





लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।।
कबीर को सभी ओर ईश्वर की ज्योति दिखी, उन्होंने लिख दिया सभी ओर, सभी स्थान पर, सभी में ईश्वर की ज्योति है। वह उनके अनुभव की बात है, उन्हें जीवन से जो अनुभव हुआ, जो जाना, समझा और पाया उसे लिख दिया। ऋषि-मुनियों, महात्माओं, महान विचारकों ने भी यही किया, उनके जीवन के जो अनुभव थे, उसे उन्होंने लिपिबद्ध कर दिया। जो साधनाये उन्होंने सम्पन्न की, योग किया, प्राणायाम, ध्यान जो भी किया उसका अनुभव वैसा ही उन्होंने लिख दिया। बिल्कुल वैसा किसी और के साथ घटित हो, ऐसा आवश्यक नहीं है, इसलिये क्योंकि यह उनका अनुभव था, वह उनकी भावभूमि थी, जिस मनोस्थिति पर वे थे, जिस भाव में, जिस क्रिया शक्ति की क्षमता से वे भरे थे, उसी रूप में उन्होंने वह अनुभव किया और उस स्थिति को समझने के लिये आपको उस भावभूमि तक पहुंचना होगा, तब वह अनुभव आप प्राप्त कर सकेंगे।
किसी असफल, निराश, हताश व्यक्ति ने जीवन को घृणित कहा तो वह भी सही है, क्योंकि उसने अपने जीवन में वही अनुभव किया, उसे वही मिला जीवन से, तो वह तो वही लिखेगा, जो उसने अनुभव किया। किस कारण से उसे दुःख मिला, पीड़ा मिली, कष्ट मिला यह विषय अलग है और उसका अनुभव अलग है। जो अनुभव हुआ वह कहना, लिखना अपने आप में बड़ी बात है। लेकिन आवश्यक यह है कि हम अनुभव तो करें। हमें किसी विषय का अनुभव तो हो, हम किसी विषय में इतने डूबे तो, कि कह सकें यह बुरा है या अच्छा है। हमारे पास यदि अनुभव ही नहीं है, तो हम कैसे कह सकते हैं? कि अमुक कार्य से अमुक परिणाम मिलेंगे।
समुद्र में उतरने से पूर्व आप कैसे कह सकते हो? कि यह समुद्र आप को डूबा देगा या पार लगायेगा। यह अनुभव प्राप्त करने के लिये आपको अपनी नाव उतारनी होगी समुद्र में, फिर जैसा मौसम होगा, जिस प्रकार की उफान होगी समुद्र की उस पर निर्भर करता है कि पार होगे या डूब जाओगे। अधिकांश लोग दूसरो की सुनी हुई, कही हुई अथवा कहीं पढ़कर अपनी बात रखते हैं। वह उनका अपना अनुभव नहीं हो सकता। रटन्त विद्या के सभी महारथी हैं, ध्यान रखना रटन्त विद्या वाह-वाही तक तो ठीक है, लेकिन जीवन की जमीन पर वास्तविक अनुभव ही काम आयेंगे।
आपने देखा होगा, जब कोई विद्यार्थी कालेज से डिग्री लेकर जॅाब के लिये जाता है, तो कम्पनी का डाइरेक्टर सबसे पहले यही प्रश्न करता है, आपको कितने वर्ष का अनुभव है? डिग्री बाद में देखता है, आपके अनुभव की जानकारी पहले लेता है। क्योंकि उसको पता है, रट कर आया हुआ है, पर जमीनी अनुभव में ढ़ीला है और अनुभव नहीं है तो कहेगा आपको तो बहुत कुछ सिखना है, आप कहीं और देखें, फिर बहुत हाथ-पैर मारकर आपको कहीं ना कहीं पांच-दस हजार की नौकरी मिल ही जाती है। फिर जैसे-जैसे अनुभव होता रहता है, आप ऊचांईयों पर बढ़ते रहते हैं। इसलिये जीवन के किसी भी क्षेत्र में अनुभव की बहुत आवश्यकता है और आपने अपने जीवन में जो अनुभव किया, वही सत्य है, दूसरा कोई सत्य नहीं, किसी और के लिये हो ना हो, पर कम से कम आपके जीवन का अनुभव आपका सत्य है, क्षेत्र कोई भी हो अनुभव की अनिवार्यता प्रत्येक क्षेत्र में है, अनुभव के लिये मैदान में उतरो, संघर्ष करो, जीत-हार अपनी जगह है, कम से कम अनुभव तो मिलेगा ही, मैदान में उतरने से जीवन का नजरिया तो पा ही जाओगे।
