





भारत संस्कृत और संस्कृति की क्रीड़ाभूमि रहा है। एक अलौकिक, अद्भूत एवं अनादिकाल से चली आ रही अमर सांस्कृतिक परम्परा के यहां दर्शन होते है। ‘संस्कृति’ शब्द में मूल्य, विचार, आचार, रीति-रिवाज के भाव सन्निहित हैं और संस्कृति का अर्थ है-स्वच्छता, शुद्धि और श्रेष्ठता। जिस व्यक्ति के रहन-सहन में कोई दोष नहीं, जिसका आचार-विचार ठीक है, वही सभ्य और सुसंस्कृत कहा जाता है। संस्कृति व्यक्ति के जीवन को आदर्श बनाती है, श्रेष्ठताएँ उभारती है और सिद्धान्तों के प्रति लगाव पैदा करती है। संस्कृति का उद्देश्य जीवन को विकसित करना है। माता-पिता-गुरू-अतिथि को देवता मानना, वैचारिक सहिष्णुता, ईश्वर की सर्वव्यापकता, मानवसेवा, कर्मफलसिद्धान्त, पुनर्जन्म का सिद्धान्त, तीर्थ-सेवन, व्रत-उपवास एवं यज्ञीय परम्परा (सेवा-त्याग) भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ हैं। इसलिये भारतीय संस्कृति को देव-संस्कृति कहते है, क्योंकि इसके अन्तर्गत लोकहित में कर्तव्यनिष्ठ होने की प्रवृत्ति भी है। एकता में अनेकता की अभिव्यक्ति और अनेकता में एकता-यही भारतीय दर्शन की विशेषता है। एक बार भगवान विष्णु ने नारद से कहा था ‘ हे नारद! मैं निराकार हूँ, इसलिये सिर्फ प्ररेणा दे सकता हूँ, लेकिन गतिविधियों को चलाने के लिये मुझे शरीर धारण करना पड़ता है और यह काम मैं श्रेष्ठ या विशिष्ट आत्माओं से कराता हूँ।’ इसी मान्यता के आधार पर ईश्वर के विभिन्न अवतारों की उद्भावना हुई।
विष्णु को नार (जल)- में स्थित रहने (अयन)- के कारण नारायण कहते हैं। सूर्य प्रातःकाल ब्रह्मा, दोपहर में विष्णु और शाम को रूद्र का रूप धारण करते है। जो लोक कल्याण में आत्मकल्याण और दूसरों की भलाई में अपनी भलाई समझे वही देवता है।
भारतीय दर्शन के अनुसार बहुदेववाद की धारणा का समर्थन स्वाभाविक है, क्योंकि जब प्रत्येक जीव में ईश्वर का निवास है और प्रत्येक मनुष्य में देवत्व का गुण है तो कोई भी मनुष्य अपने सद्गुणों को विकसित कर देव भी बन सकता है। देवता जीवन और जगत् के बाहरी अनुभवों तथा अनुभूतियों के साथ नीति, साहस, शौर्य त्याग तथा आदर्शो के प्रेरणास्त्रोत होते हैं। ईश्वर यदि परम सत्ता के प्रतीक हैं और जीव के मंजिल या लक्ष्य हैं तो देवता इस लक्ष्य तक पहुँचने के सोपान हैं। इसी आधार पर भारतीय संस्कृति में विभिन्न व्रत एवं उपवासों तथा त्योहारों का वर्णन किया गया है।
भारतवर्ष त्योहारों का देश कहा जाता है। त्यौहार मानव जीवन की सभ्यता एवं संस्कृति को पुनर्जीवित करता है तथा सैकड़ों वर्षो की खोजी हुई स्मृतियाँ प्राप्त हो जाती हैं। हमारा जीवन कष्टों से भरा हुआ है, इसमें तरह-तरह के दुःख, सुख एवं उलझनें हैं, इसलिये हमें ऐसे क्षणों की आवश्यकता होती है, जिनमें हम अपना कष्ट भूल सकें, पीड़ा को कम कर सकें एवं अपने-पराये की भावना को छोड़कर एक हो उत्सव मना सकें और हमारे पर्व और त्योहार वे ही क्षण हैं। पर्व और त्योहार हिन्दू धर्म के अभिन्न अंग हैं और सामान्य जन समुदाय में उन्हीं के द्वारा धार्मिक भावना की वृद्धि