





बहुत लोग शास्त्रों से केवल शब्द ही ले पाते है। तो उन्होंने कुछ भी नहीं लिया। तो यात्रा व्यर्थ हो गई। वे चले ही नहीं। उन्होंने सिर्फ सोचा, सपना देखा चलने का। चलने के सपने से कोई यात्रा पूरी नहीं होती। चलना होता है, वस्तुत चलना होता है।
यही अर्थ होगा कि जो ठीक लगा, वह केवल बुद्धि में न रह जाए, परिव्याप्त हो जाये समग्र जीवन पर उसका स्वाद फैल जाये तन-मन आत्मा में। उसका स्वाद तुम्हारे प्राणों को संगृहीत कर दे, तुम्हारे बिखरे टुकड़ो को जोड़ दे। उसके स्वाद का धागा तुम्हें माला बना दे- अनस्यूत हो जाये।
सूत्रों पर विचार करने का तो अंतिम दिन आ गया, लेकिन यह जिज्ञासा तो दार्शनिक मनोमंथन हुआ। यह तो ऊहापोह हुआ। यह ऊहापोह शुभ है, यदि चला दे। अगर चलाए न, तो किसी काम का नहीं। यह पुकार जो दूर से सुनाई पड़ी है, सदियों को पार करके आई है, इसे मैने फिर से पुनरूज्जीवित किया। ऐसा मत समझ लेना कि तुम समझ गये। समझ से ही अगर काम पूरा होता तो विश्वविद्यालयों में ज्ञानियों का जन्म हो जाता। फिर पंडित प्रज्ञावान हो जाते।
प्रसिद्ध कथा है कि शंकराचार्य उस समय के प्रकांड पंडित मंडन मिश्र से विवाद करने गये। मंडन मिश्र रहते थे मंडला में। मंडला का नाम ही मंडन के नाम पर पड़ा। जब शंकर वहां पहुचे…. शंकर तो युवा थे, मंडन की बड़ी ख्याति थी, शंकर को कोई जानता भी नहीं था.. नगर के बाहर ही घाट पर पानी भरती स्त्रियों से उन्होंने पूछा कि मैं महापंडित मंडन मिश्र की तलाश में आया हूं, उनके घर का पता क्या है?
वे स्त्रियां हंसने लगी, और उन्होंने कहा, मंडन मिश्र का घर भी पूछने की कोई जरूरत है! तुम चले जाओ नगर में, जिस द्वार पर बैठे हुए तोते और मैनाएं उपनिषदों के, वेदों के वचन दोहराते हो, समझ लेना कि वही मंडन मिश्र का घर है।
चमत्कृत शंकर गांव में प्रवेश किये। और निश्चित ही मंडन मिश्र के द्वार पर पक्षी शुद्धतम रूप में वेदों के वचन उद्धृत करते थे, उपनिषद दोहराते थे, गीता का गान करते थे। सैकड़ो विद्यार्थी आ-जा रहे थे। मंडन की ख्याति दूर-दिगंत तक थी। दूर-दूर देशों से विद्यार्थी उनके पास सीखने आते थे।
बहुत चकित हुए शंकर! और जब मंडन से मिले तो और भी चकित हुए। और उन्होंने मंडन से कहा, तुम्हारे द्वार पर ही तोते उपनिषद और वेद का पाठ नहीं करते, मैं तुम्हें भी देखता हूं कि तुम भी एक तोते हो। कंठ तक ही बात पहुंची है। बुद्धि तक बात पहुंची है, तुम्हारा हृदय, तुम जो कह रहे हो, उसके पीछे नहीं है। यह तुम्हारे प्राणों का आविर्भाव नहीं है।
ऐसा ही समझो न, बाजार से एक प्लास्टिक का फूल लाकर तुम किसी वृक्ष पर टांग दो। शायद दूर से धोखा दे जाये कि असली फूल है, भ्रांति हो जाये। लेकिन पास आओगे तो समझ न पाओगे कि इस फूल में वृक्षों के प्राणो का संयोग नहीं है, वृक्ष की रसधार इस फूल में बहती नहीं है? वृक्ष की जड़ से यह फूल जुड़ा नहीं है?
ज्ञान अगर प्लास्टिक के फूल जैसा वृक्ष पर लटका हो,तो आदमी पंडित होता है। और जब असली फूल है, भ्रांति हो जाए। लेकिन पास आओगे तो समझ न पाओगे कि इस फूल में वृक्षों के प्राणो का संयोग नहीं है? वृक्ष की रसधार इस फूल में बहती नहीं है? वृक्ष की जड़ से यह फूल जुड़ा नहीं है?
