





क्योंकि संसार के रहस्य को जानने, समझने का मात्र एक ही मार्ग है, स्वयं की चेतना का पूर्ण साक्षात्कार करना। जो विज्ञान की किताब में लिखा ही नहीं है। वह तो शरीर को चीड़-फाड़ कर हड्डियां, नाडि़या गिनने, काटने, जोड़ने में माहिर है, उसे चीड़-फाड़ कर भी चेतना जैसी कोई चीज मिलती नहीं तो उसने कह दिया, चेतना जैसी कोई चीज है ही नहीं, यह मिथ्या है, कोरा बकवास है, मनोविकार है, चेतना की बात करने वाला व्यक्ति मनोरोगी है।
क्यूं भाई! विज्ञान जो तुम्हारे समझ में ना आये वह इस सृष्टि में है ही नहीं क्या? सबसे सहज क्रिया यही है, जो हमारे समझ में ना आए उसे कह दो यह तो हो ही नहीं सकता, यह बकवास है, मिथ्या है, यह आदमी सभी को मूर्ख बना रहा है। इससे समाज का अहित होगा, इस व्यक्ति को समाज से दूर करो।
यह आज के मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना है, वह ऐसी कोई भी बात मानने, सुनने, समझने को तैयार ही नहीं, जिसे अपनी स्थूल आंखों से देख ना ले, सुन ना ले और जब तक स्पर्श ना कर ले। इसलिए विज्ञान को मानने वाले लोग ऐसे किसी भी आदमी को मनोरोगी घोषित कर देते हैं और उन्हें भी जो इन तथ्यों को जानने, समझने की कोशिश करते हैं, वह भी बेचारा झेंप कर समाज की बातों में आ जाता है और चुपचाप अपनी दुनिया में मग्न रहता है और आदमी करे भी तो क्या? रहना तो उसे समाज में ही है, नहीं तो उसे भी मनोरोगी घोषित कर दिया जाएगा, फिर पत्नी-बच्चे कहां जाएंगे, इसीलिए मजबूरी में आदमी पड़ा रहता है, अपनी दुनिया में। लेकिन इससे सत्य नहीं बदलता, कोई श्रीराम को माने या ना माने प्रभु श्रीराम के व्यक्तित्व पर क्या फर्क पड़ता है, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, महादेव, ब्रह्मा, नारायण, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, अप्सरा, यक्षिणी या भूत-प्रेत, पिशाच, पितृ को कोई नहीं भी मानता है, तो उन पर इसका क्या फर्क पड़ेगा, आप सोचिये क्या उनके जीवन में इससे कोई फर्क पड़ता है, नहीं पड़ता, आपके मानने ना मानने से कोई प्रभाव उन पर नहीं होता है, लेकिन आपके जीवन पर इसका प्रभाव पड़ता है।
और यदि नहीं पड़ता तो संसार में सभी मनुष्य भिन्न-भिन्न क्यों हैं? सभी के प्रकृत, स्वभाव, गुण आदि में इतनी भिन्नता क्यों है, सभी का जीवन एक जैसा क्यूं नहीं? और यदि एक जैसा नहीं है तो वह कौन है, जो इसका लेखा-जोखा रखता है, गुण, स्वभाव, विचार, व्यवहार निर्धारित करता है। वह आत्मा जो प्रत्येक जीव के भीतर है, उसका जो स्वरूप है, जो गुण है, वह जिस संगति में है, जिन विचारों के मध्य विचरण कर रही है, आपके आत्म चित्त पर जो संस्कार अंकित है, वही इन सभी के मूल में है।
