





यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है, कि संसार के प्रत्येक देश में भगवती लक्ष्मी की साधना, आराधना और उपासना होती है, वह चाहे अलग-अलग नाम से हो, अलग रूप में हो, अलग क्रिया-पद्धति से हो, परन्तु लक्ष्मी की मान्यता तो सम्पूर्ण विश्व में है ही, क्योंकि बिना लक्ष्मी के तो जीवन का आधारभूत सत्य ही समाप्त हो जायेगा।
दीपावली उत्सव प्रकाश का पर्व है, किन्तु यह प्रकाश स्थायी हो सके इसके लिए साधना के दीपकों को जलाना ही पड़ता है, जिनके प्रकाश में फिर पूरे वर्ष भर महालक्ष्मी आह्लाद पूर्वक विचरण कर सके। यह पर्व केवल लक्ष्मी पूजन की परम्परा निभाने का पर्व नहीं वरन बहुत पूर्व से तैयारी कर -‘महालक्ष्मी पर्व’ मनाने का है क्योंकि महालक्ष्मी का तात्पर्य होता है, लक्ष्मी के समस्त 108 रूपों की साधना और जीवन में उनको प्राप्त करना।
यह साधना शिविर तारा लक्ष्मी कुबेर तंत्र साधना शिविर है। यह अपने आप में पूर्ण अटूट स्वरूप में होते हुए भी सम्पूर्ण रूप से एक पद्धति है। जब जीवन की चर्चा होती है तो प्रत्येक दशा में धन की बात सबसे पहले होती है। भले ही व्यक्ति के साथ कई प्रकार की समस्याएं चल रही हों, किन्तु उसे धन की बाधा व्याप्त हो तो वह अपने शरीर और मन के कष्टों को भी दूर रख कर सबसे पहले धन की बात करना, धन प्राप्ति का उपाय जानना ही पसंद करता है। जीवन की अधिकांश समस्याएं धन के द्वारा ही दूर होती हैं। सही अर्थों में जीवन में धन बहुत कुछ महत्वपूर्ण स्थान रखता है। व्यक्ति का सारा चिंतन, उसकी मानसिक श्रेष्ठता, उसकी भावनाओं की ऊंचाई सभी कुछ उसकी आर्थिक स्थिति पर ही आश्रित होती है, और जब धन की बात आती है, स्थायी सम्पत्ति की और प्रचुरता की बात आती है।
धन की प्राप्ति के तो अनेक उपाय हैं, अनेक प्रकार की साधनायें हैं, लेकिन यही बात, यही उपाय मां भगवती जगदम्बे के शक्तिमय स्वरूप से जुड़ा हो और न केवल जुड़ा हो, वरन् उन्हीं का एक विशिष्ट स्वरूप हो, गुरु चरणों में गुरु गृह में साधनाएं और दीक्षा ग्रहण की हो तो तब असफलता कैसे आ सकती है?
