





आदमी के जीवन की समस्या एक, समाधान भी एक। आदमी के जीवन में बहुत समस्याएं नहीं हैं और न बहुत समाधानों की जरूरत है। एक ही समस्या है कि मैं कौन हूं? और एक ही समाधान है कि इसका उत्तर मिल जाये। जीवन की सारी समस्याएं इस एक समस्या से उठती हैं। यह एक समस्या जड़ है।
और इस समस्या में उलझाव भारी है। उत्तर खोजने वाले भी उत्तर नहीं खोज पाते, उलझाव में भटक जाते हैं। क्योंकि बहुत उत्तर दिये गये हैं। और बाहर से दिया गया कोई भी उत्तर काम नहीं आता। उत्तर आना चाहिये भीतर से और बाहर उत्तरों की कतार खड़ी है। और हर उत्तर तुम्हारा उत्तर बन जाने को आतुर है। हर उत्तर तुम्हें फुसला रहा है, समझा रहा है, राजी करने की कोशिश में संलग्न है- मैं हूं तुम्हारा उत्तर। और स्वभावतः जिसके भीतर समस्या खड़ी हो वह किसी भी उत्तर को पकड़ने लगता है। कहते हैं न, कि डूबते को तिनके का सहारा भी बहुत मालूम होता है। हालांकि तिनकों के सहारे कोई कभी बचता नहीं। लेकिन डूबते आदमी के पास तिनका भी आ जाये तो उसी को पकड़ लेता है।
ऐसे ही तुमने बहुत तिनके पकड़ लिये हैं। उन तिनकों को पकड़ने से तुम बचोगे नहीं। नाव तुम्हारे भीतर है। जहां से समस्या उठी है, वहीं समाधान छिपा है। समस्या के भीतर ही उतरना है तो समाधान मिलेगा। प्रश्न भीतर और उत्तर बाहर, अगर ऐसा होता तो सभी को उत्तर मिल गये होते। प्रश्न भी भीतर और उत्तर भी भीतर है। इसलिये जो भीतर जाते हैं वे ही उत्तर पाते हैं।
कोई उधार उत्तर काम न आयेगा। सब उधार उत्तर झूठे हैं। इसलिये नहीं कि जिन्होंने वे उत्तर दिये थे उन्हें पता नहीं था, बल्कि इसलिये कि यह उत्तर ऐसा है कि कोई दूसरा किसी दूसरे को नहीं दे सकता।
मैं जानता हूं फिर भी तुम्हें दे नहीं सकता। और दूंगा तो देने में ही झूठा हो जायेगा। तुम लोग, लेने में ही बेईमानी हो जायेगी। यह उत्तर ऐसा है जिसकी तलाश करनी होती है। तलाश में ही निर्मित होता है। खोज में ही इसका जन्म है।
लेकिन हम बाहर भटकने के आदी हैं। हम हर चीज बाहर खोजते हैं। हम धन भी बाहर खोजते हैं। हम पद भी बाहर खोजते है। हम समाधान भी बाहर खोजते हैं। न धन बाहर है, न पद बाहर है, न समाधान बाहर है। असल में समाधि के ही ये अलग-अलग नाम है। धन कहो, समाधि का नाम है।
कबीर के शिष्य थे धनी धरमदास। बहुत बड़े धनी थे। बहुत धन कमाया, बहुत पद-प्रतिष्ठा थी। कबीर के पास जब भी आते थे तो कबीर उन्हें कुछ और नहीं, धरमदास कहकर ही पुकारते थे। फिर एक दिन फूल खिला। भीतर की आत्मा जगी। गुरू की चोट काम आयी। और धरमदास ने सारा धन लुटा दिया। उस दिन कबीर ने उन्हें कहा, ‘धनी धरमदास। अब तु धनी हुआ। अब तेरी आंख भीतर मुड़ी। अब तेरी खोज बाहर नहीं है। अब बाहर पर तेरी पकड़ गयी।’
धनी भी भीतर है, पद भी भीतर है क्योंकि परमात्मा भीतर है। उससे बड़ा और क्या पद होगा? इसलिये तो उसे परम पद कहा हैं।
