





सामान्य मनुष्य में प्रेम, क्षमा, दया, करूणा तथा सहानुभुति जैसे सकारात्मक भाव कम आते है, ईर्ष्या, लोभ, मोह और क्रोध-जैसे नकारात्मक भाव अधिक आते हैं। विचारों की अपनी तरंगे होती है। इन तरंगों के माध्यम से विचार एक स्थान से दूसरे स्थान तक और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचते रहते हैं। विज्ञान भी अब इस अवधारणा का समर्थन करने लगा है। यदि किसी व्यक्ति के प्रति आप प्रेम और मित्रता का विचार रखेंगे तो वह व्यक्ति धीरे-धीरे आपका मित्र बन जायेगा। इसी प्रकार यदि आप किसी के प्रति शत्रुता और ईर्ष्या का भाव रखेंगे तो व्यक्ति कालान्तर में आपका शत्रु बन जायगा, बाहरी तौर पर आप उस व्यक्ति के साथ कितने भी अच्छे व्यवहार का दिखावा क्यों न कर रहे हों। मनुष्य अपने भावों और विचारों का विकिरण भी करता रहता है। किसी समुदाय में एक प्रसन्नचित व्यक्ति सबको प्रचन्नचित बना देता है तथा दुःखी व्यक्ति अपने दुःख को अन्य लोगों में भी सम्प्रेषित कर देता है। किसी संगठन का मुखिया यदि क्रोधी और अशान्त हो तो सम्पूर्ण संगठन को अशान्त बना देता है। एक सृजनशील, शान्त और प्रसन्न मुखिया अपने परिवेश को भी वैसा ही बना देता है। नकारात्मक विचार और भाव चारों ओर नकारात्मक विचारों की कीमत हमें कई अन्य स्तरों पर भी चुकानी पड़ती है। नकारात्मक विचार और भाव हमें सामाजिक रूप से अलोकप्रिय एवं असम्मानित बनाते हैं, इनका हमारे स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। नकारात्मक विचारों में क्रोध, ईर्ष्या, लोभ तथा भय आदि काफी प्रचण्डता रखते हैं। नकारात्मक भावों और विचारों का परिमार्जन हर समझदार व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। नकारात्मक मनोवेगों का नियन्त्रण एक पेचीदा मसला है।
आधुनिक मनोविज्ञान तथा श्रीमद्भगवद्गीता में मनोभावों के परिष्कार के लिये पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। यहां आधुनिक मनोविज्ञान में बतायी गयी विधियों की चर्चा न करके गीता में वर्णित कुछ एक विधियों का उल्लेख किया जायेगा। मनोवैज्ञानिक विधियों की चर्चा न करने के अपने कारण हैं। मनोविज्ञान स्वतः अपरिपक्व अवस्था में है और इसने अनेक बार अपनी ही मान्यता का खण्डन किया है। यदि मसला अपने जीवन का हो तो हमें अपेक्षाकृत परिपक्व विधियों का ही प्रयोग करना चाहिये। गीता हजारों वर्षों से लोगों का मार्गदर्शन कर रही है। अतः यह आधुनिक मनोविज्ञान की तुलना में अधिक भरोसेमन्द है। इसके अतिरिक्त मनोविज्ञानिक अनेक निष्कर्ष असामान्य लोगों, पागलों और जानवरों पर प्रयोग करके निकाले गये हैं। उन निष्कर्षों को स्वस्थ, सामान्य, मनुष्यों पर लागू करना उचित नहीं है। निष्कर्ष निकालने के लिये जिन शोध-विधियों का प्रयोग किया गया, वे भी शत-प्रतिशत त्रुटिविहीन नहीं हैं। अतः मनोविज्ञान में बतायी गयी विधियों का प्रयोग न करके यहाँ गीता की बतायी विधियों का प्रयोग दिया जा रहा है। गीता हजारों वर्षों से लोगों का सफल मार्गदर्शन करती रही है तथा मनोवैज्ञानिक विधियों पर अभी तक एक राय कायम नहीं हो सकी है।
एक उदाहरण लें, क्रोध एक प्रचण्ड मनोवेग है। हर व्यक्ति कभी न कभी इसका शिकार अवश्य हुआ रहता है। अध्यात्म और मनोविज्ञान, दोनों ने इसके नियन्त्रण के लिये उपाय बताये हैं। मनोवैज्ञानिक उपायों को हम दो वर्गो में रख सकते हैं- 1. क्रोध को दबा दीजिये, और 2. क्रोध को व्यक्त कर दीजिये। चिकित्सकों का मत है कि क्रोध को दबाने से अनेक मानसिक-शारीरिक रोग पैदा होते हैं। क्रोध को व्यक्त कर देने से कुछ राहत अवश्य प्रतीत होती है, जैसे खौलते हुये पानी भरे डिब्बे का ढक्कन खोलते ही भाप निकल गयी हो। एक बार भाप निकलने से यह गारन्टी नहीं होती कि दुबारा भाप बनेगी ही नहीं। बार-बार यदि आप गुस्से को व्यक्त करेंगे तो यह आपकी आदत बन जायेगी। आदत बन जाने के बाद गुस्से से मुक्त होना कठिन होगा। अतः गुस्से को नियन्त्रित करने के लिये उसे दबाना या व्यक्त करना-दोनों ही उचित प्रतीत नहीं होता।
