





जोधपुर की दिव्य भूमि पर आपका स्वागत है। आतुर हैं गुरूदेव आपको अपने रंग में रंगने के लिये-
भंवरों की गुनगुन, चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की कूक जब पूरे वातावरण को गुंजयमान कर देती है, जब पेड़-पौधे नवागत पत्तों के हरे-भरे रंगों से अपने आप को सजा-संवार लेते है, तब तितलियां झूमती हुई, फूलों पर इधर-उधर भ्रमण करने लगती हैं, जब हिरण भी कस्तूरी की सुगन्ध से आकर्षित हो इधर-उधर नाचने-कूदने लगते है, तो फिर सम्पूर्ण प्रकृति रंग-बिरंगे रंगों से सुशोभित हो पूर्ण श्रृंगार युक्त दिखाई देने लगती है, जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रही हो, खिलखिलाती, मुस्कराती अपने पूर्ण सौन्दर्य के साथ…….
….. क्योंकि किसी के आने की आहट उसके कानों में पहले से ही सुनाई देने लगती है, उसके श्वासों की सुगन्ध पुरवाई बनकर चारों ओर महकने लगती है, जिसके लिए वह सजी है, जिसके लिए उसने स्वयं को सुन्दर और आकर्षित करने वाले वस्त्रों से सजाया है और जिसकी प्रतीक्षा में रत, वह पूर्ण श्रृंगार युक्त हो आंखें बिछाये खड़ी है, क्योंकि उसने उसके जीवन को चैतन्यता दी है, जीवन्तता दी है, प्राणश्चेतना दी है, वह उसी को तो निहार रही है अपने सुन्दर, कटीले नेत्रों से एकटक, इतनी कोमलता और सौन्दर्य को देख मेघ भी हर्षित हो उठते हैं, और बरस उठते है पूरे वेग के साथ अपनी शीतल वर्षा से अवनि की चुनर को रंगने के लिए, उसे अपने प्रेम में आनन्द से सरोबार कर देने के लिए बेसुध कर देने के लिए, वही, और केवल वही क्षण तो होता है, उस आनन्दित कर देने वाली फुहार में भीगने और भिगो देने का, और केवल वही तो रंग होता है रंग जाने का उस शीतल और मदमस्त फुहार में।
होली का आगमन सभी के प्राणों को झंकृत कर देता है, सभी के दिलों में उमंग, उल्लास, जोश भर देता है, सभी उमंगित हो, उल्लसित हो नाचने-झूमने लगते है, सभी भंवरे की भांति फूलों का रस पी मतवाले हो गुन-गुन कर छलिया बन गाने लगते हैं।
होली ‘राग और रंग’ का पवित्र त्यौहार है। होली के आगमन से पूर्व ही जन-जीवन में बसंत अपनी मादकता का प्रभाव दिखाने लगता है, सबके दिलों में एक उमंग की लहर सी दौड़ने लगती है, जन-जीवन में उत्साह का, प्रेम का संचार होने लगता है। हम जहां प्रकृति से उन्मुक्त भाव से हंसना, गाना सीखते हैं, वहीं लोक-संस्कृति की आत्मा से फूटते रस भरे गीत भी सुनते हैं, और तब लोक-संस्कृति तथा गीतों की मधुमय सुगन्ध से समस्त प्रकृति मदमस्त हो उठती है।
‘होली’ शब्द सुनते ही द्वापर युग की याद हो आती है, जब कृष्ण राधा और गोपियों के साथ यमुना तट पर होली खेला करते थे, अत्यन्त तन्मयता और मस्ती भरी होली, जब राधा और समस्त गोपियां कृष्ण के ही रंग में रंग गई थी, जब उन्होंने अपने तन-मन पर कृष्ण की ही मनमोहक छवि अंकित कर ली थी, जब उन्होंने कृष्ण के ही रंग में रंगी चादर को तन पर ओढ़ लिया था, तभी तो होली का नाम लेते ही ‘ब्रज की होली’ का स्मरण सर्वप्रथम आता है, एक ऐसा श्यामल रंग, जो कभी नहीं उतरा, और न ही कोई दूसरा रंग उस पर चढ़ सका।
….इतना गहरा, इतना सुन्दर, इतना आनन्दित कर देने वाला, कि उसके आगे तो सभी रंग फीके नजर आते है, जिसके तन को ही नहीं, अपितु पूरे जीवन को ही रंग दिया, उस प्रेम, रस और आनन्द की फुहार से, जो तन-मन पर वर्षा बनकर बिखरा था उन गोप-ग्वालों और गोपिकाओं को प्रेम रस में भिगो देने के लिए, जिसका प्रत्यक्ष दर्शन हमें कवियों के गीतों और कविताओं में स्पष्ट झलकता है, और उनसे ही पता चलता है कि वह दृश्य वह आनन्द, वह रंग क्या था, और कैसा था, जिसमें वे रंगे थे, जिसमें वे लीन हुए थे, जो उनके जीवन का आनन्द था? कैसा था वह रंग बसंती, जिसने उन ब्रजवासियों को बेसुध कर, असीम आनन्द की उपलब्धि प्रदान की थी?
