





पिछले अंक में आपने पढ़ा किस प्रकार से गुरुत्वीय चेतना से मनुष्य का जीवन पूर्णता से युक्त हो सकता है तथा पूर्णत्व प्रदान कर उसे श्रेष्ठता के पथ पर अग्रसर करने वाली सिद्धियाँ हर क्षेत्रों में विद्यमान हैं। कैसे हम अपने जीवन को अष्ट सिद्धि तथा नव निधि स्वरुप बना सकते हैं। साथ ही आपने जीवन के उन चार नारकीय स्थितियों के बारे में भी विस्तृत रुप से ज्ञान प्राप्त किया, जिनमें से केवल एक के हो जाने मात्र से ही जीवन में अनर्थ वाली स्थितियों का विस्तार होना प्रारम्भ हो जाता है।
इस अंक में हम पढ़ेंगे कि कैसे कोई विशेष काल खण्ड अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होता है। साथ ही उन असुरी प्रवृत्ति के व्यक्तियों पर करारा प्रहार है, जो मनुष्य और मनुष्यता के बीच फैले पवित्र स्पन्दन में “कुसंगकाज्वर”फैलाकरसबकोरोगग्रस्तकरतेहैं।
अक्षय तृतीया जैसे विशिष्ट, प्रभावशाली तथा अद्वितीय पर्व की महत्ता और उसके पीछे छुपे गूढ़ रहस्यों के बारे में सद्गुरु मुख से प्रकट हुआ यह ओजस्वी प्रवचन, अपने आप में उपनिषद तुल्य है –
भारतीय संस्कृति में प्रत्येक तरह की आसुरी, राक्षसी, विषतापूर्ण स्थितियों के समाधान हेतु अनेक-अनेक विशेष पर्व-महोत्सव निर्मित हैं और जीवन जब राक्षसीमय, कुसंगतिमय तथा कुस्थितियों के स्वरुप में नारकीय बन जाता है, तब उसके समाधान हेतु विशेष पर्व निर्मित किये गये हैं और विशेष पर्व-उत्सवों में सर्वश्रेष्ठ रुप में वैशाखी शुक्ल पक्षीय तृतीया, जो कि त्रीयुगों में अक्षय धन लक्ष्मी के प्राप्ति हेतु अक्षय तृतीया का महापर्व, विशेष रुप से हमारे आर्य-संस्कृति में क्रियान्वित किया गया है। जिस तरह से जीवन की नारकीयमय स्थितियों के साथ, उसके विषममय जीवन को आनन्दमय स्वरुप को बनाने के लिए भी भाव-चिन्तन भी निर्मित किये गये हैं। जीवन के अज्ञानता को, दुषितता को, विषमता को, अपूर्णता को, समाप्त करने हेतु विशेष पर्व हम निरन्तर सम्पन्न करते हैं जिससे कि जो भी जीवन का उन्मादमय, क्रोधमय, आशंततामय, कुस्थितियाँ हैं उनका हम समाधान कर सकें अर्थात् तात्पर्य यही है कि प्रत्येक के जीवन की विषम स्थितियों का निवारण, समाधान किसी न किसी पर्व-उत्सव से जुड़कर ही किया जा सकता है।
विशेषता की बात यह है कि किस तरह जीवन के संताप, रोग, कष्ट, पीड़ा, असुर वृत्तियाँ,अशांति या नारकियमय दुःख-कष्ट को समाप्त कर पूर्ण जीवन की प्राप्ति हो; इसके लिए हमारे 108 उपनिषदों में या पुराणों में, भागवत में, रामायण में या चार वेदों में, उसका स्वरुप प्रकट किया गया है कि किस तरह से ये विषम स्थितियाँ सासांरिक गृहस्थ व्यक्तियों के जीवन से समाप्त हों । केवल उसका निदान, उसका समाधान ही उपनिषदों में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अर्थवेद में, उपनिषदों में ही प्रकट किया गया है क्योंकि ये सभी विषम स्थितियाँ मनुष्य की उग्रता के फलस्वरुप, कुबुद्धि के परिणाम स्वरुप और अनर्गल क्रियाओं के फलस्वरुप ही वह स्वनिर्मित करता है। और जब स्वनिर्मित करता है तो उसका समाधान उसे स्वतः ही साधनात्मक स्वरुप में करने से इस तरह की दुस्थितियाँ, इस तरह की कलुशितमय जीवन से निवृत्ति प्राप्त हो पाती है क्योंकि पहले हमने अपने अन्तसः मन में इन सुख और नारकीय, विषम स्थितियों को परिमार्जित किया, उन्हें पल्लवित किया, उनका उद्भव किया। अब उसका विनाश या समाप्तिकरण यकायक नहीं हो सकता है।
जिस तरह से आक या धतुरे का पौधा एक ही दिन में अपना पूरा स्वरुप प्रकट नहीं करता है ठीक उसी तरह से हमारे भीतर में जो क्रोध है, उन्माद है, विषमता है, विलखता है या अनर्गल तरह के कुविचार हैं, भावना-चिन्तन हैं। वे एक ही दिन में प्रकट नहीं होते हैं, एक ही दिन में हम उनका उद्भव नहीं कर पाते हैं, धीरे-धीरे उनको हम अपने भीतर में संग्रहित करते हैं और ज्यों-ज्यों इस तरह की विषम स्थितियों को भीतर में आत्मसात करते हैं उसी के फलस्वरुप हमारे शरीर का हाव-भाव, चिन्तन, हमारी बुद्धि, हमारे कर्म करने की क्रियात्मक शक्ति जीवन में प्रकट होती हैं और उसका एहसास स्वयं को नहीं होता है। उसका एहसास जो भी हमारे साथ में रहते हैं या जिसके सामने भी हम प्रकट होते हैं, उन्हें ऐसा मालुम होता है कि इसके भीतर में क्या-क्या अनर्गल स्थितियाँ हैं। क्योंकि प्रत्येक सांसारिक मनुष्य अपने आप को देवमय महसूस करता है। उन्मादमय, असुरमय, राक्षसीमय, जो वृत्तियाँ होती हैं, तो वह कहता है कि मेरे दिमाग का टेम्पर (Temper) ही ऐसा है, उसे भी वह सामान्य स्वरुप में स्वीकार करता है। मेरे तो भाव ही ऐसे हैं, मैं तो अपने आप में कन्ट्रोल (Control) नहीं कर पाता हूँ, नियंत्रण नहीं कर पाता हूँ, मैं बहुत ही जल्दी उच्चताओं को प्राप्त करना चाहता हूँ इस कारण से मेरे भीतर की भावना-चिन्तन है।