ज्ञान अगर प्लास्टिक के फूल जैसा वृक्ष पर लटका हो, तो आदमी पंडित होता है। और जब असली फूल की भांति वृक्ष की ऊर्जा से जन्मता है, वृक्ष की रसधार उसमें बहती है, तब प्रज्ञावान होता है, तब बुद्धपुरूष होता है।
अनन्यभक्त्या तद्बुद्धिः बुद्धिलयात् अत्यन्तम्।
अनन्य अर्थात् पराभक्ति से बुद्धि के अत्यंत लय होने से तन्मयी बुद्धि का उदय होता है।’
तन्मयी अर्थात् बड़ा प्यारा शब्द उपयोग किया है! तुम जो जानते हो, जब तन्मय होकर जानोगे, जब वह तुम्हारा जाना जानना होगा, निजी, जब तुम उसके गवाह हो सकोगे, जब तुम गवाही दे सकोगे कि हां, ऐसा है। अगर तुम कहते हो कि परमात्मा है, क्योंकि वेद कहते हैं, तो तुम तोते हो। अगर तुम कहते हो कि परमात्मा है, क्योंकि मैं कहता हूं, तो तुम यंत्रवत हो। खोज करो उस दिन की, तलाशों उस क्षण को, जब तुम कह सकोगे कि मैं कहता हूं कि परमात्मा है, क्योंकि मैं कहता हूं! क्योंकि मैंने जाना! क्योंकि मैंने देखा! देखने से कम पर भरोसा मत कर लेना! सुनी बात दो कोड़ी की, देखी बात में सचाई होती है।
किसी ने कहा, अब पता नहीं जान कर कहा हो, या उसने भी सुन कर कहा हो! कैसे निर्णय करोगे? फिर उसने जान कर ही कहा हो, तो जैसे ही जानने वाला कहता है, वैसे ही सुनने वाले के पास वही सत्य नहीं आता जो जानने वाला कहता है। सुनने वाले के पास शब्द आते है, सत्य नहीं आता।
मैंने प्रेम किया, मैंने प्रेम जाना, और मैं तुमसे प्रेम की बाते कहूंगा। तुम्हारे पास प्रेम नहीं पहुंचेगा, प्रेम नाम का शब्द भर पहुंचेगा। और तुम मुझे लाख सुनो, लाख समझो, और लाख संभाल कर रख लो, तो भी तुम प्रेम क्या है, यह न जान सकोगे। प्रेम के संबंध में जानना और प्रेम को जानना अलग-अलग बाते हैं। संबंध में जानना जानना है ही नहीं। संबंध का मतलब ही यह होता है कि तुमने जाना नहीं, ऐसे बाहर-बाहर घूमे, भीतर प्रवेश न किया, डरे-डरे रहे, जानने का साहस ही न किया।
अब प्रेम के संबंध में एक तो जानने का ढंग है कि किसी के प्रेम में पड़ जाओ। और एक ढंग है कि किसी ग्रंथालय में जाकर बैठ जाओ और प्रेम के संबंध में जितने शास्त्र लिखे गये है उन सबको पढ़ डालो। उन शास्त्रों को पढ़ कर तुम भी शास्त्र रच सकते हो। उन शास्त्रों को पढ़ कर तुम भी पीएच.डी. की थीसिस लिख सकते हो। लेकिन फिर भी तुमने प्रेम को नहीं जाना। प्रेम को जानने के लिये प्रेम करना जरूरी तादात्म्य होता है, जब जानने वाला और जानने में भेद नहीं होता- जब जानने वाला ही जानना हो जाता है- जब दोनों के बीच की सब सीमा, सब अंतराल खो जाता है, जब दोनों एक ही हो जाते है- अनन्यभाव हो जाता है- जब प्रेम और प्रेमी में जरा भी भेद नहीं होता, जब तुम प्रेमरूप होते हो, तब जानते हो। तब तुम्हारे भीतर प्रकट होता है जो छिपा था।
इन सूत्रों को सुना, सुन कर रूक मत जाना। इसलिये कहा भी नहीं था। सिर्फ इसीलिये कहा कि इससे तुम्हारी प्यास प्रज्वलित हो। इससे तुम्हें एक याद आये कि ऐसा भी संभव है। बस इतना याद आ जाये कि ऐसा भी संभव है, सिर्फ तुम्हारे भीतर एक जिज्ञासा उमंग आये। तुम्हारे भीतर एक बुझी हुई प्यास पड़ी है, सदियो से बुझी पड़ी है। तुमने उसे ढांक दिया है, क्योंकि वह प्यास खतरनाक है। उस प्यास के लिये दांव लगाना पड़ता है। तुमने उसे छिपा रखा है। तुमने उसकी जगह छोटी-छोटी प्यासें पैदा कर ली हैं।
