुदेव के अवतरण पर्व पर शुद्ध भाव से संकल्प लें कि “निरंतरमेरेजीवनमेंक्षण-प्रतिक्षणमेरेरोम-प्रतिरोममेंमेरेइष्ट, मेरे परमेश्वर एकाकार स्वरुप में निरंतर सक्रिय और क्रियाशील रहेंगे।”अपनेमानस-चिन्तनमेंस्थापितकरउन्हेंआत्मसातकरनाहोगा।केवलसोचनेसे नहीं, सोचने के साथ-साथ हमें कार्य रुप भी प्रदान करना होगा। तब हमारे जीवन में सद्गुरु बराबर एक सक्रिय रुप में बने रहेंगे, इसीलिए अधिकांश साधकों को किसी न किसी स्वरुप में, निखिलमय स्वरुप में, नारायणमय स्वरुप में, गुरुमय स्वरुप में छविमान दिखाई देते हैं।
सद्मार्ग का परिणाम क्या होता है कि जो भाग्य में नहीं लिखा हो, वह भी हम सौभाग्य से प्राप्त कर लें। जो भाग्य में नहीं लिखा होता है; अर्थात मैंनें तो सोचा ही नहीं था कि मुझे उन्नति की प्राप्ति हो जाएगी या धन की प्राप्ति हो जाएगी। मैंने तो कभी चिन्तन ही नहीं किया था, परन्तु यकायक कैसे इतना सौभाग्य की प्राप्ति हो गयी? वह हमारे स्वयं के भीतर में जो हमारे इष्ट हैं, हमारा जो सद्गुरु है उसके चिन्तन-भाव से हमारे सारे सुकार्य सम्पन्न होते हैं और ज्यों-ज्यों सुकार्य सम्पन्न होतें हैं तो होना भी चाहिये की हमारे जीवन में सुकार्यों की भी वृद्धि हो रही है, संतान सुख की भी प्राप्ति हो रही है, अचानक ही रोजगार की प्राप्ति हो जाती है, कृषि की प्राप्ति, व्यापार में और ज्यादा उच्चता की प्राप्ति हो जाती है, कैसे हो जाता है…? निश्चित रुप से आप के भीतर जो आपका इष्ट है, सद्गुरु है उसके चिन्तन-भाव से हमारे जीवन में सुस्थितियों की प्राप्ति हो पाती है। इसलिए सद्गुरु को अष्ट-सिद्धि नव-निधि प्रदाता भी कहा गया है। लक्ष्मी को नहीं कहा गया है। लक्ष्मी किस स्वरुप में आयेगी? लक्ष्मी अपने इष्ट के स्मरण करने के स्वरुप में आएगी। लक्ष्मी अकेले नहीं आती है, विष्णु के साथ में आती है। शिव अकेले नहीं आते हैं, माता गौरी के साथ में आते हैं। कृष्ण अकेले नहीं आते हैं, वह राधा के साथ आते हैं। राम अकेले नहीं आते हैं, सीता के साथ आते हैं। तो जहाँ योग वाली स्थितियाँ होंगी, जिस तरह से शिव और गौरी का, कृष्ण और राधा का, राम और सीता की योग वाली क्रियाएं होंगी निश्चित रुप से वहाँ हमारा भी सद्गुरु से योग वाली स्थितियों का भाव-चिन्तन होगा। वहाँ पर भी हमारे भीतर में देवत्व भाव-चिन्तन की वृद्धि हो पायेगी तब हमारे जीवन में अष्ट-सिद्धियों और नव-निधियों स्वरुप में लक्ष्मीयों की प्राप्ति हो पायेगी।
अष्ट सिद्धियों के स्वरुप में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। इन आठ सिद्धियों को प्राप्त करने से शिष्य निर्भिक, निडर और साहसमय बनता है अर्थात् किसी के उपर निर्भर रहने वाली भावना नहीं बनती है कि मेरा भरण-पोषण कैसे होगा….? मेरे पिताजी की पेंशन आ रही है, मेरे पिताजी कमा रहे हैं, या कृषि का कार्य है; निर्भिकता समाप्त हो जाती है। इस तरह अष्ट-सिद्धियों की चेतना के प्राप्ति से निडरता, निडरमय जीवन बन जाता है। भयग्रस्त जीवन नहीं बना रहता है, डरपोकमय जीवन नहीं बना रहता है। थोड़ा सा भी कोई चिल्लाकर, जोर से बोल देता है