





बहुत पुरानी बात है, धर्मदास अपने परिवार के साथ माधवपुर गांव में रहकर अपना व अपने परिवार का किसी तरह जीवन-यापन करता था, वह हमेशा अपने परिवार के भरण- पोषण के लिये चिंतित रहता था। धर्मदास बहुत धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था, एक बार उसने अक्षय तृतीया के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान किया, फिर विधि पूर्वक भगवान नारायण-लक्ष्मी की पूजा-अर्चना एवं आरती सम्पन्न की, इस दिन उसने अपने साम्थर्यानुसार सत्तू, चावल, नमक, गेहूं, गुड़, घी, दही, वस्त्र आदि भगवान को अर्पित कर ब्राह्मणों को दान कर दिया। यह सब देखकर कर धर्मदास के परिवार तथा उसकी पत्नी ने उसे रोकने की कोशिश की, उन्होनें कहा कि अगर धर्मदास इतना सब कुछ दान में दे देगा, तो परिवार का पालन-पोषण कैसे होगा? फिर भी धर्मदास अपने दान और पुण्य कर्म से विचलित नहीं हुआ। उसके जीवन में जब भी अक्षय तृतीया का पावन पर्व आया, प्रत्येक बार धर्मदास ने विधि सहित इस दिन पूजा, अर्चना एवं दान आदि कर्म किया, वृद्धावस्था की असमर्थता व परिवार के दायित्व भी उसे अक्षय तृतीया के व्रत, पूजन से विचलित नहीं कर पायी।
इस पुण्य के प्रभाव से धर्मदास ने अगले जन्म में राजा कुशावती के रूप में जन्म लिया। कुशावती राजा बहुत ही प्रतापी थे, उनके राज्य में सभी प्रकार का सुख-सुविधा, धन, आभूषण, सम्पत्ति थी, किसी भी प्रकार का कमी नहीं था। उनके शासन में प्रजा बहुत सुखी थी, अक्षय तृतीया के पुण्य प्रभाव से राजा को वैभव एवं यश की प्राप्ति हुयी, लेकिन वे कभी लालच के वशीभूत नहीं हुये एवं अपने सत्कर्म के मार्ग पर सदा चलते रहें। जिस प्रकार भगवान ने धर्मदास पर अपनी कृपा की वैसे ही जो भी व्यक्ति अक्षय तृतीया दिवस पर साधना, तप, पूजा, उपवास, दान आदि पुण्य कर्म सम्पन्न करता है, तो उसे अक्षय रूप से उसका सहस्त्र गुणा लाभ प्राप्त होता है। ऐसे साधक को अक्षय पुण्य एवं यश की प्राप्ति होती है।
जैन धर्म व अक्षय तृतीया
अक्षय तृतीया दिवस की जैन समुदाय में महत्वपूर्ण मान्यता है, कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकार भगवान आदिनाथ ने एक वर्ष तपस्या के पश्चात् अक्षय तृतीया दिवस पर इक्षु (गन्ना) रस पीकर व्रत परायण किया था।
जैन धर्म अनुसार प्राचीन समय में राजा ऋषभ देव सांसारिक सुखों व अपना राज्य-पाठ आदि को छोड़कर, धर्म के पथ पर अग्रसर हो गये थे। उन्होंने छः महीने तक अन्न-जल का त्याग कर तपस्या की, वे जैन धर्म के प्रथम दिगम्बर थे, जैन धर्म में मान्यता है कि कोई भी दिगम्बर संत सांसारिक सुख-धन, अन्न आदि का पूर्णतः त्याग कर प्राप्त भिक्षा पर जीवन यापन करें।
तपस्या के पश्चात् ऋषभदेव भोजन के लिये राज्य में भ्रमण करने लगे, परन्तु ऋषभदेव की प्रजा ने अपने पूर्व राजा को सोना, चांदी, हीरे, हाथी, घोड़े, कपड़े और कुछ ने तो अपने राजा की प्रसन्नता व सुख-सुविधा के लिये अपनी पुत्री तक दान में दे दी। परन्तु ऋषभदेव को तो भोजन की आवश्यकता थी। भोजन प्राप्त ना होने पर वे पुनः एक वर्ष की तपस्या के लिये चले गये और एक वर्ष तक उपवास रहे। एक वर्ष पश्चात् राजा श्रेयांश अपने आत्म प्रेरणा से ऋषभदेव के इच्छा को समझ गये और अक्षय तृतीया दिवस पर उनका उपवास परायण गन्ने का रस पिला कर किया।
इसीलिये अक्षय तृतीया को जैन धर्म में पारणा व्रत के रूप में सम्पन्न किया जाता है। इस दिन जैन लोग व्रत, उपवास रखकर गन्ने का रस, स्वादिष्ठ भोजन, मिष्ठान आदि से परायण करते है।
अक्षय तृतीया दिवस की अन्य महत्ता
अक्षय तृतीया भगवान परशुराम का जयन्ती दिवस है, जिसे वीर सिद्धि दिवस भी कहा जाता है। इसी दिवस पर भगवान विष्णु का षष्ठम अवतार परशुराम के रूप में हुआ।