विराट प्यास तो एक ही है मनुष्य के भीतर कि मैं जान लूं- सत्य क्या है? या कहो परमात्मा, या कहो इस प्रकृति का रहस्य, कुछ भी नाम दो। गहनतम में, अंतर्तम में पड़ी तो एक ही जिज्ञासा है और एक ही खोज है, हर आदमी की, हर प्राण की, कि मैं जान लूं कि यह अस्तित्व क्या है? मैं आया कहां से? मैं जाता कहां हूं? मैं हूं कौन? मेरे होने का प्रयोजन क्या है? मेरे सारे जीवन की दौड़-धूप की निष्पति क्या है? यह जन्म और मृत्यु के बीच जो फैला है जीवन, इसका प्रयोजन क्या है? इसकी अर्थवत्ता क्या है? मैं इस अर्थ को बिना जाने मै जो भी करूंगा, वह गलत ही होगा। क्योंकि जिसे अपने ही होने का पता नहीं, और अस्तित्व क्यों चल रहा है इसका पता नहीं, वह कैसे ठीक कर पायेगा? वह जो भी करेगा, वह कंधे के द्वारा अंधेरे में टटोलने जैसा होगा। भूल-चूक से शायद सत्य पर हाथ पड़ जाये, तो भी सत्य तुम्हारे हाथ नहीं आ पायेगा। हाथ पड़ भी जायेगा तो भी छूट जायेगा। तुम पहचान ही न पाओगे कि यह सत्य है। जिसको प्यास ही नहीं है, वह जल को कैसे पहचानेगा? और जो हीरों की खोज में नहीं गया है, वह हो सकता है हीरों की खदान पर भी पहुंच जाये, तो भी खाली हाथ ही आयेगा, भिखमंगा ही लौट आयेगा। जो खोजने गया है, जिसने बहुत सपने देखे हैं, बहुत गहन विचार किया है, जो तड़पा है रातो में, जो सोया नहीं, दिन हो कि रात जिसे एक धुन सवार रही है- कि जान लूं हीरे-जवाहरात कहां है? वह अगर पहुंच जाये तो शायद पहचान ले। इतनी प्रगाढ़ता से जिसने सपना देखा हो, उसे धीरे-धीरे पहचान की कला आ जाती है।
तो इन सूत्रों को तुमने सुना है, बड़े प्रेम से सुना है, बड़े आह्लाद से सुना है, मगर उतने पर बात पुरी नहीं हो जाती, उतने पर शुरू होती है। तो हमने शुरू किया था अताठों जिज्ञासा से कि अब हम जिज्ञासा करें। और मैं चाहूंगा कि हम अंत भी इसी पर करें। क्योंकि अब एक दूसरे तल पर जिज्ञासा होगी, अस्तित्व के तल पर। एक जिज्ञासा होती है बौद्धिक, इंटलेक्चुअल, और एक जिज्ञासा होती है अस्तित्वगत, एक्झिस्टेंशियल । बुद्धि की जिज्ञासा आज पूरी होगी, अब अस्तित्व की जिज्ञासा शुरू करनी होगी।
अनन्य अर्थात् पराभक्ति से बुद्धि के अत्यंत लय होने से तन्मयी बुद्धि का उदय होता है।’
अनन्य! जब तक तुम्हारे और अस्तित्व के बीच जरा सा भी द्वेष है, जरा सी भी दुविधा है, जरा सा भी द्वैत है, तब तक तुम जान न सकोगे। क्योंकि जानना अद्वैत में घटता है। जानने का एकमात्र ढंग प्रेम है। प्रेम के बिना कोई जानना नहीं होता। जानकारी होती है, जानना नहीं होता।
ऐसा समझो कि एक वनस्पतिशास्त्री इस बगीचे में आये, वृक्षों को देखे। जरूर बहुत उसकी जानकारी है, वह हर वृक्ष पर लेबल लगा सकता है कि इसका नाम क्या है, किस जाति का है, कितनी उम्र इसकी होती है, कब फूल लगेंगे, कल फल लगेंगे, लगेंगे कि नहीं लगेंगे, कितना ऊँचा जायेगा। मगर यह सब जानकारी है। इस वृक्ष के साथ इसकी कोई अनन्य भाव-दशा नहीं है। इसने किताबों में पढ़ा है, यह पहचान लेता है कि जो किताबों में लिखा है वह इसी वृक्ष के बाबत लिखा है, इस वृक्ष के संबंध में दोहरा देता है।
