





सद्गुरूदेव से मंत्रोपदेश प्राप्त होकर अगर सही रूप से उच्चारण किया जाय तो यह तुरंत प्रभाव दिखाता है और इच्छित मनोकामना पूर्ण होती है। ठीक औषधि और मंत्र की तरह रत्नों में भी विशेष शक्तियां और प्रभाव होते हैं जिसकी वजह से उनको धारण करने से व्यक्ति विशेष की बाधाएं, अड़चने समाप्त हो कर श्रेष्ठता, सफलता तथा भौतिक पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।
रत्नों की चेतना के अनुसार उससे संबंधित ग्रहों का प्रभाव रहता है, जिन दूषित ग्रहों के प्रभाव से मानव जीवन में दुःख दरिद्रता, अकाल मृत्यु, धन हीनता, मानसिक, शारीरिक पीड़ा आदि अनेक अनेक व्याधियों से मनुष्य ग्रसित हो जाता है। उन दूषित ग्रहों को पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर, जीवन में पूर्ण रूप से भौतिक-आध्यात्मिक मनोरथों की पूर्णता और धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है।
मूनस्टोन (चद्रमणि) : सफेद रंग का पुखराज चंद्रमणि कहलाता है । जिस जातक की जन्म कुण्डली में चंद्र ग्रह दूसरे, छठे, आठवे अथवा राहू केतु के साथ युक्त हो तो उसके जीवन में क्षीणता, दुर्बलता, अशुभता आती है। इसके निवारण हेतु चंद्रमणि गले में पहननी चाहिए। एक ही साथ में मोती और चंद्रमणि पहना जाय तो तुरंत वांछित फल प्राप्ति होना प्रारम्भ होती जाती है तथा विशेष प्रभावशाली योग बन जाते हैं।
श्वेत, नील और गोरी हिसाब से तीन प्रकार का चंद्रमणि मिलता है। श्वेत चंद्रमणि शुभ्र, चमकदार होता है तथा इससे रक्त संबंधी विकार, मानसिक असंतोष, नामर्दी और मूत्र विकार दोष और आतंरिक रोगों से पीड़ित रोगी को चन्द्रमणि धारण कराने से आरोग्यता और दीर्घायुता की प्राप्ति होती है।
नील शंख चंद्रमणि के ऊपर एक नीले रंग की पतली धारी दिखाई देती है। इसके पहनने से शरीर पर विष का असर नहीं होता। जंगलों में घूमने वाला अथवा व्यापारिक भ्रमण करने वाला तथा विषधरों से युक्त जीवों से सुरक्षित रहने के लिए इसका पहिनना पूर्ण लाभदायक तथा उपयोगी रहता है।
पन्ना : पन्ना बुध ग्रह का रत्न कहा गया है। इसे संस्कृत में मर्कत मणि, अंग्रेजी में एमराल्ड कहते हैं। इसका रंग मुख्यतः हरा होता है ।
पन्ना मुख्यतः पांच रंगों में प्रकृति से उपलब्ध होता है।
1 तोते के रंग के समान रंग वाला
2 हरे पानी के रंग के समान
3 सरेस क पुष्प के रंग समान
4. मयूर पंख समान
5 हलके सेंदूल पुष्प के समान
गुण : पन्ना चिकना, पारदशीवत, तेजस्वी, चमकदार, हरा रंग, पत्थरों की अपेक्षा कोमल होता है।
पन्ने की विशेषता व धारण करने से लाभ :
समस्त रत्नों में पन्ने को काफी महत्व दिया गया है, क्योंकि इसको धारण करने से शरीर और मन की विचलितता, मानसिक तनाव, अकस्मात क्रोध, आधा सरदर्द, चिडचिड़ाहट और चित्त की विकलता मिटती है। विद्यार्थिओं को यदि पन्ना धारण कराया जाये तो बुद्धि कुशाग्र और तीक्ष्ण होती है एवं सरस्वती की कृपा बनी रहती है तथा ज्ञान में निरन्तर वृद्धि होती है, चेतना और बुद्धि में श्रेष्ठा आती है। यह अनेक जटिल रोगों से मुक्त होने हेतु रोगियों के लिए बलवर्द्धक, आरोग्यदायक एवं शारीरिक सुख देने वाला है।