अनुभव का क्षेत्र आध्यात्मिक हो या भौतिक, गृहस्थ का हो या संन्यासी का, किसी भी क्षेत्र का हो। शर्त यही है कि अनुभव के वास्तविक जमीन पर उतरना होगा, तलहट पर, केवल ऊपरी भाग को देखकर समुद्र के गहराई का पता नहीं चल सकेगा, समुद्र कितना गहरा है? यह जानने के लिये गहराई में उतरना होगा, जो भी क्षेत्र हो आपका, अपनी रूचि से चयन करें। जो आपका लक्ष्य है, उसी अनुसार निर्धारित करें अपना क्षेत्र और लगा दो छलांग, जो होगा देखा जायेगा, समुद्र की मर्जी पार लगाये या डूबा दे, लेकिन यदि किनारों पर ही खड़े रहे तो पता नहीं चल पायेगा, कि गहराई कितनी है?
और जब तुम्हे अनुभव हो जायेगा, जब तुम स्वयं को तपा लोगे, तब तुम महसूस कर सकोगे, जीवन के मर्म को, मूल तत्व की परिभाषा तुम्हे समझ आ जायेगी और जब तक तुम जीवन की परिभाषा नहीं समझ जाते, तुम्हें यह ज्ञान नहीं हो जाता कि जीवन क्या है? तब तक यह भटकाव दूर नहीं होगा? भटकाव दूर करने के लिये अनुभव प्राप्त करना होगा और अनुभव के लिये उतरना होगा मैदान में, अभी तुम मैदान के बाहर खड़े दर्शक हो, तालियां बजाकर तुम अपना मनोरंजन कर रहे हो, तुम्हें लग रहा है कि ये लोग जो मैदान में हैं, वे तुम्हारा मनोरंजन कर रहें हैं। लेकिन ऐसा है नहीं, जो मैदान में है, वह हार-जीत कुछ तो पायेगा ही, उसके पास जीत का अनुभव हो या हार का अनुभव, वह अनुभव पा ही जायेगा और यदि हारा भी तो दूसरी बार जीत जायेगा, तीसरी, चौथी, पांचवी कभी ना कभी जीत ही जायेगा वह और जो ये सोच रहें हैं कि मनोरंजन हो रहा है, वे वहीं रहेंगे, किनारों पर, मैदान के बाहर और जब यह क्रिया पूर्ण हो जायेगी, समाप्त हो जायेगी, जब यह यात्रा अंत तक पहुंच जायेगी, तब उनके पास तालियां बजाने का भी अवसर नहीं होगा।
भौतिक जीवन हो या आध्यात्मिक दोनों ही अपने आप में उच्चकोटि का है, यदि उसमें विकृत ना आये, यदि उसे सुचारु रूप से गतिशील बनाया जा सके। खतरा दोनों में है, पथभ्रष्ट होने की संभावना दोनों में है, यदि चूके तो हो सकता है, समस्यायें आ जायें और समस्या आयेगी तो समाधान भी है। इसलिये अध्यात्म और भौतिक की तुलना ना करो, बल्कि दोनों को एक-दूसरे का सहायक बना लो, भौतिक को निर्भर कर दो अध्यात्म पर और अध्यात्म को निर्भर कर दो भौतिक पर, इससे सहज उपाय ना पा सकोगे। यह सबसे सहज और सरल है। एक दूसरे के सहायक बन जाओ, विरोध समाप्त हो जायेगा और जहां विरोध समाप्त होगा, वहां मित्रता आ जायेगी, सम्बन्ध स्थापित हो जायेंगे।
लेकिन तुम निर्भर मत होना भौतिकता पर, इसको केवल रास्ता समझो और गुजर जाओ, इसके अवलम्बन से। निर्भर हुये तो अटक जाओगे, फंस जाओगे, यह मायावी है, जिसको जितना मिलता है, उतना ही वह उलझता जाता है। नहीं मिलता है, तो भी उलझाये रखता है, जितनी आवश्यकता है, उतनी ही सहायता लेना इसकी। क्योंकि ये हावी बहुत तेजी से होता है, तुम पर भी यही हावी है, इसी ने भटका रखा है, इसके मूल चिंतन को समझने की आवश्यकता है, समझने का प्रयास करो, सबसे पहले तो यह सोचो कि जीवन क्या है? जीवन किस लिये है और क्यों है? मैं कौन हूं?