हम एकदम भयभीत से हो जाते हैं। बाहर से कोई गाली दे देता हम एकदम क्रोध में आ जाते हैं, भयभीत हो जाते हैं और उस क्रोध, उन्माद में और अनर्गल तरह की क्रियाएं करते हैं। निर्भिकता आ जाती है, निडरता आ जाती है और साथ ही साथ निश्चित रुप से शक्तिशाली होकर विनम्रता, विचारशीलता तथा नेक भावनाओं की वृद्धि होती है। जितना ज्यादा हमारे भीतर में विनम्रता का, नेकी का भाव आएगा, विचारशीलता का भाव आएगा; विचार भी कैसा शीलमय, अश्लीलमय विचार नहीं। विचारशील का मतलब हमें शीलमय विचार आने चाहिए, नेकता के भाव-चिन्तन आने चाहिये, निर्भिकता के भाव-चिन्तन आने चाहिए। इस तरह से उस सद्गुरु का स्मरण करने से अष्ट-सिद्धियों की, अष्ट-लक्ष्मीयों की हमें प्राप्ति होती है।
और साथ ही साथ नव-निधि स्वरुप में पद्म निधि, महापद्म निधि, नील निधि, मुकुंद निधि, नंद निधि, मकर निधि, कच्छप निधि, शंख निधि और खर्व (मिश्र) निधि। कुबेर इन नव-निधियों से युक्त होते हैं। निश्चित रुप से सद्गुरु का स्मरण करने से हमें अष्ट-सिद्धि नव-निधि स्वरुप में कुबेरता की प्राप्ति होती है और धन के अधिपति, रक्षक कुबेर हैं। ठीक उसी तरह से हमारे जीवन में भी कुबेरमय स्थितियों का विस्तार हो। हमारे हृदय में एक सात्विक रुप से सद्गुरु का विचार-चिन्तन होना चाहिये। कामना रहित चिन्तन-भाव होने से ही निश्चित रुप से जीवन में जो कामनाएं, इच्छाएं होती हैं, सद्गुरु उन कामनाओं की परिपूर्णता प्रदान करते ही हैं। हमें ईश्वर के सामने केवल एक प्रार्थना करनी चाहिए कि निरंतर आपका स्मरण बना रहे। गुरु की, ईष्ट की कृपा से निरंतर आपका चिन्तन-भाव बना रहे। सद्गुरु तो जानते हैं, वह कौन सा आपको मृत्यु प्रदान कर देंगे, आपको मलिनतामय बना देंगे। ऐसा तो है नहीं की आपने प्रार्थना नहीं किया हो इसीलिये मैं आपको मलिनमय बना देता हूँ या रोग-कष्टमय बना देता हूँ। उन्होंनें तो निश्चित रुप से आपका सहायता किया कि हर समय आपका चिन्तन-स्मरण बना रहे, मेरे हृदय भाव में, मेरे रोम-प्रतिरोम में; जब हमारे रोम-प्रतिरोम में सद्गुरु का, ईष्ट का, शक्ति का भाव-चिन्तन बना रहेगा तो निश्चित रुप से जीवन में धनहिनता वाली स्थितियाँ आयेगी ही नहीं, फिर जीवन में मृत्यु वाली स्थितियाँ आती ही नहीं हैं। प्रार्थना करने से कुछ नहीं होगा कि मुझे रोग-कष्ट से निवृत्ति की प्राप्ति हो जाए, कर्जे की समाप्ति हो जाये, मकान बन जाए, मुझे रोजगार की प्राप्ति हो जाय। प्रार्थना करने से कुछ नहीं होगा, स्वतः ही जब अपने सद्गुरु को रोम-प्रतिरोम में धारण कर दिया है तो निश्चित रुप से अष्ट-सिद्धियों नव-निधियों से हम युक्त हो ही जाते हैं। इसी कारण निरंतर-निरंतर चिन्तन-भाव रहना चाहिए और सोचते रहना चाहिए, मन ही मन में सोचना है कि गुरुजी! ये कार्य मैं कर रहा हूँ, कहीं ये कार्य अनर्गलमय स्थितियों वाली तो नहीं है? चिन्तन करना है वह स्वतः एक आवाहन् हो जायेगा। एक आवाज आयेगा कि ये गलत काम है ये तुझको नहीं करना है, बस तुरंत ही उस कार्य को दिमाग से हटा देना है एक साइड। और जब आवाज-विचार आये कि इस काम में सुसफलता, सुश्रेष्ठता की प्राप्ति तो उस कार्य को कर लेना है, जो आपके मन को अच्छा लगे और खासकर दूसरों के लिए भी हितकारी हो वह कार्य आपको करना चाहिये।