जिस घर में यह रत्न होता है, वहां अन्न-धन की वृद्धि, सुयोग्य संतानवृद्धि, भूत-प्रेत-बाधा शांत तथा अकाल मृत्यु बाधा भय का नाश होता है। जिस पुरूष या स्त्री के गले में मंत्र सिद्ध चैतन्य पन्ना धारण किया होता है, उस पर काला जादू, टोने-टोटके तथा मैली क्रियाओं का असर न्यून हो जाता है। यदि प्रातः: काल पन्ने को पाँच मिनट साफ पानी में फिरावे और फिर उस पानी से आँखें पर छीटें मारे जायें तो नेत्र रोग होते ही नहीं हैं, और आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है तथा काला पानी, मोतिया अथवा अन्य आंखों से सम्बन्धित बीमारी का प्रभाव जीवन में नहीं आता है। गर्भिणी स्त्री यदि अपनी कमर पर बांध ले तो पूर्ण समय में स्वस्थ संतान की प्रसव क्रिया होती है।
पन्ना वैवाहिक जीवन में मधुरता, संतान की प्राप्ति तथा धन वृद्धि वाला रत्न है। यह आंखों की रोशनी बढ़ाता है। पन्ना धारित व्यक्ति के विरूद्ध कोई भी राजकीय षड़यंत्र अथवा शत्रुओं द्वारा की गई कोई भी क्रिया सफल नहीं होती है। ऐसी मान्यता है कि प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को मंत्र सिद्ध पन्ना भेंट करते हैं तो प्यार अवश्य ही सफल होता है। पन्ना पहनने से शरीर में बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है। इसे धारण करने से मन एकाग्र होता है। पन्ना व्यक्ति को संयमित करता है तथा मानसिक शांति प्रदान करना है। बुध ग्रह का संबंध वाणी से होता है अतः पन्ना दमा, शोध, श्वांस, हकलाना आदि परेशानियों और बीमारियों से मुक्ति में अति लाभकारी होता है, जिन व्यक्तियों के पास धन नहीं रूकता, उन्हें पन्ना् अवश्य धारण करना चाहिए।
पथरी, डायबिटीज, आधा सीसी सरदर्द, बवासीर, ज्वर, गुर्दा, रक्त संबंधी रोग, चर्म रोग संबंधी बिमारी, नेत्ररोग तथा नामदी, मानसिक अशांति, बुद्धि मदान्धतता, स्मरण शक्ति हीनता आदि विकारों से निर्मुक्त होने में पन्ना का सफल उपयोग किया जा सकता है।
स्वर्ण या कांसा धातु में तीन रति पन्ना को जड़वा कर गले में धारण करने से शारीरिक मानसिक विकारों से मुक्ति प्राप्त होती है। धारण के समय निम्न मंत्र का जप करें।
।। ऊँ ह्रां ह्लीं बुं ग्रहनाथ बुधाय नम:।।
हीरा : हीरा शुक्र ग्रह का रत्न है। संस्कृत में इसे बज्रमणि या इंद्र मणि और अंग्रेजी में डायमण्ड कहते हैं। यह रत्नराज कहलाता है, हि क्योंकि अन्य समस्त रत्नों से अधिक मूल्यवान और दुर्लभ होता है। समस्त देवतागण इसे मुकुट पर धारण करते हैं। भाग्यवान पुरूष ही हीरा को धारण कर पाते हैं।
हीरा मुख्यतः आठ प्रकार के होते हैं।
1 अत्यंत सफेद
2 कमलासन हीरा
3 वनस्पति हीरा
4 वासंती हीरा
5 नीलक हीरा
6 श्यामल हीरा
7. तेलीया हीरा
8. पीत हीरा
गुण : यह चमकदार, चिकना, हाथों मे से फिसलने वाला, किरणें निकालने वाला, अंधेरे में यह जुगनु की तरह चमकने वाला, यह अच्छे पानी तथा अच्छे घाट का होता है।
हीरा की विशेषताएं तथा धारण करने से लाभ
हीरा धारण करने से शुक्र ग्रह से सम्बन्धित समस्त दोष शांत हो जाते हैं। जिस व्यक्ति की कुण्डली में शुक्र ग्रह निर्बल है मंगलदोष, शनि की साढे साती, व्यतिपात योग अथवा जिनकी राशि वृष, कर्क, कन्या, तुला मकर अथवा मीन राशि है वह हीरा धारण करके दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल सकते हैं।
हीरा बहुत लाभकारी होता है, जो व्यक्ति इसे धारण करता है उसके चेहरे पर तेज रहता है, चेहरे पर हर समय मुस्कान रहती है । जीवन में श्रेष्ठता और उच्चताऐं प्राप्त करने के लिए जो प्रयास करने पड़ते हैं, उसकी शक्ति और ऊर्जा मनुष्य में अनायास ही आने लगती हैं। हीरा धारण करने से धन-धान्य में वृद्धि होती है।
