





जिंदगी की सारी भावनाएं किसी अज्ञात छोर से आती हैं- जहां से जन्म आता है वहीं से। आप नाहक ही बीच में मालिक बन जाते हैं। और आपने क्या किया है? क्या है जो आपका किया हुआ है? भूख लगती है, नींद आती है, सुबह नींद टूट जाती है, सांझ फिर आंखे बंद होने लगती हैं। बचपन आता है, फिर कब चला जाता है? फिर कैसे चला जाता है? न पूछता, न विचार-विमर्श लेता, न हम कहें तो क्षणभर ठहरता। फिर जवानी चली आती है, फिर जवानी विदा हो जाती है। फिर बुढ़ापा आ जाता है। आप कहां है?
नहीं, लेकिन आप कहे चले जाते हैं कि मैं जवान हूं, मैं बूढ़ा हूं। जैसे कि जवानी कुछ आप पर निर्भर हो। फिर जवानी के अपने-अपने फूल हैं। बुढ़ापे के अपने फूल हैं जो खिलते हैं। वैसे ही खिलते हैं जैसे वृक्षों पर फूल खिलते हैं। गुलाब का पौधा नहीं कह सकता कि मैं गुलाब के फूल खिलाता हूं। क्योंकि यह तभी कह सकता था जब चमेली के खिला सकता होता। लेकिन चमेली के तो खिला नहीं पाता। चंपा के तो खिला नहीं पाता। मधुकामिनी तो नहीं लगती उस पर। गुलाब ही लगता है। फिर नाहक ही अकड़ है। गुलाब लगता है। चमेली पर चमेली लगती है।
मैं को खड़े होने की जगह नहीं है। अगर जीवन को एक-एक कण-कण सोचेंगे, तो पायेंगे, मैं को खड़े होने की जगह नहीं है। लेकिन भ्रम पैदा हम क्यो कर लेते है? कैसे यह इलूजन पैदा होता है? यह डिसेप्शन, यह प्रवंचना आती कहां से है?
यह आती इसलिये है कि हमें पूरे वक्त ऐसा लगता है कि विकल्प हैं, आल्टरनेटिव हैं। जैसे आपने मुझे गाली दी, तो मेरे सामने दो विकल्प हैं कि चाहूं तो मैं गाली का जवाब दूं और चाहूं तो न दूं- ऐसा मुझे लगता है, है नहीं। ऐसा मुझे लगता है कि चाहूं तो जवाब दूं और चाहूं तो जवाब न दूं। लेकिन क्या सच में ही विकल्प होते है? क्या जो आदमी गाली के उत्तर में गाली देता है, वह चाहता तो न देता? आप कहेंगे कि चाहता तो नहीं दे सकता था।
लेकिन थोड़ा और गहरे जाना पड़ेगा। वह चाह भी आप में होती है कि आप ले आते हैं? गाली देने की चाह, या न देने की चाह, वह भी आपके वश में है? नहीं, जो बहुत गहरे खोजते हैं, वे कहते हैं कि कहीं तो हमें पता चलता है कि चीजें हमारे वश के बाहर हो जाती हैं। एक आदमी को ख्याल आता है कि गाली दूं, गाली देता है। एक आदमी को खयाल आता है, नहीं दू, नहीं देता है। लेकिन यह खयाल कि दूं या नहीं दूं, यह खयाल कहां से आता है? यह खयाल आपका है? यह वहीं से आता है, जहां से जन्म। यह वहीं से आता है, जहां से प्रेम। यह वहीं से आता हैं, जहां से प्राण। यह वहीं खो जाता है, जहां मौत। यह वहीं लीन हो जाता है, जहा जाती हुई श्वास। लेकिन धोखा देने की सुविधा हो जाती है कि मेरे हाथ में है। चाहता तो गाली न देता। लेकिन किसने कहा था कि आप दें?