जीवन में चार ऐसी नारकीयमय स्थितियाँ होती हैं जो कि पूरे के पूरे जीवन को नारकीयमय, विनाशमय बना देती हैं। जवानी, धन-संपत्ति, प्रभुत्व, अज्ञानता।
यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्।।
जवानी तो प्रत्येक लोगों को आती है परन्तु उस जवानी में होश नहीं रहता और जहाँ होश नहीं रहेगा, जोश रहेगा वहाँ पर व्यक्ति अनर्गल कर्म करेगा और उस जोश के फलस्वरुप, उस अनर्गल कार्य का परिणाम उसे जीवन भर भोगना पड़ता है। अगर वह होश से कार्य करता है, मैंनें क्या बताया कि स्वयं के भीतर में पहले चिन्तन करना है कि गुरुजी! मैं ये कार्य कर रहा हूँ। यह कार्य मुझे और मेरे सामने वाले लोगों के लिए हितकारी है या नहीं। जब होश की भावना से हम क्रिया करते हैं तो निश्चित रुप से हमारी जवानी पूरे जीवन भर क्रियाशील, सुश्रेष्ठमय बनी रहती है और जोश में जो भी कार्य करते हैं उस कार्य से हमें कुपरिणाम की प्राप्ति होती है क्योंकि उस समय हमारे चेतन में होश नहीं रहता है, उन्माद स्वरुप में, एक अनर्गल स्वरुप में हम क्रिया कर लेते हैं। जिसके परिणामस्वरुप हमें जीवन भर कुछ न कुछ कुस्थितियाँ भोगनी ही पड़ती है, जैसे होश में हम अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते हैं, लाइफ में अच्छा शिक्षा प्राप्त नहीं किया तो स्वभाविक है कि अच्छे रोजगार की प्राप्ति नहीं होगी, अच्छी नौकरी की प्राप्ति नहीं हो पाती। क्योंकि हमारे पास बुद्धि नहीं है, हमारे पास ज्ञान-चिन्तन ही नहीं है कि कैसे हमें व्यापार को प्रारंभ करना है, संचालित करना है, क्रियाशील करना है। जिसके कारण 60-62 वर्षों तक, जब तक भी हमारा जीवन बना रहता है तब तक सामान्य-सामान्य से भी निर्धनता युक्त जीवन को व्यतीत करना होता है। इसलिये जवानी में, जवानी तो आती है, जोश भी आता है परन्तु साथ में होश बराबर रहना चाहिये। होश बराबर क्रियाशिल रखेंगे तो जोश बराबर जीवन भर सक्रिय बना रहेगा।
दूसरा है धन-संपत्ति। जो पुरखों से मिली है। दादा-परदादा-पिता से जो संपत्ति प्राप्त होती है उसका हम सद्उपयोग नहीं कर पाते, क्योंकि वो तो हमें फ्री में प्राप्त होती है। मैंने तो परिश्रम किया नहीं और जो जीवन में परिश्रम करके पैसा कमाते हैं ना वह स्वयं बहुत न्यूनतम रुप में खर्च करते हैं। कुछ चिन्तन तो करें, आप नौकरी कर रहे हैं, रात-दिन मेहनत कर कृषि कार्य कर रहे हैं और जो भी कृषि कार्य से छः महिने-एक वर्ष में लाख रुपये, दो लाख रुपये आ रहे हैं तो आप उसे कितनी मात्रा में खर्च करेंगे; चिन्तन करें। नौकरी में आप हैं और हर महिने आपको 40-50 हजार रुपये सैलरी मिल रही है आप स्वयं पर कितना खर्च कर रहे हैं। बहुत न्युनतम रुप में अपने आप पर खर्च किया जाता है। परन्तु पुरखों से प्राप्त संपत्ति का हम सही उपयोग नहीं कर पाते हैं उस संपत्ति का हम दुरुपयोग कर रहे हैं जो हमें विनाश की ओर ले जाती है। इसीलिये कहा जाता है तीन पीढ़ी तक यदि संपत्ति का या