यह पहला प्रश्न जब भीतर उठता है, जब यही एक प्रश्न बार-बार उठने लगे, तब समझ लेना कि तुम जागने की पहली स्टेज पर हो, जागे नहीं हो, बल्कि तुम्हारी चिरनिद्रा में थोड़ी सुगबुगाहट हुयी है, इसको बनाये रखना, इस प्रश्न को जीवन्त बनाये रखना, इसकी आहट होने दो, लगातार होने दो, जितनी इसकी आहट होगी, उतनी ही निद्रा टूटेगी और फिर उसी क्षण तुम्हारे पास माया आयेगी, कहेगी सो जा इसी में मस्ती है पर तुम्हें जागना होगा, अपनी कोशिश, अपना प्रयास बनाये रखना और प्रश्न को उठने दो, जितनी बार उठे, उठने दो, प्रारम्भ में पीड़ा होगी, कष्ट होगा, दुःख होगा, मस्तिष्क की नसें फट रहीं हैं, ऐसा अनुभव होगा। बहुत दबाव पड़ेगा तुम पर, पड़ने देना, इससे तुम्हारा कुछ अहित ना होगा, सद्गुरु का सहारा लेकर, परमात्मा को अपना आसरा बनाकर उठने का प्रयास करना, यह आसरा, यह सहारा तुम्हारी तन्द्रा तोड़ेगी।
और जब उठने की आहट सुनायी दे, जब ऐसा भाव मस्तिष्क में जगह बनाने में सफल होने लगे, तब अनेक-अनेक तरह के विचार, चिंतन उठेंगे, कभी बीच में परिवार आयेगा, पत्नी आयेगी, बच्चे आयेगें, भाई-बन्धु, सम्बन्धी, नौकरी, व्यवसाय, वैभव सब आंखों के सामने घूमने लगेगें, पूरी ताकत लग जायेगी तुम्हें रोकने के लिये, पूरा प्रकृत तुम्हें रोकेगा, जितनी विकृतियां है, सभी उफान पर आ जायेंगी, दुर्गुण हावी होना चाहेंगे। मन-मस्तिष्क विचारों से भर जायेगा, घर-परिवार की चिन्ता सतायेगी, जीवन के लिये चिंतित हो जाओगे, मन में बार-बार विचार आयेगा, ऐसा ना हुआ तो क्या होगा? वैसा ना हुआ तो क्या होगा? इसके चक्कर में पड़ना ही मत कि आगे क्या होगा? मन में बांध लो, जो होगा वही परमात्मा की रजा है और हम राजी हैं, उसकी रजा में।
इसी क्षण तुम्हारे भीतर असीम संकल्प और दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता होगी, अपनी सुरक्षा के चक्कर में मत पड़ना, ये सुरक्षा जो हम ढूढ़ते रहते हैं, यही असुरक्षा का सबसे बड़ा कारण है, वास्तव में सुरक्षा नाम की चीज ही नहीं है, असुरक्षा ही असुरक्षा है चारो ओर, सुरक्षा तो केवल मृत्यु है, मृत्यु पूरी तरह सुरक्षित है, मृत्यु आयेगी, निश्चित आयेगी, इसलिये यह सुरक्षित है।
और जो आयेगी, जिसका आना निश्चित है, वह आज ही आये, उस राह से यदि आज ही गुजरना हो, तो क्या समस्या है। इसलिये इस पथ पर चलने वालो की सबसे पहले मृत्यु होती है, वे सबसे पहले स्वयं को मारते हैं, स्वयं को मारना, अपने अंह को मारना, इस पथ का पहला कदम है और जब अहं मर जाता है, तब ना पत्नी होती है, ना पुत्र, ना बन्धु, ना सखा सब समाप्त हो जाता है, बचता है, तो केवल वह ईश्वर, वह सद्गुरु, उसी में सारे रिश्ते-नाते समाहित हो जाते हैं।