यह व्यक्ति की शारीरिक विवशताओं को दूर करके शरीर में नवीन क्रांति का संचार करता है तथा मानसिक दुर्बलताओं का अंत करता है, जिससे दाम्पत्य जीवन सुखमय व्यतीत होता है। हीरा धारण करने से भूत-प्रेत बाधा दूर होती है, जादू-टोने का असर नहीं होता। अन्धेरे से भय, दिल में डर और टांगों में कम्पन्न की क्रिया बार-बार होने पर हीरा धारण करना अनुकूल रहता है। सहवास क्रिया के समय स्तम्भन शक्ति में वृद्धि होती है। यह अकारण क्रोध को समाप्त करता है तथा शान्त चित्त की वृद्धि में सहायक रहता है, अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति में सहायक होता है। इसमें वशीकरण करने की अपूर्व क्षमता होती है, इसे पहिनकर युद्ध में जाने से विजय प्राप्त होती है।
शत्रुओं को परास्त एवं वश में करने की इसमें अटूट क्षमता होती है। बुद्धि, सम्मान, बल एवं शरीर की पुष्टता हीरा धारण करने से स्वतः ही बढ़ती है। कला के प्रति आग्रह रखने वाले व्यक्ति को इस रत्न को धारण करना सिद्धदायक होता है।
मंदाग्नि, शीघ्रस्खलन, संतान उत्पन्न करने में अक्षम, नामर्द, दुर्बल, अशक्ती शरीर, अतिसार, अजीर्ण, वायु प्रकोप, चक्षुरोग आदि में हीरा का प्रयोग सर्वोत्तम रहता है।
शुक्रवार के दिन चांदी या सोने की अंगूटी में लगभग एक रत्ति हीरा को जड़वा कर गले में निम्न मंत्रोच्चारण के साथ धारण करें।
मंत्र : ।। ऊँ ऐं जं गीं शुक्राय नम:।।
नीलम : नीलम शनि ग्रह का रत्न है।
संस्कृत में इसे इंद्र नीलमणि कहते हैं। अंग्रेजी भाषा में सेफायर टरग्युज, ब्लू सेफायर कहते हैं ।
गुण: इसका रंग नीला होता है परंतु मोर पंख के रंग के नीलम सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। यह चमकीला होता है तथा पतली पतली नीली किरणें सी निकलती दिखाई देती है।
चिकना, स्पष्ट साफ, पारदर्शीवत्, इसका पानी श्रेष्ठ होता है तथा इसके कोण सुडौल होते हैं।
नीलम कीं विशेषताएं तथा धारण करने से लाभ :
नीलम पहनने से शनि से सम्बन्धित समस्त दोष शांत हो जाते हैं। नीलम के विषय में कहा जाता है कि यह रत्न सबसे शीघ्रता से अपना प्रभाव दिखाता है। नीलम का प्रभाव शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार का होता है। इसलिये नीलम परीक्षण करने के उपरांत पूर्ण चेतन्य मंत्र सिद्ध कर धारण करने वाले साधक से सम्पुटित किया जाना चाहिये।
नीलम का शुभ या अशुभ प्रभाव जानने के लिये नीलम को दाहिने हाथ में नीले कपड़े की सहायता से बांध लेना चाहिये अथवा रात में सोते समय लगातार पांच दिवस तक अपने तकिये के नीचे रख लेना चाहिये। इससे यदि आपको कुछ नुकसान न हो तथा शुभ स्वप्न आयें या शुभ समाचार मिलें तो नीलम पहनना शुभ है, यदि विपरीत परिस्थितियां बनें तो नीलम पहनना अशुभ है और यदि परिस्थितियां समान रहें तथा कुछ भी महसूस न हो तो भी नीलम पहनना शुभ है, परंतु नीलम मेष, वृष, सिंह, कन्या, मकर तथा कुम्भ राशि वालों को कभी भी नुकसान नहीं पहुंचाता है। नीलम शनि की साढ़े-साती का दुष्प्रभाव दूर करता है। यह यदि अनुकूल पड़े तो धन-धान्य, सुख-संपत्ति, मान-सम्मान, यश-गौरव, आयु, बुद्धि, बल तथा वंश की वृद्धि करके जीवन को अलौकिक आभा मण्डल से चमका कर जीवन में सुचिता, श्रेष्ठता तथा ऐश्वर्य वृद्धि में सहायक रहता