उच्चताओं को भी प्राप्त करना है और इस तरह की सूक्ष्म और न्यून भावना-चिन्तन भी है। उसका वह समाधान भी नहीं करता है। दोनों का ताल-मेल सम्भव नहीं हो पाता है क्योंकि हम ज्यों-ज्यों अपने उच्च लक्ष्यों, उच्च कामनाओं की ओर वृद्धि को प्राप्त होते हैं तो हमें धीरे-धीरे उन सोपानों को, सीढ़ियों को, उन ऊँचाईयों को छूने के लिये प्रयास करना पड़ता है। और ज्यों-ज्यों हम प्रयास करते हैं त्यों-त्यों निरन्तरता बना कर रखनी पड़ती है। तब हम उन श्रेष्ठताओं को धीरे-धीरे आत्मसात कर पाते हैं। हमारे भागवत में, जिसकी रचना वेदव्यास जी ने की, और भगवान विघ्नहर्ता गणपति ने निर्विघ्न स्वरुप में अपने मधुर वाणी से उसका गायन-उच्चारण किया और अविरल रुप से वेदव्यास जी ने उसे उल्लेखित किया। इसीलिए अक्षय तृतीया महापर्व का विशेष महत्व है और अक्षय तृतीया वैशाखी शुक्ल पक्ष दिवस पर विशेष रुप से आठ महापुरुषों को चिरंजीवी रहने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। वो अष्ट चिरंजीवी श्री वेदव्यास, जिन्होनें भागवत की रचना की। अश्वत्थामा, राजा बली, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, मारकण्डेय, जिन्होंने ‘महामृत्युंजय, रुद्राष्टाध्यायी मंत्रों’ की रचना की और विशेष रुप से परशुराम जो कि भगवान विष्णु के दशावतार स्वरुप में प्रकट हुए। ये अष्ट चिरंजीवी अर्थात् वे अभी भी कलयुग में निरन्तर विचरण कर रहे हैं, उन्हें कभी भी मृत्यु की प्राप्ति नहीं हुई। अक्षय रुप से वे निरन्तर सृष्टि में गतिशील हैं और अक्षय तृतीया के महापर्व पर शुभ-मंगलमय कार्य सम्पन्न किये जाते हैं अनेकों लोग सांसारिक-भौतिक गृहस्थ जीवन में पदार्पण करने के लिये, प्रवेश करने के लिये जाते हैं।
इस विशेष दिवस पर विवाह का पर्व उसके माता-पिता द्वारा सम्पन्न किया जाता है जिससे की उन नव विवाहित वर-वधु की जोड़ी अक्षय रुप में बनी रहे। ऐसे विशेष पर्व पर अबुझ स्वरुप में अर्थात् इस दिन किसी भी तरह का राहु काल, वक्री काल मंगल दोष, नवग्रह संताप दोष, कोई तरह की विषम स्थिति या विषम भाव निर्मित नहीं होता है। यह 24 घण्टे का अबूझ मुहुर्त पूर्ण रुप से क्रियाशील रहता है। इसीलिए इस दिवस पर अधिकांश-अधिकांश स्वरुप में जो सोलह संस्कारों के श्रेष्ठताओं की प्राप्ति में सर्वश्रेष्ठ वैवाहिक संस्कार है, उसका विशेष रुप से प्रयोजन सम्पन्न करते हैं और वह विशिष्ट रुप से जीवन के निर्माण में सहायक रहता है। जब तक वे दोनों पति-पत्नी अपने आप को एक दूसरे के साथ, आत्मीय भाव से, मानसिक भाव से एक रुपता को बने रहते हैं तब तक उनका जीवन सुश्रेष्ठमय बनता है।
विशेष रुप से इन आठ चिरंजीवियों के साथ-साथ जो भवतारिणी है, जो हमें पूर्ण रुप से पवित्र करने की क्षमता रखती है; माँ गंगा को अक्षय तृतीया के दिवस पर भगवान सदाशिव महादेव ने अपनी जटा से सृष्टि पर प्रकट किया था। साथ ही साथ अन्नपूर्णा जिससे जीवन क्रियाशील रहता है। क्योंकि अन्न को पूर्णता से ग्रहण करने से ही निरन्तर हम सुऊर्जा से युक्त होते हैं। और वह अन्नपूर्णा अनेक-अनेक धार्मिक पदार्थों के स्वरुप में, वनस्पतियों के स्वरुप में, फल के स्वरुप में हम ग्रहण करते हैं, जो मेरे उदर के लिए, पेट के लिए सुपाच्य है, उसे हम ग्रहण करके अन्तस रुप से तृप्तमय बनते हैं और जब तृप्तमय बनते हैं तो जीवन में विकास के भाव, वृद्धि के भाव का निर्माण होता है। और हम वर्षों तक अपने जीवन में देह की वृद्धि के साथ-साथ अनेक-अनेक स्वरुपों में सुक्रियाओं से युक्त होते हैं।
भगवान कुबेर जो विशेष रुप से धन-लक्ष्मी के अधिपति हैं, वे आज के ही दिवस पर नियुक्त किये गये थे। वे धन के अधिपति हैं, धन के रक्षक हैं इसीलिए इस दिवस पर कुबेर की पूजा, धन-लक्ष्मी की पूजा सम्पन्न की जाती है। जिससे की अक्षय रूवरुप में मुझे लक्ष्मी की, धन की प्राप्ति हो और जिसके कारण से मैं अपने सांसारिक भौतिक-गृहस्थ जीवन को और समृद्धशाली और सुश्रेष्ठमय बना सकूँ। वह कुबेर के, धन-लक्ष्मी के फल के स्वरुप ही हमें प्राप्त हो सकता है। क्योंकि दरिद्रता या अभाव वाला जीवन पूर्ण-पूर्ण स्वरुप में नारकीय होता है। धन अभाव, निर्धनता के फलस्वरुप जीवन में अनेक-अनेक कुस्थितियाँ निर्मित होती हैं। निर्धनता के फलस्वरुप शरीर जर्जर और कंकाल सा बन जाता है। निर्धनता के फलस्वरुप शरीर रोगग्रस्त बन जाता है, परिवार का सही रुप से हम भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं व कलह-तनाव तथा विषमताओं की वृद्धि होती है, इस दरिद्रता के, धन अभाव के फलस्वरुप ही हमें सामान्य बुद्धि के माध्यम से, ज्ञान के माध्यम से जो योगमय क्रियाओं का निर्माण करना चाहिए; उन योगमय क्रियाओं का निर्माण नहीं कर पाते हैं। इसलिए जीवन को सही रुप से संचालित करने के लिए आवश्यक है कि निरन्तर प्रचुर मात्रा में धन का वक्र बना रहे और धन के आगम के लिए निश्चित रुप से…, यह तो स्वभाविक है कि केवल प्रार्थना करने से या ईच्छा-कामना करने से काम होता नहीं है उसके लिए कर्मशक्ति आवश्यक है इसीलिये लक्ष्मी को कहा गया है- “कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि”।
कर्म करने से उसका जो प्रभाव होगा, उससे ही मेरा जीवन प्रकाशमय बनेगा, उससे ही मेरे जीवन के अन्धकारमय स्थितियों का निवारण होगा। केवल कर्म करने से ही…-“प्रबलःकर्मसिद्धान्तः”।
हम संसार में आये तो पहले भाग्य लेकर नहीं आए, पहले कर्म लेकर आये और “कर्मसेहीभाग्यकानिर्माणहोताहै।”
उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्यानि न मनोरथैः।।
फल मेरे ललाट की भृकुटी में, आज्ञा चक्र में या मेरे हस्त रेखाओं में, ग्रहों के माध्यम से भाग्य का निर्माण नहीं होता है; कर्म करने से भाग्य का निर्माण होता है। इसीलिये कहा जाता है- “कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि”।