त्रेता युग में भागीरथ ने पावन-पवित्र गंगा की धारा पृथ्वी पर अक्षय तृतीया दिवस पर लाया, जो अनवरत् सतत् रूप से जीवनदायिनी रूप में प्रवाहित है। इस दिवस पर लोग गंगा स्नान, पूजा आदि सम्पन्न करते हैं।
यह दिवस माँ अन्नापूर्णा की जयंती का भी है। इस दिन माँ अन्नपूर्णा का पूजन कर उनसे अन्न भण्डार को भरपूर रखने की प्रार्थना की जाती है।
दक्षिण भारत में इस दिन लक्ष्मी यंत्रम का पूजन विधि-विधान से सम्पन्न होता है। कहा जाता है इस दिन कुबेर ने शिवपुरम नामक जगह पर भगवान शिव की आराधना कर, उन्हें प्रसन्न किया था, कुबेर की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कुबेर से वर मांगने को कहा, कुबेर ने अपनी धन-सम्पत्ति पुनः प्राप्त करने की याचना की। भगवान शिव ने कुबेर को लक्ष्मी जी का पूजन करने को कहा, इसी दिवस पर कुबेर लक्ष्मी की तपस्या कर लक्ष्मीवान बने। इस दिवस पर लक्ष्मी आराधना करने वाले साधक कुबेरवत् धन की प्राप्ति करने में सफल होते हैं।
अक्षय तृतीय के दिन ही महर्षि वेदव्यास ने महाभारत लिखना प्रारम्भ किया था।
इसी दिन युधिष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुयी थी, इस अक्षय पात्र की विशेषता थी, कि इसमें से कभी भोजन समाप्त नहीं होता था।
महाभारत में अक्षय तृतीया की एक और कथा प्रचलित है, इसी दिन श्री कृष्ण ने कभी समाप्त ना होने वाली साड़ी से द्रौपदी के सम्मान की रक्षा की थी।
अक्षय तृतीया के दिन ही सुदामा- श्री कृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे थे, सुदामा के पास कृष्ण को देने के लिये केवल चार मुठ्ठी चावल ही थे, सुदामा ने उसे ही अपने परम सखा कृष्ण को भेंट किया था। अपने मित्र की यह स्थिति देख अंतर्यामी भगवान ने सुदामा की निर्धनता को दूर किया और सुदामा के झोपड़ी को महल में परिवर्तित कर उन्हें सभी सुख-सुविधाओं से सम्पन्न बनाया। इसलिये इस दिवस पर किये गये दान को अक्षय कहा जाता है और उस दान का सहस्त्र गुणा लाभ प्राप्त होता है।
उड़ीसा में अक्षय तृतीया दिवस किसानों के लिये शुभ माना जाता है, इस दिन किसान अपने खेत को जोतना शुरु करते हैं, जिससे फसल का क्षय ना हो, इस दिन उड़ीसा के जगन्नाथपुरी से रथ यात्रा भी निकाली जाती है।
बंगाल में इस दिवस पर गणेश-लक्ष्मी का पूजन कर व्यापारियों द्वारा नवीन बही-खाता प्रारम्भ किया जाता है। इसे यहां हलखता कहते हैं।
18 अप्रैल अक्षय तृतीया पर साधनात्मक क्रिया द्वारा आप अक्षय स्वरूप में लक्ष्मी की चेतना शक्ति से आप्लावित हो सकेंगे। इस हेतु अक्षय धनदा लक्ष्मी पादुका जो अक्षय शक्तिमय है, को स्थापित कर लक्ष्मी के स्थायित्व की प्राप्ति कर सकेंगे। साथ ही धन-सम्पदा, श्री, वैभव एवं लक्ष्मीवान बन सकेंगे और आपका जीवन सौभाग्य, समृद्धि, धन, वैभव, सम्पन्नता, प्रियता, लावण्यता, आभा, कान्ति तथा राजकीय शक्ति युक्त बन सकेगा। सही अर्थों में आप लक्ष्मी नारयणमय कर्म शक्ति चेतना द्वारा अपने जीवन का पालन-पोषण अपने पुरुषार्थ से भली-भांति पूर्ण करने में समर्थ हो सकेंगे।
प्रत्येक साधक-साधिका को इस दिव्यतम दिवस की चेतना को स्वयं के जीवन में धारण करने का विधान पूर्ण करना ही चाहिये। जिससे उनके जीवन में लक्ष्मी विष्णु नारायण की चेतना अक्षय रूप से विद्यमान रहे और वे इस नारायणमय कर्म शक्ति चेतना द्वारा अपने सांसारिक जीवन को श्रेष्ठमय बना सकें। जीवन के प्रत्येक सुकर्म का श्रेष्ठ सुफल प्राप्त करने में सफल हो सकें।
अक्षय धनदा लक्ष्मी पादुका न्यौछावर 600/-
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