समाधि भीतर है। और समाधि ही सारे प्रश्नों का, समस्याओं का समाधान है। इसलिये तो उसे समाधि कहा है-जहां समाधान हो जाये। सब मिल जाता है उत्तर मिल जाने पर। जैसे पानी खिल जाता है कमल खिल जाने पर। कमल के खिलते ही कमल ही नहीं खिलता, उसके आसपास का सरोवर भी खिल जाता है। जब तुम्हारे भीतर उत्तर का जन्म होता है तो तुम्हारी आत्मा ही नहीं खिलती, तुम्हारी देह भी खिल जाती है। तुम्हारा केंद्र ही नहीं खिलता, तुम्हारी परिधि भी खिल जाती है।
सब मिल जाता है उत्तर मिल जाने पर। जैसे पानी खिल जाता है कमल खिल जाने पर। तब तुम हुए धनी।
एक ही खोज है कि मैं कौन हूं, और एक ही उपद्रव है कि बाहर सस्ते उत्तर मिल जाते हैं। मुफ्त मिल जाते हैं। बिना कुछ दांव पर लगाये मिल जाते हैं यह महत उत्तर बिना दांव लगाये नहीं मिल सकता।
कल एक युवा संन्यासी ने मुझे आकर कहा-आनंद कबीर ने, विचारशील युवक हैं। कुलीन घर से आते हैं। उनके दादा ख्यातिनाम हैं। उनके दादा के सैकड़ों शिष्य है। पुष्ठिमार्ग के अनुयायी हैं। दादा चौरासी वर्ष के है ओर एक विशेष संप्रदाय के विशेष व्यक्ति हैं। वे कबीर को समझाते हैं कि मैं मर जाऊं फिर तू संन्यास ले लेना। फिर तुझे जो करना हो करना, मेरे जीते जी मत कर। मेरी प्रतिष्ठा को चोट लगती है। कबीर ने आकर कल मुझे कहा हैं कि मैं क्या करूं? बड़ी अड़चन हो गयी। मैंने उनसे कहा, कि चौरासी वर्ष तक किसी मार्ग पर चलने के बाद भी अगर व्यक्ति को प्रतिष्ठा का मोह नहीं मिटा है तो कुछ भी नहीं मिला। जाकर अपने दादा को समझाना कि तुम भी संन्यस्त हो जाओ।
प्रतिष्ठा! नाम! यश! तो दूसरे देते हैं। दूसरों से दी गयी प्रतिष्ठा कोई प्रतिष्ठा है? ज्ञानियों ने आत्मप्रतिष्ठा कहा है। जो अपने में ठहर गया उसको प्रतिष्ठित कहा है। जो अब डांवाडोल नहीं होता उसको प्रतिष्ठित कहा है। जिसको अब हवा के झोकें हिलाते नहीं, जो निस्पंद हुआ है, तरंगशून्य हुआ है। आये अंधड़, आये तूफान, लेकिन उसके भीतर लहर नहीं उठती। और फिर जो व्यक्ति जान चुका है वह दूसरे को स्वतंत्रता देगा। ज्ञान का अनिवार्य परिणाम है स्वतंत्रता। वह दूसरे का सम्मान करेगा।
लेकिन बाहर के उत्तर सस्ते हैं। आदमी उनको पकड़े-पकड़े मर जाता है। उनके कुछ हल नहीं होता। सारी उलझन वैसी की वैसी बनी रहती है। आत्मवंचना है बाहर के उत्तर। सावधान रहना बाहर के उत्तरों से।
असली साधु के पास तुम्हारी चिंताएं पहली दफा उमगती हैं। पहली दफा फूट पड़ता है तुम्हारा सारे भीतर का सांत्वना का बना-बनाया संसार, सब बिखर जाता है। तुम पहली दफा अपने को खंडहर की भांति देखते हो। तुम्हारे हाथ में जो धन है वह कचरा है, तुम्हारे पास जो ज्ञान है वह कचरा, तुम्हारे पास जो चरित्र है वह दो कौड़ी का। तुम्हारा आचरण, तुम्हारी प्रतिष्ठा, तुम्हारा यश किसी मूल्य का नहीं है। स्वभावतः आदमी घबड़ा जायेगा। लेकिन उसी घबड़ाहट से क्रांति की शुरूआत होती है।
कबीर ने उन्हें पुनः दर्शन दिया। कबीर ने फिर वहीं झलक दी। कबीर ने वही झरोखा फिर खोला।