जीवात्माओं में भी अच्छाईयां-बुराईयां होती हैं, बिल्कुल मनुष्य की तरह, उस पर भी संस्कारों का प्रभाव पड़ता है, हां यह अवश्य है कि आत्मा शीघ्र ही प्रभाव में नहीं आती, इसीलिए कोई अच्छा मनुष्य बहुत बुरे संगत में कई वर्ष बिताने के बाद भी जब गुणवान लोगों के बीच जाता है, वहां रहने लगता है तो उसका मूल स्वभाव उभरकर सामने आ जाता है और एकदम से उसके व्यवहार, स्वभाव, आचरण में परिवर्तन देखने को मिलता है। हालांकि सांसारिक क्रिया-कलापों के संस्कार बीच-बीच में उसको दिग्भ्रमित करते हैं, फिर भी यदि वह दृढ़ता से अपने मूल स्वभाव पर बना रहे अथवा ईश्वरीय कृपा, गुरु कृपा से चेतना का संचार होता रहे तो वह मूल स्वभाव पर टिका रहता है, अन्यथा फिर संसार में ही लिप्त हो जाता है और फिर जैसा-जैसा वह सांसारिक क्रिया-कलाप करता जाता है और उसी में रमता रहता है, उसी तरह से उसके आत्म संस्कार में भी परिवर्तन होता रहता है।
इसीलिए सुक्रियायें करने की प्रेरणा ईश्वर के, परमात्मा के, सद्गुरुदेव के कार्य को करने वाले महान पुरुषों द्वारा निरन्तर प्रदान की जाती रहती है। जिससे व्यक्ति के आत्म-ज्योति में मलिनता का लेपन ना होने पाये और वह अपने जीवन के मूल चिंतन से एकाकार हो सके। आत्मा की मलिनता, जड़ता उसे ऐसे चक्रव्यूह में फंसा देती है, जहां वह हजारों-हजारों वर्षों तक घोर यातनायें, कष्ट, उल्टे-पुल्टे कार्य करते-करते ना जाने कहां-कहां भटकती रहती है और इसकी शुरुआत इसी मनुष्य शरीर से होती है और कल्याण भी मनुष्य शरीर से ही होता है।
यह मनुष्य शरीर दोनों प्रदान करने में समर्थ है, प्राप्त क्या हो? यह मनुष्य शरीर धारी को निर्धारित करना है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप मनुष्य योनि से किसी नीची योनि में जाते हैं या मनुष्य योनि से ऊंची योनि में जाते हैं, ये क्रियाएं इसी शरीर से सम्भव है, आपके विवेक पर निर्भर है, जो आपके पास है।
भूत-प्रेत योनियां भी हैं, इस संसार में पिशाच भी है और वास्तव में है इसमें कोई लेकिन नहीं, आप ना माने तो कोई जबरदस्ती भी नहीं है, मानना ना मानना आपकी इच्छा है। भूत-प्रेत का होना वह उनकी इच्छा है, उनकी इच्छा इसलिए क्योंकि या तो उन्होंने ऐसे कृत्य किए जिससे उन्हें प्रेत योनि मिली या तो वे अतृप्त हैं अपनी अनन्त इच्छाओं के कारण अथवा किसी ने उनके साथ अनैतिक कृत्य किया जिसके कारण उन्हें प्रेत योनि मिली, घटना-दुर्घटना भी एक कारण है इसका।
अब यहां से फिर एक चक्र प्रारम्भ होता है, पहले यह समझ लीजिए प्रेत होते क्या हैं? भूत-प्रेत स्थूल शरीर छोड़कर सूक्ष्म शरीर धारी होते हैं, जिन्हें सामान्यतः नहीं देखा जा सकता है या ऐसे व्यक्ति उन्हें देख पाते हैं, जिनकी सूक्ष्म चेतना में जागृति का भाव हो। भूत-प्रेत योनि कुछ समय की भी हो सकती है या कई वर्षों का भी हो सकता है, यह उस व्यक्ति के कर्मों पर निर्धारित है और इसका एक पक्ष यह भी है, जो आत्मा प्रेत योनि में है यदि उस आत्मा के पारिवारिक सदस्य प्रेत योनि से मुक्ति का उपाय करते हैं, तो वह जीवात्मा शीघ्र ही प्रेत बंधन से मुक्त हो सकती है।
