





संन्यासी का तात्पर्य यह नहीं है, कि वह जंगल में रहता है या भगवे कपड़े पहनता हो अथवा अपनी मर्जी से जीवन बिताता हो, अपितु संन्यासी का तात्पर्य यह है कि वे गृहस्थ में रहते हुए भी गृहस्थ की झंझटों से अपने आपको बचाए रख सके, जो निरंतर और निरंतर साधना की ओर अग्रसर हो, और जिसके मन में यह बलवती इच्छा हो कि मैं अपने जीवन में साधना में अवश्य ही सफलता प्राप्त करूंगा – कुण्डलीनी जागरण, दस महाविद्या, स्वर्ण विज्ञान, आयुर्वेद विज्ञान या किसी भी एक क्षेत्र में पूर्णता के साथ सफलता प्राप्त करूंगा ।
वर्णाश्रम व्यवस्था में संन्याश्रम आयु का यह चतुर्थ भाग होता है, जिसमें व्यक्ति अपने सांसारिक दायित्वों को पूर्ण कर पूर्ण रूप से वैरागी हो जाता है। परंतु पूज्य गुरूदेव ने तो गृहस्थ संन्यास के महत्व को ही प्रेरित किया है, अर्थात् परिवार के मध्य पूर्ण प्रेम भाव से रहते हुए भी निर्लिप्त रहना और जिस दिन व्यक्ति के मानस में ऐसा चिंतन आ जाए, तो वह दिन ही उसके लिए संन्यास दिवस हो जाता है शास्त्रों में मान्यता है कि संन्यास दिवस के अवसर पर साधक या शिष्य प्रयत्न करके भी गुरू चरणों में अवश्य पहुंचे भक्ति भाव के साथ उनके चरणों में बेठे और अगले एक वर्ष के लिए किसी एक साधना और जीवन क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करने का संकल्प करे। वह गुरू के सामने यह शपथ ले कि मैं यह एक वर्ष आपके श्री चरणों में समर्पित कर रहा हूं, मेरी इच्छा और आकांक्षा अमुक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की है, इसके साथ ही साथ वह गुरू से उस गोपनीय विद्या की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करें ।
गुरू तो कोई भी ज्ञान या जानकारी शिष्य को देने का प्रयत्न करता ही है, वह इस बात को देखता रहता है कि शिष्य में कितनी परिपक्वता या कितना स्नेह-सम्बंध आ पाया है । वह जितना ही ज्यादा गुरू के प्रति समर्पित होगा, वह जितना ही ज्यादा गुरू की साधना में लीन होगा गुरू उतनी ही तेजी के साथ उसे उस ज्ञान को देने का प्रयत्न करेंगे, इसके लिए पूरी क्रिया और प्रयास शिष्य की तरफ से ही होता है।
और यदि गुरू के द्वार तक पहुंचना संभव न हो या कुछ ऐसी परिस्थितियां आ जाय जिसकी वजह से यात्रा न कर सके, या गुरू से प्रत्यक्ष न मिल सके तो अपने घर में ही स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर गुरू चित्र के सामने बेठ जाय और पूर्ण विधि विधान के साथ गुरू पूजन करे और हाथ में जल लेकर यह दृढ़ संकल्प करे कि मैं यह पूरा वर्ष गुरू चरणों मे लीन करता हुआ अमुक साधना में पूर्णता प्राप्त करने के लिए ही व्यतीत करूंगा और अमुक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करूंगा ।
इसके साथ ही साथ जब वह ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेता है तो उच्चकोटि के योगी, संन्यासी और उसके प्रिय गुरू का भी पूर्ण प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है, जिससे वह अवश्य ही अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेता है।
वह जीवन ही क्या जो गुमनामी के साथ व्यतीत हो जाय, उस जीवन का मकसद ही कया, जिसके द्वारा आप हजारों लाखों लोगों का कल्याण न कर सके, वह जीवन जीवन कहा ही नहीं जा सकता, जो पूरे देश में प्रसिद्धि प्राप्त न कर सके, जो अपने जीवन में अपने आप को अद्वितीय न बना सके और जो साधना के क्षेत्र में पूर्ण सफलता न प्राप्त कर सके।
