





इन सब के मूल्याकंन का आधार, मनुष्य का अपने स्वयं का अनुभव ही है। भूतकाल का लेखा-जोखा कर भविष्य की रूप रेखा बनाई जा सकती है। अनुभव जन्म से किसी को प्राप्त नहीं होते है। वह तो स्वयं जीवन की सम-विषम परिस्थितियों को झेलते हुए जो क्रिया सम्पन्न होती है वे ही अनुभव बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को दयनीय कहा जा सकता है जिसका भविष्य उसके पीछे और भूतकाल उसके सम्मुख रहता है। जिस समय भी जो निर्णय भूतकाल में लिया वह उस समय को देखते हुए श्रेष्ठ निर्णय लिया था उसके सम्बन्ध में बार-बार रोने से भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता। जीवन अपना है और उसका निर्णय करना मनुष्य की स्वतंत्रता है। सही आर्थों में मनुष्य वही है जो मन-मस्तिष्क और भावना से युक्त हो । जब मन विचलित होता है तो मनुष्य विचलित होता है। शुद्ध मन से शुद्ध भाग हैं एक भाग २ बाह्य इन्द्रियों (चक्षुओं) द्वारा जो कुछ देखता है उसे ग्रहण करता है। दूसरा भाग उन सब का विवेचन करता है। इसलिए मन के प्रथम भाग को मानस और द्वितीय भाग को बुर्दधि कहा गया है। श्रेष्ठ व्यक्ति उसे ही कहा जा सकता है जिसके मानस और बुद्धि में सही तारम्यता हो। संदेहात्मक, संशयात्मक स्थिति में बुद्धि ही मानस पर हावी होकर उसे सही निर्णय की ओर अग्रसर करती है। लेकिन यह मानस और बुर्दि का समन्वय बहुत कम लोगों में ही संभव हो पाता है।
ज्यादातर लोग विश्रम की स्थिति में रहते हैं और मानस और बुद्धि में अंतर बना रहता है और जितना अधिक अंतर बना रहेगा उतनी ही अंर्तद्वन्द्रता की स्थिति बनती है। इसी स्थिति में मनुष्य जो देखता है, सुनता है, उसी को सत्य मान लेता है। स्वयं निर्णय नहीं लेता स्थितियां निर्णय लेती है और मनुष्य परिस्थितियों के नियंत्रण में जकड़ा हुआ जीवन-यापन करता है। यह स्वतंत्रता की स्थिति न होकर परतंत्रता की स्थिति है। जब तक अपने आप में मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकेगें तो स्वतंत्रता कैसी?
क्या धर्म का तात्पर्य मात्र पूजा पाठ व आरती है?
क्या धर्म मानस और बुद्धि को परतंत्र रहने की सलाह देना है?
हमारे धर्म, हमारी संस्कृति में कोई ऐसी विधि नहीं थी ।
इस देश के धर्म और संस्कृति को सबसे अधिक नुकसान तथाकथित पण्डितों और व्याख्याकारों ने ही पहुंचाया है उन्होने अपने ज्ञान के अनुसार ही शब्दों की व्याख्या की और उसे तोड़ मरोड़कर पेश किया, तक-कुतक किये, वाद-विवाद किये, शास्त्रार्थ किये। कहीं भी किसी ने शुद्ध रूप में उसे रखने का प्रयास ही नहीं किया, इसी कारण सामान्यजन धर्म और संस्कृति से कटता ही चला गया। जब शरीर के साथ आत्मा भी पराधीन हो जाती है तो उस संस्कृति का पतन प्रारम्भ हो जाता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि जितने भी पंथ सम्प्रदाय हुए हैं वे अपने ज्ञान का आधार ऋग्वेद, यर्जुवेद, सामवेद, अर्थवेद और उपनिषदों को ही बताते हैं। जब पूरे आर्यावर्त में वेद एक ही है तो फिर इतनी सांस्कृतिक दरिद्वता क्यों है ?
