





सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया। ये चारों मुनि प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। भगवान विष्णु का इस रूप में अवतरित होने का एक उद्देश्य ब्रह्मा जी के कार्यों में सहायता करना और जीवन निर्माण में सहयोग करना था। सनकादि मुनि की आयु सदा पांच वर्षीय बालक की रही, ये ज्ञान व बुद्धि के कोष हैं व सदा शांत चित्त में रहने वाले हैं। परन्तु एक बार भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय के अपमानजनक व अनुचित व्यवहार से क्रोधित होकर चारों कुमारों ने इतना प्रचण्ड शाप दिया, जिसके परिणामतः उन दोनों द्वारपालों को पृथ्वी पर कईयों बार जन्म लेना पड़ा और प्रत्येक बार उनका संहार भगवान विष्णु के किसी-न-किसी अवतार के हाथो हुआ।
सनतकुमार ने ज्ञान, बुद्धि, विवेक का मार्ग दिखाया। इनका नित्य ध्यान कर शांत चित्त से साधना करने से साधकों को मन में व्याप्त जो भी व्याकुलता है या जो भी मानसिक रोग या कष्ट है उन सभी का अंत होता है। वाणी प्रभावशाली बनती है, जिससे सामने कोई भी व्यक्ति क्यों न हो प्रभावित हो जाता है।
भगवान विष्णु की इस रूप में कृपा प्राप्त करने से शत्रुओं का भी अंत निश्चित हो जाता है, व्यक्ति विवेकशील बन अपनी बुद्धिचार्युता से मनचाहा लक्ष्य प्राप्त करने में पूर्णतया सफल हो जाता है। अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिये यह प्रज्ञा, बुद्धि, अन्तर्दृष्टि सनत कृपा प्राप्ति दीक्षा पूर्णता फलदायी सिद्ध होती है। राजनीति, कोर्ट-कचहरी, दफ्तर में कार्यरत व्यक्ति के लिये भी यह उत्तम साधना है।
प्रज्ञा-बुद्धि-अंतर्दृष्टि सनत कृपा प्राप्ति साधना
यह प्रयोग प्रत्येक साधक किसी भी एकादशी, गुरुवार या रविवार को सम्पन्न कर सकते हैं। इस प्रयोग को सिद्ध करने के लिये कोई स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है, अतः इस प्रयोग को स्त्री या पुरुष, अध्ययनरत विद्यार्थी ही पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ सिद्ध कर सकते है।
सामग्री- ऊधर्वचेतस यंत्र, प्रज्ञा माला।
प्रात: काल साधक दैनिक क्रिया से निवृत होकर, पूजा कक्ष में ढीले वस्त्र पहिन कर श्वेत आसन पर बैठ जाये, पवित्रीकरण तथा दैनिक साधना विधि सम्पन्न करने के पश्चात् 5 मिनट तक अति तीव्रता से भस्त्रिका और प्राणायाम क्रिया को सम्पन्न करें, इसके लिये सांस को दोनों नथुनों से अंदर भरते हुये अत्यन्त तीव्रता से पीछे की ओर हाथों को खीचें, हाथों को आगे और पीछे ले जाने और ले आने की क्रिया में आपको ऐसा लगना चाहिये, कि जैसे आप किसी भारी वस्तु को ढकेल रहे है और अपनी ओर खींच रहे है, यह क्रिया बहुत ही तीव्रता से 5 मिनट तक लगातार करें।
इसके पश्चात् सुखासन या पद्मासन किसी भी आसन में, जो आपके अनुकूल हो, आँख को बन्द कर निश्चल भाव से बैठ जायें तथा अपना ध्यान भ्रूमध्य में केन्द्रित करें, लगभग 15 मिनट के पश्चात् ‘‘ऊधर्वचेतस यंत्र’’ को अपने सामने स्थापित कर दें, इसमें किसी विशेष पूजन की आवश्यकता नहीं है, सामान्य पूजन करें और ‘‘प्रज्ञा माला’’ से निम्न मंत्र का 15 माला मंत्र-जप सम्पन्न करें-
मंत्र-
।। ऊँ हृीं क्लीं ।।
साधकों को चाहिये कि मंत्र-जप समाप्ति के बाद, वे प्रत्येक 3 महिने तक पड़ने वाली एकादशी अथवा पूर्णिमा को इसी प्रकार प्रयोग सम्पन्न करें, और तीसरे माह की पूर्णिमा को मंत्र-जप समाप्ति के पश्चात् यंत्र और माला को नदी या सरोवर में विसर्जित कर दें।
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