





मनुष्य उन्नतशील प्राणी है परन्तु वह अनायास ही उन्नत नहीं हो पाता। प्रकृति के सम्राज्य में कोई ऐसा पदार्थ नहीं है जो शक्तिहीन हो। जो मनुष्य पदार्थों की शक्ति से जितना परिचित और जितना प्रयोग करना जानता है वह उतना ही उन्नत और उच्च समझा जाता है। शक्तिमान पुरुष जब चाहे तब संसार का मानचित्र बदल सकता है। जो साधक विचारशील हैं तथा यह जानते हैं कि साधनाओं से ही शक्ति की अराधना हो सकती है। वे साधक सदैव ही दस महाविद्या तत्वों को धारण करने अथवा प्राप्त करने के लिये प्रयासरत रहते हैं।
यदि ध्यान से देखा जाय तो संसार में प्रत्येक जीव का मुख्य लक्ष्य सुख की प्राप्ति और दुःख की निवृत्ति करना ही है। शक्ति का अर्थ है बल, पौरूष तथा सामर्थ्य, छोटे-से-छोटा काम, यहाँ तक अपनी कनिष्ठा उँगली उठाने के लिये भी हमें शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। जिस शक्ति से संसार का सारा काम, पशु-पक्षी, वृक्ष आदि सबका कार्य सम्पन्न होता है, वह सभी दृश्य-अदृश्य शक्तियां दस महाविद्या की शक्तियों से ही सम्भव है। समस्त सिद्धियां भी शक्ति के ही सापेक्ष हैं। साधक को चाहे जिस प्रकार भी सिद्धि प्राप्त करनी हो, वह उसके आत्मशक्ति के अनुशीलन बिना प्राप्त होना असंभव है। शक्ति की साधना, ज्ञान और उसके प्रयोग से भूचर मनुष्य भी खेचर बन जाता है।
मनुष्य के अंदर असीमित शक्तियाँ विद्यमान हैं; जिसे ‘कुण्डलिनी शक्ति’ कहते हैं। महाविद्यायें इन्हीं ‘कुण्डलिनी शक्तियों’ का प्रतिनिधित्व करती हैं। अतः इस दिव्य यंत्र को धारण करने से साधक स्वयं ही चैतन्य होने लगता है। उसके अन्दर व्याप्त नकारात्मक विचार-चिन्तन स्वयं ही नष्ट होने लगते हैं तथा जीवन में चैतन्यता युक्त सुस्थितियां व्याप्त हो जाते हैं।
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