क्रोध हमारा एक प्रमुख शत्रु है। गीता में कई स्थानों पर क्रोध का उल्लेख हुआ है। गीता के दूसरे अध्याय के बासठवें और तिरसठवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण क्रोध उत्पन्न होने का कारण, उससे होने वाली हानि और क्रोध को नियन्त्रित करके के उपाय पर प्रकाश डालते हैं। श्लोक इस प्रकार हैं-
ध्यायतो विषयान्पुंसः सगंस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।
क्रोधाभ्दवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।
अर्थात् विषयों का निरन्तर ध्यान करते-करते व्यक्ति के मन में विषयों के प्रति रस उत्पन्न होता है। इस रस के कारण मनुष्य के मन में विषयों के प्रति इच्छा जागती है। इच्छापूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अभिभूत होने पर मूढ़भाव जाग्रत् होता है। मूढ़भाव से स्मृति लुप्त हो जाती है। स्मृति लोप से बुद्धि का नाश होता है। बुद्धि नष्ट होने से मनुष्य स्वयमेव नष्ट हो जाता है।
उपर्युक्त श्लोकों का तार्त्यार्थ यह है कि यदि आप क्रोध से मुक्त होना चाहते हैं तो विषयों के प्रति कुछ अनुराग उत्पन्न हो ही गया है तो उनकी इच्छा न उत्पन्न होने दे। इच्छापूर्ति में बाधा से ही क्रोध उत्पन्न होता है। इच्छाओं का गणित विचित्र है। एक इच्छा पूर्ण होते ही अनेक अन्य इच्छाएं उत्पन्न हो जाती है, जिसमें से अधिकांश पूर्ण होना सम्भव नहीं होता। अतः क्रोध की उत्पति होती है। ये हमारी आकांक्षायें ही हैं, जो क्रोध की उत्पति परिणत हो जाती हैं। हमने सबसे आकांक्षाएँ पाल रखी हैं-साथियों से, परिवार से, समाज से सड़क पर चल रहे अपरिचित लोगों से भी।
ये आकांक्षाएँ पूर्ण नहीं होतीं और हम क्रोध के शिकार हो जाते हैं। सड़क पर चल रहे अपरिचित लोगों से भी हमने उम्मीदें पाल रखी हैं। यथा-वे यातायात के नियमों का पालन करेंगे, सड़क को गन्दा नहीं करेंगे आदि। हमारी आकांक्षाएँ पूर्ण नहीं होतीं और क्रोधग्रस्त होकर हम अपनी मानसिक शक्तियों की आहुति दे देते हैं। अतः क्रोध को समाप्त करने के लिये आकांक्षाओं को समाप्त कीजिये। जब भी आप क्रोध के शिकार हों, अपना खुद का विश्लेषण कीजिये और पता लगाइये कि किस अपूर्ण आकांक्षा के कारण क्रोध आया। इस प्रकार एक-एक करके इच्छाओं को समाप्त करते जाइये। यहां यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि यदि इच्छाएँ समाप्त हो गयीं तो हम कार्य क्यों करेंगे? वस्तुतः हमारे कार्य हमारे शुभ संकल्पों की शक्ति से संचालित होने चाहिये, न कि इच्छाओं के अनियन्त्रित प्रवाह से।
मनोवेगों के नियन्त्रण और परिमार्जन के लिये गम्भीर प्रयास की आवश्यकता पड़ती है। कुछ मनोवेग व्यक्त करने योग्य होते है और कुछ नहीं। प्रेम, मैत्री, करूणा आदि व्यक्त करने योग्य मनोवेग हैं। घृणा, ईर्ष्या, क्रोध ऐसे मनोवेग है, जिन्हें व्यक्त करना उचित नहीं। इनको दबाना भी उचित नहीं है। इन्हें तो पूरी तौर पर जड़ से उखाड़ना चाहिये। इन्हें समूल समाप्त करने के तथा मन को नियंत्रित करके के अनेक उपाय गीता में बताये गये हैं। ध्यान करना, आहार सात्विक और शुद्ध रखना, मन में सद्विचारों को जाग्रत करना, परमात्मा का चिन्तन करना तथा परमात्मा के प्रति समर्पण भाव रखना आदि ऐसे उपाय हैं, जो मनोभावों को नियन्त्रित और शुद्ध रखनें में सहायक होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण गीता में एक-से-एक सरल उपाय बताते चले गये हैं। हमें अपनी रूचि और शक्ति के अनुसार उपाय का चुनाव करके सतत उसका अभ्यास करना चाहिये।
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