एक कवि आये, एक प्रेमी आये, एक चित्रकार आये, उसके देखने का ढंग और है। वह इस वृक्ष को देखे, वह इस वृक्ष को गले लगा ले, आलिंगन करे। वह इस वृक्ष के साथ मस्त हो जाये। इस वृक्ष की हरियाली में डूब जाये, इस वृक्ष की हरियाली को अपने में आमंत्रित कर ले। वह वृक्ष के पास बैठे, उठे, वह वृक्ष के साथ दोस्ती करें, मैत्री बनाए, कभी सुबह सूरज के ऊगते क्षण में वृक्ष को देखे, कभी सांझ सूरज के डूबते क्षण को देखे, कभी चांदनी से भरी रात में, कभी तारों से भरी रात में, कभी अंधेरी अमावस में, कभी पूर्णिमा में, कभी वृक्ष मस्त है और कभी वृक्ष उदास है, और कभी वृक्ष आह्लाद में है और कभी वृक्ष बड़े विषाद में है, और कभी वृक्ष पर फूल खिले है और कभी वृक्ष के पत्ते भी गिर गये है और वृक्ष नंगा खड़ा है। कभी शांत है और कभी गर्मी है। वृक्ष की अनेक-अनेक भाव भंगिमाओं को पहचाने, अनेक-अनेक मुद्राओं को पहचाने, वृक्ष के साथ मैत्री करे, वृक्ष से बतियाए, बातचीत करे, बोले, संवाद करे, तो एक और ढंग का जानना होता है, जिसको प्रेम के द्वारा जानना कहते हैं।
चीन के एक सम्राट ने एक बहुत बड़े झेन चित्रकार को कहा कि मुझे राजचिन्ह के लिये एक मुर्गे की तस्वीर चाहिये। मगर तस्वीर ऐसी हो कि जैसे कभी किसी मुर्गे की न हुई हो। तो तुम यह तस्वीर बना लाओ। प्रसिद्ध चित्रकार था। उसने कहा, कोशिश करूंगा। सम्राट ने कहा, समय कितना लगेगा? उसने कहा कि कम से कम तीन वर्ष तो लग ही जायेंगे। सम्राट ने कहा, पागल हुए हो, एक मुर्गे की तस्वीर ! उस चित्रकार ने कहा कि तस्वीर तो सेकेंडो में बन जायगी, मगर तस्वीर बनाने के पहले मुझे मुर्गा बनना होगा। नहीं तो मैं मुर्गे को भीतर से कैसे पहचानूंगा? बाहर से तो अभी बना दूं। जिंदगी मेरी चित्र बनाते बीती है, अभी बना दूं, लेकिन वे लकीरें ही होंगी, उनमें मुर्गा नहीं होगा। ऊपर की रूपरेखा होगी।
यही तो फर्क है एक फोटोग्राफ में और एक चित्रकार के द्वारा बनाए गये चित्र में। कैमरा ऊपर की रूपरेखा पकड़ता है। बहुत लोग सोचते थे, जब कैमरा बन गया तो अब चित्रकार की कोई जरूरत न रह जायेगी। तुम चकित होओगे, जब से कैमरा बना है तब से चित्रकार की कीमत बहुत बढ़ गई। क्योंकि पहली दफे फर्क साफ हो गया कि कैमरा सिर्फ लकीरें खींचता है, बाहर की रूपरेखा। लेकिन अंतस्तल रह जाता है।
उस चित्रकार ने कहा कि तीन वर्ष तो मुझे लग ही जायेंगे। मुर्गो के साथ रहूंगा, मुर्गा बनूंगा, मुर्गे को भीतर से जानूंगा। जब मूर्गा सुबह बांग देता है, जब तक मैं भी वैसी बांग न दे सकू, जब तक बांग मेरे भीतर से न उठ सके, तब तक मैं कैसे जानूंगा कि मुर्गे की शान क्या है, गरिमा क्या है, महिमा क्या है?
सम्राट कुछ राजी तो नहीं हुआ, तीन साल बहुत वक्त होता है। लेकिन उसने कहा, अच्छा ठीक है, तीन वर्ष सही!
एक वर्ष बाद उसने अपने आदमी भेजे कि पता लगाओ, उस पागल का क्या हुआ?
