





यदि आप शिष्य है, साधक है, शक्ति उपासक है, तंत्र-मंत्र के माध्यम से शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति से ओत-प्रोत होना चाहते है तो नवरात्रि की यह विशिष्ट त्रिगुणात्मक साधना सम्पन्न करने से निश्चित रूप से उक्त शक्तियों को पूर्णता से आत्मसात किया जा सकता हैं। जन्म से मृत्यु तक के जीवन काल में कोई सा दिन ऐसा नहीं जाता जब मनुष्य युद्ध न करता हो जीवन को जीना भी एक संघर्ष है और हर कदम को आगे बढ़ाने के लिए जूझना पड़ता है अर्थात् जीवन में श्रेष्ठतम स्थितियों को प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन युद्ध करना पड़ता है। सांसारिक जीवन में जो मनुष्य संघर्ष नहीं करता वह जीवन का श्रेष्ठतम सुख प्राप्त नहीं कर सकता। सुख का अनुभव दुख मिलने पर ही होता है और दुखों को समाप्त करने के लिए संघर्ष करके ही सुख का अनुभव प्राप्त होता है। जीवन का दूसरा नाम ही संघर्ष है और जो निरंतर क्रियाशील रहता है और वही विजय श्री को प्राप्त होता हैं।
नवरात्रि का यह विशेष पर्व अपने भीतर से अज्ञानता, दोष, कमियां, निकाल बाहर कर अपने भीतर शक्ति भरने का पर्व है, यदि संसार विपत्ति सागर है, तो उसमें से पूर्ण रूप से बाहर निकलने के लिए शक्तिवान होना ही पड़ेगा, अपने भीतर शक्ति सामर्थ्य भरनी पड़ेगी, यह शक्ति ही अपने अलग-अलग रूपों में विद्यमान हो कर साधक के कार्य सम्पन्न करती है।
मां दुर्गा के तीनों महान स्वरूपों के बारे में ‘‘श्री देव्यथर्वशीर्ष’’ में लिखा है कि ‘‘हे देवी! आप चित स्वरूपिणी महासरस्वती है, सम्पूर्ण द्रव्य, धन-धान्य रूपिणी महालक्ष्मी हैं तथा आनन्दरूपिणी महाकाली है, पूर्णत्व पाने के लिए हम सब तुम्हारा ध्यान करते हैं, हे! महाकाली, महासरस्वती, महालक्ष्मी स्वरूपिणी चण्डीके, आपको बारम्बार नमस्कार है, मेरी अविद्या, अज्ञान, अवगुण रूपी रज्जु की दृढ़ ग्रन्थी काट कर मुझे शक्ति प्रदान करें।’’
शक्ति प्राप्ति का तात्पर्य बल से नहीं लगाया जा सकता यद्यपि व्यवहार में शक्ति का प्रयोग इसी रूप में व्यवहृत किया जाता प्रकृति अर्थात् पराशक्ति त्रिगुणात्मिका स्वरूप को अपने में समाहित किए हुए है, जिसकी उपासना हम महासरस्वती, महाकाली एवं महालक्ष्मी के रूप में करते हैं।
नवरात्रि की मूल भावना इन्हीं तीनों शक्तियों की आराधना, साधना एवं इससे भी अधिक उनके वरदायक प्रभाव की प्राप्ति की कामना ही है। नवरात्रि की ये नौ रात्रियां अपने आप में तीन आदि शक्तियों अर्थात – सरस्वती शक्ति, दुर्गा शक्ति और लक्ष्मी शक्ति साधना द्वारा जीवन में अनुकूल करने की रात्रियां है। इन्हीं त्रिशक्तियों से ही जगत की समस्त शक्तियों का उद्भव का संचरण हुआ है। नवरात्रि की प्रथम तीन रात्रियों में शक्ति की उपासना की जाती है। इसके अगले दिन अर्थात् इन तीनों शक्तियों द्वारा वह अपनी आंतरिक एवं बाह्य आसुरी शक्ति पर विजय प्राप्त कर लेता है। भौतिक जगत में इस शक्ति का सबसे श्रेष्ठ स्वरूप महालक्ष्मी है, जो सीमा-रहित, नित्य निवासिनी विष्णु की नारायणी शक्ति है, और इसी शक्ति के विभिन्न स्वरूप लक्ष्मी, श्री, पद्मा, पद्मालिनी, कमला इत्यादि है, इस ‘‘अहन्ता’’ शक्ति की सिद्धि ही इस शारदीय नवरात्रि में सम्पन्न करना है। और यह विजय व्यक्ति को तभी प्राप्त हो सकती है, जब वह ज्ञान