इस आदमी के पास कुछ है। असली सिक्के हैं। टकसाल से निकले सिक्के हैं। आज पहली दफा प्रेम से भरकर, हर्ष से भरकर कबीर को देखा। पहली बार तो झिझक से देखा होगा, डरते-डरते देखा होगा, अपने को दूर-दूर रखा होगा, बीच में फासला रखा होगा, दीवाल रखी होगी। अपनी धारणाएं, अपने पक्षपात, अपने विचार, अपना सिद्धान्त, उन सबकी दीवाल स्वभावतः रही होगी। उसके पार से कबीर को देखा था। आज सब हटाकर देखा। छः महीने में वे सब दीवालें अपने आप हट गयीं।
गुरू मिल जाये, उसकी भनक भी पड़ जाये कान में तो फिर मिथ्या गुरू की पकड़ ज्यादा देर नहीं चल सकती। थोड़ी बहुत देर तुम अपने को धोखा दे लो, दे लो।
आज पहली दफा आंख भरकर देखा। असीम था सामने। इस छोटी-सी देह में जैसे द्वार था असीम का, जैसे अगम का मार्ग खुलता था।
पहले कबीर ने जो बातें कहीं थी, कह दी थीं। लेकिन गुरू निहारकर तो शिष्य की तरफ तभी देखता है, जब शिष्य हर्ष से प्रमुदित होकर गुरू के पास बैठता है।
किसी ने कहा है कि मैं अपने गुरू के पास था। तीन साल तक तो उन्होंने मेरी तरफ देखा ही नहीं। बैठा रहता उनके पास मगर वे मेरी तरफ न देखते। और लोग आते, और बातें होती, मैं बैठा रहता, बैठा रहता। तीन साल बाद उन्होंने मेरी तरफ निहारा। मैं धन्यभागी हो गया। फिर तीन साल तक ऐसे ही बैठा रहा, बैठा रहा। फिर तीन साल बाद, उन्होंने मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया। फिर और तीन साल बीत गये बैठे-बैठे। फिर एक दिन उन्होंने मुझे छुआ, मेरे कंधे पर हाथ रखा। और तीन साल बीत गये तब उन्होंने अपने गले से मुझे लगाया, आलिंगन किया। बारह साल गुरू के पास बैठे-बैठे आलिंगन की घड़ी आती है।
गुरू देखता ही तब है…. इस बात को समझना। गुरू के देखने से मेरा मतलब यह नहीं कि कबीर पहली दफा जब धरमदास को देखे तो आंख बंद रखे होंगे। कि कबीर को नहीं देखा, कि कबीर को दिखाई नहीं पड़े होंगे धरमदास। देखा था, बस यह ऊपर की आंख से देखा था। एक और आंख है गुरू की, उस आंख से तो कोई तभी देखा जाता है जब कोई तैयार हो जाता है। वह आंख तो तुम्हारे भीतर तभी उतर सकती है जब हर्ष तुम्हारे भीतर द्वार खोल दे। तुम्हारे भीतर चिंताएं खड़ी है, बेचैनियां खड़ी है, फिक्रे खड़ी है, सही-गलत का हिसाब खड़ा है, संदेह खड़े हैं, अश्रद्धा खड़ी है, अनास्था खड़ी है, तो गुरू अपनी वह आंख खराब नहीं करता। उस आंख की अभी तुम्हें जरूरत नहीं है। उस आंख की जब जरूरत होती है तभी वह आंख तुममें डाली जाती है। वही आंख वास्तविक दीक्षा है। वही है गुरू के साथ जुड़ जाना। उसी आंख की झलक, और जोड़ बन जाता है। फिर जोड़ नहीं टूटते।
इस हर्ष का विचार ही उठा था, यह आनंद का भाव ही उठा था। कबीर ने कहा धरमदास को-
आओ धरमदास पगु धारो, चिंहुक चिंहुक तुम काहे निहारो
ऐसे दूर-दूर से, चिंहुक-चिंहुक! ऐसे डरते-डरते, ऐसे भयभीत….!
कबीर ने कहा, अब रखो पग। यह खुला मार्ग। मैं हूं मार्ग, रखो पग।
अब दूर रहने की कोई जरूरत नहीं। अब दूर-दूर से देखने की कोई जरूरत नहीं। आ जाओ पास, निकट आ जाओ। इस निकट आ जाने का नाम सत्संग है। और धन्यभागी हैं वे जिन्हें गुरू बुला ले और कहे,
कबीर कह रहे हैं धरमदास से,
सब ठीक ठाक है?