भू-भवन को या जो भी पूरखों, पूर्वजों या माता-पिता दादा-दादी से प्राप्त हुआ है, उसे सही रुप से संयोजित कर के रखते हैं तो वह आगे अनेक पीढ़ियों तक क्रियाशील रहती है इसीलिये जितने भी राजा-महाराजा हुए, रईस हुए उन्होंने तीन पीढ़ियों तक बराबर नियमित रुप से उनका संचालन नहीं किया जिससे वे विनाश की ओर अग्रसर हो गये। इसीलिए पुरखों से प्राप्त संपत्ति का भी सही रुप से सदुपयोग करने से….., क्योंकि दुरुपयोग करने से कि इतना सारा कार-गाड़ी है, इतना बड़ा मकान बना के गये हैं, ठीक है आधा मकान बेच देते हैं, ऐसे ही शौक-मौज-मस्ती में खतम कर देते हैं। होश नहीं रहता है उस समय और हम जो स्वयं के अर्जन से कमाते हैं नौकरी करके, व्यवसाय, व्यापार करके, उसका हम सही ढंग से सदुपयोग कर पाते हैं, क्योंकि हमनें पूरे-पूरे महिने तक, साल तक मेहनत किया है। कृषि कार्य में या व्यापार में निरंतर अपने परिश्रम से व्यापार को ऊंचा बनाया है। इससे हमारे जीवन में होश बना रहता है, हम विनाश वाली स्थितियों की ओर क्रियाशिल नहीं हो पाते हैं।
श्लोक में तीसरी बात अधिकार-प्रभुत्व के बारे में कही गयी है। सही योग्यता या टैलेंट (Talent) नहीं होने के फलस्वरुप भी उसे किसी भी अधिकार की प्राप्ति हो जाती है। मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं हूँ और मुझे संचालन का कार्यभार दे दिया गया कि तुम्हारे ऑफिस में ये लोग हैं और तुम्हें इनका संचालन करना है, बराबर गाइड (Guide) करना है। मैंने ना तो C.A. किया, ना ही M.B.A किया, ना ही B.A. किया, मुझे ऑफिस का कोई नॉलेज ही नहीं है और प्रभुत्व बन जाता है कि दस लोगों के बीच में संचालन करना है। फैक्टरी का मुझे ज्ञान ही नहीं, व्यापार का ज्ञान ही नहीं है और उधर फैक्टरी को चलाना है। कपड़े की फैक्टरी है या कोई ‘राइस मिल’ (Rice Mill) है, उस राइस मिल को चलाना है। उसे ज्ञान ही नहीं है कि कैसे चावल को अलग करना है, उसको पॉलिश करना है, कैसे अलग तरह से उनको कट्टों में बाँधना है, ध्यान ही नहीं है। “जबप्रभुत्व प्राप्त हो जाता है तो हम उसका दुरुपयोग करते हैं तो वह हमें विनाश की ओर अग्रसर करता है।”इसलिए“अधिकारकेसाथ-साथयोग्यताभीआवश्यकहै।”योग्यताकेलिएहमेंसक्रियरुपसेज्ञानप्राप्तकरनाआवश्यकहै, जब हम सक्रिय रुप से ज्ञान प्राप्त करते हैं तो धीरे-धीरे टैलेंट (Talent) वाले, योग्यता वाले स्थितियों का विस्तार होता है। अर्थात् योग्यमय बनना, अमुक कार्य के लिए मैं योग्य हूँ या नहीं, उस योग्यता को पहले आत्मसाध करना चाहिए।
इस स्कूल में चार सौ बच्चे हैं और मुझे अचानक वहाँ का हेडमास्टर बना दिया। मुझे ज्ञान ही नहीं कि कैसे यहाँ जो भी टीचर हैं उनको संचालित करना है, मुझे वो चेतना ही नहीं है कि कैसे मैं उन तीन सौ-चार सौ बच्चों को सम्भाल पाउंगा, उन बीस-बाइस स्टाफ को कैसे सहन कर पाऊँगा। उसके लिए मुझे योग्यता से, ज्ञान से, बुद्धि से, प्रज्ञा से युक्त होना पड़ेगा। जब मैं सही रुप से योग्यता से, ज्ञान से, बुद्धि से, सभी रुपों से, प्रतिभाशाली बनूंगा तब जाकर उस काम को सही ढंग से संचालित कर पाऊँगा। जैसे