परन्तु अधिकांश लोग इस तथ्य को मानने के लिए तैयार ही नहीं होते, कारण कि सूक्ष्म शरीर तो विरले मनुष्य ही देख पाते हैं, हर किसी को यह दिखता नहीं और वह प्रेत योनि की आत्मा अपनी बात अपने परिवार को बता भी नहीं पाती, समझा भी नहीं पाती, समझाने के लिए शरीर चाहिए, संकेत समझने वाले व्यक्ति चाहिए, नहीं तो चेतनावान पुरुष जो उनसे बात-चीत कर सके, सामान्य रूप से ऐसा संभव नहीं हो पाता, इसलिए वह बेचारा भटकता रहता है।
प्रेत के स्वभाव, गुण उस व्यक्ति के अपने जीवन में किए गए कर्म, विचार पर आधारित होते हैं। अर्थात् जैसा कर्म वह अपने जीवन में करके आता है, उसी के अनुसार उसके गुण, दोष परिदर्शित होते हैं, प्रेत योनि की प्रत्येक जीवात्मा दूसरों को कष्ट, दुख, पीड़ा ही दे यह आवश्यक नहीं है, परन्तु प्रेत योनि में बहुत दिनों तक दुःख, कष्ट, पीड़ा सहते-सहते वह जीवात्मा क्रुद्ध हो जाती है, उसमें क्रूरता आ जाती है और यदि उसके स्वभाव में पूर्व से ही दुष्टता का भाव है, तो वह और अधिक क्रूरता से भर जाती है, जिसके कारण सभी को दुख, कष्ट, पीड़ा देना उसका स्वभाव बन जाता है। परिवार के द्वारा उसके मुक्ति का कोई उपाय ना होने पर वह सबसे अधिक परिवार पर ही कोपित होती है और अपने ही परिवार को तरह-तरह की परेशानियां देने लगती है और यह क्रम ऐसा नहीं कि एक ही पीढ़ी तक सीमित हो, जब तक उसकी मुक्ति नहीं हो जाती, तब तक वह पीढ़ी दर पीढ़ी कष्ट देती रहती है। यह समस्या तब और अधिक विकराल हो जाती है, जब वह जीवन के ऊपर काल की तरह मंडराने लगती है।
ये सभी बातें पितृ दोष के अंर्तगत आती हैं और आपके सामने इस विषय को स्पष्ट करने का तात्पर्य यह नहीं कि आप इनसे डरें, आप सचेत हो जायें अपने कर्तव्यों के प्रति, अपने वंश की कुशलता के प्रति यही समझाने का प्रयास है, यही बताने का प्रयास है कि आपके कुल परम्परा में जो भी दोष व्याप्त है वह समाप्त हो सके और आप अपने मानवीय कर्तव्यों के चक्रव्यूह से मुक्त हो सकें, इसी विषय को स्पष्ट करने का प्रयास आपके मध्य कर रहा हूं और मैं यह जानता हूं कि आप सक्षम हैं, समर्थ हैं, चैतन्य गुरु के अनुयायी हैं, उनके शिष्य हैं और सबसे बड़ी बात आप एक साधक हैं और आपमें वह क्षमता है कि अपने पितरों को तृप्त कर सकें, उनके आगे के जीवन का मार्ग प्रशस्त कर सकें, आपके द्वारा ऐसा हो सकता है, यदि आप दृढ़ मानस-चिंतन बना लें तो।
कुछ वर्ष पूर्व की घटना है, एक हजार वर्षों तक प्रेत योनि में रहने वाला एक मुसलमान पीर ने एक छात्र मोहन सिंह के शरीर में में प्रवेश कर आश्चर्यजनक रहस्यों व घटनाओं का वर्णन तब किया जब एक संत ने मोहन सिंह को एकान्त कमरे में बैठाकर उससे सैकड़ों प्रश्न किए, मैं आपको उस घटना के बारे में विस्तार से बताता हूं, जैसा कि वहां घटित हुआ था-
तुम्हारा क्या नाम है?
तुम कहां के रहने वालो हो?
मैं इरान का रहने वाला मुसलमान हूं
तुम हिन्दुस्तान कैसे आये?