कर्मकरनेसेहीहमजीवनकेअन्धकारकोसमाप्तकरसकतेहैंऔरइसकेसाथ-साथयदिहमअनर्गलक्रियायेंकरतेहैं, कुकर्म करते हैं तो निश्चित रुप से हमारा जीवन नारकीय बन जाता है। अर्थात् इस जीवन का निर्माण किस तरह से वर्तमान संसार से जुड़ा है; अधोगामि हो रहा है या निरन्तर-निरन्तर उत्तरोत्तर विकास स्वरुप में हो रहा है, उसका हम स्वयं ही अपने मनुष्य प्रवृत्ति के फलस्वरुप ज्ञात कर सकते हैं कि किस तरह से मेरा जीवन आनन्दमय, प्रसन्नमय बन रहा है और किस तरह से मेरा जीवन कुस्थितियों के स्वरुप रोग, जर्जरता, कलह-तनाव, दुःख, कष्ट-पीड़ा, अनेक तरह के संतापों का निवारण हम इस दिवस पर साधनात्मक भाव-चिन्तन से और साधना का तात्पर्य कि निरन्तर-निरन्तर उस कर्ममय क्रिया में हमें अग्रसर होना है। तब जाकर साधना का कुछ फल प्राप्त होता है। कोई पाँच लाख, सवा लाख या 11 माला, 21 माला या एक विशेष दिवस पर कोई साधना करने से उसका कोई लाभ नहीं मिलता है जो उस मंत्र का भाव-चिन्तन है उसके साथ-साथ हमें निरन्तर उस शक्ति को साथ में लेते हुए कर्म करना होता है। तब हम उस मंत्र का पूर्ण रुप से लाभ प्राप्त कर पाते हैं, तब हमें अपने जीवन में सुचिता की प्राप्ति होती है, सिद्धिदा की प्राप्ति हो पाती है। ऐसा नहीं है कि साक्षीभूत रुप में महामाया आ जायेगी, माँ बगलामुखी, अप्सरा, धुमावती या कोई शक्तियाँ हमारे सामने आ जाएगी और हमें दृश्यमान दिखाई देगी। वैसा कुछ भी नहीं है, उसे प्राप्त करने के लिये अपने भीतर में भी वह महामाया शक्तिमय बनना पड़ेगा, अपने भीतर में भी छिन्नमस्ता या विशेष रुप से मातंगी शक्ति, महाकाली स्वरुप में अपने आप को प्रकट करना होगा, शक्ति से युक्त होना पड़ेगा और वह शक्ति निरन्तर-निरन्तर सुस्थितियों के द्वारा हमें क्रिया क्रियाशील करनी होगी। तभी हमारे जीवन में जो स्वयं के ही शत्रु हैं-शरीर के भीतर में, आस-पास के शत्रु नहीं। वे बहुत टेम्पररी (Temporary) हैं, बहुत ही लघु समय के लिए हैं। परन्तु जो निरन्तर-निरन्तर मेरे जीवन को नारकीय कर रहे हैं, उन शत्रुओं का संहार इन शक्तियों की अभ्यर्थना, आराधना से ही कर सकते हैं।
अक्षय तृतीया केवल लक्ष्मी का ही दिवस नहीं है। मैंने क्या बताया कि ये आठ चिरंजीवी कैसे-कैसे हुए….? जो कि ज्ञान-बल-बुद्धि और कैसे परशुराम ने 18 बार इस पृथ्वी पर से क्षत्रियों का संहार किया और वे भगवान विष्णु के अवतार रहे, इसलिए अक्षय तृतीया का दिवस परशुराम जयन्ती के रुप में भी सम्पन्न करते हैं और अन्नपूर्णा की वृद्धि रहे, धन-धान्य की वृद्धि रहे, मेरे घर में विघ्नहर्ता गणपति विराजमान रहें, मेरे घर में रिद्धि-सिद्धि शुभ-लाभ विराजमान रहें। अन्नपूर्णा, चाहे वह धन या गेहूं के स्वरुप में हो या वनस्पतियों के स्वरुप में; निरन्तर-निरन्तर हमें सर्वप्रथम आवश्यकता होता है-अन्न की। हमें उदर की पुर्ति की आवश्यकता रहती है। गरीबी है, विषमता है, जर्जरता है, रोग है, ये सब एक साईड में है। परन्तु सर्वप्रथम हमें आवश्यकता रहती है कि मेरे पेट की भूख शांत हो सके जिससे की मैं शक्ति से युक्त हो सकूँ। जब पेट के भूख को शांत कर हम ऊर्जा से युक्त होते हैं तब हम सुविचार से युक्त हो पाते हैं और सुविचारों को क्रियात्मक तरीके से, अन्नपूर्णा के माध्यम से हमारे भीतर में शक्ति का संचार होता है।
तो शक्ति आती कहाँ से है-अन्नपूर्णा के माध्यम से। ऊर्जा कहाँ से आती है…? यकायक किसी पर क्रोध आता कहाँ से है..? कोई अन्दर क्रोध भरा हुआ थोड़ी है, सामने वाला आपके साथ आचरण कैसे कर रहा है। आनन्द कहाँ से आता है…? भीतर में हम स्वस्थ होते हैं तब आनन्द की प्राप्ति होती है। भीतर में हम प्रसन्न होते हैं तब हमें एक चैतन्यता की प्राप्ति होती है। आप कोई कार्य करने से बहुत प्रसन्न नहीं हो जायेगें। स्वयं आपको मालूम है कि वास्तव में मैं इस कार्य के लिए अनुकुल नहीं हूँ, इस पल के योग्य नहीं हूँ, इस बात के योग्य नहीं हूँ। परन्तु जब भीतर से हम पूर्ण रुप से, शारीरिक रुप से स्वस्थ बनते हैं, जब हमारे जीवन में मानसिक रुप से स्वस्थ्यता की वृद्धि होती है तब आत्मिक रुप से हम प्रसन्नचित हो पाते हैं और जब इन तीनों ही सुयोगों का, त्रि-शक्तियों का युग्मक स्वरुप होता है, तब हम सुकर्म करने के लिये प्रेरित हो पाते हैं, तब हमारे पास अनर्गल कर्म, अनर्गल भावना-चिन्तन नहीं रहती है।
जब हमारे भीतर में अन्नपूर्णा का आभाव होगा, हमारे भीतर में अशान्ततामय भूख होगी। तब हमें अनर्गल कर्म करने की चिन्तन या भावना रहती है। और अगर तीनों ही स्वरुप में हम तृप्त हैं तो हम सुकर्म करने की ओर क्रियाशील होते हैं, तब हमारे जीवन में उस कर्म के फलस्वरुप प्रकाशमय स्थितियों का विस्तार होता है।
अक्षय तृतीया के महापर्व पर…. मैनें क्या बताया था साधन कहाँ से आएगें? पहले अपने आप को इन तीनों स्थितियों से सुशोभित होना होगा और उसके लिए उसका प्रतिरुप क्या है? हमें अपने आप को साधनों से युक्त करना होगा। जब साधनों से युक्त करेंगे तभी तो उदर स्वरुप में, आर्थिक-मानसिक स्वरुप में हम तृप्त हो पायेगें। और जब तृप्त हो जायेगें तो निश्चित रुप से जो कर्म या कार्य करेंगे तो उससे हमें सुलाभ की प्राप्ति होगी। तब हमारे जीवन में किसी भी तरह की क्षय वाली स्थितियाँ नहीं आयेगीं। रोग, जरा, पीड़ा, उन्माद, क्रोध, विषमता, शत्रुता ऐसी स्थितियाँ हमारे जीवन में…., हमें उनको एकदम साइड (Side) में कर देना है कि ये मेरे जीवन को नारकीयमय बना रही हैं इसलिए मुझे इन विषमताओं से दूर ही रहना है। फिर ये आयेंगी भी नहीं क्योंकि आप निरन्तर-निरन्तर इन तीनों ही चेतनाओं से युक्त होते हुए कर्मशीलमय बने रहेंगे, तो निश्चित रुप से इस तरह के कुभाव-चिन्तन या कुक्रियाओं का अनुशरण करने का चिन्तन ही नहीं आयेगा। तब हम सुश्रेष्ठताओं की ओर अग्रसर हो पायेंगे।
इन विशेष पर्वों पर जो भी मेरे जीवन में ‘क्षय’ रुपी स्थितियाँ हैं। ‘क्षय’ क्या…? ‘क्षय’ को कहते हैं -(Tuberculosis) या TB जो शरीर को खोखला कर दे, जो जीवन को खोखला कर रही है, जीवन को दिमक की तरह चाट रही है, उनका क्षय करने का यह विशेष पर्व है। अक्षय तृतीया सामान्य सा पर्व नहीं है और इस विशेष पर्व-समय पर, जैसे हमने सूर्यग्रहण पर साधना सम्पन्न किया, सद्गुरुदेव अवतरण पर्व पर साधना सम्पन्न किया और विशेष रुप से भगवान बद्रीनाथ के कपाट इसी दिवस पर प्राकट्य स्वरुप में दर्शन के लिये खुलते हैं, और इसके चार दिन के बाद में केदारनाथ के कपाट खुलते हैं, गंगोत्री, यमुनोत्री, चार धामों के कपाट भक्तों के लिए, दर्शनार्थियों के लिए निरुपित किया जाता है, तो निश्चित रुप से एक विशेष पर्व के रुप में अक्षय तृतीया महापर्व का महत्व है।