यह दिवस “दृढ़ संकल्प दिवस’ है, मनोयोग पूर्वक पूर्ण निश्चय का दिवस है, मन के चिंतन और आत्मलोचन का दिवस है। यह दिवस इस बात का साक्षी है, कि मैंने अपने नींवन में अब तक क्या प्राप्त किया है ? और मुझे क्या प्राप्त करना है ? मैंने अब तक नो नींवन बिंताया है, उसका क्या प्रयोजन रहा है, और मुझे इस वर्ष में नींवन की पूर्णता के लिए क्या, कार्य, क्या साधना संपन्न करनी चाढिए, और यदि ऐसा आत्म विश्लेषण शिष्य दृढ़ता पूर्वक कर लेता है, तो यह दिन उसके लिए परिवर्तनकारी और सौभाग्यशाली होता है ।
ऊपर टिप्पणी में संन्यास सिद्ध पंचरत्न का उल्लेख आया है, साधना में या जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्ति के लिए संन्यासी इन पंचरत्नों का प्रयोग करते हैं और इसीलिए वे दीर्घायु होते हैं, इसीलिए उनका शरीर स्वस्थ, बलशाली, सौंदर्ययुक्त और अत्यंत आकर्षक बना रहता है, इसीलिए हजारों लाखों भक्तक और व्यक्ति उनके चरणों में झुके रहते हैं, और इसीलिए ऐसे संन्यासी अद्वितीय व्यक्तित्व से युक्त होते हैं।
गुहस्थ साधक भी पंचरत्नों का प्रयोग कर सकता है, और इसके माध्यम से वह अपने जीवन में प्रत्येक दृष्टि से पूर्णता सफलता और श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है।
यह अंगूठी के आकार का महत्वपूर्ण कंकण माना गया है। जिसे संन्यासी अपनी ऊंगली में धारण किये रहते हैं, इसके माध्यम से उन्हें अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती रहती है, एक प्रकार से देखा जाय तो उनके जीवन में कठिन या असंभव नाम की कोई चीज नहीं होती। प्राचीन समय से ही संन्यासियों को सिद्ध कंकण पहिनने की सलाह दी गई है, जिससे कि वे अपने जीवन में निश्चित और निर्भीक हो सकें, वे अपने जीवन में आगे बढ़ सकें और सफलता प्राप्त कर सकें।
इसके निर्माण में रांगा, सीसा, जस्ता, चुम्बक पत्थर अथवा सिद्ध धातु में से किसी एक धातु को कूट पीस कर कपड़े से छान कर उसकी पिस्टी बना लेनी चाहिए और फिर इसे गूलर के दूध में घोंट कर खूब कूटना चाहिए, कूटते कूटते जब इसमें से तार निकलने लगे, तब उसे अग्नि में जारण कर उसे चिकना और कड़ा बना देना चाहिए और उस गर्म तार की मुद्रिका बनाकर जब वह लाल सुर्ख हो, तब उसे जाग्रत पारे में डुबो कर सिद्ध कर लेनी चाहिए, इसी को ग्रंथों में सिद्ध कंकण कहा गया है, यह अपने आप में अद्वितीय और दुर्लभ होता है, और प्रत्येक संन्यासी के लिए तो एक प्रकार से अनिवार्य हे ही, प्रत्येक साधक के लिए तो उपयोगी और आवश्यक भी हे।
किसी भी शुभ दिन इस कंकण को अपनी उंगली में धारण कर लेना चाहिए जिससे कि साधना के क्षेत्र में उसे निरंतर सफलता प्राप्त होती रहे । ऐसा कंकण निरंतर शरीर को स्पर्श किये रहता है जिससे शरीर में बराबर विद्युत प्रवाह बनी रहती है, शरीर रोग रहित, सुंदर, आकर्षक और अद्वितीय बन जाता है और यदि श्रद्धापूर्वक उसे धारण किये रहे, तो उसके जीवन के प्रत्येक कार्य सफल होते रहते हैं। एक प्रकार से देखा जाय तो साधना और सिद्धि के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्लभ कंकण कहा गया है।
तंत्र ग्रंथों में यह बताया गया है कि गृहस्थ को यदि अपने प्राण प्रिय है, अपना शरीर प्रिय है तो उसे यह कंकण भी उतना ही प्रिय होना चाहिए क्योंकि इसी के द्वारा वह प्रत्येक कार्य में सिद्धि और सफलता प्राप्त करने में सफल हो पाता है।
हकीकत में देखा जाय तो इसको “योगी कड़ा” या ‘संन्यासी कड़ा”? कहा जाता है। गोरखनाथ ने इसे जल कड़ा या जलमुद्रा कहा है । अपने हाथ की कलाई में संन्यासी लोग इस प्रकार का कड़ा धारण किये रहते हैं।