एक मुसलमान बादशाह हिन्दुस्तान को लूटने के लिए यहां आया था। मैं उसी बादशाह की सेना के साथ यहां आया था। वह तो लूटकर वापस गया चला गया, लेकिन मैं यहीं हिन्दुस्तान में रह गया। यहीं मैंने शादी कर ली और यहीं रहने लगा, मेरे दो लड़के और दो लड़कियां हुईं, मेरे घर के पास ही एक परिवार रहता था, जो इस समय मोहन सिंह के रूप में आपके सामने बैठा है, इसने मेरी बड़ी लड़की से नाजायज ताल्लुकात पैदा कर लिए। उसके नाजायज ताल्लुकात का मुझे जब पता चला तो मैंने बहुत कोशिश की कि किसी प्रकार इसकी नाजायज ताल्लुकात टूट जाएं। मैंने दोनों को बहुत समझाया और उस समय की हुकूमत के जरिये भी ताल्लुकात तुड़वाने की बड़ी कोशिश की, लेकिन मुझे कामयाबी नहीं मिली। मेरे मन में इस बात का बहुत गहरा असर हुआ और मैंने दिल से खुदा से दुआ की कि मैं इससे इसका बदला किसी प्रकार जरूर लूं। हे परवरदिगार! तू मेरी यह इच्छा पूरी कर। इसी ख्याल में मैं कुछ दिनों बाद मर गया।
सुलेमान! तुम अपने मरने के वक्त की सारी घटना बताओ, तुम कैसे मरे और उस समय तुम्हारे साथ क्या हुआ? जब मेरे मरने का वक्त आया, तब मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे। मेरी जबान एकदम बंद हो गयी, मैं इशारे करता, लेकिन मुझसे उस समय बोला नहीं जाता था, मरते वक्त मुझे बहुत तकलीफ हुई, जैसे एक झाड़ी हो जिसमें कोई पत्ता न हो और उसमें लम्बे-लम्बे नुकीले कांटे लगे हुए हों, उसके ऊपर बारीक मलमल का कपड़ा डाल दिया जाए और उसे बड़ी बेरहमी से खींचा जाए तो उस कपड़े का एक-एक धागा अलग हो जाएगा, ऐसी ही स्थिति उस समय मेरी थी, मरते समय इतना घोर दुख हुआ कि मैं बता नहीं सकता।
धर्मराज के सामने पेश करने पर तुम्हारे साथ क्या हुआ?
धर्मराज के पास पहुंचने पर चित्रगुप्त नाम के फरिश्ते ने मेरी जिंदगी के जितने भी पुण्य-पाप थे, उसका सारा हिसाब-किताब बताया, धर्मराज ने सब सुनकर मेरे पाप-कर्मों के फलस्वरूप कुम्भीपाक नरक में और नरक भोग के बाद एक हजार वर्ष तक के लिए प्रेत योनि की सजा सुनायी और बताया जब तुम्हारा एक हजार वर्ष का समय पूरा हो जाएगा, तब तुम्हें जिसने तुम्हारी लड़की के साथ नाजायज ताल्लुकात बनाया था, वह तुमसे मनुष्य रूप में मिलेगा, तब तुम उससे अपना बदला ले सकोगे, फिर तुम्हें एक महापुरुष मिलेंगे, उन्हीं के हाथों तुम दोनों का कल्याण होगा।
कुम्भीपाक नरक से निकलने के बाद तुम्हारे साथ क्या हुआ?
मुझे कुम्भीपाक की घोर यातनाएं भोगने के बाद यह प्रेत योनि दे दी गयी। प्रेत योनि मिलने पर मैं अपने गांव जहां मेरी कब्र बनी हुई है, वहीं जाकर रहने लगा। वहां मजार पर पूजा करने वाले आते थे, मैं उन्हें देखता था, पर वे मुझे नहीं देख पाते थे। मेरे साथ वहां पांच पीर और भी रहते थे, उनमें से एक प्रेत की उम्र तीन हजार वर्ष थी।
तुम इस मोहन सिंह के शरीर में कैसे आये?