आज-कल हमारी मानसिकता बहुत ही Reuse सी और विवश सी हो गयी है। कोई भी उत्सव, पर्व, त्यौहार, चाहे घर में बच्चे का जन्म दिवस हो या स्वयं का ही जन्मदिन, विवाह का दिवस, या कोई मंगलमय दिवस हो, वट सावित्री, करवा चौथ, तीज या कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हो, बहुत ही हल्के-हल्के सामान्य स्वरुप में, बिल्कुल न्यूनतम रुप में सम्पन्न करते हैं। जब हम न्यूनतम रुप में पर्व को ही सम्पन्न कर रहे हैं, तो हमारे जीवन में उत्सवमय-पर्वमय स्थितियाँ कैसे निर्मित हो पायेंगी….? एक आनन्द भाव से हम किसी भी दिवस को सम्पन्न नहीं कर पाते हैं कि आज सूर्य शक्ति का दिवस है, आज चन्द्रवार है, आज हनुमान या गणपति का दिवस है तो किस तरह से हमें उनके शक्तियों से युक्त होना है। हम बिल्कुल न्यूनतम से न्यूनतम रुप में सम्पन्न करते हैं, अपने स्वयं के लिए भी। क्योंकि हमारेभीतर में इच्छा शक्तियाँ मृत सी हो गयी हैं। हम जागृत भी नहीं करना चाहते हैं। इच्छाएं बड़ी-बड़ी करते हैं, भावनाएं बड़ी-बड़ी रखते हैं, कामनाएं बड़ी-बड़ी करते हैं, परन्तु उन भावनाओं, कल्पनाओं, इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम इन पर्व-उत्सवों को सही रुप से नियोजित नहीं कर पाते हैं। इसी कारण से हमें उस पर्व, उत्सव, समय का, उस काल का सही रुप से सुलाभ की प्राप्ति नहीं हो पाती है। और हमारा जीवन ऐसा ही दीन-हिनता, दुःख और संताप कष्ट-बाधा से युक्त होकर बंधा रहता है। इसलिए एक विशेष काल-खण्ड का… आप यहाँ पर कोई प्रसाद लेने या भोजन ग्रहण करने नहीं आये हैं, भ्रमण करने भी नहीं आए हैं, कोई भी खुला स्थान नहीं है यहाँ, कोई जादूगरी वाला खेल हो नहीं रहा है यहाँ पर; आये हैं तो कुछ न कुछ चिन्तन लेकर आये हैं। उस हित-चिन्तन को पूर्णता से प्राप्त करने की एक भावना होनी चाहिये। जिस भावना-चिन्तन से आप मन्दिर जा रहे हैं ईश्वर के दर्शन करने या शिव के दर्शन करने तो पूर्ण आत्मिय भाव से उनके दर्शन करें।
विशेष रुप से जब भी नवरात्रि, महाशिवरात्रि या श्रावण मास के पर्व-उत्सव होते हैं तो भले ही हम एक फार्मल-फार्मल (Formal) स्वरुप में जल चढ़ाने के लिए चले जाते हैं या थोड़ा भयभीत सा रहते हैं कि मैं अपने हाथ में कलश या लोटा लेकर जा रहा हूँ, मुझे कोई देखे नहीं, कोई मुझे टोके नहीं, भीतर में ही नकारात्मक भाव-चिन्तन से युक्त होते हैं। मेरा स्वयं का जीवन है, स्वयं का चिन्तन है, मैं हाथ में कलश या लोटा लेकर जा रहा हूँ या तुलसी की या वट सावित्री का पूजन करने जा रहा हूँ, ये मेरा स्वयं का चिन्तन है। मैं आद्या शक्ति के मन्दिर में जा रहा हूँ या महामाया के मन्दिर में जा रहा हूँ, यह मेरा स्वयं का चिन्तन है। दूसरे क्या और किस तरह से देख रहे हैं, उनको देखते हुए अपने आप में परिवर्तन नहीं करना है। मैं इनकी अभ्यर्थना-अराधना के लिये जा रहा हूँ ताकि मेरे जीवन में सुपरिवर्तन वाली सुस्थितियों का निर्माण हो सके। उसके लिए हमें क्रियाएं करनी चाहिए। डर-डर के हम मंत्र जाप करते हैं, डर-डर के हम पूजा करते हैं, भयग्रस्त होते हुए हम चिन्तन करते हैं। डर-डर के पूजा-अराधना से तो ध्यान-चिन्तन नहीं हो पाता है। फिर आप कहते हो कि मेरा मन बहुत भटकता है, मन के अन्दर कुविचार आते हैं, सुविचार थोड़ो न आयेंगे। इसी कारण से नहीं आते, आप ईश्वर का, महामृत्युंजय मंत्र का, शक्ति का, महामाया का, लक्ष्मी के मंत्र का उच्चारण कर रहे हैं तो उसे आनन्द भाव से करना चाहिए। उसमें पूरा ध्यान, एक्रागता बनी रहनी चाहिये। हम अपने मन को, मस्तिष्क को जगह-जगह Divert करते रहते हैं, मोबाईल फ़ोन हमें Divert करता रहता है। कोई Call आ गया, Masage आ गया; उसमें भी हमारा ध्यान ज्यादा जाता रहता है। सामने से, ईधर-उधर से कोई आ-जा रहा है। आँखें हमारी डोलती रहती हैं और मन में अनेक तरह के विचार भी आते रहते हैं; तब हमारे जीवन में एकाग्रता नहीं बन पाती है।
किसी भी क्षेत्र में, यहाँ पूजा के स्थान की बात तो छोड़ीये; जहाँ अपने प्रोफेशन (Profession) में, नौकरी में काम कर रहे हैं वहाँ भी एकाग्रता नहीं बन पाती है, तब हमारे जीवन में उपद्रव वाली, विकार वाली स्थितियों का विस्तार होने लगता है।
अक्षय तृतीया के विशेष दिवस पर जो कौरवों और पांडवों का ‘महायुद्ध’ अर्थात् ‘महाभारत’ का युद्ध हुआ था, जो अट्ठारह दिनों तक चला था, वह समाप्त हुआ। समाप्त होने के बाद क्या मिला…..? किसी को कुछ नहीं मिला। “युद्धकापरिणामकुछभीनहींहोताहै।”युक्रेनमेंयुक्रेनऔररशियाकेबीचयुद्धहोरहाहैपरन्तुपरिणामउसमेंकुछभीसफलनहींहै।भलेहीरशियाऔरयुक्रेनअपनेसीमाकाविस्तारकरदेगा।अपनावर्चस्वबढ़ादेगापरन्तु परिणाम उसका कोई सुखदमय नहीं है। महाभारत में जब कौरवों और पाण्डवों के बीच महायुद्ध हुआ तो उसका परिणाम कुछ भी नहीं मिला। किसी को पाँच गाँव भी नहीं मिले, किसी को हस्तिनापुर का राज्य भी नहीं प्राप्त हुआ; सब कुछ समाप्त से हो गये। सौ-सौ पुत्र होने के बाद भी वे मृत्यु के दास बन गये।