कितने-कितने समय से तुम्हारी सूरत की याद कर रहे थे।
यह मत सोचना कि शिष्य ही गुरू को खोजता है। गुरू शिष्य से ज्यादा खोजता है। शिष्य की खोज तो अंधी है, अंधेरी है। शिष्य को तो पता नहीं ठीक-ठीक क्या खोज रहा है। गुरू को पता है। इजिप्त के पुराने शास्त्र कहते है, जब शिष्य तैयार होता है तो गुरू उसे खोज लेता है। शिष्य तो कैसे खोजेगा? शिष्य तो कैसे पहचानेगा कौन गुरू है? गुरू से मिलन भी हो जायेगा तो भी प्रत्यभिज्ञा नहीं होगी। गुरू सामने भी खड़ा होगा तो भरोसा नहीं आयेगा। हजार बाधाएं पड़ेगी, हजार चितांए अड़चन डालेंगी। हजार संदेह उठेंगे। मैं भी इस बात से राजी हूं कि पहला कदम गुरू उठाता है, शिष्य नहीं। पहला निमंत्रण गुरू देता है।
मथूरा में देखा था धरमदास को। तब धरमदास तो नहीं पहचान सका था अपने गुरू को लेकिन गुरू अपने शिष्य को पहचान लिया था। देखा होगा बीज धरमदास में। देखी होगी संभावना इसके वृक्ष बन जाने की, किसी दिन आकाश में फूल खिल जाने की। देखी होगी इसकी अनंत संभावना। गुरू उसी दिन चुन लिया था। धरमदास को तो उस दिन पता भी नही था। धरमदास को तो कुछ पता हो भी नहीं सकता था।
कबीर कहते हैं कि हमने तुम्हें पहचाना।
इतनी देर लगाया और हम राह देखते और राह देखते।
हम तो तुम्हें चीन्ह लिये, अब तुम हमें चीन्हो। हम तो तुम्हें पहचान लिये, अब तुम हमें पहचानो। गुरू पहले पहचानता है तभी शिष्य के पहचानने की संभावना प्रगाढ़ होती है। गुरू पहले चुनता है, तब शिष्य चुनता है।
भली भई दरसन मिले बहुरि मिले तुम आये
जो कोऊ मोंसे मिले जो जुग बिछुरि न जाए
कबीर कहते हैं, अच्छा हुआ, भली भई दरसन मिले। आ गये तुम। ये बड़े सम्मान से कहे गये वचन हैं। सद्गुरू के मन में शिष्य के प्रति बड़ा सम्मान होता है। और जिस गुरू के मन में शिष्य के प्रति सम्मान न हो वह गुरू ही नहीं, उसे पता ही नहीं। क्योंकि शिष्य और गुरू भेद क्या है? भेद शिष्य की तरफ से होगा, गुरू की तरफ से कुछ नहीं हो सकता। गुरू तो जानता है, जो मेरे भीतर विराजमान है वही शिष्य के भीतर विराजमान है। मेरे भीतर जाग गया, शिष्य के भीतर सोया है लेकिन सोने-जागने से क्या फर्क पड़ता है? स्वभाव तो एक है। शिष्य को भेद पता चलता है कि मैं कहां, गुरू कहां! मैं अंधेरा-भरा, गुरू रोशन। मुझे कुछ मिला नहीं, गुरू को सब मिला। लेकिन गुरू को तो यह दिखाई पड़ता है ना, कि जैसा मुझे मिला वैसा ही तुझे अभी मिल सकता है, इसी वक्त मिल सकता है। तेरी अपनी संपदा है। कहीं मांगने नहीं जाना। कहीं खोजने नहीं जाना। अभी परदा उठा, अभी भीतर झांक और अभी पा ले। क्षण भर की भी देर करने की जरूरत नहीं है। इसलिये गुरू के मन में शिष्य के प्रति उतना ही सम्मान होता है, जितना शिष्य का गुरू के प्रति होता है।
फिर से तुम आ गये! मैं राह देखता, मैं प्रतीक्षा करता था। जो कोऊ मोंसे मिले- और जो मुझसे मिल जाता है, सो जुग बिछरि न जाये। फिर बिछुड़ना संभव नहीं है। अब तुम आ गये तो आओं ही मत, मिल ही जाओ ताकि फिर बिछुड़ना न हो सके।