वे गए, उन्होंने देखा कि वह जंगल में सरक गया है। खोज-बीन की तो पता चला कि वह जंगली मुर्गो के साथ रह रहा है। वे गए भी तो उस चित्रकार ने उन्हें पहचाना भी नहीं। वह तो वैसे ही मुर्गो के बीच मुर्गा बन कर बैठा था, बांग दे रहा था। उन्होंने लौट कर कहा कि वह आदमी पागल हो गया है, अब आप प्रतीक्षा मत करो। अब वह आयेगा नहीं। मुर्गा बनाने को कहा था उसे, वह खुद मुर्गा बन गया है। अब उससे क्या आशा है कि वह चित्र बनायेगा।
लेकिन तीन साल बाद चित्रकार लौटा। आकर उसने सम्राट के सामने ही मुर्गे की तस्वीर बना दी, सेकेंड लगे। कहते है, वैसी तस्वीर कभी नहीं बनाई गई । तस्वीर सुरक्षित है अभी भी। और उस तस्वीर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि मुर्गे भी उसे पहचान लेते है। और कोई तस्वीर तुम रख दो कमरे में, मुर्गा आयेगा, ऐसे निकल जायेगा। मुर्गो को तस्वीर से क्या लेना-देना ! लेकिन वह जो तस्वीर है, जो तीन साल चित्रकार ने मुर्गा बन कर बनाई है, मुर्गा आता है तो दरवाजे पर ठिठक जाता है। देखता है उसको, जीवंत है-डर भी जाता है, क्योंकि जंगली मुर्गे की तस्वीर है, जैसे अब बांग दी, बस अब बांग देने को ही है, जैसे सुबह होने को ही है।
यह एक और ढंग है जानने का। यह अस्तित्वगत ढंग है। जानकारी बाहर से मिल जाती है, जानना भीतर से करना होता है, एक तादात्म्य, एक अनन्यभाव।
परमात्मा को कैसे जानोगे? अनन्यभाव से। परमात्मा के साथ एकरूप हो जाना होगा। भक्त को भगवान और अपने बीच जरा सा भी फासला न रखना होगा। न जरा सी लाज, न जरा सा संकोच, न जरा सी लज्जा। परमात्मा के सामने तो भक्त को पूरा खुलना होगा। बुरा-भला जैसा है, सुंदर-कुरूप जैसा है, साधु-असाधु जैसा है, सारे हृदय को खोल देना है।
जब तक मुझे खयाल है कि मैं हूँ, तब तक मेरे और परमात्मा के बीच दूरी रहेगी। कबीर ने कहा है न-स्मरण करो- प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाएं। वहां एक ही बन सकता है प्रेम की गली में। वहां दो का उपाय नहीं है, गली बड़ी संकरी है। जीसस का भी प्रसिद्ध वचन हैः स्टैªट इज माई वे, बट इज नैरो। सीधा है मेरा मार्ग, पर बड़ा संकीर्ण। और ईसाई सदियों से इसकी व्याख्या करते रहे है, और अड़चन में रहे है, कि संकीर्ण क्यो? उन्हें कबीर का वचन समझ में आ जाये तो क्यों कहते है कि और संकीर्ण? बस इतने पर ही बात उन्होंने छोड़ दी है, आगे कुछ कहा नहीं।
कबीर के वचन में उसकी व्याख्या हैः प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाएं। संकीर्ण है मार्ग, क्योंकि वहां दो नहीं बन सकते, बस एक ही बन सकता है। एक के ही गुजरने का उपाय है। दो एक साथ नहीं गुजर सकते।
प्रेमी चला गया। वर्ष बीते। उसने अपने मैं को गलाया, फिर लौटा। द्वार पर दस्तक दी। भीतर से फिर वही सवालः कौन? और इस बार उसने कहा, तू ही है। फिर द्वार खुले।
जिस दिन तुम कह सकोगे समग्र मन से कि तू ही है, उस दिन अनन्यभाव। उस दिन प्रेम का द्वार खुलता है। और प्रेम ही मंदिर है। और प्रेम के मंदिर में जो गया, वही परमात्मा में गया।
अनन्यभाव। मैं अन्य नहीं हूं। तू अन्य नहीं है। मैं तेरी ही तरंग, मैं तेरा ही पत्ता, तू मेरा वृक्ष, मैं तेरी लहर, तू मेरा सागर, मैं तेरी एक अभिव्यक्ति, एक भाव-भंगिमा, एक मुद्रा। अनन्यभाव हो जाये तो बुद्धि अत्यंत लय हो जाती है। और तब तन्मयी बुद्धि का जन्म होता है।