प्रेत योनि के लिए निर्धारित एक हजार वर्ष पूरे होने में कुछ वर्ष बाकी थे, तो इस लड़के मोहन सिंह ने जिसका पिछले जन्म में मेरी लड़की से नाजायज ताल्लुक था, एक दिन अचानक आकर मेरे कब्र पर पेशाब कर दिया। मैंने इसे खूब गौर से देखा तो, इसकी आत्मा को मैंने पहचान लिया और मैंने तुरंत यह तय कर लिया कि अब इससे अपना बदला अवश्य लूंगा। मैंने झट से इसे पकड़ लिया और इसके शरीर में दाखिल हो गया। मैंने और बहुतों को पकड़-पकड़ कर मार दिया था, पर इसे इसलिए नहीं मारा कि इसके द्वारा मेरा उद्धार होना था।
सात साल से मैं इसके शरीर के अन्दर रहता हूं और अब समय आ गया जब धर्मराज के अनुसार मेरी मुक्ति होनी है। मैंने इसे खूब सताकर इससे अपना बदला भी ले लिया है, अब मेरी मुक्ति का समय करीब है।
इन्सान का कल्याण कैसे हो सकता हैं?
अपने-अपने गुरु के द्वारा बताये गए मंत्र जप से इंसान का कल्याण होता है।
धर्मराज कैसा था?
धर्मराज बहुत सुंदर था, उसके सफेद लम्बी दाढ़ी थी और सिर पर केश भी थे और वह दिखने में बड़ा दिव्य था।
तुम प्रेत लोग कहां पर रहते हो?
हम खंडहरों में रहते हैं या पेड़ों के ऊपर लटके रहते हैं, खूब चीखते हैं, चिल्लाते हैं, पुकारते हैं लेकिन हमारी आवाज कोई नहीं सुनता, हमें भूख-प्यास भी खूब लगती है और हम लोग बहुत ही दुखी रहते हैं।
तुम्हें प्रेत योनि क्यों मिली?
मुझे प्रेत योनि इसलिए मिली कि मेरे पाप बहुत भयानक थे, मैं ताबीज बनाने-बेचने और झाड़-फूंक का काम करता था, भूत-प्रेतों को निकालने का झूठा धंधा भी करता था, सच-झूठ बोलकर लोगों से पैसा लूटता था, इसी काले इल्म की वजह से मुझे यह प्रेत योनि मिली, मेरी जिन्दगी में बहुत सारे कर्म बडे़ गंदे थे, मैंने दूसरों की बहन, बेटी, पत्नी को बहला-फुसला कर, जोर-जबरदस्ती से बड़ा नाजायज ताल्लुकात पैदा कर रखा था और भी कई बड़े घोर पाप मैंने किया था, जिसके कारण मुझे कुम्भीपाक नरक में जाना पड़ा और अपने किये हुए पापों का फल भोगना पड़ा। फिर मुझे यह एक हजार वर्ष के लिए प्रेतयोनि मिली, जिसका कष्ट मैं अभी भी भोग रहा हूं।
क्या तुम भूत-प्रेतों को पूजा-पाठ, कथा आदि से शान्ति प्राप्ति होती है।
प्रेत और अन्य भूत योनियों को पूजा-पाठ आदि धार्मिक कार्यों में आने का हुक्म नहीं है। अगर भूत-प्रेत पूजा-पाठ, धार्मिक कार्यों में आते हैं, तो उन्हें आन्तरिक जलन होती है और शरीर जलने लगता है, ऐसे स्थानों पर भूत-प्रेत नहीं टिकते, भाग जाते हैं। यदि किसी महापुरुष की अनुकम्पा हो जाये, तो भूत-प्रेत पूजादि धार्मिक कर्मों के निकट रह सकता है और उसमें शामिल भी हो सकता है, जिससे उसका धीरे-धीरे उद्धार होता है।
इस घटना में वह मुसलमान प्रेत जो मोहन सिंह के भीतर था, वह कुरान की आयते भी बोलता था, जबकि मोहन सिंह को कुरान के एक भी अक्षर का ज्ञान नहीं था। ऐसी अनेक घटनाएं हमारे आस-पास भी होती हैं और कभी-कभी किसी व्यक्ति के अन्दर भूत-प्रेत प्रवेश कर अपने आप कई रहस्य उजागर कर देते हैं, जो आश्चर्यजनक होते हैं। इस स्थूल जगत के साथ सूक्ष्म जगत में भी बहुत कुछ घटित होता रहता रहा है।