और ऐसा ही हुआ। धरमदास फिर न लौटे। लौटकर नहीं देखा। कायर ही लौटकर देखते हैं। हिम्मतवर आदमी आगे देखता है, पीछे नहीं देखता। वहीं से सब लुटवा लिया। घर भी लौटकर नहीं गये। लुटाने को भी नहीं गये। अब उसके लिये भी क्या जाना! वहीं से खबर भेज दी कि सब बांट दो। जो है सब बांट-बूंट दो। जिनको जरूरत है, ले जाएं। सारे गांव को कह दो जिसको जो ले जाना है ले जाये। लौटकर भी नहीं गये। असल में लौटकर भी जाते तो थोड़ी चूक हो जाती। देने के मजे में भी तो अहंकार भरता है। इतना लुटा रहा हूं, इतना दे रहा हूं, यह मजा लेने भी चले गये होते तो थोड़ा अहंकार घना होता। धन का मूल्य तो फिर भी स्वीकार कर लिया होता कि धन बड़ी कीमती चीज है, जाऊं, लुटाऊं, बांट आऊं। धन का कोई मूल्य ही न रहा। इधर कबीर से आंख क्या मिली, सब मिल गया। वहीं से खबर भेज दी। अपने आदमी भेज दिये होंगे जो साथ आये थे कि भाई जाओ, मैं तो गया। तुम जाओ, जो है सब बांट-बूट दो। जैसा है निपटा-निपटा दो। मेरा अब आना न हो सकेगा।
जब कबीर कहते हैं, सो जुग बिछुरि न जाए, जो मुझसे आ मिला फिर कभी बिछुड़ता नहीं, तो अब इतना भी बिछोह न सहूंगा। फिर धरमदास कबीर की छाया होकर रहे। कबीर के समाधि-उपलब्ध शिष्यों में एक थे धरमदास। और जिस दिन धरमदास ने सब लुटवा दिया, उस दिन से कबीर ने उनको कहा धनी धरमदास।
एक धन है जो बाहर का है। जिससे कोई आदमी धनी नहीं होता, सिर्फ भिखारी बनता है। और एक धन है भीतर का, जिससे आदमी वस्तुतः धनी होता है। धन की परिभाषा क्या है? धन की परिभाषा है जो बांटने से बढ़े। जो बांटने से घट जाये वह धन नहीं। यह भीतर का धन ऐसा है, जितना बांटो उतना बढ़ता है। इसलिये कबीर ने उनको धनी कहा। अब अटूट धन मिल गया, अखूट धन मिल गया। धनों का धन मिल गया।
शिष्य और गुरू का जहां मिलन होता है वहीं परमात्मा प्रगट होता है। उस मिलन की घड़ी में ही परमात्मा प्रगट होता है।
जहां शिष्य और गुरू मिलते हैं, तब वहां समाधि फलित होती है। जहां शिष्य और गुरू मिलते हैं, वहां ईश्वर का आविर्भाव होता है, वहां जीवन के मूल का आविर्भाव होता है।
फिर तुम्हें बार-बार नहीं आना होगा। जिसने गुरू को पकड़ा उसे फिर बार-बार नहीं आना होगा। उसे यह चक्कर, यह जन्म और मरण की पीड़ा, ये नरकों की यात्रा फिर नहीं करनी होगी। अहंकार करवाता है ये सारी यात्राएं-ये चौरासी कोटि की यात्राएं, ये नरकों का आवागमन अहंकार करवाता है। अहंकार अग्नि है, नरकों में जो जलती है।
तुमने सुना नर्क में अग्नि जलती है, उसमें तुम जलाए जाआगे? उस अग्नि को ईंधन कहा से आता है? तुम्हीं ले जाते हो। तुम्हारा अहंकार ही ईंधन बनता है। और सच यह है कि नर्क थोड़े ही जाना पड़ता है जलने के लिये! अभी तुम जल रहे हो। जब तक अहंकार है तब तक तुम जल रहे हो। जहां अहंकार है वहां जलन है वहां पीड़ा है, वहां दुःख है। गुरू के चरण पकड़ने का अर्थ है, अहंकार छोड़ा। समर्पण का और क्या अर्थ होता है! इतना ही कि अब मैं नहीं तुम। कोई एक ऐसा व्यक्ति मिल गया जिसके सामने हम कह सकते हैं अब मैं नहीं, तुम। अब मेरे हृदय में तुम विराजो। मैं हटता हूं, मैं सिंहासन खाली करता हूं, तुम आओ।
गुरू के इस सिंहासन पर बिठाने का प्रयोजन क्या है? एक ही प्रयोजन है कि इस बहाने अहंकार गिर जाए। गुरू वहां बैठता थोड़े ही है! गुरू तुम्हारे सिंहासन को भरता थोड़े ही है! गुरू तो सिर्फ निमित्त है। वह तो सिर्फ तुम्हारा अहंकार छूट सके इसलिये एक निमित है। जैसे ही अहंकार छूट जाता है….गुरू तुम्हारे सिंहासन पर कभी नहीं बैठता। अहंकार छुटाने का उपाय है गुरू। जैसे ही अहंकार छूट जाता है, परमात्मा को तुम अपने सिंहासन पर बैठा हुआ पाओगे। इसलिये तो गुरू को भगवान कहा है। क्योंकि बुलाया था गुरू को, आता भगवान है। गुरू नहीं बैठता है। और अगर कोई गुरू तुम्हारे सिंहासन पर बैठ जाये तो फिर चौरासी की यात्रा शुरू हो गयी। वह गुरू गुरू ही नही था, जो तुम्हारे सिंहासन पर बैठ गया। वह तो सिर्फ एक उपाय था।