उपनिषदों में लिखे अंशों को समझने के लिए किसी ऋषि-मुनि, तपस्वी, शिक्षक, व्याख्याकार की आवश्यकता है ही नहीं। ये सारे श्लोक तो जीवन से जुड़े हैं और जो धर्म संस्कृति की परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते हुए नवीनता से युक्त रहती है वहीं संस्कृति चिरयौवन रहती है।
इला सरस्वती मही तिस्त्रो देवीमयोभुवः।
बर्हि सीदन्त्वस्त्रिध: ।।
( 13/9 ऋग्वेद )
भूमि, सरस्वती और वाणी ये तीन देवियां जीवन में सुख देने वाली हैं, ये जीवन में कभी भी क्षीण न होते हुए सदैव आसीन रहें ।
इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि थेहि चित्ति दक्षस्य सुभगत्वमस्ते ।
पीष स्यीणामरिष्टिं तनूनां वाचः सुदिनत्वमहाम् ।।
( 21/3 ऋग्वेद )
हे देवाधिदेव इन्द्र! हमें श्रेष्ठ सम्पति दें, विचारों में बल और सौभाग्य के साथ द्रव्य की अभिवृद्धि और शारीरिक निरोगता, वाणी की मधुरता और समय की उत्तमता प्रदान करें।
अति तृष्टं ववक्षिथा थैव सुमना असि।
( 9/3 ऋग्वेद )
हे अग्नि आप दहन के समय जिस उत्साह से शब्द करते हैं उसी प्रकार का जीवन उत्साह हमें प्राप्त हो ।
धिया चक्रे वरेण्यो।
( 27/9 ऋग्वेद )
बुद्धि द्वारा कर्म करने वाला मनुष्य अन्य लोगों के लिए वरण-अनुसरण करने योग्य हो ।
कर्मभिम्महार्दि: सुश्रुतो भूत्।
( 36/1 ऋग्वेद )
मनुष्य अपनी कर्म शक्ति से ही प्रसिद्ध होता है।
अत्रा न हार्दि क्रवणस्य रेजते यत्रा मर्तिर्विद्यते पूतबन्धीन ।
( 44,/9 ऋग्वेद )
जिसके जीवन में बुद्धि और पवित्रता का संयोग होता है उस व्यक्ति के कर्म, उसके हृदय के मनोरथ, सदैव सफल होते ही हैं।
यजस्व तन्वं तव स्वाम।
( 11/2 ऋग्वेद )
अपने स्वभूत तन का, देह का पोषण कर उसे निरोग बनाओ।
ते मनो विष्वप्रन्वि चारीत।
( 25/1 ऋग्वेद )
वश होकर हित में ही संलग्न रहे ।
धिया विप्रो अजायत।
( 6/28 ऋग्वेद )
बुद्धि से व्यक्ति विद्वान बनता है।
क्षेत्रविक्धि दिश आहा विपुच्छते।
( 70/9 ऋग्वेद )
अपने क्षेत्र को जानने वाला व्यक्ति ही उस क्षेत्र के संबन्ध में पूछने वाले को ज्ञान दे सकता है।
त्रयम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योमुक्षीय मामृतात् ।।
( 3/60 ऋग्वेद )
हे महादेव ! हमारा जीवन सुगंधयुक्त, पुष्टिवर्धक एवं दिव्यता से युक्त हो, जीवन में तीनों स्थितियां प्राप्त होने पर हम मृत्यु भय से मुक्त होकर उसी प्रकार अलग हो जायें, जिस प्रकार पूर्ण पका हुआ फल वृक्ष से अलग हो जाता है।
वात्रस्पतिवाज नः स्वदतु स्वाहा।
( 1/9 यजुवेद )
वाणी की अधिपति हमारी वाणी को मधुर बनायें ।
वाजश्च में प्रसवश्च में प्रयतिश्च में
प्रसितिश्च में धीतिश्च में क्रमुश्च में स्वश्च
में श्लोकश्च में श्रवश्च में श्रुतिश्च में
ज्योतिश्च में स्वश्च में यज्ञेन कल्पन्ताम् ।
( 17/1 यजुवेद )
इस यज्ञ में मेरे लिये अन्न और ऐश्वर्य रत्न शक्ति, विचार शक्ति, कर्म शक्ति, स्वर शक्ति, यज्ञ एवं स्तुति, श्रवण शक्ति, करण शक्ति, तेजस्विता और आत्मशक्ति प्राप्त हो ।