“अहम् भाव।”जिसमेंभीअहम्भावआजाताहैउसकेअन्दरसाचनेकी, कर्म करने की शक्ति क्षीण हो जाती है। जब-जब हमारे भीतर ‘अहम् भाव’ आयेगा कि मैं इतना महान हूँ, पढ़ा-लिखा हूँ, ज्ञानी हूँ, त्यों ही मैं धीरे-धीरे अधोगति के तरफ क्रियाशील होता हूँ। आपके भीतर में ज्यों ही अहम् भाव आयेगा कि मैं इतना सुश्रेष्ठमय हूँ, जवानी से युक्त हूँ, मैं कर्मशक्ति से युक्त हूँ, मेरे पास इतना वर्चस्व है; ये आपका ही तो उपयोग है। इसके लिये अहम् भाव करने की क्या आवश्यकता है? मैं ऐसा संचालन, क्रियान्वयन कर रहा हूँ, परिवार का भरण-पोषण कर रहा हूँ। किसका भरण-पोषण कर रहे हैं…? दूसरे के परिवार का थोड़ो न कर रहे हैं, स्वयं के परिवार का कर रहे हैं जोकि आपके जीवन में सुख प्रदान कर रहा है। उसके लिये अहम् भाव करने की क्या आवश्यकता है। मेरे पास इतना मान सुख है, मेरे पास इतना भू-भवन है, कृषि योग्य जमीन है, गाड़ीयाँ हैं, धन-दौलत है….. अहम् भाव किस बात का? ज्योंहि अहम् भाव शुरु करते हैं, त्योंहि हम धीरे-धीरे अधोगति की ओर, समाप्ति की ओर क्रियाशील हो जाते हैं।
आप कहते हो ना गुरुजी धन का आभाव हो रहा है, कर्ज वाली, ऋण वाली स्थितियाँ आ रही हैं। क्यों आ रही हैं कर्ज वाली, ऋण वाली स्थितियाँ…? दो साल पहले तो कर्ज वाली, ऋण वाली स्थितियाँ नहीं थी, अब कैसे आ गयी? अनर्गल क्रिया और कुबुद्धि के फलस्वरुप! और उसमें भी हम निरन्तर अन्दर गिरते रहते हैं। ध्यान-चिन्तन भी यही कहता है कि हमने साहुकार से कर्जे में धन को प्राप्त किया है। फिर भी हम कुबुद्धि के फलस्वरुप निरन्तर-निरन्तर विनाश की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि “सद्बुद्धिहमेंउद्भवकीओर, उच्चता की ओर अग्रसर करती है और कुबुद्धि हमें अधोगति की ओर अग्रसर करती है।”कुबुद्धि के फलस्वरुप क्रोध, उन्माद की स्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं और जिससे हमारे भीतर में फुफकारमय, नागराजमय स्थितियाँ हो जाती हैं कि कैसे हम उसको काटें और समाप्त कर दें।
क्या बताया था अभी मैनें, एक छोटा सा अनर्गल क्रिया करने से उसका परिणाम जीवन भर हमें भोगना पड़ता हैं। तब हमारे पास केवल पश्चाताप के अलावा कोई क्रिया नहीं रहती। इसलिए दुःख वाली, शत्रु वाली स्थितियाँ जीवन भर धारदार बनी रहती हैं क्योंकि उनका उद्भव-विकास, निर्माण हमनें स्वयं न हीं किया है इसलिए आपको जीवन में मालूम है कि पन्द्रह साल पहले मुझे किस तरह से दुःख प्राप्त हुआ था, पाँच साल पहले मेरे को किस प्रकार पीड़ा प्राप्त हुई थी, कैसे मेरे शत्रु निर्मित हुए थे; आपको ये स्मरण रहता है। सुख का स्मरण नहीं रहता; क्योंकि सुख को बराबर नियोजित बनाकर नहीं रखते हो, निरन्तरता बनाकर नहीं रखते हो और जो भी दुःख, कष्ट, असुर-वृत्ति, संताप या राक्षसी प्रवृत्ति है, बराबर विष के रुप में उसका पान करते रहते हैं। इसलिए उसका साधनात्मक भाव-चिन्तन रखिये कि उसको समाप्त कैसे किया जाय? चिन्तन तो है परन्तु उसको क्रियान्वित करने की चेतना ही नहीं। इस कारण से हमारे जीवन की विषममय स्थितियाँ, असुरमय स्थितियाँ समाप्त नहीं हो पाती।
फिर हम कहते हैं कि हमारी कामनाएं पूर्ण नहीं हो पाती। क्यों नहीं हो पाती हैं? क्योंकि उसके साथ में कर्म करने का भाव नहीं है, उसके साथ हमें ध्येय नहीं है, धैर्यता नहीं है, गंभिरता नहीं है, निरन्तरता नहीं है; इसी कारण से कामनापूर्ति नहीं हो पाती। कामनायें अलग-अलग समय में, अलग-अलग स्वरुप में, अलग-अलग करते हैं, फिर भी समान्य-समान्य सी कामनायें हैं। क्या कामनायें हैं कि धन-लक्ष्मी हो, स्वस्थ रहूँ, निरन्तर परिवार में आनन्द और प्रसन्नता का भाव-चिन्तन रहे, निरन्तर मेरे कार्य-व्यापार या नौकरी में वृद्धि होती रहे; ये तो सामान्य सी कामना है। अब इसके प्राप्ति के लिए क्या करना है हमें? इसके प्राप्ति के लिए कर्म तो करना पड़ेगा न और कर्म में निरन्तरता नहीं है।
कर्जा तो हो गया गुरुजी! दस लाख रुपया कर्जा हो गया, उससे ज्यादा तो ब्याज ही बन गया है। अब उसका निस्तारण करने का भाव-चिन्तन नहीं है, चिन्तन तो कर रहे हैं पर निस्तारण करने का भाव नहीं है। रोग है, परन्तु रोग को समाप्त करने की क्रिया नहीं कर पा रहे हम। इसलिये धीरे-धीरे एक रोग से और अधिक रोगों की वृद्धि होती है। एक कलह से अनेक-अनेक तरह के अर्न्तकलह निर्मित होते हैं। लघु परिवार है, इसके बावजूद भी हमारे जीवन में इस तरह की कुस्थितियाँ बनीं रहती हैं।
सब एक साथ ही चेतनायुक्त हो जाय। बस एकदम से कोई शक्ति आ जाये, एकदम से भगवान विष्णु आयें, लक्ष्मी आयें, एकदम प्राकट्य स्वरुप में भगवान शिव आयें और मैं महामृत्युंजय शक्तियों से युक्त बन जाऊँ, मेरे सर्व शत्रुओं का संहार हो जाये, घर में धन-लक्ष्मी का प्रचुर मात्रा में…., बिस्तर में, तकिये के नीचे स्वर्ण मुद्राएं आ जायें; ये सब संभव नहीं है। किसी भी स्थिति में संभव नहीं है। निरन्तरता बना के रखनी पड़ती है, तब उत्तरोत्तर धीरे-धीरे शुभ-लाभ की वृद्धि होती है।
ऐसा ही यह विशेष महापर्व जो कि इन कुस्थितियों को, इन विषम स्थितियों को समाप्त करने का, क्षय करने का एक विशेष पर्व है। और इस दिवस पर भी इन कुसंगतियों को, कुस्थितियों को, असुर वृत्तियों को, दुःख या पीड़ा, जो भी रोग है उनका क्षय करने का भाव-चिन्तन भी नहीं रहेगा तो आगे भी वर्षों तक स्थितियाँ और जटिल सी बन जाती हैं। बहुत ज्यादा दुःखदायी और कष्ट-पीड़ामय बन जाती हैं। इसीलिये ऐसे विशेष अक्षय तृतीया महापर्व पर साधनात्मक भाव-चिन्तन से कि मेरा जीवन शिव परिवारमय बने, मेरा जीवन अक्षय धन-लक्ष्मी स्वरुप बने, सूर्य तेजस्वीतायुक्त बने, सद्गुरुदेव की शक्ति से युक्त बने, माँ भगवती, माँ महामाया की शक्ति से परिपूर्ण बने। उस तरह का हम चिन्तन करेंगे और उसके लिए हम साधनात्मक भाव-चिन्तन करेंगे तो हमारे जीवन में एक सुश्रेष्ठता आनी प्रारम्भ होगी, तब धीरे -धीरे हम रोगों को समाप्त कर सकेंगे, जो ये कष्ट पूर्ण रोग हैं, संकटपूर्ण पीड़ाएं हैं उनको समाप्त करने के लिये हम क्रिया प्रारम्भ कर सकेंगे और उसमें निरन्तरता बना कर रखेंगे तो निरन्तर हम सुस्थितियों की ओर, सुचेतनाओं की ओर क्रियाशील हो पायेगें।