हो सकती है। आज इन पर्वों में कुछ विकृतियाँ आ गयी हैं फिर भी हमको अपनी प्राचीन परम्परा को स्थित रखना चाहिये और समयानुकूल संशोधनों द्वारा उसे अधिक उपयोगी बनाना चाहिये, क्योंकि वर्तमान को सुधारने एवं भविष्य को सँवारने के लिये अतीत का ज्ञान आवश्यक है। भारतीय संस्कृति में स्त्रियाँ संतान के कल्याण के लिये जीवत्पुत्रि का व्रत करती हैं तो हरितालिका (तीज) और करवा चौथ का व्रत पति के कल्याण एवं सुहाग-रक्षा के लिये करती हैं, वटसावित्री व्रत भी सुहाग-रक्षा के लिये होता है। अन्य व्रत एवं त्योहार स्वकल्याण एवं सामाजिक सद्भाव के लिये होते हैं। भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के महत्त्व को देखते हुये पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों की भी पूजा का विधान किया गया है।
आस्तिकता की मान्यता को सुस्थिर रखने के लिये उपासना या देवपूजन जरूरी है। परमात्मा का मूर्तिमान स्वरूप हमारी आँखों के सामने विचरता रहे और अदृश्य सत्ता सामने साकार रूप में परिलक्षित हो, यह तभी सम्भव है कि जब अधर्म का परित्याग कर धर्म को दृढ़तापूर्वक पकड़े रहने की इच्छा हमारी मनोभूमि में खरी उतरे। अदृश्य परमात्मा को दृश्य रूप में, साक्षी-सहचर के रूप में अनुभव करते रहने का महान् कार्य उपासना है। उपासना अर्थ समीप बैठना अर्थात् निकट रहना है। जो बातें बार-बार व्यवहार में आती हैं, वे स्मृति में आती हैं और जो अदृश्य रहती हैं, लोग उन्हें भूल जाते हैं। उनके सम्बन्ध में बहुत कुछ पढ़ते-लिखते हैं, परन्तु यह मान्यता मस्तिष्क के किसी कोने में पड़ी रहती है, यह सामान्य जन की समस्या है एवं इसी कठिनाई को दूर करने के लिये देव-प्रतिमा या देवपूजा का विधान किया गया है। सच्ची उपासना का अर्थ है-आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना और ऐसा करने पर किसी खाली जलाशय का संबंध जिस तरह भरे जलाशय से जोड़ देने पर उसकी जल राशि से खाली जलाश्य भी भर जाता है, उसी प्रकार आत्मा द्वारा परमात्मा से संबंध बना लेने पर परमात्मा की श्रेष्ठ आत्मा मनुष्य में प्रवाहित हो जाती है, किंतु इस माध्यम के बीच कोई व्यवधान रख दिया जाय तो जलाशय को जल और मनुष्य को श्रेष्ठता प्राप्त नहीं होगी।
पूजा या व्रत-त्योहार का अर्थ है लक्ष्य-प्राप्ति के लिये महापुरूषों से अच्छाइयों को ग्रहण करने के लिये उनके द्वारा अपनाये गये गुणों को ग्रहण करना तथा उनके द्वारा बताये गये मार्ग पर चलना। मनुष्य सुख, शान्ति, संस्कार एवं मोक्ष (मानसिक शान्ति) चाहता है, यह मानव-जीवन का लक्ष्य है और इस लक्ष्य तक पहुँचने की राह वही दिखा सकता है, जिसने स्वयं उस लक्ष्य को पा लिया है। देवता वे होते हैं जो इस लक्ष्य को पा चुके हैं और व्रत-त्यौहार या देव- पूजन का अर्थ देवताओं द्वारा अपनाये सद्गुणों को ग्रहण करने की प्रवृति की शिक्षा है। हम किसी महापुरूष की जयन्ती या पुण्य तिथि के अवसर पर उनके गुणों की चर्चा करते हुये उनके अनुकरण का संकल्प लेते हैं। भारतीय संस्कृति में भी देव-पूजन या व्रत-त्यौहार की व्यवस्था