कहने मात्र से नहीं होता त्वमेव हो माता च पिता त्वमेव, ऐसा करना, अनुभव की ऐसी भाव-भूमि पर उतरना इस वाक्य की पूर्णता है, आप चिल्लाते रहोगे जीवन भर क्या फर्क पड़ता है? चिल्लाने से नहीं होता है। उसकी जमीन पर उतरना पड़ता है, उसे अनुभूति में अपने शामिल करना होता है। इसलिये जितना यह कहने में सरल दिखता है, उतना है नहीं, प्रैक्टिकल जीवन में ऐसे कितने लोग होंगे, जिनके जीवन में ये श्लोक चरितार्थ हुआ हो। ढूढ़ते रहोगे, तो मुश्किल से एक-दो नजर आ जायेंगे। इस भाव-भूमि तक पहुंचना ही अपने आप में बहुत बड़ी बात है।
और आप जैसे-जैसे गहराई में उतरते जायेंगे, वैसे-वैसे रहस्य उजागर होते रहेंगे, केवल असीम धैर्य के साथ बढ़ते रहना जब तक अनुभव की जमीन ना मिल जाये, एक बात और समझनी होगी गलतियों से ही धीरे-धीरे अनुभव की सीढि़या बनती हैं, अनुभव एक दिन की क्रिया नहीं है, यह वर्षों की तपस्या है, जिसमें असीम धैर्य, संतोष होना आवश्यक है, तब ही धीरे-धीरे अनन्त गहराई की थाह मिलती है।
इस पथ पर एक समय ऐसा भी आता है, अधिकतर उनके लिये जो गृहस्थ हैं, जो सांसारिक हैं, जब वे घबरा जाते हैं, क्योंकि यह मार्ग कड़ी परिश्रम का तो है ही साथ ही इस पथ पर एक बार जीवन पूरी तरह डगमगा जाता है, चारों ओर से बाधायें, परेशानियां जकड़ लेती हैं। जीवन की छोटी-मोटी जरूरते पूरी करना मुश्किल हो जाता है, दुःख के बादल इतने गहरे हो जाते हैं, कि लगता है सूरज अब उदय ही नहीं होगा, हम तो अंधेरे में ही डूब जायेंगे, ऐसी मनोस्थिति बन जाती है। यह भी सत्य है कि यह पथ दुःख और परेशानियों की वस्तुओं से बना है, इस पर यही प्राप्त होता है। सुख के बादल कभी-कभी ही मंडराते हैं, लेकिन जब यात्रा पूरी हो जाती है, तब शांति और तृप्ति होती है। जो इन सांसारिक वस्तुओ से नहीं प्राप्त हो सकती है।
संन्यासियों की भी कड़ी परीक्षा होती है, उनको भी अनेक मनोभावों से गुजरना पड़ता है। सत्य तो यही है कि सरल कुछ भी नहीं जीवन में यह तो हमारे मनोदशा पर निर्भर है कि हम कौन सा मार्ग चुनते हैं, ईश्वत्व प्राप्ति का। कर्म की प्रधानता प्रत्येक अवस्था में है। हां सन्यासी के लिए सर्वाधिक सुलभ स्थिति यही है कि वह घर-गृहस्थी इत्यादि चक्करों से मुक्त होता है, जिससे वह निरन्तर साधना मार्ग में गतिशील रह सकता है। यदि वह सोच-समझकर धीरे-धीरे अग्रसर होता है। अपने मनोभावों पर नियंत्रण कर लेता है। इसलिये सभी को सर्वप्रथम ध्यान की क्रिया करनी चाहिए, मेडिटेशन अनर्गल तनाव के साथ बुरे विचारो, भावों को भी रोकता है और स्वस्थ, सम्बल मनोस्थिति निर्मित करता है।
गृहस्थियों के पास सैकड़ो चक्कर हैं, उनके जीवन की अनेक मनोकामनायें, इच्छायें उन्हें हमेशा परेशान करती रहती हैं। एक के बाद एक अभिलाषा जीवन में चक्कर काटने को विवश करती रहती हैं, अधिकतर गृहस्थ इसी में उलझे रहते हैं। इसलिये आत्म नियंत्रण की विधि अपनानी चाहिये, जिससे मनोकामनायें सीमित हो सकें। हां मैं जानता हूं, संसार में रहते हुये ऐसा करना संभव नहीं हो पाता, लेकिन प्रयास करने से धीरे-धीरे उस मनोस्थिति तक पहुंच जायेंगे। एक महान सिद्ध संत अहमदाबाद में निवास करते थे, प्रतिदिन अनेकों व्यक्ति उनके दिव्य मार्गदर्शन में अपनी समस्याओं के समाधान प्राप्त करते और प्रफुल्लित होकर लौट जाते। एक दिन वहीं के एक प्रख्यात व्यवसायी उनके पास अपनी समस्या लेकर आये।