संन्यासियों के लिए या गृहस्थ व्यक्तियों के लिए यह कड़ा पूर्ण सौभाग्य शाली माना गया है। ऐसे कड़े को वे हृदय की सातो परतों में छिपा कर रखते हैं, कुछ योगी इसे अपने हाथ में धारण भी कर लेते हैं ।
इसके माध्यम से गृहस्थ पर किसी प्रकार का मारण या मोहन या वशीकरण की क्रिया नहीं हो पाती। एक प्रकार से वह निर्भय और निश्चिंत बना रहता है। यदि गृहस्थ इस कड़े को धारण करता है, तो उस पर किसी प्रकार की तांत्रिक क्रिया का प्रभाव नहीं हो पाती | भूत-प्रेत, पिशाच आदि उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। वह जहां कहीं भी रहता है,, शत्रुओं से पूर्णतः सुरक्षित रहता है। शत्रु अपने आप परास्त होते रहते हैं और किसी भी प्रकार से शत्रु ऐसे व्यक्ति पर न हावी हो सकते हैं और न उसके शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे व्यक्ति को किसी प्रकार की बाधा या अड़चन नहीं आती है।
कड़े के निर्माण में तीन धातुओं को परस्पर मिला कर उसके उपर चेतन्य पारे का लेप किया जाता है, और फिर उसे जल मुद्रा में बांधा जाता है क्यों कि धातु पर पारे का लेप करना अत्यंत कठिन है। इस प्रकार से जल बंधन कर फिर उसे अग्नि ताप दे कर कड़े को पूर्ण कठोर बनाया जाता है। यदि इसके निर्माण में थोड़ी सी गलती होती है तो सारा रसायन चोपट हो जाता है और वह कड़ा किसी लायक नहीं रहता, यह सारी क्रिया कठिन है, और इस प्रकार का कड़ा निर्माण करने पर काफी व्यय आ जाता है। मगर इतना व्यय करने के बावजूद भी यह कड़ा बन जाय तो सौभाग्य ही समझना चाहिए।
संन्यासी इस कड़े को धारण करते हैं या झोली में रख देते हैं। गहस्थ इस कड़े को पहिन सकते हैं या सुरक्षित रख सकते हैं। वास्तव में ही यह जल कड़ा सौभाग्य दायक और श्रेष्ठ माना गया है।
यह ताबीज के आकार का अत्यंत दुर्लभ रसायन युक्ता होता है, जिसे प्रत्येक संन्यासी अपने गले में धारण किये रहता है। योगियों ने इसको गन्डा भी कहा है। इसके माध्यम से संन्यासी को कई प्रकार की सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती है । इसको धारण करने के बाद जब साधक तांत्रिक साधना संपन्न करे, तो उसे निश्चय ही शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है।
अनुभव में आया है कि वज्रदण्ड जहां साधक को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, सैकड़ों शत्रु मिल कर के भी उसका किसी प्रकार से कोई अहित नहीं कर सकते, हर क्षेत्र में शत्रु परास्त रहते हैं। साथ ही साथ इस वज्रदण्ड की यह विशेषता होती डै कि कुछ सिद्धियां तो उसे स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। भूत-प्रेत सिद्धि या भूतों को वश में करना, उनसे मनचाहा कार्य करवा देना, तीव्र और उग्र साधनाओं को सिद्ध करना, योगिनीयों को वश में करके उनसे मनचाहा द्रव्य प्राप्त करना, आदि साधनाएं थोड़े से प्रयत्न से ही सिद्ध हो जाती है।
इस वज्रदण्ड के द्वारा ही संन्यासी अपने भक्तों के कई कार्य सम्पन्न कर लेते हैं और वह सिद्ध माना जाता है। इस प्रकार के वज्रदण्ड के निर्माण के लिए निवडग तथा थूहर को मिलाकर एक गोल गोली को घोट कर उसे वज्रदण्ड के रूप में सिद्ध किया जाता है। फिर इसे ताबीज में भर कर धारण किया जाता है। इस सारी क्रिया पर भी काफी अधिक व्यय हो जाता है। ऐसा वज्रदण्ड कोई भी पुरूष या स्त्री धारण कर सकते है जो जीवन में पूर्ण सफलता चाहते है।