जब तक तुम सोचते हो मैं अलग हूं, तब तक एक अहंकारी बुद्धि है। यह अहंकार ही तुम्हारी बुद्धि को छोटा बनाए हुए है। अन्यथा तुम्हारे पास जो बुद्धि है, वह उतनी ही विराट है जितनी परमात्मा की बुद्धि। तुम्हारे भीतर जो प्रतिभा है, वह परमात्मा की प्रतिभा है। लेकिन तुमने उसे बड़ा छोटा बना रखा है। तुमने उस पर बड़ी बागुड लगा दी है। तुमने बड़ी दीवाल उठा दी है। तुम दीवाल पर दीवाल उठाने में कुशल हो गए हो।
ब्रह्म शब्द का अर्थ जानते हो? ब्रह्म शब्द का अर्थ हैः जो विस्तीर्ण है, जो फैला हुआ है। विस्तार शब्द भी, ब्रह्म जिस धातु से आता है, उसी से आता है। इसीलिये तो हम इस विश्व को ब्रह्माण्ड कहते है- जो फैला हुआ है। यह फैलता ही चला गया है। और यह हमारे रहस्यवादियों की जो अनूभूति थी, आधुनिक भौतिकशास्त्र इसके साथ सहानुभूति में है। पांच हजार साल पहले रहस्यवादी की जो अनुभूति थी, आधुनिक भौतिकशास्त्र इसके साथ सहानुभूति में है। पांच हजार साल पहले रहस्यवादी संतो ने कहा थाः यह ब्रह्माण्ड है। अर्थात् यह फैलता हुआ विश्व है। और अभी इस सदी में अलबर्ट आईस्टीन ने सिद्ध किया कि यह जगत जो है, धिर नहीं है। दिस इज एन एक्सपैडिंग यूनिवर्स। यह फैलता हुआ जगत है। यह रोज फैल रहा है, बड़ी गति से फैल रहा है। यहां सब चीज फैल रही है। बीज वृक्ष हो रहे हैं। बूंद सागर बन रही है। इस फैलते हुए जगत में तुम यह छोटा सा क्षुद्र अहंकार लिये बैठे हो! वही तुम्हारी अड़चन है, वही तुम्हारा नरक, वही तुम्हारी पीड़ा, वही तुम्हारा बंधन। उसी में तुम जकड़े हो।
तोड़ दो वे जंजीरे। और ये जंजीरे सिवाय दुःख के और कुछ भी नहीं दे रही है। इनके तोड़ते ही तुम अचानक पाओगे, तुम्हारे भीतर प्रतिभा जन्मी। ऐसी प्रतिभा जो परमात्मा की प्रतिभा है। तन्मयी बुद्धि का अर्थ होता हैः तुम गए, परमात्मा प्रविष्ट हुआ। तुमने जगह खाली कर दी। अहंकार से भरी बुद्धि विदा हो गई, अब विराट बुद्धि का अवतरण हुआ। तुमने अपने आंगन के चारों तरफ जो दीवाल खींच दी थी, वह गिरा दी। अब तुम्हारा आंगन आकाश हो गया। तन्मयी बुद्धि का वही अर्थ हैः आंगन को आकाश बना लेना है। और आंगन आकाश है, मगर तुमने एक छोटी सी दीवाल खींच रखी है। तुमने कुछ ईंट-पत्थर जोड़ कर एक दीवाल बना दी है। तुमने आकाश को खंड में तोड़ लिया है- जरा सा कर दिया, छोटा कर दिया। इतना विराट आकाश तुम्हारा हो सकता था।
स्वामी रामतीर्थ जब अमरीका गये, उनकी मस्ती लोगों की समझ में न आई। अपूर्व थी उनकी मस्ती- एक फकीर की मस्ती! पश्चिम से फकीर खो गया है। यहां भी खोता जा रहा है। क्योंकि मस्ती ही खोती जा रही है, क्योंकि तन्मयी बुद्धि खोती जा रही है। बांस की पोंगरियां रह गई है, गीत तो दिखाई नहीं पड़ता। रामतीर्थ की बांस की पोंगरी बांस की पोंगरी नहीं थी, बांसुरी थी, वेणु थी, उसमें से गीत उतर रहा था। जो भी उनके पास आते, देखते कि कुछ हो रहा है, कुछ घट रहा है – कुछ ऊर्जा, कुछ आभा! अंधो को भी दिखाई पड़ जाती। और बहरों को भी कुछ सुनाई पड़ जाती। और जो उनके पास आने की हिम्मत कर लेते, उनको थोड़ा रस भी लग जाता।
पूछा लोगों ने उनसे कि आपके पास कुछ दिखाई नहीं पड़ता, फिर आप इतने मस्त क्यों है? क्योंकि अमरीका तो एक ही भाषा समझता है- क्या तुम्हारे पास है? वही भाषा है। धन है तुम्हारे पास, तो तुम मस्त होने के अधिकारी हो। बड़ा मकान है,बड़ा पद है, प्रतिष्ठा है, तो तुम मसत होने के अधिकारी हो। इस आदमी के पास कुछ भी नहीं है। ऐसा आदमी तो आत्महत्या कर लेता है। इतनी मस्ती किस कारण? तुम्हारे पास कुछ नहीं- मकान नहीं, पत्नी नहीं, धन-दौलत नहीं, कुछ भी नहीं- तुम मस्त क्यो हो रहे हो?