नहीं, आप कहेंगे, बुद्ध है, महावीर हैं, वे गाली नहीं देते।
क्या आप समझते है कि वे चाहें तो गाली दे सकते हैं? नहीं, जैसे आप गाली देने में बंधा हुआ अनुभव करते है, उससे कम बंधा हुआ बुद्ध और महावीर अनुभव नहीं करते हैं न गाली देने में। चाहे तो भी दे नहीं सकते। नहीं, वह चाह पैदा ही नहीं होती।
भाग्य की जो अद्भुत कल्पना है, उसके पीछे यह रहस्य था। नियति की, डेस्टिनी की जो अद्भुत धारणा है, उसके पीछे यह राज है। नियति और भाग्य का यह मतलब नहीं है कि आप कुछ न करें, बैठ जाएं। क्योंकि भाग्य तो कहता है, बैठ भी नहीं सकते तुम। वह बिठाए तो बैठ सकते हैं। भाग्य तो कहता है, कुछ न करें हम फिर, यह भी तुम नहीं कर सकते। वह न कराए तो नहीं करना आ जायेगा।
ध्यान रखें, भाग्यवादी जो लोग दिखाई पड़ते हैं उनमें एक भी भाग्यवादी नहीं है। वे कहते हैं, सब भाग्य कर रहा है, हम क्या करें। तो हम कुछ नहीं करते। हम कुछ नहीं करते, इतना भी खयाल शेष रह गया तो करने का भाव शेष है। पूर्ण नियति की धारणा यह है कि हम हैं ही नहीं करने का उपाय नहीं है। वही है- परमात्मा ही है।
और जब हम कर सकते हों, कर्ता न हो सकते हों, तो फिर ममत्व, मेरा क्या होगा? किसे हम कहें, मेरा है? बेटे को कहें? मेरा है? लगता है, क्योंकि मैंने जन्म दिया मालूम पड़ता है। ऐसा भ्रम होता है। हालांकि किसी ने कभी किस के बेटे को जन्म नहीं दिया। बेटे जन्मते है। आपसे रास्ता खोज लेते हैं।
एक मकान आप बना लेते हैं, तो कहते हैं, मेरा है। लेकिन देखते हैं, चिड़ियां भी घोंसला बना लेती हैं। इस जगत में छोटे से छोटा प्राणी भी रहने की जगह बनाता है। और ऐसी चिडियां भी हैं जो कभी किसी से सीखती नहीं। कुछ ऐसी चिड़िया हैं, जिनको जन्म देने के बाद, जिनके अंडा देने के बाद मां तो उड़ जाती हैं। अंड़ा जब फूटता है, तो चिड़िया सीधी बाहर निकल जाती है। उसे मां की शिक्षा नहीं मिल पाती, पिता का संरक्षण नहीं मिल पाता। कोई स्कूलिंग, कोई स्कूल में उसको भर्ती नहीं किया जाता। बड़े आश्चर्य की बात है, वह चिड़िया फिर वैसा ही घोंसला बनाती है जैसा उसकी मां ने बनाया था, और उसकी मां की मां ने बनाया था, और उसकी मां की मां ने बनाया था। और वह घोंसला साधारण नहीं होता, बहुत टेक्नीकल, बड़े तकनीक का, बड़ा आर्किटेक्चर का होता है। कि आदमी को भी बनाना पड़े सीखना पड़े, फिर भी पूरी कुशलता से बना ले तो कठिन है।
आदमी भी बनाता है। सभी बनाते हैं। मेरे कहने का कोई कारण नहीं है। किसी चीज में हम कहें मेरा है? क्योंकि धन इकट्ठा कर लेते हैं? संग्रह सारे प्राणी करते हैं। अनेक-अनेक रूपों में करते हैं। और ऐसा नहीं है कि आदमी उनमें सर्वाधिक कुशल है। ऐसा भी नहीं है। आदमी से भी ज्यादा कुशल संग्रह करने वाले प्राणी हैं।
संग्रह की वृत्ति निसर्गत है। इसलिये ईशावास्य का यह सूत्र कहता हैः सब परमात्मा का है। निसर्ग का कहें, नियति का कहें, प्रकृति का कहें, लेकिन ईशावास्य कहता है, परमात्मा का है। क्योंकि निसर्ग, नियति और प्रकृति मेकेनिकल शब्द हैं, यांत्रिक शब्द है। यह इतना विराट, यह इतना रहस्यपूर्ण, यांत्रिक नहीं हो सकता-जीवंत है, चेतन है।
विज्ञान भी यही कहता है कि सब प्रकृति कर रही है। लेकिन जब हम कहते है विज्ञान की भाषा में कि सब प्रकृति कर रही है, तो हम दीन तो हो जाते हैं, हीन तो हो जाते हैं, यंत्रवत हो जाते हैं। लेकिन जब ईशावास्य कहता है, सब परमात्मा कर रहा है, तो एक तरफ हमारा अहंकार भी छिन जाता है, लेकिन दूसरी तरफ हम परमात्मा हो जाते हैं। वहीं महत्त्वपूर्ण है। वहीं समझ लेने जैसा है।
इसलिये विज्ञान जितना विकसित होता जाता है….. विज्ञान का भी जोर यही है कि आदमी यह भ्रम छोड़ दे कि मैं कर रहा हूं, सब हो रहा है। लेकिन उसका जोर इस बात पर है कि सब मेकेनिकल हो रहा है, सब यंत्रवत हो रहा है। मशीन की तरह सब होता है। सारा जगत यंत्रवत चल रहा है। अगर सब यंत्रवत हो रहा है, तो आदमी दीन तो हो जाता है, उसका गौरव , जो अहंकार से मिलता था, बड़ा क्षुद्र था। छोटे से मिट्टी के तेल में जलते हुए दीये की तरह था। वह तो बुझ जाता है। गहन अंधकार छा जाता है-सूरज कहीं से वापस नहीं लौटता।
धर्म और विज्ञान के मूल आयाम में यही भेद है। विज्ञान भी उन्हीं बातों को कह रहा है जिन्हें धर्म कहता है। उसकी एम्फेसिस मेकेनिकल है, उसका जोर यंत्र पर है। धर्म भी वही कह रहा है, लेकिन उसका जोर चेतना पर, प्रज्ञा पर, जीवंत पर है। और वह जोर कीमती है। अगर पश्चिम का विज्ञान सफल हो गया, तो अंततः आदमी मशीन हो जायेगा। अगर पूरब का धर्म जीत गया, तो अंततः मनुष्य परमात्मा हो जाता है। दोनों अहंकार छीन लेते हैं। लेकिन एक से अहंकार छिनता है तो आदमी नीचे गिरता है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,