बुद्धि वाक् शक्ति के माध्यम से जीवन में सरस्वती के स्वरूप में चैतन्यता प्राप्त हो सकें। और इस ज्ञान बुद्धि के माध्यम से ही शारीरिक और मानसिक, आत्मिक शक्ति का संचरण कर दुर्भाग्य विनाशक विजय श्री ऐश्वर्य लक्ष्मी सौभाग्य युक्त वैभव लक्ष्मी को पूर्णता से अपने जीवन में स्थिपित कर सकें। तभी हम जीवन में समस्त सांसारिक सुखों को आश्विन नवरात्रि के इन विशेष दिवसों में देवी के त्रिगुणात्मक स्वरूप की तांत्रोक्त पद्धति से पूजन कर साधना करे। जीवन का श्रेष्ठ निर्माण इन्हीं तीनों शक्तियों से सम्भव है।
पवित्रीकरण
बाए हाथ में जल लेकर दाएं हाथ में ऊपर छिडके –
ऊँ अपवित्रः पवित्रे वा सर्वावस्थां गतोपि वा
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।
साधक अपने दायें ओर धूप, दीप जलाएं एवं
निम्न मंत्र बोलकर कुंकुंम, अक्षत, अर्पित करें –
भो दीप देव रूपस्वरूत्वं कर्म साक्षि कृत्
यावत् कर्म सामप्तिः स्यात् तावदत्र स्थिरो भव।
संकल्प
दाएं हाथ में जल लेकर संकल्प करें –
ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुःश्रीमद्भगवतो
महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्माणो
द्वितीय परार्द्धे श्वेत वाराह कल्पे दैवस्वत मन्वन्तरे
अष्टाविंशति कलियुगे कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे
भारतवर्षे आश्विन मासे शुक्ल पक्षे शनि वासरे,
अमुक गोत्रोत्पन्नोहं (गोत्र बोलें) अमुक शर्माहं (नाम
बोलें) भगवती दुर्गा प्रीत्यर्थ गुरोरज्ञया यथा
मिलितोपचारैः पूजनं अहं करिष्ये। (जल जमीन पर छोड़ दें)
कलश स्थापन
कलश में जल भर कर अपनी बाँयी ओर रखे, उसमें वरुण देवता का आवाहन करें। हाथ जोड़ कर बोलें –
सर्वे समुद्रा सरिता तीर्थानि जलदा नदाः।
आयान्तु देव पूजार्थ दुरितक्षय कारकाः।।
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठै रुद्रः समाश्रितः।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृ गणा स्थिताः।
कुक्षौ तु सागरा सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा।
ऋग्वेदोथ यजुर्वेदः सामवेदाः ह्यथर्वणः।
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समात्रिताः।
‘वं वरुणाय नमः’ मंत्र का 108 बार जप करें। फिर कलश में गंध, अक्षत, पुष्प डालकर सभी तीर्थो का आवाहन करें
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
ब्रह्माण्डोरदक तीर्थानि करैः पृष्ठानि ते रवेः।
तेन सत्यने मे देव, तीर्थं देहि दिवाकर।।
निम्न मंत्र बोलकर कलश की चार दिशा में कुंकुंम से चार बिन्दी लगाऐं
पूर्वे ऋग्वेदाय नमः। दक्षिणे यजुर्वेदाय नमः।
पश्चिमे सामवेदाय नमः। उत्तरे अथर्ववेदाय नमः।
इसके बाद नारियल को कलश पर स्थापित करें और कलश पर मौलि बांध दें। प्रत्येक साधना में एक नए नारियल की आवश्यकता होती है। कलश पर तिलक, अक्षत, पुष्पादि अर्पित करें और दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें –
भो वरुणा! प्रसन्नो भव, वरदो भव, अनया
पूजया वरुणादि आवाहिता देवता प्रीयन्ताम्।
गणपति स्मरण
अपने सामने पारदेश्वर विघ्नहर्त्ता गणपति पर निम्न मंत्र बोलकर पुष्प चढ़ाएं –
ऊँ लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः। ऊँ उमा
महेश्वराभ्यां नमः। ऊँ वाणी हिरण्य गर्भाभ्यां
नमः। ऊँ शची पुरन्दराभ्यां नमः। ऊँ इष्ट