बेचारे बहुत निराश और बेचैन थे। न जाने किस तरह इन्कम टैक्स वालो को उनकी वास्तविक सम्पत्ति के बारे में जानकारी मिल गयी और उन पर भारी जुर्माना लगा दिया। इस जुर्माने में उनकी सम्पत्ति के एक बड़े हिस्से का जाना निश्चित था। जुर्माने की रकम लाखों में बैठ रही थी और इसकी चिन्ता ने उनके दिन-रात का चैन छीन लिया था। स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा और घर का वातावरण बोझिल होता चला गया। सेठ जी को अब अपना जीवन ही निरर्थक लगने लगा था और वे दिनो दिन निराशा के काले अंधेरों में डूबते चले जा रहे थे कि इसी बीच उनके किसी शुभ चिन्तक ने उन्हें आचार्य से मिलने की सलाह दी। वैसे तो वे साधू, महात्माओं के चक्कर में उलझना उचित नहीं समझते थे। पर मरता क्या न करता की हालत ने उन्हें मजबूर कर दिया और कोई उपाय ना होने के कारण उन्होंने आचार्य से मिलने का निश्चय कर ही लिया। अपनी भीषण समस्या के समाधान हेतु वे उनके आश्रम पहुंचे, जहां आचार्य जी का निवास था। आचार्य सेठ को देखते ही उनकी समस्या के विषय में जान गये। कुशल समाचार के उपरान्त उन्होंने सेठ से बड़ी आत्मीयता से उनके पारिवारिक और व्यवसायिक जीवन के बारे में पूछा।
उनके प्रेम पूर्ण मधुर व्यवहार से द्रवित होकर सेठ जी रूंधे गले से बोल उठे, महराज मुझे बर्बाद होने से बचा लीजिये, मैं हर तरफ से निराश होकर आपके पास आया हूं। आचार्य ने विस्तार से उनकी समस्या पूछी। सेठ ने अपनी सारी समस्या विस्तार से सुनायी। फिर आचार्य ने उनसे उनकी सम्पूर्ण सम्पत्ति और जुर्माने व देन-दारियों के रकम का योग करने को कहा। काफी समय तक हिसाब-किताब लगाने के पश्चात् सेठ ने बताया कि सम्पूर्ण सम्पत्ति की कीमत पचास लाख रूपये बैठती है। फिर आचार्य ने जुर्माने के 20 लाख और सभी देनदारियों का व्यय घटाने को कहा। वैसे तो इन सभी खर्चों में सेठ जी की बहुत बड़ी सम्पत्ति जा रही थी, पर इसके पश्चात् भी सेठ जी के पास दस लाख रूपये बचे हुये थे, जो कि तब भी बहुत थे। आचार्य ने कहा देखिये सेठ जी बीस लाख रूपये जुर्माने के और बीस लाख रूपये बाकी सभी देनदारियों के देने के पश्चात् भी आपके पास दस लाख रूपये बच जाते हैं और जहां तक मेरा ख्याल है, इतने पैसों से केवल आपका ही नहीं बल्कि आपकी आने वाली तीन पीढि़यों का भी गुजारा चल सकता है।
इतने पैसों से आप फिर से अपना व्यापार फैला सकते हैं और एक चिंता मुक्त, सुखमय जीवन जी सकते हैं। इससे न केवल आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा ही बची रहेगी, बल्कि आपका अमूल्य शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शांति भी आपका साथ नहीं छोड़ेगी। सेठ जी जरा सोचिये आपके पास तो अभी भी दस लाख रूपये बचे हुये हैं और मेरे पास तो अपना कहने को कुछ भी नहीं हैं। रूखी-सूखी खा लेता हूं और मजे से चैन की जिन्दगी जीता हूं, तन ढ़कने के