जवानी बताया और अकारण रुप से पुरखों से प्राप्त धन बताया और योग्यता के अभाव के फलस्वरुप जीवन में हम विनाश की ओर अग्रसर होते हैं। आपको सीढ़ी पर बैठा तो दिया, मुझे तो ये मालुम ही नहीं है कि ऑफिस कार्य को कैसे संचालित करना है, कैसे घर का संचालन करना है, मुझे खाना पकाना ही नहीं आता और मुझको दे दिया 12-15 लोगों का, परिवार का खाना पकाना है, मुझमें कोई क्वालिटी नहीं है, कैसे सब्जी-रोटी बनाना है, चावल बनाना है, अन्य चीजें बनानी हैं तो इसे भी आत्मसात् करना होगा ना। योग्यता कैसे आएगी…? निरंतर अभ्यास से, निरंतर कार्य से, ज्ञान-बुद्धि-चेतना से योग्यता की प्राप्ति होती है।
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
केवल बच्चों के लिए ज्ञान-बुद्धि का भाव नहीं है, केवल उनके लिए ही सरस्वती का भाव-चिन्तन नहीं है। अज्ञानता के फलस्वरुप ही हम जीवन में विनाश वाली स्थितियों की ओर अग्रसर हो पाते हैं और निरंतर-निरंतर ध्यान से युक्त होकर….। और ज्ञान कहाँ से आएगा? अपने सद्गुरु के स्मरण से, चिन्तन-भाव से, निरंतर चिन्तन करना है कि आज जो मैं कार्य कर रहा हूँ उससे मुझे सुफल की प्राप्ति होगी या नहीं और सुफल की प्राप्ति अगर होगी तो किस रुप में होगी। यह चिन्तन-भाव करने के बाद हम कार्य करेंगे तो निश्चित रुप से कार्य में पूर्णता की प्राप्ति होगी। जोश, उन्माद, अज्ञानता के अनुरुप जब कार्य करते हैं तो वह हमें निरंतर विनाश की ओर अग्रसर करती है।
जो ज्ञानी पुरुष होता है ना, जो व्यक्ति पढ़ा-लिखा होगा ना, जो ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट होगा ना, तो वह बड़ी-बड़ी बातें नहीं करता, गप्पे नहीं मारता क्योंकि उसमें गंभीरता का भाव-चिन्तन है। एक पोस्ट ग्रेजुएट व्यक्ति ने सही ढंग से Step by step शिक्षा प्राप्त की है। मास्टर्स किया है या उसने कुछ और विशेष कोर्स किया है, C.A. कोर्स किया है तो उसमें एक गंभीरता की स्थितियाँ आती है, एक पेशेंस (Patience) की वृद्धि होती है,वह कभी अज्ञानता से परिपूर्ण नहीं होता और कभी भी अपने जीवन में मुर्खता वाली स्थितियाँ नहीं लाता।
एक बार दो सेठ थे और एक सेठ ने दूसरे से कहा कि मेरा नौकर तो बहुत ही मूर्ख है। दूसरे ने कहा,-“तुम्हारा नौकर मूर्ख है मेरा नौकर तो महामूर्ख है।”
पहले सेठ ने कहा-“नमुनादेखोगे?” दूसरे सेठ ने उत्तर दिया-“हाँदिखादो”
तो सेठ ने दस रुपये का नोट निकाला और कहा कि बाजार जाओ और टेलीविजन (T.V.) लेकर आओ। नौकर दस रुपये लेकर चला गया। पहले वाले सेठ ने कहा-“देखामूर्खआदमीदसरुपयेलेकरचलागया।कैसेलेकरआताहै।”
दूसरे वाले सेठ ने कहा कि मेरा भी नमुना देख लो। उसने अपने नौकर को बुलाया और कहा-“यहाँआओ।मेरेऑफिसमेंजानाऔरमालुमकरनाकिमैंवहाँपरहूँयानहीं।”दूसरानौकरभीचलागया।कुछसमयबादमेंदोनोंनौकरएकजगहमिले।पहलेवालेनौकर, जिसको सेठ ने टी.वी. लेने भेजा था, से उसने कहा-“तुमकिसकामसे आए?” तो नौकर ने कहा मेरे को इस काम से सेठ नें भेजा है।
सेठ में इतनी भी अकल नहीं है। कितना बड़ा मूर्ख है। आज इतवार है उस दस रुपये में मैं तो चार टी.वी लेकर आ जाता।