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षायाऽऽप्नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोत श्रद्धया सत्यमाप्यते।।
( 19/30 यजुवेद )
दृढ़ संकल्प से दक्षता प्राप्त होती है। जो दीक्षा से युक्त होती है, दीक्षा से श्रद्धा और श्रद्धा से सत्य प्राप्त होता है।
ऋचं वाचं प्र पद्ये मनो यजुः प्र पद्ये साम प्राणं प्र पद्ये।
चक्षुः श्रोत्रं प्र पद्ये। वागोज: सहौजो मयि प्राणाणनौ ।।
( 36/1 यजुवेद )
वाणी द्वारा ऋग्वेद की शरण लेता हूं, मन द्वारा यर्जुवेद की, प्राण द्वारा सामवेद की, श्रोत्र द्वारा अर्थवेद की शरण लेता हूं। मेरे अंदर वाणी और बल ऐक्य और बल व प्राण शक्ति स्थिर हो ।
पूरे वेदों में मनुष्य की देह, विचार, बुद्धि, बल, निरोगता, ज्ञान के सम्बन्ध में ही लिखा है। साथ ही जीवन धर्म से सम्बन्धित वचन है और मूल रूप से जीवन की आवश्यक तत्व भूमि अग्नि वरूण सूर्य इन्द्र इत्यादि को अपने जीवन में उतारने की क्रिया है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या इन श्लोकों को समझने के लिए व्याख्याकारों की आवश्यकता है। व्याख्याकारों ने इसी सरल ज्ञान को इतना अधिक उलझा दिया है कि सामान्य जन के जीवन से वेद एक प्रकार से हट ही गये हैं।
माया और अमाया, द्वैत-अद्वैत, अद्वैतादैत, ब्रह्म, परब्रह्म इत्यादि के चक्कर में उलझते ही गये। इतनी अधिक कलिष्ट भाषा का उपयोग हुआ कि व्यक्ति आत्मा शब्द से डरने लगा। उसे वेद, उपनिषद इत्यादि बहुत दूर की बाते समझ पड़ी और भक्ति मार्ग में जिस प्रकार तोता रटन्त की क्रिया होती है उस क्रिया हो ही योग्य समझने लगा। कही देवी-देवताओं के चार हाथ, आठ हाथ बनाने शुरू कर दिये तथा कथित पण्डितों ने जो कुछ भी लिखा वही उसके लिए भगवान का स्वरूप बन गया।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में महर्षि अरविन्द, विवेकानन्द इत्यादि ने संस्कृति और धर्म की व्याख्या दी। हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति की विशुद्ध रूप को समझाया लेकिन हजार साल में खण्ड खण्ड में बंटा देश का व्यक्ति अपने स्थान पर ही सिकुड़ कर रह गया। सांस्कृतिक चेतना की लहर एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं फैल सकी। चेतना जो उसे चैतन्य कर सके, ऐसी स्थिति इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि धर्म के नाम पर देश जाति, सम्प्रदाय, मतमतान्तर के कुचक्र में उलझा हुआ था। अपने आप को विकसित करने के बजाय दूसरे सम्प्रदाय को कुचल देना ही धर्म था।
सद्गुरुदेव ने हर समय यही कहा कि लकीर के फकीर मत बनो। प्रत्येक शब्द को स्वयं समझो और जब समझ में आ जाये तब उसे क्रिया रूप में प्रणीत करो | सम्पूर्ण भारतीय ज्ञान केवल महापण्डितों, शास््त्रकारों, व्याख्याकारों के लिए ही नहीं बनाया गया है। यह ज्ञान तो तुम्हारे के लिए ही बनाया गया है। जरुरत इस बात की है कि तुम इस ज्ञान को स्वयं आत्मसात करने के लिए आगे बढ़ो न कि किसी के बताये ज्ञान तक ही सिमट कर रह जाओ।
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