लक्ष्य हमारा बहुत दूर है परन्तु लक्ष्य को प्राप्त करने का पहला कदम हम बढ़ा देते हैं तो मान के चलो कि हमें 99 कदम ही चलना है, दस कदम बढ़ा देते हैं तो नब्बे कदम ही चलना है। कदम भी नहीं बढ़ायेंगे, पाप हमारे डटे हुए रह जायेंगे, हम एक जगह रुके हुए, बँधे हुए रह जायेंगे। ऐसा कैसे हो सकता है, पत्नी ऐसा कर रही है, बच्चे ऐसा कर रहे हैं, माता-पिता ऐसा कर रहे हैं, ऐसा क्यों कर रहे हैं, क्योंकि हमारे भीतर में डर वाली भावना है, भय वाली भावना है, क्योंकि आप तो असुरमय प्रवृत्ति वाले बन जाते हैं, उस समय माता-पिता, बच्चे या पत्नी कहाँ जाते हैं? जब आप राक्षसीमय बन जाते हैं तो पत्नी कहाँ जाती है? साथ में ही तो रहती है न। गुरुजी! पत्नी ऐसा कहेगी, माता-पिता, बड़े ऐसे कहेंगे, पड़ोसी ऐसे कहेंगे, उस समय हम नकारात्मक सोच-भाव करते हैं कि किसी तरह से ये क्रिया करनी ही न पड़े। अर्थात् अपने आप को परिवर्तित करने का बहुत प्रयास करना पड़ता है, प्रातः-सुबह उठने के लिये बहुत प्रयास करना पड़ना है। प्रयास ही नहीं करेंगे तो आलस्य, प्रमाद का विस्तार होगा तो निरन्तर-निरन्तर जीवन में एक प्रमाद वाली स्थितियाँ उद्यत होंगी। प्रयास कुछ नहीं करना है गुरुजी! बस सब कुछ अच्छा-अच्छा हो जाय।
अच्छा-अच्छा के लिये जो अनर्गल वाली स्थितियाँ हैं, उन स्थितियों को समाप्त करने की क्रिया स्वयं करनी पड़ेगी न। भीतर में क्या कष्ट-पीड़ा है….? भीतर में क्या संताप है….? भीतर में क्या रोग है….? जीवन में क्या दुःख है….? उसको समाप्त करने के लिए स्वयं को क्रिया करना पड़ेगा ना। केवल महामाया को भोग लगाने से, भगवान शिव को जल चढ़ाने से या सद्गुरु के चरणस्पर्श करने से तो वह क्रिया समाप्त नहीं होती है। सद्गुरु के चरणस्पर्श कर रहे हैं या महामाया को भोग लगा रहे हैं, अर्चना कर रहे हैं तो महामाया किस रुप से शक्ति स्वरुपा बनी हैं, उस तरह शक्ति स्वरुपा भी तो बनना होगा ना। जिस प्रकार से भगवान शिव महामृत्युंजय स्वरुप में बने हैं, तो हमें भी महामृत्युंजय शक्तियों को आत्मसात करने के लिए शिवमय बनना पड़ेगा ना। गौरीमय, लक्ष्मीमय, पार्वतीमय बनना है तो हमारे भीतर में भी एक तरह से उचासमय स्थितियाँ होनी चाहिये। मेरे भीतर में अंधकारमय या कालीखमय स्थितियाँ हैं, वह कालीखमय स्थितियाँ समाप्त होंगी तभी तो मैं गौरीमय स्थितियों से युक्त हो पाउंगा। अगर मुझे सौभाग्यमय बनना है तो मेरे जीवन की दुर्गतिमय, दुर्भाग्यमय स्थितियों का मुझे ही संहार करना होगा ना।
सिर्फ गौरी की, वट सावित्री की, करवा चौथ की, तीज की पूजा से कोई सौभाग्य स्थितियों की प्राप्ति नहीं होती है। अक्षय लक्ष्मी का चिन्तन करने से लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं हो पाती है। या पूरे श्रावण मास जलाभिषेक करते रहेंगे तो हम महामृत्युंजय शक्तियों से शुशोभित नहीं होंगे। वो शक्ति अपने भीतर में आत्मसात करते हुए, जब जलाभिषेक करेंगे तब हमारे भीतर में निरन्तर-निरन्तर सुशक्तियों का प्रभाव बना रहेगा। तब जाकर हम महामृत्युंजय शक्तियों से युक्त हो पायेंगे। तब जाकर हम महामाया की चेतना से युक्त हो पायेंगे, इसलिए महामाया को कहा जाता है-“सर्वसंतापहारिणी, सर्व दुःख हारिणी।”महामायाकोईछोटास्वरुपनहींहै, केवल रतनपुर में ही महामाया नहीं है। प्रत्येक घर में महामाया विराजमान हैं। उसे हम किस रुप में आत्मसात करते हैं, वह शक्ति का, पार्वती का, लक्ष्मी का एक रुप है; उसे किस रुप में आत्मसात करना है यह हमारा चिन्तन-भाव होना चाहिये।
महामाया को ‘सर्व संताप हारिणी’- संताप हारिणी मतलब जो भी हमारा कष्ट-रोग-पीड़ा है। हम सभी जानते हैं कैसे-कैसे कष्ट हमें निर्मित होते हैं, पीड़ा जिससे कि हर समय मानसिक रुप से उद्विग्नमय रहते हैं, क्रोध की स्थितियाँ बनी रहती हैं, अधिकांश-अधिकांश लोग मानसिक रुप से रोग से, पीड़ा से ज्यादा ग्रसित होते हैं; जब मानसिक रुप से स्वस्थ नहीं हैं तो पहली बात तो शरीर स्वस्थ रहेगा ही नहीं और किसी प्रकार रह भी जायेगा तो मानसिक रुप से हम स्वस्थ नहीं हैं तो कोई भी सुकर्म कर नहीं पायेंगे। फिर अनर्गल कर्म, असुर वृत्ति के कर्म, राक्षसीय वृत्ति के कर्म ही होंगे। हमारे संताप-दोष, कष्ट-पीड़ा के निवारण के लिए ही महामाया शक्ति स्वरुपा अक्षय तृतीया के दिन उनका अभ्युदय पर्व है। और जो भी जीवन में अनर्थ रुपी, कलह रुपी स्थितियाँ हैं…., हम किससे युद्ध कर रहे हैं….? युद्ध कर रहे हैं अपने सुखों से, सुखों को प्राप्त करने का हमारे पास जो सुअवसर है, उससे हम युद्ध कर रहे हैं, किस तरह से हमारे जीवन में दुःखों की वृद्धि हो। चिन्तन भले नहीं है परन्तु अनर्गल कर्म हम ऐसे ही कर रहे हैं, युद्ध कर रहे हैं हम अपनी आरोग्यता से कि जीवन में रोगमय स्थितियों का विस्तार होता रहे। अर्नगल खान-पान कर रहे हैं, मध्यपान कर रहे हैं, जर्दा-तम्बाकू खा रहे हैं, बीड़ी-सिगरेट पी रहे हैं, अनर्गल तरह की स्थितियाँ कर रहे हैं, जिससे हम रोगों की वृद्धि कर रहे हैं, अपने भीतर में एक शांतता का, एक चेतना का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं; निश्चेतनामय, मृत्युमय बने रहते हैं, इस कारण से घर में कलह वाली स्थितियाँ बन रही हैं।