बुद्ध ने इस शब्द का उपयोग कियाः उपाय। गुरू के चरणों में सिर झुकाने का मतलब यह नहीं है कि अब वे चरण तुम्हारे हृदय में विराजमान हो गये। उनको विराजमान करने की चेष्टा में अहंकार हट जायेगा। अहंकार के हटते ही परमात्मा प्रविष्ट हो जाता है। कबीर ने कहा न! ‘गुरू गोविंद दोई खड़े, काके लागू पावं।’ इधर अहंकार गया कि दोनों एक साथ खड़े होते हैं सामने। ‘गुरू गोविंद दोई खड़े। बलिहारी गुरू आपकी गोविंद दियो बताय।’ तो गुरू की बलिहारी वही है कि जैसे अहंकार हटा, शिष्य के सामने दोनों खड़े होंगे- गुरू और गोविंद।
और गुरू गोविंद की तरफ इशारा कर देगा कि अब उन्हें बैठने दो। मेरा काम पूरा हो गया। मेरा काम औषधि की तरह था। तुम्हारा अहंकार थी बीमारी, मैं था औषधि, यह रहा स्वास्थ्य। गोविंद आकर खड़े हो गये। बीमारी गयी, औषधि भी जाने दो। औषधि को क्या करोगे अब? अब परम स्वास्थ्य उतरता है इसे अंगिकार करो। गुरू संसार से छुड़ाता है, और परमात्मा से मिलाता है। कोटि, एक यात्रा चौरासी कोटियों की अचानक समाप्त हो जाती है। एक दूसरी यात्रा शुरू होती है-अनंत की, अगम की।
और जैसे ही तुम झाकोगे वैसे ही तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर अमृत की बूंदे झरने लगी। अकड़े रहे, जहर से भरे रहोगे। अकड़ की गांठ जहर पैदा करती है। इसलिये अहंकार से भरा हुआ आदमी सदा दुःखी है।
अमृत बूंद झरे घट भीतर-जो झुका उसके घट के भीतर अमृत की बूंद झरने लगती है।
धरमदास कहते हैं, मैं हाथ जोड़कर तुमसे प्रार्थना करता हूं, इस ढंग से मैंने पाया, तुम भी पा लो। यह रास्ता था मेरे पहुंचने का, तुम भी पहुंच जाओ।
सारा शब्द को मन में बसाओ। सारा शब्द यानी क्या? जिसने जान लिया, जिसने पा लिया, उसकी ध्वनि को अपनी भीतर जाने दो। उसके लिये सब द्वार खुले छोड़ दो। उसकी किरणों को बुलाओं, पी जाओ। गुरू को पियो। गुरू को पचाओ।
और जैसे-जैसे तुम गुरू को अपने भीतर बसाओगे और उसकी वाणी को अपने भीतर गूंजने दोगे, तुम चकित हो जाओगे। क्या होगा चमत्कार? चमत्कार ये होगा कि गुरू की वाणी जैसे ही तुम्हारे भीतर प्रविष्ट होनी शुरू होती है निर्बाध, वैसे ही तुम्हारे भीतर जो शब्द सोया पड़ा है जन्मों-जन्मों से वह जाग उठता है।
समझो, तुम सो रहे हो। मैं आया और मैंने तुम्हें पुकारा कि उठो। मेरे उठने-उठाने, मेरे शब्द से तुम्हारे भीतर क्या होता है? जो सोया है वह जग जाता है। ‘उठो’ शब्द थोड़ी काम आता है!‘उठो’ शब्द का तो सिर्फ इतना प्रयोजन था कि तुम्हें चौका गया। लेकिन उसी चौकने में नींद टूट गयी। तुम्हारे भीतर जागरण खड़ा हो गया। जागरण की क्षमता तुम्हारे भीतर है। जागोगे तुम। गुरू के शब्द तुम्हारे भीतर पड़े सारे शब्द को ध्वनित कर देते हैं। गुरू की मौजूदगी, तुम्हारे भीतर वह जो परमात्मा सोया पड़ा है उसकी तुम्हें स्मृति से भर देगी। गुरू बार-बार तुम्हें तुम्हारे ऊपर फेंकता है। चोटें करता है। पुचकारता भी है, भागने भी नहीं देता। हर चेष्टा करता हैं कि तुम्हारे भीतर जो चेतना है दबी पड़ी है, वह बीज की तरह फूट जाय।
तो गुरू से घबड़ा कर भाग मत जाना। क्योंकि गुरू पहले तो जलायेगा।
मथुरा में वहीं हुआ था। कबीर से जब मिलना हुआ धरमदास का-आगे आगे दहि चले! तो कबीर टूट पड़े धरमदास पर। जैसे अंगारों की वर्षा हो गयी।
जल गया होगा। भारी चोट खायी होगी। घाव लग गये होंगे। ‘आगे आगे दहि चले’ छः महीने तक वह जलन रही। वह आगजलाती रही। और फिर जब कबीर को देखा जाकर-