दूसरे नौकर ने कहा कि मेरे मालिक ने मुझसे कहा है कि जाओ मेरे ऑफिस में देखकर आओ कि मैं हूँ या नहीं।
इस पर पहले नौकर ने कहा कि सेठ वहाँ से फ़ोन नहीं कर सकता है कि वह वहाँ आफ़िस में है या नहीं।
ऐसे-ऐसे मूर्ख होते हैं दुनिया में। और ऐसी मूर्खता निरंतर अधिकांश व्यक्ति करते रहते हैं। वे बड़ी-बड़ी डींगे मारते हैं। इसीलिए निरंतर सद्काम भाव से, सुभाव से, सुविचार से, विचार तो कई तरह के आते हैं ना; अनर्गल विचारों को निरंतर निकालने की क्रिया करनी चाहिए। जितना अधिक अनर्गल विचार आएंगे उतना ही अधिक अलक्ष्मी का विस्तार होगा। लक्ष्मी और अलक्ष्मी हमेशा साथ-साथ चलती हैं। जितने कुविचार आएंगे उतना जीवन में कुस्थितियों का विस्तार होगा। किसी के प्रति जितना ईर्ष्या, द्वेष का भाव-चिन्तन आएगा उतना ही जीवन में स्वयं के नाश वाली स्थितियों का विस्तार होगा। मैं दूसरों के प्रति छल का, राग-द्वेष का, शत्रुता की भावना रखता हूँ तो निश्चित रुप से उसका परिणाम कब प्राप्त होगा वह तो उसके किस्मत में है परन्तु स्वयं को उसका कुपरिणाम भोगना पड़ता है। इसीलिए कुपरिणामों का ह्यास हो, समाप्त हो, हम उसका समाप्तिकरण, निस्तारण कर सकें, उसी के लिए निरंतर हमें अपने इष्ट का, सद्गुरु का……, जितना हम गुरु गीता, निखिल स्तवन, गीता पाठ, भागवत, रामायण पाठ के रुप में, स्मरण करते हैं तो निश्चित रुप से इस तरह की अनर्गल क्रियाएं हमारे अंदर नहीं आ पाती। “अप्पदीपोभव”मेरेजीवनमेंनिरंतरप्रकाशमयसुस्थितियोंकाविस्तारहो, वह क्रिया मुझे करना है। दूसरों के प्रति द्वेष-भाव, ईर्ष्या-भाव, वैमनस्यता का भाव रखकर मैं जीवन में वृद्धि को प्राप्त नहीं हो पाउंगा। वह कैसे समाप्त हो, मेरे जीवन से अलक्ष्मी का नाश कैसे हो? मैंने क्या बताया की सद्गुरु स्मरण करने से… सद्गुरु का महिमा मण्डन नहीं हो रहा है, हनुमान का स्मरण करने से उनका कोई महिमा मण्डन नहीं हो रहा है कि हनुमान बहुत ज्यादा पूज्य बन जाएंगे निश्चित रुप से उसके भाव-चिन्तन से आपके जीवन के दुर्गति का नाश होता है। सद्गति की स्थिति आती है। सद्गति का मतलब जीवन में सद्स्थितियों की प्राप्ति हो, वह हमारे जीवन में सुक्रियाओं का विस्तार करती है। इसीलिए सद्गुरु निखिल के अवतरण पर्व पर हम अष्ट सिद्धि, नव निधि तथा “अक्षय”कीप्राप्तिकेलिए; अक्षय का मतलब है कोई भी क्षय नहीं हो, आयु का क्षय नहीं हो, जितनी आयु भगवान ने लिखी हो उसका हम सही रुप से, आनन्द भाव के साथ, प्रसन्न भाव के साथ व्यतीत कर सकें। जीवन को, समय को काटना नहीं है, समय तो सबका ही कट रहा है परन्तु हम उस काटने वाले समय का सदुपयोग कर सकें, सांसारिक जीवन का,गृहस्थ जीवन का, भौतिक जीवन का सदुपयोग करें जिससे की जीवन में सद्मय स्थितियों का विस्तार हो, वह अक्षय स्वरुप है निरंतर मेरे जीवन में धन-लक्ष्मी का विस्तार होता रहे और वह धन, वह लक्ष्मी कभी भी समाप्ति रुप में, क्षय रुप में नहीं बने, यह अक्षय लक्ष्मी का भाव-चिन्तन है।
परम् पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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