होली का पर्व पूर्णिमा के दिन आता है और इस रात्रि से ही जिस काम महोत्सव का प्रारम्भ होता है उसका भी पूरे संसार में विशेष महत्त्व है क्योंकि काम शिव के तृतीय नेत्र से भस्म होकर पूरे संसार में अदृश्य रूप में व्याप्त हो गया। इस कारण उसे अपने भीतर स्थापित कर देने की क्रिया साधना इसी दिन से प्रारम्भ की जाती है। सौन्दर्य, आकर्षण, वशीकरण, सम्मोहन, उच्चाटन आदि से सम्बन्धित विशेष साधनाएं इसी दिन सम्पन्न की जाती है। शत्रु बाधा निवारण के लिये, शत्रु को पूर्ण रूप से भस्म कर उसे राख बना देना अर्थात् अपने जीवन की बाधाओं को पूर्ण रूप से नष्ट कर देने की तीव्र साधनाएं महाकाली, चामुण्डा, भैरवी, बगलामुखी, धूमावती, प्रत्यंगिरा इत्यादि साधनाएं भी प्रारम्भ की जा सकती हैं तथा इन साधनाओं में विशेष सफलता शीघ्र प्राप्त होती है।
गुरू के रंग में रंग जाने के लिये ही हमें प्रेरित करता है यह होली का पावन त्यौहार, जो मनुष्य के समस्त विकारों को दूर कर, उन्हें प्रेम के रस में आप्लावित कर देने का पर्व है।
पूज्य गुरूदेव तो एक चित्रकार की भांति अपने प्रत्येक शिष्य के गृहस्थ जीवन में सुन्दर और आकर्षक रंगों की रंगोली बनाकर उनको अपने दीक्षा, शक्तिपात और विभिन्न विशिष्ट साधनाओं के गेरूए रंग में रंगने के लिए हर क्षण तत्पर है, और होली का त्यौहार ही मात्र ऐसा पावनतम पर्व है जो विभिन्न रंगो को अपने में समेटे हुए, सभी को एक रंग में रंग देने का उत्सव है, जिसे पूज्य गुरूदेव के सान्निध्य में जोधपुर में मनाया जा रहा है।
जोधपुर ऐसी पावनतम, चैतन्यता युक्त, पवित्र एवं दिव्यतम स्थली है, जहां लगता है मानो सिद्धाश्रम ही इस धरती पर उतर आया हो, जहां गुरूदेव विराजमान हैं…. और गुरूदेव के रंग में रंग जाना तो प्रत्येक शिष्य के जीवन की प्रथम और अंतिम कामना है, एक बहुत बड़े सौभाग्य की बात है, जब इस पृथ्वी पर साक्षात पूज्य गुरूदेव के सान्निध्य में हम होली खेलेंगे…. तो कौन नहीं रंगना चाहेगा उस पावनतम रंग में, जिसे प्रेम, आन्नद और पूर्णता कहते है, जिसे जीवन की सर्वोच्चता कहते हैं।
हे गुरूदेव! इस रंगोत्सव पर हमारे जीवन की समस्त न्यूनताओं को दूर कर, अपनी प्रेममयी कृपा दृष्टि से हमें रंग दीजिये न….. जो रंग मस्ती, जोश, उमंग भर देने वाला है… जो रंग आनन्द से सरोबार कर देने वाला है…. मदमस्त कर देने वाला है….प्रेम रस में डूबो देने वाला है.. जिसके आगे हर रंग फीका है…. हर रंग बेमानी है… ऐसे ही रंग में रंग दो भगवन्! जो कभी ना छूटे… हे प्रभु! मेरी चुनरिया ऐसी रंग दो, कि यह रंग जीवन भर चढ़ा ही रहे, छूटे नही-
होली का पर्व ….. दो महापर्वो के ठीक मध्य घटित होने वाला पर्व! होली के पंद्रह दिन पूर्व ही सम्पन्न होता है महाशिवरात्रि का पर्व, और पन्द्रह दिन बाद चैत्र नवरात्रि का। शिव और शक्ति के ठीक मध्य का पर्व और एक प्रकार से कहा जाए तो शिवत्व के शक्ति से सम्पर्क के अवसर पर ही यह पर्व आता है। जहां शिव और शक्ति का मिलन है वहीं ऊर्जा की लहरियों का विस्फोट है और तंत्र का प्रादुर्भाव है, क्योंकि तंत्र की उत्पत्ति ही शिव और शक्ति के मिलन से हुई। यह विशेषता तो किसी भी अन्य पर्व में सम्भव ही नहीं और इसी से होली का पर्व वर्ष का श्रेष्ठ पर्व, साधना का सिद्ध मुहुर्त, तांत्रिको के सौभाग्य की घड़ी कहा गया हैं।
परमवन्दनीय माताजी एवं सद्गुरूदेव के साथ जोधपुर स्थित सभी शिष्य आपको आमन्त्रित करते है, होली पर्व गुरूमय में पूर्ण आनन्द के साथ सम्पन्न करते हुए गुरू रंग में रंगने को……..
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