है। नीलम खोई संपत्ति को वापिस दिलाता है, इसे धारण करके मन पवित्र होता है तथा दुष्कर्मों से मुक्ति मिलती है, मन सत्कर्म में लगता है। सत्य, दया, परोपकार के विचार धारणकर्त्ता के चित्त में बसने लगते हैं। ट्रांसपोर्टर, जमीन जायदाद, टेकेदारी, कारखानेदार, व्यापारी, पुलिस ऑफिसर आदि को यह विशेष तरक्की दिलवाता है तथा नौकरी, व्यापार में उन्नति करता है। जिनके बाल झड़ रहे हों तथा बालों में खुजली रहती हो वह नीलम धारण करके इन परेशानियों से मुक्ति पा सकते हैं। नीलम के बारे में यह कहावत सर्वविदित है कि नीलम यदि माफिक पड़े तो यह रंक (भिखारी) को भी रातों-रात राजा बनाने की क्षमता रखता है, समाज में इसके बह्धा उदाहरण हैं कि जिन व्यक्तियों को नीलम पूर्ण रास आ गया उनकी किस्मत बहुत कम समय में मुक्कदर का सिकन्दर बनी है तथा जिनको मध्यम रास आया है उनको भी फायदा ही है। नीलम दिन-दूनी रात चौगुनी उन्नति प्रदान करता है।
आंखों के रोग, मोतिया, खांसी, उल्टी, रक्तं विकार, विषम ज्वर, पागलपन की बीमारी में नीलम भस्म का प्रयोग, विभिन्न प्रकार वात रोग, मिगी, स्नायुविकार में नीलम का प्रयोग तुरंत फलदायक सिद्ध होता है।
पंचधातु या सोने में निर्मित करवा कर शनिवार के दिन हो सके तो ६ रत्ति या कम से कम चार रति जडवा कर गले में निम्न मंत्र का जप कर धारण करें।
मंत्र : ।। ऊँ हीं ऐं श्री शनिश्चराय नमः ।।
गोमेद : गोमेद मुख्यतः राहु का रत्न है। इसे संस्कृत में गोमेद तथा अंग्रेजी में हाईसोनाईट, जिरकन भी कहते हैं।
गुण : अच्छे जाति का गोमेद चमकदार, सुदर, पारदशीं, चिकना, अच्छे घाट का तथा उज्ज्वल होता है। यह उल्लू के आंखों के समान दिखाई देता है।
गोमेद कीं विशेषताएं तथा धारण करने से लाभ:
गोमेद राहू ग्रह का प्रतिनिधित्व रत्न है, अतः गोमेद धारण करने से राहू ग्रह के अनिष्ट प्रभाव शांत होते हैं। राहू ग्रह के प्रकोप से मानसिक तनाव बढ़ता है, छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आता है, कार्यकुशलता में निर्णायक कमी आती है, निर्णय लेने की क्षमता क्षीण हो जाती है तथा योजनायें असफल हो जाती हैं।
ऐसे व्यक्तियों को गोमेद अवश्य धारण करना चाहिये। गोमेद धारण करने से शत्रु पक्ष कमजोर होता है तथा शत्रु गोमेद धारण करने वाले के समक्ष टिक नहीं सकता है, इससे शत्रुओं का भय समाप्त होता है, शत्रुओं पर विजयश्री प्राप्त होती है। गोमेद मुकदमे के मामले में, कोर्ट-कचहरी के कार्यों में विशेष शुभकारी है। उदर रोगों का कारण भी राहु ग्रह को माना गया है, अतः गोमेद धारण करने से पाचन तंत्र मजबूत होता है, जिससे पेट संबंधित रोगों में शांति मिलती है। जिन बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता है तथा चंचलतावश मन छटपटाता रहता है, उन बच्चों को गोमेद का लॉकेट पहना देना चाहिये। इसे धारण करने से समस्त रूके हुए कार्य पुनः गति प्राप्त करते हैं। इस रत्न को पहनने के लिये राशि का विचार नहीं किया जाता है। यह रत्न प्रत्येक राशि वर्ण के लिये फलप्रद है ।
बल, बुद्धि, कांति, शक्ति, वीर्य, शारीरिक आरोग्यता को बढ़ाने के लिये, मिर्गी, वायु, बवासीर आदि रोगों में, गमी, प्लीहा, ज्वचर, शिरोगत रोग, सीफलिस, गनेरिया आदि रोगों के लिये गोमेद का प्रयोग करना उचित तथा लाभदायक रहता है।
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