फिर पीछे हर्ष उदय हुआ, आनंद उदय हुआ। फिर सब हरा हो गया। कहते हैं यह अनूठी प्रक्रिया है, पहले जलाती है और सुखा डालती है। और जब तुम बिल्कुल सूख जाते हो तब नये पत्ते लगते है, नये फूल लगते है। पुराने से मुक्त होना ही पड़ता है तभी नये का जन्म होता है। अतीत से छुटकारा चाहिये। तभी कुछ हो सकता है। अन्यथा कुछ भी नहीं हो सकता है। तुम इतने अतीत से दबे हो… इसीलिये दबे हो। अतीत को हटा दो। यह राख हटा दो अतीत की तो तुम्हारा अंगारा प्रगट हो जाये।
पहले तो सोचा था कि जड़े काट दीं। और अब देखते हैं धरमदास तो फल लगे है, जड़ काटकर फल लगे हैं। यही जीवन का सार-सूत्र है। यहां भी जीवन का वृक्ष ऐसा ही है। इसमें जीवन के मूल को जड़ को काट देता है-जीवेषणा। जीवेषणा मूल है, जीवन की जड़ है। जीने की इच्छा- कि जीऊं, और सदा जीऊं, कभी मरूं न। मैं रहूं, और रहूं यह जीवन की जो मूल आकांक्षा है यही जड़ है। इसी जड़ के कारण तुम मरते हो, और मरते हो। चाहते हो जीओ, चाह के कारण मरते हो। बारबार मरते हो। पुनः मरते हो। जिसने इस जड़ को काट दिया, जीवेषणा को काट दिया, फिर नहीं मरता। अमृत हो जाता है।
यहां जीवन के परम अनुभव को कौन उपलब्ध हुये? जिन्होंने जीवन की आकांक्षा छोड़ दी-कोई बुद्ध, कोई महावीर, कोई कबीर, कोई नानक। जिन्होंने जीवन की आकांक्षा छोड़ दी ये परम जीवन को उपलब्ध हुये।
सद्गुरू जब मिलेगा तो ख्याल रखना, पहले तो कड़वा ही लगेगा। जो पहले से मीठा लगे उससे बचना। क्योंकि वह जो पहले से मीठा लग रहा है वह असली फल नहीं है। वह तो मीठा लग रहा है इसलिये कि तुम्हें फांस लेना चाहता है। उसकी मिठास तुम्हें फांसने के लिये जाल है। उसकी मिठास तो निर्मित है। असली फल तो कड़वा होगा।
ज्ञानी की बात कड़वी लगती है। क्योंकि ज्ञानी की बात तुम्हारे पैर के नीचे की जमीन खींच लेती है। तुम भले-चंगे चले जा रहे थे और ज्ञानी तुम्हें उलझन में डाल देगा है। सब ठीक-ठाक चलता था और मुश्किल खड़ी हो जाती है। पछताते हो कि कहां सुन ली यह बात!
और उस फल की पहली मुलाकात बड़ी कड़वी है। कड़वी क्यों है? सत्य का फल कड़वा क्यों है? इसे थोड़ा समझो। सत्य का फल वस्तुतः कड़वा नहीं है तुम असत्य के फल को बहुत दिन तक अभ्यास किये हो। वह तुम्हें मीठा लगने लगा है। अभ्यास से चीजें मीठी हो जाती है। तुमने कभी पहली दफा शराब पी है? पहली दफा शराब पिओगे तो बड़ी तिक्त मालूम पड़ती है। कड़वी मालूम पड़ती है। तुम्हें भरोसा ही नहीं आयेगा कि आखिर लोग शराब किसलिये पीते है।
शराब पहले दफा पियोगे तो कड़वी लगेगी ही। लेकिन पीते ही रहे तो शराब भी मधुर मालूम होने लगेगी।
असत्य को जन्मों-जन्मों तक पचाया है। असत्य कड़वा है, जहर है लेकिन जन्मों-जन्मों का अभ्यास-रूचिकर हो गया है। और जिसे असत्य मीठा लगने लगे उसे सत्य कड़वा लगेगा ही। क्योंकि असत्य से सत्य बिल्कुल उल्टा है। इसलिये शुरू-शुरू में कड़वा लगेगा ही। क्योंकि असत्य से सत्य बिल्कुल उल्टा है। इसलिये शुरू-शुरू में कड़वा लगता है। इसलिये कबीर कठोर मालूम होते है। इसलिये सद्गुरू तीर की तरह चुभ जाता है। तुम्हारी गलत आदतों का परिणाम है, और कुछ भी नहीं।
और अगर जन्मों-जन्मों तक अभ्यास चला हो तो सब सत्य तुम्हारे कान में पहली दफे पड़ेगा, तो तुम्हें बिलकुल भी रूचिकर मालूम नहीं होगा। दुर्गंध का अभ्यास हो गया है, सुगंध समझ में नहीं आती। शोरगूल का अभ्यास हो गया है, शांति काटती है। शब्द का बहुत अभ्यास हो गया है, मौन डराता है। भीड़-भाड़ की आदत हो गयी है, अकेले नहीं बैठा रहा जाता। भीड़-भाड़ चाहिये। चाहिये ही भीड़-भाड़।