रामतीर्थ ने कहा, जो मेरे पास था, बहुत छोटा था। छोटे के कारण मैंने उसे छोड़ दिया। एक आंगन क्या छोड़ा, पूरा आकाश मेरा हो गया। एक घर क्या छोड़ा, सारे घर मेरे हो गए। इधर छोड़ना था कि उधर साम्राज्य हो गया मेरा। तब से मैं बादशाह हो गया हूं। लोग कहते हैं फकीर, और मैं हंसता हूं क्योंकि में तब से बादशाह हो गया हूं।
वे अपने को बादशाह राम कहते थे। उनकी बड़ी प्रसिद्ध किताब हैः बादशाह राम को छह हुक्मनामे। बादशाह ही हुक्मनामे लिख सकता है। आज्ञाएं! थे भी बादशाह!
हर एक बादशाह होने को पैदा हुआ है, मगर फकीर, भिखमंगा रह कर हम मर जाते हैं। मांगते-मांगते ही जिंदगी चुक जाती हैं। तन्मयी बुद्धि हो जाये, तो बादशाहत मिल जाती है। तुम्हारी बुद्धि तुम्हारी दरिद्रता है। तुम दरिद्र ही रहोगे। तुम्हारे होने में दरिद्रता छिपी है। तुम दरिद्रता का मूल कारण हो, मूल जड़ हो। तुम जाओ, तुम विदा हो जाओ। तुम अपने को नमस्कार कर लो। तुम अपने से हाथ जोड़ लो। जाओ नदी में सिरा दो अपने को, जैसे कभी-कभी तुम गणेशजी को सिरा आते हो। और उसी दिन तुम पाओगेः तन्मयी बुद्धि का जन्म हुआ। आकाश मिला, विराट मिला, जिसकी कोई सीमा नहीं- अनंत और असीम।
‘अनन्य अर्थात् पराभक्ति से बुद्धि के अत्यंत लय होने से तन्मयी बुद्धि का जन्म होता है।’
और तन्मयी बुद्धि यानी बुद्धत्व।
कृष्ण का आश्वासन है गीता मेंः
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेकं ये प्रपद्यंते मायामेतो तरंति ते।।
‘ मेरी माया में बंधे हो, किंतु मुझमें शरण लेते हो, अनन्य भक्ति के जन्मते ही माया से मुक्त हो जाओगे’
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरस्त्यया।
तुम मेरी माया की शक्ति में उलझ गए हो। तुमने मुझे देखा ही नहीं। तुम मेरे सेवको में उलझ गए हो। तुमने मालिक नहीं देखा। तुम्हारी हालत ऐसी है जैसे तुम राजमहल गए हो और द्वारपाल को ही सम्राट समझ कर उसके पैर पकड़ लिए। द्वारपाल भी शानदार होता है, गर्वीला होता है, हाथ में उसके तलवार होती है, सुंदर उसकी वेशभूषा होती है, चमकदार बटन होते है उसके कोट पर, पालिश किए हुए जूते होते है- उसकी अकड़ देखते बनती है। सच तो यह है कि जमाना कुछ ऐसा बदला कि सम्राट तो सीधे-सादे वेशभूषा में रहने लगे है, द्वारपाल के पास ही चमकदार वेशभूषाएं रह गई है। अब सम्राट इतने बुद्धू नहीं है। अब तो द्वारपाल ही चमकदार बटने लगाता है। मगर तुम एकदम झुक जाओगे। तुम उसके पैर पकड़ लोगे। और शायद समझोगे यही सम्राट है। तो तुम चूक गए। तो तुम दरवाजे पर ही अटक गए। इस जगत में तुमने अगर कोई भी चीज पकड़ ली है- धन, पद, प्रतिष्ठा- तो तुम द्वारपालों में उलझ गये।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
तुम मेरी दुष्परिहार्य माया में उलझ गए हो। तुमने मुझे देखा ही नहीं। जो मेरी शरण आ जाता है।
मामेकं ये प्रपद्यते मयामेतां तरंति ते।।
वह इस माया से तर जाता है। तुम जरा मेरी तरफ देखो, कृष्ण कहते है। मालिक की तरफ देखो।
तुम उसकी साधारण शक्तियों में उलझ गए हो। शक्तियों के मूलस्त्रोत की तरफ देखो। उसकी शरण आ जाओ। तुम ऐश्वर्य में उलझ गए हो, ईश्वर की तरफ देखो, जो सारे ऐश्वर्य का मूलस्त्रोत है। उसके चरणों में गिर जाओ। उसके चरण में गिर जाने का नाम अनन्यभक्ति।
लेकिन हम क्षुद्र में उलझे है। हमारा प्रेम भी देह में उलझा है। हमारा प्रेम भी नाक-नक्शों में उलझा है। हमारा प्रेम भी बड़ा दयनीय है। मगर हम वहीं अपना गुणगान किए रहते है।