लिये बस दो जोड़ी कपड़े हैं और बाकी जो कुछ भी अतिरिक्त मिलता है, वह सब समाज की सेवा में लगा देता हूं। इतने पर भी न तो मुझे किसी बात की चिन्ता है और न ही मुझे लोगो से मिलने वाले प्रेम, सहयोग और सम्मान में ही कोई कमी आई है। आचार्य की बाते सुनकर सेठ को आश्चर्य हुआ, यह कैसा संत है? जिसके पास कुछ भी नहीं फिर भी आनन्द में है और मेरे पास तो दस लाख हैं, तब भी मैं तनाव और चिन्ता में हूं। भविष्य की वह चिंता जो नकारात्मक दृष्टिकोण से उपजी थी और सेठ को रात-दिन खाये जा रही थी, तुरन्त ही दूर होकर हर्षातिरेक में बदल गयी।
सेठ ने कहा- मैं तो जीवन से बिल्कुल निराश हो गया था। एक आप हैं, जो अकिंचन होते हुये भी दिव्य सम्पत्ति के स्वामी हैं और मैं इतनी सम्पत्ति के होते हुये भी, इतना कुछ होने के बाद भी स्वयं को दुर्भाग्यशाली और कंगाल समझता रहा। वास्तव में जीवन सुख-दुःख की धूप-छांव है। यहां अगर आनन्द के अवसर आते हैं, तो साथ ही जिन्दगी को बोझिल बनते देर नहीं लगती और फिर मुश्किले इंसान को धीरे-धीरे वैसे भी चूर-चूर कर डालती है, जैसे नदी की तेज धार पत्थर को फोड़ डालती है। इसी तरह कोई भी सेठ अगर जो भी सम्पत्ति उसके पास है, उसके होते हुये भी खुद को कंगाल समझे और अमूल्य जीवन को नष्ट करने पर तुल जाये, तो इसका कारण मात्र इतना ही है कि उसके जीवन में स्वस्थ और संतुलित नजरिया का ना होना, सही दृष्टिकोण के अभाव में ही उसे उचित मार्ग नहीं मिल पाता, क्योंकि वे केवल अपनी मुश्किलो पर ही नजरे लगाये हुये रहते हैं और जब सारा ध्यान सिर्फ जीवन की मुश्किलो पर ही केन्द्रित होता है, तब हम उसे नहीं देख पाते हैं, जो पहले से ही हमारे अधिकार में होता है। ऐसी मनोस्थिति बन जाती है तब वह अन्य विकल्पों पर विचार ही नहीं कर पाता, इसलिये अपनी मनोस्थिति को उस सीमा तक ले जाओ, जहां पर भौतिकता का बहुत अधिक आडम्बर ना भी हो तो भी जीवन चलता रहे, ऐसी मनोभावों से आपूरित करने का प्रयास करो।
एक बार एक प्रोफेसर जैसे ही अपनी क्लास में आये, उन्होंने विद्यार्थियों से एक सरप्राइज टेस्ट लेने के बारे में कहा, सभी विद्यार्थी अपने-अपने डेस्क पर चिंतित होकर टेस्ट के बारे में सोच ही रहे थे, तभी प्रोफेसर ने सारी पत्रिका अपने हाथों में ली, प्रोफेसर के चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे टेस्ट बहुत मुश्किल होगी, उन्होंने एक-एक करके सारी प्रश्न पत्रिका विद्यार्थियों को दी और उसे पलटने को कहते हुए टेस्ट प्रारम्भ करने के लिये कहा, पेज पलटते ही सभी को आश्चर्य हुआ, क्योंकि वहां कोई प्रश्न नहीं लिखा हुआ था—–केवल पेज के बीच में एक काला डॅाट (बिन्दु) था।