गुरूजी! मैं क्या करुँ? पत्नी ही ऐसी है, बच्चे ही ऐसे हैं, पति ऐसा है। ये तो एक दूसरे के ऊपर दोषारोपण कर दिया। परन्तु उसका निवारण क्या होगा? मान लिया पति आपका बहुत खराब है, पत्नी आपकी बहुत खराब है, बच्चे बहुत ही नालायक हैं। बच्चे किसके हैं…? बच्चे तो मेरे ही हैं ना। मान लिया पत्नी बहुत खराब है पर साथ में चलना किसको है…? उसी के सहारे चलना है ना। पति बहुत दुष्ट है, बहुत ही खराब है। उसका समाधान क्या है? समाधान तो स्वयं को करना होगा ना।
शिव की भार्या पार्वती को ही हम लक्ष्मी का स्वरुप मानते हैं। विष्णु की भार्या को भी हम लक्ष्मी का स्वरुप मानते हैं। और वह कई स्वरुपों में हमें शक्ति प्रदान करती हैं। शक्ति का मतलब ये नहीं कि केवल शारीरिक बल ही प्रदान करे, शक्ति का अर्थ है जो विशेष रुप से हमारे दुर्गति का नाश करे। जो हमारा जीवन दुर्गतिमय बना हुआ है, उसे वह समाप्त करती है जिससे मैं और अधिक उस पर क्रियाशील नहीं रहूँ। उनकी अभ्यर्थना करने से, अक्षय लक्ष्मी की अभ्यर्थना करने से हमें सुलाभ की प्राप्ति होती है, दुर्गति का नाश करती है। दुर्गति कहाँ से आती है…? कुबुद्धि के फलस्वरुप आती है और कुबुद्धि को सही तरह से चेतनामय बनाने के बाद वह हमें सद्बुद्धि प्रदान करती है और हमारे जीवन के दुर्गति का नाश होता है।
‘जया’ अर्थात् जीतमय, विजयीमय स्थितियाँ प्रदान करती हैं। हम हर स्वरुप में पराजयमय स्थितियों से युक्त हो रहे हैं, हर स्वरुप में हम सफल नहीं हो पा रहे। क्यों सफल नहीं हो पा रहे…? क्योंकि भीतर में हमारी आत्मिय शक्ति बहुत ही ‘लूज़’ (स्ववेम) सी होती जा रही है। कर्म शक्ति बिल्कुल ही क्षीण सी हो रही है। इस कारण से हम विजयश्री प्राप्त नहीं कर पा रहे। अभ्यर्थना-अराधना करने से हर क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति कर पाते हैं।
साथ ही अपर्णा, आर्या, ब्राह्मी, चित्रा, माहेश्वरी, नित्या, रत्नप्रिया, वैष्णवी। अष्ट स्वरुपों में उनकी अभ्यर्थना-अराधना करने से हमें अष्ट लक्ष्मीयों की प्राप्ति होती है। केवल धन लक्ष्मी ही नहीं। चित्रा स्वरुप में हमें आनन्द प्रदान करती है और शिवानी स्वरुप में वह शिव की शक्तियों से युक्त होती है। वह हमारे भावना-चिन्तन को विशेष रुप से आनन्दमय बनाती है और साथ ही साथ आर्या स्वरुप में इस आर्य जगत में विद्यमान है तो निरन्तर हम उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त हो सकें। और नित्या स्वरुप में, रक्तप्रिया स्वरुप में अनेक-अनेक सुरत्नों से युक्त हो सकें।
अक्षय तृतीया के ही विशेष पर्व पर समुद्र मंथन के माध्यम से जो चौदह रत्न निर्मित हुए थे…., सब तरफ से विष का निर्माण हुआ और सबसे अंत में लक्ष्मी का उद्भव हुआ। तो जो हमारे भीतर का विष है हमें उनका तो समाप्तिकरण करना ही होगा। यकायक हमारे जीवन में लक्ष्मी आ नहीं सकती है। लक्ष्मी तो वहीं आयेगी जहाँ पर सद्विचार होंगे, सद्क्रियाएं होंगी, सद्चेतना होगी जहाँ पर कोई कलह-तनाव नहीं होगा, रोग नहीं होंगे, वहाँ पर लक्ष्मी आती है और जब विषम स्थितियाँ होंगी तो अलक्ष्मी ही आयेगी। अब हमें चिन्तन करना है कि जीवन के विष को समाप्त करना है तो हम एरावत हाथी जैसे चौदह रत्नों से युक्त हो सकें अर्थात् उनकी सद्चेतना से हम युक्त हो सकें। हाथी जो कि गज लक्ष्मी का एक स्वरुप है, विशाल स्वरुप में हमें लक्ष्मी की प्राप्ति हो। स्वर्ण मुद्रा के स्वरुप में वह हमें निर्मित करता है। इसलिए लक्ष्मी प्रत्येक के घर में प्रकट नहीं होती है। गुरुजी! मैं तो हर बार दीपावली में लक्ष्मी का पूजन, अभ्यर्थना-अराधना करता हूँ; परन्तु उसके साथ-साथ जो दुर्गन्धमय स्थितियाँ हैं, जो सड़ान्धमय स्थितियाँ हैं उनका निवारण कैसे करना है, वह भी हमें चिन्तन करना है। खाली “ऊँश्रींह्रींमहालक्ष्मी नमः”, “ऊँ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।”इसतरहमंत्रउच्चारणकरनेसेलक्ष्मीनहींआयेगी।साथमेंसर्वमंगलकैसेहो? शिव के साथ, ‘शिवे सर्वार्थ साधिका’ कैसे हो? वह भी हमें चिन्तन करना है ना तब हमारे जीवन में सुलक्ष्मीयों का विस्तार होता है, तब हमारे जीवन में सौभाग्य लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, यश लक्ष्मी, भू-भवन लक्ष्मी, कार्य-व्यापार लक्ष्मी के वृद्धि की प्राप्ति होती है। एक ही सद्क्रिया करने से, निरन्तरता बनाये रखने से ही हमारे जीवन में इस तरह का भाव होता है।
हम उन सुस्थितियों का लाभ ही नहीं ले पा रहे हैं। गुरु के प्राकट्य स्वरुप में हम उनका चिन्तन नहीं कर पा रहे हैं तो चिन्ताओं का विस्तार तो होना ही है। हमें सोच में परिवर्तन करने की क्रिया को करना है और उसके उपर निरन्तरता बनाकर रखना है। सोचते तो बहुत अच्छा-अच्छा हैं। मेरे शरीर में रोग, पीड़ाएं आयें, पत्नी कष्टमय सा बन जाय, पति असुर वृत्ति और असभ्यमय बन जाय, संतान हमारी कुसंगमय बन जाये, कभी सोच ऐसी नहीं करते हैं। सोच तो हमेशा अच्छी ही करते हैं परन्तु सोच को साकार करना है। यह भवन अकेले नहीं बना है, इस भवन का निर्माण करने के लिए सैकड़ों मजदूर कर्मियों ने परिश्रम किया है और जो भी अधिपति रहा है, मालिक रहा है, उसने भी बराबर इसका ध्यान-चिन्तन किया है। तब जाकर इतना सुन्दर भवन निर्मित हुआ है।
हमें भी अपने जीवन के सुन्दर भवन का निर्माण करना है तो निरन्तर-निरन्तर हमें भी अपने स्वयं की क्रियाओं के फलस्वरुप संयम रुप से, परिश्रम रुप से कर्म करना होगा, तब हम अपना उद्भव-विकास कर पायेंगे, अपने जीवन का एक सुन्दर भवन निर्मित कर पायेंगे, तब हमारा जीवन आनन्दमय और सुस्थितियों से युक्त हो पायेगा। नहीं तो वही कहते हैं न-
बचपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया
बुढ़ापा देखकर रोया…..
