





ज्योतिष में काल सर्प दोष को बहुत ही हानिकारक कुयोग माना गया है। जिस जातक की कुंडली में काल सर्प दोष का योग होता है। उसे जीवन में काफी संघर्ष करना पड़ता है तथा इसका प्रभाव साधक के मानसिक और शारीरिक रुप में भी पड़ता है। इसके फलस्वरुप ही साधक के आर्थिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कार्य-व्यापार-रोजगार में भी अस्थिरता व्याप्त हो जाती है। पीड़ित व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। वह सदैव असाध्य रोगों और मानसिक तनाव से ग्रसित रहता है जिससे उसके परिवार में भी कलह और अशांति बनी रहती है, व्यक्ति हर समय अकेलापन और निराशा से घिरा रहता है। जीवन अनेक दुष् चिंताओं, न्यूनताओं, अभावों और विसंगतियों से घिर जाता हैं। साथ ही पूर्व जन्मकृत पाप दोष, शापोद्वार दोष और पितृदोष के कुयोग के फलस्वरूप जीवन नारकीय बन जाता हैं और जीवन में गतिशीलता नहीं रह पाती है।
काल सर्प दोष तब बनता है जब जन्म कुंडली में सभी ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाते हैं। मतलब, राहु और केतु के एक तरफ कोई अन्य ग्रह नहीं होता। इस स्थिति को काल सर्प दोष कहते हैं। ‘काल’ का अर्थ है ‘मृत्यु’ या ‘समय’, ‘सर्प’ का अर्थ है ‘साँप’, इसलिए इसे सर्प का काल या समय कहा जाता है, जो जीवन में बाधाओं और संकटों का प्रतीक माना जाता है।
काल सर्प दोष के कुल 12 प्रकार माने जाते हैं। इनका वर्गीकरण राहु और केतु की स्थिति के आधार पर किया जाता है, अनंत, शेषनाग, कर्कोटक, कुलिक, वासुकि, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, शंखचूड, घातक, विषधर। इसमें महापद्म काल सर्प दोष सबसे अधिक प्रभावशाली और अशुभ माना जाता है।
कालसर्प योग के प्रकोप से छुटकारा पाने के लिये जातक विभिन्न भौतिक उपायों का सहारा लेता है। धन प्राप्ति के लिये अनेक उपाय सोचता है तथा उसके लिये आवश्यक नियोजन भी करता है परन्तु उसे बार-बार प्रामाणिक और युक्तिगत प्रयोग करने पर भी सफलता प्राप्त नहीं होती।
उक्त स्थितियों में से आपके साथ कोई भी क्रिया हो रही हैं तथा उसके फलस्वरूप जीवन में आनन्द, हर्ष, प्रसन्नता, समाप्त सी हो गई हो तो शीघ्र आपको कालसर्प दोष निवारण की दीक्षा को जीवन में आत्मसात करना आवश्यक है। जिससे हर रूप में मधुरता, आनन्द और श्रेष्ठता की स्थितियों की प्राप्ति हो सके।
श्रावण का महीना भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय है, शिव पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि श्रावण माह का प्रत्येक दिन योगी स्वरूप गृहस्थों के सौभाग्य का द्वार खट-खटाता है और जो इस द्वार को खोल देता है या दूसरे शब्दों में कहें तो श्रावण महीने में इस विशिष्ट दीक्षा को आत्मसात कर लेता है, उसके कर्म में लिखा हुआ दुर्भाग्य भी सौभाग्य में बदल जाता है, महामृत्यंजय की पूजा, साधना उस दरिद्रता को मिटा कर सम्पन्नता प्रदान करता है। कालसर्प दोष के कारण व्याप्त कुस्थितियों, बाधाओं, आर्थिक न्यूनताओं से निवृत्ति भगवान सदाशिव महादेव की पूजा, साधना-दीक्षा से होती ही है।
श्रावण मास भगवान शिव से सम्बन्धित है और गृहस्थ जीवन को सुदृढ़ व पूर्ण आनन्दमय निर्मित करने के लिये है क्योंकि गृहस्थ जीवन में प्रथम पूज्य देव ‘महादेव’ ही हैं। जो गृहस्थ जीवन की विषम परिस्थितियों का शमन कर आनन्द, भोग, विलास युक्त जीवन प्रदान करते हैं। इस श्रावण माह में, विशेष रुप से नाग पंचमी पर्व पर उक्त दीक्षा को अवश्य ही आत्मसात करें। जिससे आपके जीवन से कुस्थितियों का नाश हो तथा आपका जीवन सुदृढ़ तथा समृद्ध बन सके।
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