जीवन में लक्ष्मी के सभी रूपों के संयुक्त प्रभाव से ही घटित हो सकती है, जीवन की ‘श्रीं’ वैभव ओर पूर्ण समृद्धि! दीपावली तो वर्ष का अद्भुत पर्व है। एक ओर घनी काली रात और दूसरी ओर पूर्ण आभामय स्वरूप में षोडश श्रृंगार किए इस धरा पर महालक्ष्मी का पदार्पण और फिर उनके पदार्पण से ही यह रात्रि बन जाती है साक्षात महारात्रि—– एक चैतन्य दिवस, इस बात को सूचित करता हुआ जब अंधकार की कालिमा सर्वाधिक घनी हो, तभी घटित होने के क्षण आते हैं, जीवन में उत्सव के, परिवर्तन की। दीपावली ऐसे ही दरिद्रता रूपी अंधकार के समाप्ति का पर्व है। आशा, आभा और प्रकाश के दीपक जलाकर आत्म चैतन्य होने का दिवस है।
किस प्रकार जीवन में लक्ष्मी के एक से अधिक स्वरूपों की साधना करके ही जीवन को अनेक प्रकार से सुखी व सम्पन्न बनाने के साथ अपनी विभिन्न मनोकामनाओं की भी पूर्ति की जा सकती है। केवल धनलक्ष्मी ही नहीं, यश लक्ष्मी, आयुलक्ष्मी, वाहन लक्ष्मी, स्थिर लक्ष्मी जैसे तारा लक्ष्मी के स्वरूपों को अपना कर ही सही अर्थों में लक्ष्मी की साधना की जाती है जिससे जीवन गगन मण्डल मैं तारों की तरह दैदीप्यमान बना रह सकें। यह सम्पूर्णता का पर्व है।
जीवन में घटित होने वाली विविध घटनाओं को देखते हुए एक साधारण व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता है, कि वह किस रूप में अपना जीवन प्रारम्भ करे। उसके जीवन का निर्माण उसके खुद के हाथों से निकल कर उन घटनाओं पर निर्भर हो जाता है, जो उसके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। और फिर वह अपने जीवन को एक निष्कंटक गति प्रदान करता हुआ सिर्फ जीवन व्यतीत करता रहता हैं। आज का मानव विवश दिखाई देता है, हारा हुआ, थका हुआ, निस्तेज दिखता है। वह किसी अन्य के लिए तो कुछ करने में असमर्थ होता ही है, खुद के लिए भी कोई ऐसा कार्य नहीं कर पाता, जिससे उसे सन्तुष्टि का अनुभव हो। यदि उससे पूछा जाये, कि क्या उसे अपने जीवन की कोई भी ऐसी घटना याद है जिसमें उसे प्रसन्नता मिली हो, उस समय वह निरूत्तर हो जाता हैं।
तारा महालक्ष्मी दीक्षा गुरु अपने शिष्य को तभी देता है जब वह देखता है कि अब उसे भौतिक क्षेत्र में परिपूर्ण कर ही देना है, अपूर्ण नहीं रखना है क्योंकि तारा दीक्षा सिर्फ लक्ष्मी के स्वरूप को ही ध्यान में रखकर नहीं प्रदान की जाती है, उसे आरोग्यता प्रदान करती है। यदि बीमारी के कारण उसकी देह निस्तेज हो गई है, तो उसका पूर्ण कायाकल्प कर उसके चेहरे को ओजयुक्त और प्रसन्न बना देती है, शत्रु फिर ऐसे साधक के जीवन में प्रविष्ट नहीं हो पाता है, फिर उसे अपने लक्ष्य की प्राप्ति में कोई बाधा या अड़चन नहीं आती है।
हम चाहे रूद्र की साधना करें और चाहे हम ब्रह्मा की साधना करे, इन्द्र, मरुद्गण, यम और कुबेर की साधना करें, किन्तु वैभव और धन की अधिष्ठात्री देवी तो तारा लक्ष्मी ही हैं, मात्र लक्ष्मी की साधना के माध्यम से ही व्यक्ति अपने अभावों को दूर कर सकता है, पूर्वजों से प्राप्त गरीबी और निर्धनता को हजारों मील दूर धकेल सकता है, सर्वथा रोग रहित होकर जीवन को आनन्ददायक बना सकता है, सम्पन्नता और वैभव का प्रदर्शन कर सकता है— और यदि लक्ष्मी की कृपा हो गई, तो मंदिर बना सकता है, धर्मशालायें बना सकता है, तालाबों का निर्माण करा सकता है और समाज सेवा के माध्यम से हजारों-लाखों लोगों का कल्याण कर सकता है। तारा लक्ष्मी की साधना से जहां व्यक्ति स्वयं अपने जीवन को श्रेष्ठ बना कर पूर्णता प्राप्त कर सकता है, वहीं परिवार और समाज के बहुत बड़े वर्ग को, सुख और सौभाग्य, आनन्द और मधुरता प्रदान कर सकता है।