बुराड़ी दिल्ली की घटना में आपने पढ़ा होगा, कि किस तरह से एक ही परिवार के सभी 11 सदस्यों की जीवन लीला समाप्त हो गयी अचानक, रहस्यमयी ढंग से सभी की मृत्यु हो जाती है। प्रशासनिक जांच में उस परिवार की डायरी से जो रहस्य सामने आया, उसमें वर्णन है कि उस परिवार का एक व्यक्ति अपने मृत पिता से बात करता था और जिसने यह डायरी लिखी है, तो सत्य ही लिखा होगा, इतनी सारी बातें उसके मन का वहम नहीं हो सकती, कोई कल्पना नहीं हो सकती। जो व्यक्ति अपने सांसारिक जीवन के सभी कार्य कर रहा है, उसके सारे कार्य सामान्य रूप से चल रहें है, वह मनुष्य मानसिक रोगी कैसे हो सकता है? उसके जीवन के सारे कार्य सामान्य हैं, तो केवल यही एक विषय से उसे मानसिक विकृत वाला व्यक्ति घोषित करना कहां तक उचित है, हमारे समाज में यही सबसे बड़ी न्यूनता है कि लोग तथ्य और साक्ष्य पर ही विश्वास करते हैं, सत्य के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है, जिसे सांसारिक जीवन के लिए उचित कहा जा सकता है, लेकिन अदृश्य जगत में इसकी कोई बहुत बड़ी आवश्यकता नहीं होती, इस संसार में अदृश्य शक्तियों का भी एक जगत है, वहां भी अनेक-अनेक क्रियाएं होती हैं, जो हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं, यह हमें स्वीकार करना चाहिए।
और ऐसी ही अदृश्य शक्तियों में अकाल मृत्यु प्राप्त मनुष्य जिसकी अनेक इच्छाएं, आकांक्षाएं अधूरी रह गयीं हो और अचानक ही उसकी मृत्यु हो जाए अथवा वह अपने जीवन में बहुत सारी इच्छाएं रखता हुआ मर जाए, उसे अपने परिवार से अति मोह हो, तो ऐसे जीवात्मा प्रेत योनि में चली जाती है, जिसे पितृ दोष आदि भी कहा जाता है, ये पितृ देव रूप में और भूत-प्रेत दोनों स्वरूपों में अनुभव हो सकते हैं, उनके कर्म और क्रियाएं आदि इसके लिए जिम्मेदार होती हैं।
इसलिए सभी मनुष्यों को अपने पितरों की शांति, संतुष्टि व मुक्ति के लिए प्रयास करना चाहिए, उनके लिए ऐसे साधनात्मक क्रियाओं का आश्रय लें, जो उन्हें दिव्य लोक में अग्रसर करने में सहायक हो। टोने-टोटके, पारम्परिक पितृ तर्पण आदि क्रियाओं से केवल औपाचरिकता पूरी हो पाती है, वास्तविक रूप से उनकी मुक्ति हेतु शक्ति के फोर्स की जरूरत होती है, एक ऐसी साधनात्मक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो उनके लिए कवच बन जाये और धीरे-धीरे सद्गति की ओर अग्रसर करे। जब उन्हें साधनात्मक शक्ति का सहयोग मिलता है, एक ऊर्जा मिलती है, तब उनके कर्मदोष, इच्छाएं, पापादि समाप्त होते हैं और उसके बाद ही मुक्ति का, दिव्य लोक का मार्ग प्रशस्त हो पाता है।
प्रारम्भ होने वाले पितृ तर्पण माह में आप सभी अपने पितरों के लिए शांति, संतुष्टि व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक बने, उनके भावी जीवन को सद्गति दे सके और इन सभी के माध्यम से स्वयं व अपने आने वाले वंश के जीवन को मंगलमय वातावरण, एक सकारात्मक स्थिति प्रदान करने में समर्थ व सक्षम बन सके, ऐसी ही मैं आपके लिए कामना करता हूं, आपको मंगलमय जीवन का आशीर्वाद प्रदान करता हूं।
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी
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