देवताभ्यो नमः। ऊँ कुल देवताभ्यो नमः। ऊँ
ग्राम देवताभ्यो नमः। ऊँ स्थान देवताभ्यो नमः।
ऊँ वास्तु देवताभ्यो नमः। ऊँ सर्वेभ्यो देवभ्यो नमः।
सुमुखश्चतै कदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्न नाशो विनायकः।
धूम्रकेर्तुगणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशै तानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि।।
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।।
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके,
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते।।
आसन शुद्धि
अपने आसन के नीचे कुंकुंम से एक त्रिकोण बनाएं तथा निम्न मंत्र बोलकर उस पर पुष्प, अक्षत, कुंकुंम चढाएं।
ऊँ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना
धृता। त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु आसनम।।
दिग्बन्धन
बाएं हाथ में अक्षत लेकर निम्न मंत्र बोलकर सभी दिशाओं में अक्षत के दानें फेंके –
अपसर्पनतु ते भूता ये भूता भूमि संस्थिताः,
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते ते नश्यन्तु शिवाज्ञया।
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम्,
सर्वेषाम्अ विरोधोन पूजा कर्म शुभारम्भे।
गणपति पूजन
ऊँ गजाननं भूत गणधि सेवतिं, कपित्थ जम्बू
फल चारु भक्षणं। डमासुतं शोक विनाश
कारकं, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजं।।
ऊँ गं गणपतये नमः स्नानं समर्पयामि। वस्त्रं
समर्पयामि नमः। तिलकं अक्षतान् पुष्पाणि
समर्पयामि नमः। नैवेद्यं निवेदयामि नमः। (स्नान,
वस्त्र, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य अर्पित करें)
ऊँ नमस्ते गणपतये त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि,
त्वमेव केवलं कर्तासि, त्वमेव केवलं भर्तासि, त्वमेव
केवलं हर्तासि, त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि, त्वं
साक्षात् आत्मासि, नित्यमृतं वच्मि, सत्यं वच्मि।
गुरु पूजन
हाथ जोड़कर गुरुदेव से प्रार्थना करें
गुरुर्ब्रह्मा गुरुविष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
ध्यान मूलं गुरो मूर्तिः पूजा मूलं गुरोः पदम्।
मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं मोक्ष मूलं गुरोः कृपा।
श्री पारमेष्ठि गुरुं निखिलेश्वरानन्दं
आवाहयामि स्थापयामि नमः।
योगेश्वरः योगगम्यः योगक्षेम करस्तथा।
याजुष्यः योग निरतः योगानन्द समाहितः।
गुरु चित्र को स्नान कराकर कुंकुंम, अक्षत, पुष्पदीप अर्पित करें –
स्नानं समर्पयामि गुरुर्देवाय नमः।
गन्धं समर्पयामि अक्षतान् समर्पयामि।
धूपं दीपं पुज्पाणि समर्पयामि।
निम्न मंत्र बोलकर नैवेद्य अर्पित करें –
जगद्गुरुः जगन्नेता जगदन्तः जनार्दनः।
जयनेश्वरश्च विष्णुर्जगन्मंगल दायकः।
श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि।
दोनों हाथ में पुष्प लेकर ऊँ गुरुदेवाय नमः बोलकर साधना में सफलता की प्रार्थना कर गुरु चित्र पर चढ़ाएं।
भैरव स्मरण
हाथ जोड़कर भगवान भैरव का ध्यान करें –
तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पान्त दहनोपम, भैरवाय
नमस्तुभ्यं मनुज्ञां दातुमर्हसि। ऊँ भं भैरवाय नमः।
इस प्रारम्भिक पूजन के बाद विशेष साधना करें-
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