प्रोफेसर शांति से सभी के हाव-भाव देख ही रहे थे, तभी उन्होंने बच्चों से कहा कि- मैं चाहता हूं कि तुम टेस्ट में वो लिखों, जो तुम्हें वहां दिखाई दे रहा है। इसे सुनते ही सभी विद्यार्थी बिना सोचे-समझे लिखने लगे। क्लास के अन्त में, प्रोफेसर ने सभी विद्यार्थियों की उत्तर पत्रिकाएं जमा की और जोर-जोर से विद्यार्थियों के सामने ही उसे पढ़ना शुरु किया, जिसमें सभी ने यही लिखा था कि पेज के बीच में एक काला धब्बा है या कुछ उस बिन्दु की स्थिति दर्शाये थे—और इस तरह सभी उत्तर पुस्किाएं पढ़ने के बाद पूरा क्लास रूम शांत था और तभी प्रोफेसर ने समझाना प्रारम्भ किया। मैं आपके इन उत्तरो पर आपको कोई ग्रेड नहीं देने वाला हूं, मैं तो बस आपको कुछ ऐसा काम देना चाहता था, जिसमें आपको थोड़ा सोचना पड़े, किसी ने भी अपने उत्तर पुस्तिका में उस सफेद पेपर के बारे में नहीं लिखा, सभी का ध्यान केवल उस काले डॅाट पर ही था।
इसी तरह हम सभी पेपर के सफेद भाग पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करते, हम उसकी चर्चा नहीं करते जो सफेद है, जिसमें जीवन बिना किसी धब्बे के चल रहा है, हमारा ध्यान उसी बिन्दु पर अटका रहता है जो काला है। ईश्वर ने हमें सब कुछ दिया है, बहुत से संसाधन, कार्य शक्ति, बुद्धि, विवेक, क्षमता, परिवार, मित्र, गुरु इतना सब कुछ होने के बाद भी यदि हम निराश होकर केवल काले दाग-धब्बे पर ही केन्द्रित हों तो, यह हमारी मूर्खता है। काले धब्बे में हमारे स्वस्थ की समस्या, धन की कमी, उलझे हुये रिश्ते आदि-आदि समस्यायें हैं, परन्तु इसके बाद भी यदि काले भाग की तुलना सुन्दर भागो से करें, तो सुन्दर भागों की तुलना में काला भाग बहुत ही छोटा होगा, लेकिन फिर भी उस छोटे भाग ने हमारी मनोस्थिति ही बदल डाली, हमें निराश कर दिया, इसी तरह सेठ जी भी केवल काले भाग को ही देख कर परेशान थे, इसके बाद भी उनके पास मार्ग था। लेकिन उनकी मनोस्थिति ऐसी नहीं बन पायी कि वे उस भाग को देख सकें, जहां से जीवन में अनुकूलता का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
हमें हमारे जीवन में ऐसी मनोस्थिति निर्मित करनी होगी, जो धैर्य, संयम, साहस और विवेक पूर्ण निर्णय ले सके, मुश्किलो, बाधाओं में हमारा मनोबल निर्बल ना बनने पाये इसके लिये हमें अनुभव की भावभूमि तैयार करनी पड़ेगी और अनुभव की भावभूमि साधना, तप, ध्यान, योग द्वारा निर्मित होती है, गुरु ज्ञान, चेतना, शक्ति से आप अनुभव की भूमि पर बीज रोपण कर सकते हैं। अपूर्व परिश्रम की इच्छा शक्ति से आप ऐसे मनोभूमि प्राप्त कर सकेंगे, जो आपके लिये अनुभव की जमीन तैयार करने में सहायक होगी, साधना, जप, तप कर जब तुम एक दिन अनुभवी बन जाओगे, जब तुम्हारे देह के भीतर साधना की ऊर्जा संचरित होने लगेगी, तब तुम स्वयं यह अनुभव कर सकोगे, कि तुम्हारी समस्याये तुमसे बहुत छोटी हैं, फिर घबराहट नहीं होगी, बल्कि तुम विपरीत परिस्थितियों का सामना करके अत्यधिक परिपक्व बनते जाओगे।
ऐसे ही दिव्य मनोभूमि पर तुम पहुंच सको, तुम्हारे जीवन में अनुभव की मजबूत मनोस्थिति निर्मित हो और तुम स्वयं में समर्थ, सक्षम बन सको ऐसा ही तुम्हें आशीर्वाद् देता हूं—————— मंगल कामना करता हूं———— —————————–कल्याण हो——–!!!
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,