इसी आधार पर की गयी है। जन-साधारण मूर्ति, तस्वीर या व्रत-त्यौहार द्वारा इस सत्य को ग्रहण कर सकते हैं। विष्णु संहिता में मूर्तियों के प्रयोजन के बारे में स्पष्ट रूप से लिखा है- बिना आकार के ईश्वर का ध्यान लगाना कैसे सम्भव हो सकता है? उसकी कोई शक्ल नहीं हो तो ध्यान कैसे केन्द्रित किया जायेगा? ध्यान हमेशा फिसल जायेगा या निद्रा आ जायेगी। इसलिये बुद्धिमान लोग किसी आकार विशेष का ध्यान लगाते हैं। जिस प्रकार हम मन्दिर में धातुमयी मूर्ति, प्रस्तर मूर्ति अथवा काष्ठमयी मूर्ति की स्थापना कर पूजा करते हैं, उसी प्रकार अपने अन्तर्हृदय में मनोमयी मूर्ति को स्थापित कर मानस पूजा करते हैं और फिर शनैः-शनैः, ध्याता और ध्येय- यह त्रिपुटी भी समाप्त हो जाती है।
ईश्वर या देव-पूजन के लिये मनुष्य के मन में श्रद्धा एवं विश्वास का होना आवश्यक है, क्योंकि भावना का ही दूसरा नाम भगवान है। देवताओं को जिस रूप में पूजते हैं, उसके पीछे प्रेरणाएँ छिपी रहती हैं। गाँव के ब्रह्म और जगदम्बा की पूजा विवेक, शान्ति तथा शक्ति के समन्वय के रूप में होती है। मलंग का अर्थ मस्तमौला, सदा खुश रहने वाला तथा कल्याण में मस्त रहने वाला होता है। हनुमान जी में ब्रह्मचर्य पालन, स्वामिभक्ति, निष्ठा, सतत कार्यशीलता, जागरूकता एवं दृढ़ संकल्प के गुण वर्तमान हैं। पहले वे सुग्रीव के सचिव मात्र थे, लेकिन अपने इन्हीं गुणों और माता सीता की खोज करने एवं प्रभु श्रीराम की सेवा करने के पश्चात् वे अमरदेवता बन गये। दुर्गा का गुण संगठन शक्ति द्वारा अत्याचारियों का दमन करना है, वहीं दीपावली का संदेश वैभव एवं विवेक का समन्वयय है। पूजा में बलि का अर्थ अपनी इन्द्रियों के सुखो और आसुरी प्रवृत्तियों की बलि देना अर्थात् त्याग करना है न कि निरीह पशु-पक्षियों की बलि देना। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में ‘बीमारों की सेवा, अज्ञान-निवारण और जनता को सन्तोष देना सबसे बड़ी पूजा है।’
देववाद की वास्तविकता यह है कि बौद्धिकता के स्तर पर अथवा मनोभाव के कारण मनुष्य देवशक्ति के किसी रूप की उपासना करे, उसे सदैव याद रखना चाहिये कि मूल तत्त्व एक ही है। ‘एकोऽहं बहु स्याम (मैं एक से अनेक हो जाऊँ)’ की परिकल्पना के आधार पर ही भारत में बहुदेववादी धारणा का विकास हुआ है। देवप्रतिमा, व्रत त्योहार तथा मनोरंजक एवं शिक्षाप्रद कथाओं की व्यवस्था इसलिये की गयी है ताकि सामान्य स्तर की जनता उसे जान एवं समझ सके। समय-समय पर देवपूजन एवं व्रत-त्योहार के आयोजन से स्मृति ताजी होती रहती है। पुराणों के अनुसार सारे देवी-देवता परमात्मा के अंश हैं, इसलिये इनका स्मरण एवं पूजन आवश्यक है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा भी है कि ‘कोई भी भक्त, भक्ति के किसी रूप में उपासना करता है तो वह मेरी ही उपासना करता है,क्योंकि मैं ही उसे वरदान देता हूँ। फिर जीव मेरे पास आता है और मैं उसका स्वागत करता हूँ, क्योंकि वह जो रास्ता चुनता है, वह मेरा ही है।’
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