





मानव जीवन (प्राण) का अस्तित्व प्रभु व प्रकृति के बिना असंभव है। व्यक्ति चाहे नास्तिक हो या आस्तिक, चाहे किसी धर्म परम्परा को माने या ना माने, उसके सारे तर्क, चाहे वह अनुभव व विज्ञान के तर्क से मान्य हो। रचना को लेकर, प्रारम्भ को लेकर, शून्य हो जाते हैं तो यह प्राण चाहे मानव का हो या प्रकृति का। यह ईश्वर की ही रचना है। वहाँ इन दोनों का अस्तित्व एक दूसरे के बिना असंभव है। विज्ञान जहाँ शून्य (0) तर्क हीन हो जाता है वहाँ आपको वास्तविकता का आभास, उत्तर, संतुष्टि केवल आध्यात्म ही दे सकता है।
आध्यात्म अर्थात् आध्य और आत्मा का, प्रभु व प्रकृति का मिलन!
एक सामान्य व्यक्ति सदैव इस अविश्वास की स्थिति में झूलता रहेगा कि करें या ना करें, मानें या ना मानें; सदैव द्वन्द्व व चिन्तन में ही रहेगा। वहीं एक साधक मंथन करेगा। कर्म व अपने कार्य कि वह परिवर्तन लायेगा, अभावों को दूर करेगा।
भय, डर तो सबके मन में व्याप्त है अन्धकार का, अनीति का। पर उनका समाधान कोई नहीं करना चाहते, उस भय का समाधान करना, उस अंधकार में घुस कर बाहर निकलने का सामर्थ-विश्वास केवल आध्यात्म से होगा, तब आपके मन में यह विश्वास होगा कि मेरा कुछ नहीं होगा, मेरे मन-मस्तिष्क में मेरे ईश्वर, मेरे प्रभु, मेरे प्राण, मेरे गुरु विराजमान हैं। तो आप अवश्य ही विकट से विकट स्थिति से, उस अंधकर से, बाहर निकल जाओगे। जब मन में गुरु रुपी ज्योति प्रज्वलित है तो अन्धकार, भय रहेगा ही नहीं।
तो जब आपकी आत्मा में वो प्राणश्चेतना अपने गुरु द्वारा प्रदान व ऊर्जा प्राप्त है तो आप अवश्य ही इस भौतिक व साधनात्मक जीवन के यश-वैभव का आनन्द ले सकते हैं। आप को केवल प्रभु, जो एक सर्वोच्च चेतना हैं, साथ ही प्रकृति को एकाकार करना है। अर्थात् प्राण का अपने प्रभु के प्रति कृत प्रकृति को संयुक्त करके करना ही एक शिष्य का धर्म उद्देश्य है। इस आनन्द की, सुख की, धर्म की उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सदैव ही एक शिष्य को कार्यरत रहना चाहिये। तभी एक गुरु अपने शिष्य को उस उच्चता की, उस सिद्धाश्रम की प्राप्ति में सहायक होते हैं।
इस उद्देश्य की प्राप्ति, शिवत्व की प्राप्ति हेतु 22-23 अगस्त को ‘सर्व दुष्ट हर्ता काल भैरव महाकाल शिव-गौरी साधना महोत्सव-उज्जैन (म.प्र.)’ में अवश्य सम्मिलित हों।
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