लेकिन अगर कोई साधता रहे, साधता रहे, तो अब जहर भी मीठा हो जाता है साधते-साधते तो अमृत तो मीठा है ही। साधते-साधते हो जायेगा। साधने का इतना ही अर्थ है कि साधते-साधते जहर की आदत छूट जायेगी। और जहर मीठा है यह भ्रांति साफ हो जायेगी। यह भ्रांति मिट जायेगी। उसी दिन अमृत का स्वाद पहली बार मिलेगा। वही स्वाद मुक्ति है।
प्यारे वचन है। धनी कहते है, ‘सुंघत के बौरा भये हो’। कि जो उसे सूंघ लेता है, उस सत्य के रस को, वह बावला हो जाता है, पागल हो जाता है। क्योंकि जिसे तुमने अभी समझदारी समझी है वह समझदारी नहीं है। तुम जिसे अभी समझदारी कहते हो वह एक तरह का पागलपन है।
क्या है तुम्हारी समझदारी? धन इकट्ठा कर लो और मर जाओ। अब धन में से कुछ ले जा न सकोगे। अब यह बड़े मजे की बात है, एक आदमी जिंदगी भर इकट्ठा करता है जिसमें से कुछ ले जा न सकेगा। इसको तुम समझदार कहते हो? यह कैसी समझदारी हुई? ऐसी चीज इकट्ठी की, जो ले जा न सकेगा। और इसको इकट्ठा करने में न कभी चैन से सोया, न कभी चैन से बैठा। जिंदगी खराब हुई और बाद में सब पड़ा रह गया। इसको तुम समझदारी कहते हो? यह समझदारी तो नहीं हो सकती। मगर इसी को लोग समझदारी मानते हैं।
बड़ा मजा है। संसारी समझते हैं संन्यासियों को पागल। और सन्यासी समझते है कि संसारी पागल है। अगर दोनों में विचार करोगे तो तुम एक दिन पाओगे कि संसारी ही पागल है। क्योंकि संन्यासी वह जोड़ता है जो मौत में भी साथ जायेगा। वह ध्यान इकट्ठा करता है, धन नहीं। ध्यान उसका धन है। वह पद नहीं जोड़ता, प्रेम जोड़ता है। प्रेम उसका पद है। वह इस संसार की व्यर्थ चीजें इकट्ठी नहीं करता, वह सिर्फ परमात्मा को पाने की पात्रता जुटाता है। वह अपने पात्र को खालिस करता है, परिशुद्ध करता है कि किसी दिन परमात्मा उसमें बरसे तो वह तैयार रहे। वह जीवन में जो महत्त्वपूर्ण है वही करता है। अब ऐसा ही समझो कि तुम गये समुद्र के तट पर, वहा हीरे भी पड़े थे, और कंकड़-पत्थर भी पड़े थे। तुम कंकड़-पत्थर बीनते रहे और संन्यासी ने हीरे बीन लिये। हालांकि तुम उसे पागल कहोगे क्योंकि तुम अपने कंकड़-पत्थरों को हीरा समझते हो। और वह तुम्हें पागल कहेगा। क्योंकि वह जानता है, हीरा क्या है।
और एक बात ख्याल रखना, संन्यासी संसार का भी अनुभव रखता है, तुम संन्यास का अनुभव नहीं रखते। तुम्हारी बात उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकती। उसने दोनों बातें जानी है। उसने संसार जाना है और संन्यास जाना है। ऐसा ही समझो कि एक जवान आदमी है, और बूढ़ा आदमी है। हम बूढ़े आदमी की बात को ज्यादा मूल्य क्यों मानते है? इसलिये कि उसने जवानी भी जाना और बूढ़ापा भी जाना। तुमने सिर्फ जवानी जानी है। तुम्हें अभी दूसरे पहलू का कुछ पता नहीं है। इसलिये जवान आदमी के बात का कोई बहुत मूल्य नहीं माना जाता। पहले जवानी को जाने दो। पहले इसका उतार भी देखो। अभी तुमने वसंत ही देखा है, पतझड़ भी देखो। फिर तुम जो कहोगे उसमें ज्यादा संतुलन होगा। ऐसे ही हमने इस देश में बूढ़े को आदर दिया। क्योंकि बूढ़े का अनुभव जवान से ज्यादा है। जवान को हम आदर देते हैं बच्चें से ज्यादा, क्योंकि बच्चे से जवान का अनुभव ज्यादा है।
परम पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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