1, 2, 3 नवम्बर दीपावली महोत्सव के पावन पर्व पर पूज्य गुरूदेव ने शिष्य व साधकों को दीपावली पर्व पर शिष्यों को अटूट धन प्रदायिनी महालक्ष्मी तारा साधना प्रत्यक्ष सम्पन्न कर साधक के जीवन में पूर्णरूपेण तारा स्वरूप में महालक्ष्मी स्थापित हो सकें। आप सभी साधक-साधिकाओं को यह संकल्प ले कर आना होगा कि अब हम लक्ष्मी सिद्ध कर के ही रहेंगे और जब स्वयं गुरुदेव के सानिध्य में और विशेष चैतन्य महालक्ष्मी दिवसो में आप साधना सम्पन्न करेंगे तो फिर असफलता की संभावना भी कहा है। कुछ जरुरत है तो वह है स्वयं पर और उस से भी कहीं अधिक अपने गुरु पर विश्वास होना चाहिए।
यहां यह बात बतानी अत्यन्त ही आवश्यक है कि ये विशेष दिवस हर मास संपन्न होने वाले साधना शिविरों से अलग है। यहां हम केवल उन दृढ़ निश्चयी साधकों का आवाहन कर रहे हैं जो समाज की भेड़-चाल से अलग हट कर कुछ विशेष करना चाहते हैं और अपनी पहचान साधनात्मक और भौतिक जगत में बनाना चाहते हैं, जिनके लिए गुरु से प्राप्त साधना, मंत्र व दीक्षा का विशेष महत्व है। गुरुदेव का यह आवाहन ऐसे ही साधकों के लिए है जो इस सुअवसर पर पूर्णरूपेण श्रेष्ठता प्राप्त करना चाहते हैं और इसलिए इस शिविर में भाग लेने के लिए कुछ नियम हैं जो हर साधक को मान्य होने चाहिए।
नियम
1- तीन दिवसीय शिविर का उद्देश्य साधना को पूर्णरूपेण साधक के जीवन में उतारने की क्रिया स्वरूप हैं। इसी कारण केवल वे साधक ही आयें जो साधना सिद्धि के आकांक्षी हों।
2-प्रत्येक साधक को प्रातः 4:00 बजे उठना है और अपनी पूजा-साधना प्रारम्भ करनी है।
3- साधक अपने साथ स्वच्छ पीली धोती, गुरु चादर, आसन, पंच पात्र और सद्गुरुदेव का चैतन्य चित्र लेकर आयें, जिससे शुद्ध भाव से दीपावली पूजन सम्पन्न किया जा सकें।
4- साधना काल में व्यर्थ की बातों में समय व्यय न कर गुरुदेव के सानिध्य में मंत्रात्मक साधना क्रिया सम्पन्न कराई जायेगी। जिससे आप साधना को पूर्णरूपेण आत्मसात कर सके।
5- साधना दिवसों में बाहर का खाना व पानी पीना वर्जित है। गुरुधाम में ही सभी साधकों को भोजन प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना है। जिससे आपको किसी प्रकार का अन्न दोष न लगे।
6- किसी भी प्रकार का व्यसन सर्वथा वर्जित है।
7- आपको रहने, खाने पीने का कोई अन्य व्यय नहीं उठाना है। यह स्नेह आपको गुरुदेव की ओर से ही प्रदान किया जायेगा।
8- प्रत्येक साधक को अपना पंजीकरण 13-अक्टूबर विजय दशमी तक सुनिश्चित करवा लेना अनिवार्य है। गुरुदेव द्वारा आपको पूर्ण चैतन्य साधना सामग्री, मंत्र साधना विधान, लक्ष्मी पूजन पैकेट एवं चैतन्य ‘अटूट धन प्रदायिनी महालक्ष्मी तारा दीक्षा ’प्रदान की जायेगी।
9- केवल साधना में भाग लेने वाले साधक ही पंजीकरण कराये और अपने साथ परिवार के अन्य सदस्यों को साथ नहीं लाये। बहिन, बेटियाँ, माँतायें अकेली कभी नहीं आये। यह साधनात्मक वातावरण बनाये रखने की दृष्टि से अनिवार्य है।
पंजीकरण शुल्क 4100/-
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