बस वही स्थितियाँ आ गयी हैं; जो बचपन ज्ञान-बुद्धि से युक्त होना चाहिये वह ज्ञान-बुद्धि से युक्त नहीं हो पाये, जो मेरे लक्ष्य थे उन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए मैं सही तरह से चेतना से युक्त नहीं हो पाया और निरन्तर बच्चा है, बच्चा है, करते-करते जवानी निकल गयी। कल मैनें बताया था…. कि जवानी में उन्माद आता है, जोश आता है, एकदम सबको मार-काट दो, खतम कर दो। जवानी में सुकर्म करने का भाव-चिन्तन नहीं रहता है। जिसके भीतर में सुकर्म करने का भाव-चिन्तन रहता है वो निरन्तर 70-80 वर्षों तक प्रसन्नचित रहता है। फिर बुढ़ापे में सोचते हैं कि जवानी में कुछ नहीं कर पाये। किसने रोका था आपको….? Opportunity अच्छी नहीं मिली गुरुजी। माहौल अच्छा नहीं मिला गुरुजी, मेरे माता-पिता अच्छे नहीं थे। माता-पिता का क्या दोष था? आपको संसार में पैदा किया ना, माँ ने नौ-दस महीने गर्भ में रखा ना। 8-10 साल तक आपको पाल-पोसकर बड़ा किया ना, आप चलने लगे ना। चलना सिखाया किसने…, मुड़ना किसने सिखाया, खाना-पीना किसने सिखाया? फिर हम उन्हीं को दोष दे रहे हैं कि माता-पिता मेरे खराब थे। फिर हम गाँव को दोष दे रहे हैं; गाँव-मुहल्ले को दोष देने से क्या फायदा है?
चलो मान लिया कि माता-पिता खराब रहे, जन्मभूमि बहुत खराब रही। मगर उसका समाधान क्या हुआ…, उसके निस्तारण का क्या हुआ…? आप कौन से उच्चता के लेवल (Level) पर अग्रसर हो गये…? ऐसे दोष देने से कुछ नहीं होगा, उसके लिए क्रिया करनी पड़ती है। पति-पत्नी अच्छा क्यों नहीं मिला? सद्गुणों का अभ्यास क्यों नहीं किया? ज्यों ही हम दूसरों की अपेक्षा करते हैं- पत्नी, बच्चे मेरा ध्यान-चिन्तन रखें, पति मेरा ध्यान-चिन्तन रखे, अर्थात् हम उस व्यक्ति पर आश्रित हो गये कि वो मेरा खयाल रखे, वह मुझे आनन्द प्रदान करे, मेरे माता-पिता मेरा ध्यान रखें, मुझे अच्छा भोजन प्रदान करे। हम उस पर डिपेंड (Depend) हो गये और ज्यों ही थोड़ी सी न्यूनता होती है त्यों हम असुर वृत्ति के, राक्षस वृत्ति के बन जाते हैं। क्योंकि हम आश्रित हो गये, हमने अपनी माँग (Demand) रख दी, मतलब हम भिखारी बन गये, जब भिखारी वाली भावना आ जाती है ना तब लोग हमें दीन-हीन समझ जाते हैं।
सब कुछ बस गुरुजी कर दें, भगवान कर दें, सब कुछ कुलदेवता कर दें। तो आप क्या करोगे…? इसका मतलब मेरे को लालसा है, लालच वृत्ति है, दूसरों से मुझे प्राप्त हो जाय। सब मेरा सहयोग करें, सब मेरे आज्ञा पालक बन जायें, सब सम्मोहित हो जाय। आप स्वयं के आज्ञा पालक कितने हैं? सब मेरा अनुसरण करें, क्यों अनुसरण करें? आपके अन्दर क्या क्वालिटीज (Qualities) है, क्या चिन्तन है, जो अपका अनुसरण करेंगे, आज्ञा पालन करेंगे, आपके हिप्नोटिज़्म (Hypnotism) से सम्मोहित हो सकेंगे। आपमें ऐसा क्या आकर्षण वाला भाव-चिन्तन है? आप कौन सी अच्छी पोस्ट (Post) पर हैं। आप कितने कर्मशील हैं,कितने क्रियाशील हैं?
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।
जब हमारे अन्दर से माँग (Demand) आती है ना तब हमारे भीतर में क्रोध, उन्माद वाली स्थितियाँ आती हैं। ये मेरी पत्नी है, मेरी बात नहीं मान रही है। मेरे बच्चे मेरी आज्ञा नहीं मान रहे हैं। मेरे माता-पिता मुझे अच्छा नहीं मान रहे हैं। मेरे पड़ोसी मुझे ऐसा मान रहे हैं। मेरे रिश्तेदार ऐसे हैं, बोझ लेने से क्या हो जायेगा? पुत्रों को त्याग नहीं सकते ना, पत्नी को छोड़ तो नहीं सकते ना। पड़ोसियों से हम निवृत्ति प्राप्त कर सकते हैं, उनसे हम बोलना छोड़ देंगे। माता-पिता तो वहीं रहेंगे। चिन्तन करना चाहिए कि मुझे किस तरह से अपने जीवन में उद्भव-विकास करना है। जो समय बीत गया उसके बारे में सोचने से क्या होगा?
ज्यादातर हम Past में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। जो समय बीत गया उसके बारे में चिन्तन करते रहते हैं। आज के दिवस पर, अक्षय तृतीया के दिवस पर मुझे क्या करना है? उसका चिन्तन नहीं करते हैं। गुरुजी! ऐसा-ऐसा हुआ। पूरे महाभारत की कथा, पूरे जीवन की कहानी बता देते हैं। अगर उनसे पूछो कि “बेटाआपकोक्याकरनाहै?” कोई चिन्तन नहीं, कोई चेतना नहीं, कोई आगे बढ़ने का भावना-चिन्तन नहीं। जब इतना बता दिया कि मेरे साथ ऐसी-ऐसी घटनायें हुई। ठीक है, बहुत गलत हुआ, घटनायें हो गयीं। तो उसका निस्तारण क्या करना है बेटे….? कोई भावना नहीं, कोई चिन्तन नहीं, कोई सोच नहीं, तो फिर कैसे उन समस्याओं का समाधान हो पायेगा। सोच होना चाहिए कि आगे, भविष्य में, आज के दिन, दो घण्टे बाद, जीवन कैसा रहे। कल का जीवन मेरा अच्छा बने और जो बीत गया उसके बारे में क्या सोचना? उसको तो वापस लौटा नहीं सकते ना।
बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।
जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देइ।।
अक्षय तृतीया सामान्य सा महापर्व नहीं है, हम बहुत प्राचीन समय से इसे मानते आ रहे हैं। हम सद्गुरुदेव की शक्तियों से तो युक्त हों ही; साथ ही साथ अक्षय स्वरुप में उन सुशक्तियों से भी युक्त हो सकें और ऐसा ही मैं मंगल कामना करता हूँ कि महामाया शक्ति रुप में जो भी आपके जीवन में रोग, कष्ट, पीड़ा, संताप, बाधायें हैं; उनका संहार कर सकें अर्थात् आपके भीतर में महामाया की शक्ति, दुर्गा स्वरुप में, दुर्गति नाशाय स्वरुप में विराजित हो सके और जब सारी विषमतायें समाप्त होंगी तब आपके जीवन में अष्ट स्वरुपों में सुलक्ष्मीयों की वृद्धि हो सकेगी। ऐसा ही आप सभी के लिए मंगल कामना कारता हूँ, कल्याण कामना करता हूँ।
शुभार्शीवाद!
परम् पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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