संन्यासियों में यह इसी नाम से पुकारा जाता है और यह अंगूठी के आकार का होता है, ही गुरू गोरखनाथ ने कहा है, कि जो पूरे संसार पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं, जो पूरे संसार पर राज्य करना चाहते हैं उनको यह विश्वबेधी सुदण्ड धारण करना चाहिए ।
इसमे वशीकरण की अन्यतम विशेषता होती है। उच्चकोटि के गृहस्थ साधक या संन्यासी इसे अंगूठी में धारण किये रहते हैं। इसकी विशेषता यह है कि इसके सामने किसी स्त्री या पुरूष की नजर इस मुद्रिका पर पड़ जाती है तो वह स्वतः वश में हो जाती है, वह वश में बना रहता है और जीवन भर उस वज्रदण्ड या धारण करने वाले व्यक्ति की आज्ञा मानता रहता है।
एक प्रकार से देखा जाय तो यह सम्मोहन अथवा वशीकरण मुद्रिका है इसके निर्माण में बड़ के दूध में पारद को बांध कर फिर उसमें धातु का जारण किया जाता है ओर उस में अग्नि वेध कर उसे मुद्रिका रूप में सिद्ध किया जाता है और इसमें दूसरों को सम्मोहित करने या वशीकरण करने की अद्भुत क्षमता आ जाती है।
ऐसा साधक विश्व में कहीं पर भी असफल नहीं होता और संपूर्ण विश्व को अपने वश में करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है। साधक स्वयं इस प्रकार की मुद्रिका तैयार कर अथवा कहीं से भी प्राप्त कर संन्यास दिवस को धारण कर जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकता है।
इसे “गोरख कंकण” भी कहा जाता है, किसी पात्र में समुद्र का जल भर कर आंच पर रख कर उसमें धीरे-धीरे मधु का जारण किया जाता है । जब यह मोम बन जाये तो उसमें पारे का संस्कार कर उस मोम को त्रिधातु पर लपेट कर चौबीस घण्टे उसे समुद्र जल में ही पकाया जाता है, इससे इस प्रकार का कायाकल्प कंकण तैयार हो जाता है।
इसके धारण करने से स्वतः पूरे शरीर में परिवर्तन होता रहता है और यदि संन्यासी को या साधक को किसी प्रकार का रोग हो, तो वह निश्चित ही आरोग्यमय बन जाता है।
शास्त्रों में यह बताया गया है कि इस कड़े में रोग मुक्त करने की अद्भूत क्षमता है, यदि इस कड़े या मुद्रिका को रात भर पानी में रख कर सुबह वह पानी रोगी को पिला दे तो रोगी का रोग दूर होना शुरू हो जाता है।
इसमें तो कोई दो राय नहीं है कि इसे धारण करने वाले व्यक्ति के शरीर के रोग समाप्त होते ही हैं, उसकी वृद्धावस्था भी समाप्त होने लगती है, सिर पर काले और घने बाल आने लगते है, आंखों की रोशनी और शरीर में पूर्ण पौरूष के साथ-साथ वह एक ऐसा व्यक्तित्व बन जाता है, कि सामने वाला देखता ही रह जाता है।
एक प्रकार से धीरे-धीरे पूरे शरीर का कायाकल्प हो जाता है। वास्तव में ही यह अपने आप में दुर्लभ और सिद्ध “कायाकल्प मुद्रिका’ कही जाती है। इसे ग्रहस्थ साधक अथवा संन्यासी धारण किये रहते हैं, जिससे उनका शरीर दर्शनीय चमत्कारिक और आकर्षक युक्त हो जाता है।
ऊपर संन्यासी पंचरत्नों का विवेचन किया गया है। इन पांचों दुर्लभ वस्तुओं से ही संन्यासी संपूर्ण विश्व में सम्मान, यश, प्रसिद्धि और पूर्णता प्राप्त करने में समर्थ, सफल हो पाते हैं। इनको बिना किसी मंत्र जाप के द्वारा मात्र धारण किया जा सकता है।
वह जीवन ही क्या जो गुमनामी के साथ व्यतीत हो जाये उस जीवन का मकसद ही कथा, जिसके द्वारा आप हजारों लाखो लोगो का कल्याण न कर सके, वह जीवन कहा ही नहीं जा सकता, जो पूरे देश मे प्रसिद्धि प्राप्त न कर सके, जो अपने जीवन में अद्वितीय न बन सके, और जो साधना के क्षेत्र में पूर्ण सफलता न प्राप्त कर सके।
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