साधारण प्रेम का लोग इतना गुणगान करते है कि उतना गुणगान अगर परमात्मा का करें, तो सब मिल जाए। कोई किसी की आंखो का दीवाना हो गया है, कोई किसी के नाक नक्श का, कोई किसी के बालों के ढंग का, कोई किसी के बोलने की शैली का, कोई किसी की आवाज का, कोई किसी के चलने का, उठने का, बैठने का, कोई किसी के रंग का। तुम्हारी दीवानी भी बड़ी अजीब है। तुम बड़ी छोटी बातों में उलझ जाते हो। और नाक कितनी ही सुंदर हो, सब मिट्टी है, और सब मिट्टी में ही गिरेगा और मिल जाएगा। सब मिट्टी से ही उठा है और सब मिट्टी में गिर जाने वाला है। और इस सारी मिट्टी के खेल के बीच परमात्मा भी छिपा है, मगर तुम बाहर-बाहर भी भटक जाते हो। तुम द्वारपाल में ही उलझ जाते हो।
तुमने जब किसी सुंदर स्त्री में अपने को बांधा या सुंदर पुरूष के मोह में बंधा पाया, तब तुमने याद भी किया है कि तुमने उसके भीतर छिपे परमात्मा को देखा या नहीं? फिर अगर तुम दुःखी होते हो तो आश्चर्य नहीं है। और अगर तुम्हारा प्रेम जंजीरे ढाल देता है। तुम्हारे लिये तो आश्चर्य नहीं है। और अगर तुम्हारा प्रेम तुम्हारे लिये दुःख के न मालूम कितने-कितने उपाय ले आता है तो आश्चर्य नहीं है! मूल भूल हो गई। तुमने मालिक को नहीं पहचाना। तुम केवल मालिक के कपड़ो से उलझ गए। परमात्मा का यह सारा जगत उसके वस्त्र है, उसकी अभिव्यक्ति है। तुम इसी में मत खो जाना। यह अभिव्यक्ति सुंदर है, मगर उसके मुकाबले क्या जो इसका मालिक है।
एक स्त्री अपने झोपड़े में बैठी सुबह ध्यान करती थी। होगी अनन्यभक्ति में। जगी होगी तन्मयी बुद्धि। उसका पति उठा, वह बाहर आया। सूरज निकलता था, सूरज की लाली पूरब पर फैली थी, पक्षी उड़ते थे, गीत गाते थे, वृक्ष जाग रहे थे, सुंदर सुबह थी, सुहानी सुबह थी, बड़ी मदमाती सुबह थी। उसके पति ने जोर से पुकारा कि तू भीतर कोठरी में बैठी क्या करती है? बाहर आ ! बड़ी सुंदर सुबह हो रही है। बड़ा प्यारा सूरज निकल रहा है। पक्षी गीत गा रहे है, वृक्ष जागे हैं, फूल खिले हैं। खिलखिलाने की आवाज आई। और उस स्त्री ने अपने पति से कहा तुम कब तक बाहर भटकते रहोगे? सुबह सुंदर है, मगर मैं सुबह बनाने वाले को भीतर देख रही हूं, तुम्ही भीतर आ जाओ। बाहर सुंदर होगा, जरूर सुंदर है- क्योंकि जिसने बनाया वह सुंदर है। मूर्ति जब इतनी सुंदर है तो मूर्तिकार कितना सुंदर न होगा! फूल जब इतने सुंदर हैं तो वह चितेरा कितना सुंदर न होगा जिसने फूल रचे! चांद – तारे जब इतने सुंदर है तो जरा हस्ताक्षर तो खोजो, किसके हस्ताक्षर हैं इनके ऊपर? उस मालिक की तलाश करो।
माया में मत उलझो, जागो! माया के भीतर कौन खड़ा है? इस जादू में मत पड़ जाओ, जादूगर को तलाशों। मगर नहीं, हम उलझे ही रहते हैं। एक आशा टूटती है, हम दूसरी बना लेते हैं। उम्मीद पर उम्मीद जन्माते चले जाते है।
इसी उम्मीद में, इसी आशा में लोग समय गुजार रहे हैं। मौत आती है, और कुछ भी नहीं आता। आखिर हाथ में मिट्टी आती है और कुछ भी नहीं आता। अगर हमने मालिक को देखा होता तो सारी बात बदल जाती।
अनन्य भक्ति से बुद्धि का आत्यंतिक लय हो जाता है। और बुद्धि के आत्यंतिक लय से परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है। भक्त उसी साक्षात्कार को मोक्ष कहते है। वही निर्वाण है। मैं का मिट जाना निर्वाण है। परमात्मा परिपूर्ण रूप से तुम्हारे भीतर रह जाये और तुम न रहो, तुम सारी तरह से हट जाओ, तुम्हारी छाया भी न बचे-वही मोक्ष है।
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